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वित्तीय वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट: विनिर्माण क्षेत्र भारत के अगले विकास के चरण को गति प्रदान करेगा

प्रविष्टि तिथि: 12 FEB 2026 11:36AM by PIB Delhi

मुख्य बिंदु

  • वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में जीवीए में 7.72 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 9.13 प्रतिशत वृद्धि के साथ भारत के विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन सशक्त हुआ
  • भारत के विनिर्माण मूल्यवर्धन में मध्यम और उच्च प्रौद्योगिकी उद्योगों का योगदान 46.3 प्रतिशत है
  • केंद्रीय बजट 2026-27 में सात रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • समुद्री भोजन से लेकर माइक्रोवेव ओवन,जूते और विमान विनिर्माण तक के उत्पादों के लिए कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क में छूट दी गई है।
  • केंद्रीय बजट 2026-27 में 10,000 करोड़ रुपये के लघु एवं मध्यम उद्यम विकास कोष और आत्मनिर्भर भारत कोष में 2,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि के साथ अग्रणी लघु एवं मध्यम उद्यमों के निर्माण को बढ़ावा दिया गया है।

 

परिचय

भारत सबसे तेजी से बढ़ती औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है,जिसने वैश्विक औद्योगिक प्रदर्शन में असमानता के बावजूद लचीलापन प्रदर्शित किया है। जहां कैलेंडर वर्ष 2025 की तीसरी तिमाही में वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में मामूली 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं भारत ने इसी अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। यह प्रदर्शन घरेलू आधारभूत संरचनाओं की मजबूती और औद्योगिक विस्तार के लिए निरंतर नीतिगत समर्थन को दर्शाता है।

सुधारों,क्षेत्र-आधारित पहलों और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ,विनिर्माण 2047 तक भारत के 35 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा का ग्रोथ इंजन बना हुआ है। इस महत्व को पहचानते हुए,केंद्रीय बजट 2026-27 ने निवेश प्रोत्साहन,नवाचार,अवसंरचना विकास और औद्योगिक इकोसिस्टम को मजबूत करने पर केंद्रित उपायों के माध्यम से विनिर्माण के लिए समर्थन को सशक्त किया है।

विनिर्माण क्षेत्र तीन परिभाषित कर्तव्यों के आधार पर,भारत की वृद्धि, रोजगार सृजन, निर्यात प्रतिस्पर्धा और दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन को गति देने के लिए तैयार है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन


 
विनिर्माण क्षेत्र भारत की बढ़ती औद्योगिक गति का एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभर रहा है। पूंजीगत सहायता और नीतिगत सुधारों के चलते,उत्पादन,निवेश और कारोबारी भावना से जुड़े हाल के आंकड़े औद्योगिक और विनिर्माण गतिविधियों में निरंतर मजबूती का संकेत दे रहे हैं।

 

भारत के औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र की गति में मजबूती

भारत की औद्योगिक गतिविधि में निरंतर मजबूती रही है,वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में वास्तविक औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में वार्षिक आधार पर 7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह गति वर्ष के अंत तक जारी रही,क्योंकि दिसंबर 2025 में औद्योगिक उत्पादन में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई,जो दो वर्षों से अधिक समय में सबसे मजबूत वृद्धि है। इससे पहले नवंबर 2025 में 7.2 प्रतिशत(आरई) की उच्च वृद्धि दर्ज की गई थी।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में भी परिलक्षित यह वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र द्वारा संचालित है,जिसने दिसंबर 2025 में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसमें कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों (34.9 प्रतिशत), मोटर वाहनों और ट्रेलरों (33.5 प्रतिशत), और अन्य परिवहन उपकरणों (25.1 प्रतिशत) में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई।

हाल की तिमाहियों में विनिर्माण प्रदर्शन में और मजबूती आई है,वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में  जीवीए में 7.72 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 9.13 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसे उच्च मूल्य वाले उत्पादन की ओर क्रमिक बदलाव,बेहतर औद्योगिक बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी और औपचारिकीकरण की व्यापक स्वीकार्यता का समर्थन मिला हुआ है और जो सामूहिक रूप से पूरे क्षेत्र में बढ़ती औद्योगिक क्षमता को दर्शाता है।

मांग और कारोबारी उम्मीदों में सुधार से आत्मविश्वास बढ़ा

भारत के औद्योगिक क्षेत्र में भविष्य के संकेतक आशावाद को दर्शाते हैं जहां मार्च 2023 से विनिर्माण का क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) लगातार विस्तार क्षेत्र (50 के अंक से काफी ऊपर) में बना हुआ है। जनवरी 2026 में पीएमआई 55.4 पर था जो इसके दीर्घकालिक औसत से ऊपर है और जिससे इस क्षेत्र की स्थिति में निरंतर सुधार का संकेत मिलता है।

