राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत ने ‘भारत में नकली दवाओं पर अंकुश लगाने के उपायों’ पर चर्चा आयोजित की


बैठक की अध्यक्षता करते हुए एनएचआरसी के सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि अगर अलग-थलग पड़ी नियामक चुनौतियों का निर्णायक और व्यवस्थित रूप से समाधान नहीं किया गया तो वे बड़े पैमाने पर मानवीय संकट का रूप ले सकती हैं

एनएचआरसी  की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने फार्मास्युटिकल इकोसिस्टम  में कड़ी निगरानी और जवाबदेही स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया

महासचिव श्री भरत लाल ने इस बात पर प्रकाश डाला कि नकली दवाएं घटिया दवाओं से अलग होती हैं, लेकिन इस खतरे से निपटने के लिए दोनों ही मामलों में समन्वित संस्थागत कार्रवाई की आवश्यकता

चर्चा के दौरान नकली और घटिया दवाओं पर एक व्यापक और केंद्रीकृत डेटाबैंक स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया, जिसमें प्रवर्तन एजेंसियों, नियामकों और राज्यों के सुझावों को शामिल किया जा सके

प्रविष्टि तिथि: 26 FEB 2026 4:36PM by PIB Delhi

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने नई दिल्ली स्थित अपने परिसर में ‘भारत में नकली दवाओं पर अंकुश लगाने के उपायों’ विषय पर हाइब्रिड मोड में एक खुली चर्चा का आयोजन किया। इसकी अध्यक्षता एनएचआरसी के सदस्य, न्यायमूर्ति (डॉ) बिद्युत रंजन सारंगी ने की। इस चर्चा में एनएचआरसी  की सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी; पूर्व सदस्य श्री राजीव जैन; महासचिव श्री भरत लाल; महानिदेशक (जांच) श्रीमती अनुपमा निलेकर चंद्रा; रजिस्ट्रार (विधि) श्री जोगिंदर सिंह; संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार और श्रीमती साइडिंगपुई छकछुआक ने भाग लिया। इनके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, नियामक, कानून प्रवर्तन अधिकारी, विशेषज्ञ और फार्मास्युटिकल क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भी इसमें शिरकत की।

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इस अवसर पर न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविध देश में, यदि नियामक चुनौतियों के मामलों का निर्णायक और व्यवस्थित रूप से समाधान नहीं किया गया, तो वे बड़े पैमाने पर मानवीय संकट का रूप ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि नकली, घटिया और जाली दवाओं से उत्पन्न बढ़ता खतरा और जीवन एवं स्वास्थ्य के अधिकार पर इसके सीधे प्रभाव को देखते हुए, मानवाधिकार उल्लंघन के इस गंभीर मुद्दे से निपटने के लिए आयोग समन्वित और बहु-क्षेत्रीय कार्रवाई की मांग करता है।

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एनएचआरसी की सदस्य, श्रीमती विजया भारती सयानी ने घटिया इलाज के मानवीय पक्ष और इसकी कीमत पर विचार साझा किए। उन्होंने याद किया कि कैसे उनके परिवार के एक सदस्य को अनुचित उपचार और खराब दवाओं  के उपयोग के कारण अपनी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए खोनी पड़ी। उन्होंने कहा कि फार्मास्युटिकल इकोसिस्टम में कड़ी निगरानी और जवाबदेही स्थापित करके इस मुद्दे पर तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

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एनएचआरसी  के पूर्व सदस्य, श्री राजीव जैन ने प्रवर्तन और अपराधियों में डर पैदा करने की प्रणाली को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिसमें उन्होंने अभियुक्तों के मुकदमों में तेजी लाने के लिए विशेष औषधि अदालतों की स्थापना, वास्तविक समय में दवाओं के परीक्षण की व्यवस्था और अनिवार्य क्यूआर कोड के साथ-साथ ब्लॉकचेन-आधारित ट्रैक-एंड-ट्रेस आपूर्ति श्रृंखला प्रमाणीकरण पर जोर दिया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने केवल एनएबीएल मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं के अनिवार्य उपयोग, वितरण पैटर्न में विसंगतियों को पकड़ने के लिए एआई-आधारित तकनीक, औचक निरीक्षण, मामले की सूचना देने वालों की सुरक्षा में वृद्धि, डिजिटल केस ट्रैकिंग, नकली दवाओं का एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय डेटाबेस, बेहतर सार्वजनिक हेल्पलाइन और ई-प्रिस्क्रिप्शन से संबंधित नियामक सुरक्षा उपायों की समीक्षा करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