विनिर्माण क्षेत्र के संबंध में आरबीआई का औद्योगिक दृष्टिकोण सर्वेक्षण

  • कच्चे माल की लागत,वित्तपोषण लागत और वेतन व्यय से जुड़े दबावों में अपेक्षित कमी के कारण वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में व्यापार मूल्यांकन सूचकांक में पहली तिमाही की तुलना में सुधार हुआ है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही के लिए,विनिर्माता समूह मांग को लेकर आशावादी बना हुआ है और लागत के दबाव में कमी,बेहतर मूल्य प्राप्ति और स्थिर व्यावसायिक माहौल की उम्मीद कर रहा है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही और वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में मांग की स्थिति में और मजबूती आने की उम्मीद है।

 

प्रमुख क्षेत्रों के समर्थन से औद्योगिक विस्तार

उत्पादन के मोर्चे पर,क्षेत्र-आधारित रुझान संकेत दे रहे हैं कि भारी उद्योग और हल्का विनिर्माण दोनों ही समग्र वृद्धि को समर्थन दे रहे हैं। दिसंबर 2025 में आठ प्रमुख उद्योगों का सूचकांक (आईसीआई) 175.7 रहा,जो दिसंबर 2024 की तुलना में 3.7 प्रतिशत की अस्थायी वृद्धि दर्शाता है। इस दौरान सीमेंट,इस्पात,बिजली,उर्वरक और कोयले के उत्पादन में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।

सीमेंट: भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश बना हुआ है, जिसका उत्पादन वित्त वर्ष 2025 में लगभग 453 मिलियन टन तक पहुंच गया,जिससे अवसंरचना और निर्माण क्षेत्र के विस्तार को समर्थन मिला।

इस्पात: भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक देश है,जहां वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल-अक्टूबर के दौरान कच्चे इस्पात उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान तैयार इस्पात उत्पादन में भी 10.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

कोयला: भारत का कोयला उद्योग वित्त वर्ष 2025 में ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंच गया,जहां 1,047.52 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ,जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.98 प्रतिशत अधिक है।

रसायन एवं पेट्रोकेमिकल्स: वित्त वर्ष 2025 में प्रमुख रसायनों और पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन 58,617 हजार टन तक पहुंच गया,जिससे यह क्षेत्र मजबूत संयोजनों और कई अनुगामी उद्योगों के माध्यम से औद्योगिक विकास को समर्थन देना जारी रखे हुए है।

 

तालिका 1: भारत के प्रमुख इनपुट उद्योगों में दशक के दौरान मजबूत वृद्धि (लाख टन में मूल्य)

प्रमुख इनपुट उद्योग

वित्त वर्ष 2015

वित्त वर्ष 2025

सीमेंट

270.00

453.00

तैयार इस्पात

81.86

146.69

कोयला

609.18

1,047.52

स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26

 

भारत का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 से पता चलता है कि मध्यम और उच्च प्रौद्योगिकी उद्योग अब भारत के विनिर्माण मूल्यवर्धन में 46.3 प्रतिशत का योगदान दे रहे हैं,जो अधिक परिष्कृत उत्पादन संरचना की ओर क्रमिक बदलाव का संकेत है। इस बदलाव से भारत उन कुछ चुनिंदा मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है जो विनिर्माण वैल्यू चेन में लगातार प्रगति कर रही हैं। इन उपलब्धियों के फलस्वरूप,भारत की वैश्विक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में सुधार हुआ है और प्रतिस्पर्धी औद्योगिक प्रदर्शन (सीआईपी) सूचकांक में देश की रैंकिंग 2022 में 40वें स्थान से बढ़कर 2023 में 37वें स्थान पर पहुंच गई है।

विनिर्माण क्षेत्र ने भी भारत के निर्यात प्रदर्शन को मजबूत करने में योगदान दिया है। वित्त वर्ष 2025 की पहली तीन तिमाहियों में निर्यात का स्तर अब तक का उच्चतम रहा। इसके अलावा, अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान निर्यात 634.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.3 प्रतिशत की और वृद्धि दर्शाता है,और यह भारत के निर्यात प्रदर्शन में निरंतर मजबूती को रेखांकित करता है।

विनिर्माण में सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) की भूमिका

 

सूक्ष्म,लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) का भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था के लिए केंद्रीय महत्व है। ये विनिर्माण उत्पादन में लगभग 35.4 प्रतिशत,निर्यात में 48.58 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 31.1 प्रतिशत का योगदान देते हैं,जबकि 7.47 करोड़ उद्यमों में 32.82 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। यह कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता  है।

जैसे-जैसे भारत का विनिर्माण वैश्विक बाजारों के साथ अधिक एकीकरण हो रहा है, एमएसएमई आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने, स्थानीय मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने और समावेशी क्षेत्रीय विकास में सहयोग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

 

बजट 2026-27: विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख पहल

केंद्रीय बजट 2026-27 में रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से कई व्यापक उपायों की घोषणा की गई है। ये घोषणाएं सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं और तात्कालिक आवश्यकताओं (जैसे कर राहत और सीमा शुल्क सुधार) के साथ-साथ दीर्घकालिक क्षमता विकास (जैसे नए औद्योगिक मिशन और क्लस्टर योजनाएं) का भी समाधान करती हैं।

रणनीतिक क्षेत्र की पहल और औद्योगिक इकोसिस्टम का विकास

बजट में उच्च प्रभाव वाले और उभरते हुए उद्योगों पर केंद्रित नई योजनाओं और कार्यक्रमों की शुरुआत की गई है,ताकि औद्योगिक विकास के अगले चरण को गति दी जा सके। इन योजनाओं और कार्यक्रमों का उद्देश्य सात रणनीतिक और उभरते क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देना है।

  • विरासत औद्योगिक क्लस्टरों का पुनरुद्धार: बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी के उन्नयन के माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मकता और दक्षता में सुधार लाने के लिए 200 विरासत औद्योगिक क्लस्टरों को पुनर्जीवित करने की योजना
  • बायोफार्मा शक्ति: पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ,इस योजना का उद्देश्य भारत को बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर्स के वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना है। इसका उद्देश्य अनुसंधान क्षमता का विस्तार करना,तीन नए और उन्नत राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईपीईआर) स्थापित करना,1000 से अधिक नैदानिक ​​परीक्षण स्थलों का नेटवर्क स्थापित करना और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को मजबूत करना है।
  • सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: पूर्व की पहलों पर आधारित,यह कार्यक्रम सेमीकंडक्टर उपकरण और सामग्री के उत्पादन,पूर्ण स्टैक भारतीय आईपी के डिजाइन,आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने और उद्योग-नेतृत्व वाले अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्रों के निर्माण पर केंद्रित है।

  • समर्पित रासायनिक पार्क: घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए राज्यों को क्लस्टर-आधारित प्लग-एंड-प्ले मॉडल पर तीन रासायनिक पार्क स्थापित करने के लिए सहायता प्रदान की जाएगी।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना (ईसीएमएस): निर्धारित लक्ष्यों से परे निवेश प्रतिबद्धताओं की गति का लाभ उठाने और घरेलू घटक विनिर्माण को गति देने के लिए, परिव्यय 22,919 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
  • दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबक और गलियारे: नवंबर 2025 में शुरू की गई दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबक योजना के आधार पर, खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में समर्पित दुर्लभ पृथ्वी गलियारों का विकास किया जाएगा।
  • खेल सामग्री विनिर्माण पहल: खेल उपकरण और सामग्री विज्ञान में विनिर्माण, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए समर्थन।
  • केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) में हाई-टेक टूल रूम: विनिर्माण नवाचार और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए सीपीएसई के भीतर सटीक उपकरण निर्माण, प्रशिक्षण और डिजाइन सुविधाओं की स्थापना।
  • निर्माण और अवसंरचना उपकरण (सीआईई) योजना: उच्च मूल्य और तकनीकी रूप से उन्नत सीआईई के घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने के लिए नई योजना।
  • कंटेनर विनिर्माण योजना: वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंटेनर विनिर्माण इकोसिस्टम बनाने के लिए पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये का आवंटन।
  • वस्त्र क्षेत्र के लिए समर्पित उपाय: समर्थ 2.0 के तहत फाइबर आत्मनिर्भरता, क्लस्टरों का आधुनिकीकरण,हथकरघा और हस्तशिल्प को मजबूत करना,टिकाऊ वस्त्रों को बढ़ावा देना और वस्त्र कौशल को उन्नत करना जैसे एकीकृत वस्त्र कार्यक्रम का शुभारंभ।
  • द्रुत गति से से मेगा टेक्सटाइल पार्क का निर्माण जिसमें तकनीकी वस्त्र समेत मूल्य वर्धन पर ध्यान हो
  • प्रशिक्षण, कौशल वृद्धि, उत्पादन गुणवत्ता, ब्रैंडिंग और वैश्विक बाजार संपर्कों में सुधार करके खादी, हथकरघा और हस्तशिल्प के सशक्तिकरण के लिए महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल की शुरूआत करना  जिससे ग्रामीण उद्योग और कारीगरों को लाभ हो।
  •  एमएसएमई को मुख्य ग्रोथ इंजन के रूप में मान्यता देनाएमएसएमई भविष्य के उद्योग में चैंपियन बन कर उभरे उसके लिए त्रिआयामी दृष्टिकोण प्रस्तावित किया गया है जिसमें 10,000 करोड़ रूपये का एक समर्पित एसएमई विकास कोष शामिल हो जिससे उच्च क्षमता वाले उद्यमों को सहायता मिल सके। इसके अलावा आत्मनिर्भर कोष में अतिरिक्त 2000 करोड़ रुपये का योगदान करना है ताकि लघु उद्यमों को जोखिम उठाने में सहायता मिल सके।