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चर्चा में एनएचआरसी के महासचिव श्री भरत लाल ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि मुख्य ध्यान नकली दवाओं पर है, लेकिन नकली और घटिया दोनों ही तरह की दवाएं जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार पर असर डालती हैं, जिसके लिए इस खतरे से निपटने हेतु समन्वित संस्थागत कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि नागरिक इस विश्वास के साथ दवाओं का सेवन करते हैं कि जीवन और गरिमा की रक्षा करना राज्य का दायित्व है और उन्होंने चेतावनी दी कि इस विश्वास में किसी भी प्रकार की चूक पीड़ितों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकती है। उन्होंने  इस बात पर जोर दिया कि  'दवाएं ठीक करने के लिए होनी चाहिए, नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं'। इसके साथ ही उन्होंने औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 17-बी के तहत परिभाषित 'नकली दवाओं' और 'घटिया दवाओं' के बीच स्पष्ट अंतर बताया। राष्ट्रीय औषधि सर्वेक्षण का हवाला देते हुए उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सरकारी नमूनों में से लगभग 10 प्रतिशत दवाएं घटिया पाई गई थीं।

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श्री लाल ने आगे कहा कि नकली दवाओं का उत्पादन और वितरण एक आपराधिक गतिविधि है, नकली दवा बनाने वाले की कोई स्पष्ट पहचान नहीं होती और इसलिए इनके लिए आपराधिक जांच की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, घटिया दवाओं के निर्माताओं का पता लगाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि एनएचआरसी नकली दवाओं के कथित सेवन से मानवाधिकारों के उल्लंघन की रिपोर्टों पर बहुत सक्रियता से स्वतः संज्ञान लेता रहा है। इस संदर्भ में, उन्होंने अक्टूबर 2025 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों के साथ-साथ केंद्रीय स्वास्थ्य और नियामक अधिकारियों को भेजे गए हालिया नोटिसों का उल्लेख किया। यह कार्रवाई उन मीडिया रिपोर्टों के बाद की गई थी जिनमें ख़राब कफ सिरप पीने से बच्चों की कथित मृत्यु की बात सामने आई थी। आयोग ने पूरी आपूर्ति श्रृंखला की व्यापक जांच के निर्देश दिए और राज्य की प्रयोगशालाओं को नमूनों की परीक्षण रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया, जो तत्काल की गई समन्वित नियामक कार्रवाई को रेखांकित करता है।

एनएचआरसी  के विशेष प्रतिवेदक डॉ. केशव कुमार, जिन्होंने इस विषय पर व्यापक शोध किया है, उन्होंने बेहतर निगरानी, केंद्रीय और राज्य-स्तरीय कार्यबल के गठन, नियमों का कड़ाई से पालन करने, विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल, कानून प्रवर्तन एवं न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण, पीड़ितों को मुआवजा देने और अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ सहयोग का प्रस्ताव रखा। उन्होंने मौजूदा समय में हो रही घटनाओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नकली दवाओं के मामलों में दोषसिद्धि बहुत कम मामलों में हो पाती है, जांच और न्यायिक निर्णय में काफी देरी होती है । उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "नकली दवाओं" (जो कि जाली, नकली या जानबूझकर गलत लेबल वाले उत्पाद हैं) और "घटिया दवाओं" (असली उत्पाद जो निर्धारित गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं करते हैं) के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करने की आवश्यकता है।

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गृह मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुश्री निष्ठा तिवारी ने नकली दवाओं की समस्या से निपटने के लिए मंत्रालय द्वारा किए गए प्रमुख क़दमों पर प्रकाश डाला, जबकि भारत के औषधि महानियंत्रक के संयुक्त औषधि नियंत्रक श्री चंद्रशेखर रंगा ने औषधि नियामक अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों जैसे समन्वित निरीक्षण, निगरानी प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण और निरीक्षकों के प्रशिक्षण का उल्लेख करते हुए नई चुनौतियों के लिए निरंतर तैयार रहने पर जोर दिया। साथ ही 'द ट्रुथ पिल' के लेखक श्री प्रशांत रेड्डी टी. ने कठोर गुणवत्ता आश्वासन और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए जैव समतुल्यता संबंधी चिंताएं व्यक्त कीं और यह स्पष्ट किया कि सभी जेनेरिक दवाएं अनिवार्य रूप से मूल अन्वेषक दवा  के समान प्रभाव नहीं दिखाती हैं।

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चर्चा में नियमों को लागू करने की भी समीक्षा की गई, जिसमें राज्यों के बीच समन्वित जांच, नकली दवा के मामलों में संगठित अपराध के प्रावधानों को लागू करना और अभियोजन, पुलिस क्षेत्राधिकार, पीड़ितों के अधिकारों एवं अदालती कार्यवाही से संबंधित उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के बदलते न्यायिक दृष्टिकोण पर विचार किया गया। अंत में, प्रतिभागियों को आयोग के समक्ष विस्तृत लिखित सुझाव प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया, ताकि आयोग अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप दे सके।

इस चर्चा में शामिल अन्य बहु-क्षेत्रीय प्रतिभागियों और हितधारकों में सुश्री अनुपमा जेम्स (एआईजी, राष्ट्रीय जांच एजेंसी); श्री पी. कृष्णमूर्ति (अध्यक्ष, एनपीपीए; सुश्री साई अहलादिनी पांडा (सदस्य सचिव, एनपीपीए); डॉ. केशव कुमार (सेवानिवृत्त आईपीएस, इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस); श्री ओम प्रकाश साधवानी (सेवानिवृत्त संयुक्त आयुक्त, एफडीए); डॉ. एन.आर. सैयद (उपायुक्त, खाद्य एवं औषधि नियंत्रण प्रशासन); डॉ. भूमिका पटेल (डीन, स्कूल ऑफ फार्मेसी, एनएफएसयु); डॉ. पी.के. शर्मा (प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष, फार्माकोलॉजी विभाग, एसएलबी मेडिकल कॉलेज); प्रो. (डॉ.) योगेंद्र कुमार गुप्ता (अध्यक्ष, एम्स कल्याणी); श्री अंकित गुप्ता (अध्यक्ष, एएसपीए); श्री हरीश के. जैन (राष्ट्रीय अध्यक्ष, एफओपीए); श्री नरेंद्र अहूजा (नियामक सलाहकार, एफओपीइ); श्री संदीप सिकारिया (एफओपीइ); डॉ. इलियास के.पी.ए. (उप निदेशक, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो) और श्री दुबे पाटिल (एफडीए आयुक्त, महाराष्ट्र) प्रमुख रूप से शामिल थे।

चर्चा के दौरान कुछ अन्य सुझाव इस प्रकार थे:

  • प्रवर्तन एजेंसियों, नियामकों और राज्यों से प्राप्त इनपुट्स को एकीकृत करते हुए नकली और घटिया दवाओं पर एक व्यापक, केंद्रीकृत डेटाबैंक स्थापित करने की आवश्यकता है;
  • पैटर्न की पहचान, आपूर्ति श्रृंखला मानचित्रण और जोखिमों का समय रहते पता लगाने के लिए तकनीकी हस्तक्षेप किए जाने चाहिए।
  • संरचित और समय-समय पर आयोजित होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से ड्रग इंस्पेक्टरों के क्षमता निर्माण को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
  • प्रशिक्षित अधिकारियों द्वारा अपनाई गई क्षेत्र-स्तरीय जांच प्रक्रियाओं का दस्तावेजीकरण करने के लिए एक औपचारिक तंत्र शुरू किया जा सकता है, जिसमें साक्ष्य संग्रह, अभियोजन रणनीति और अंतर-एजेंसी समन्वय शामिल है जिसे राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने के लिए एक मॉडल प्रोटोकॉल के रूप में काम किया जा सके;
  • एक निरंतर और खुफिया जानकारी पर आधारित सतर्कता ढांचा अनिवार्य है। निवारक निगरानी, बाजार से नमूने लेना और निरीक्षणों को मजबूत किया जाना चाहिए, जिसमें बार-बार अपराध करने वालों और आपूर्ति श्रृंखला के संवेदनशील केंद्रों की पहचान करने पर विशेष जोर दिया जाए।
  • प्रभावी नियामक का प्रदर्शन करने वाले राज्यों की सर्वोत्तम पद्धतियों को व्यवस्थित रूप से प्रलेखित, बेंचमार्क और अंतर-राज्य समन्वय मंचों के माध्यम से सभी क्षेत्राधिकारों में लागू किया जाना चाहिए।
  • नकली और घटिया दवाओं की निगरानी करने और उनसे निपटने के लिए समर्पित एक समन्वित केंद्र-राज्य संयुक्त प्रवर्तन तंत्र  स्थापित करने पर विचार किया जा सकता है।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाएं कि वर्तमान में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी) अदालतों या अन्य अधीनस्थ अदालतों के समक्ष लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर सक्षम सत्र न्यायालयों में स्थानांतरित कर दी जाए, जिसमें कहा गया है कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत अपराधों की सुनवाई केवल सत्र न्यायालयों द्वारा की जा सकती है।

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पीके/केसी/एसके/ डीए


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