 

विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कर और सीमा शुल्क सुधारउपरोक्त क्षेत्र-आधारित हस्तक्षेपों के पूरक के रूप में, केंद्रीय बजट 2026-27 में कर प्रोत्साहनों और सीमा शुल्क सुधारों की एक श्रृंखला पेश की गई,जिससे कर व्यवस्था को विनिर्माण-अनुकूल और निर्यात-समर्थक बनाने के लिए परिष्कृत किया गया। प्रमुख उपायों में शामिल हैं:

  • बॉन्डेड ज़ोन में किसी भी टोल निर्माता को पूंजीगत सामान,उपकरण या औजार उपलब्ध कराने वाले अनिवासियों को पांच साल के लिए आयकर से छूट।
  • बॉन्डेड वेयरहाउस में घटक भंडारण के लिए अनिवासियों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करना
  • विश्वसनीय विनिर्माताओं के लिए विलंबित शुल्क भुगतान की सुविधा।
  • निर्यात के लिए समुद्री खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण में उपयोग किए जाने वाले निर्दिष्ट कच्चे माल के शुल्क-मुक्त आयात की सीमा को पिछले वर्ष के निर्यात कारोबार के एफओबी मूल्य के वर्तमान 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत करना।
  • निर्दिष्ट कच्चे माल के शुल्क-मुक्त आयात को चमड़े या सिंथेटिक जूते के अलावा जूते के ऊपरी भाग के निर्यात तक विस्तारित करना।
  • चमड़े या वस्त्रों,चमड़े और सिंथेटिक जूते के निर्यातकों के लिए अंतिम उत्पाद के निर्यात की समय सीमा मौजूदा 6 महीने से बढ़ाकर 1 वर्ष कर दी गई है।
  • माइक्रोवेव ओवन के निर्माण में प्रयुक्त विशिष्ट पुर्जों और विमान निर्माण में प्रयुक्त घटकों एवं पुर्जों पर मूल सीमा शुल्क से छूट।
  • रक्षा इकाइयों द्वारा रखरखाव, मरम्मत या नवीनीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले विमान पुर्जों के निर्माण हेतु आयातित कच्चे माल पर मूल सीमा शुल्क से छूट
  • विश्वसनीय और दीर्घकालिक आपूर्ति श्रृंखलाओं वाले नियमित आयातकों को जोखिम प्रणाली में मान्यता दी जाएगी।
  • इलेक्ट्रॉनिक सीलिंग का उपयोग करके निर्यात किए जाने वाले माल को कारखाने से जहाज तक की निकासी प्रक्रिया के माध्यम से सुगम बनाया जाएगा
  • पात्र लघु एवं मध्यम औद्योगिक क्षेत्रों (एसईजेड) की विनिर्माण इकाइयों द्वारा घरेलू टैरिफ क्षेत्र में रियायती दर पर बिक्री की सुविधा के लिए एक विशेष एकमुश्त उपाय

 

ये सभी उपाय भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए सरकार के निरंतर प्रयासों का हिस्सा हैं; एक ऐसा केंद्र जो रोजगार सृजित कर सके,अत्याधुनिक तकनीकों में नवाचार कर सके और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में सफलतापूर्वक एकीकृत हो सके।

 

विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि को गति देने वाली स्थायी सरकारी पहलकदमियां

भारत के विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार को लक्षित प्रोत्साहन योजनाओं,मिशन-आधारित सुधारों, अवसंरचना विकास और नवाचार-आधारित पहलों के संयोजन से बल मिल रहा है,जो विनिर्माण वृद्धि के अगले चरण के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहा है।

 

प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना

आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अनुरूप उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना 14 क्षेत्रों में औद्योगिक विकास के लिए एक प्रमुख उत्प्रेरक के रूप में उभरी है। इस योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स,फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में प्रमुख लाभ दिखाई दे रहे हैं,जिससे भारत की वैश्विक विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत हुई है:

  • पीएलआई-प्रेरित निवेशों ने भारत में स्मार्टफोन उत्पादन को प्रोत्साहित किया है,जिससे देश एक प्रमुख वैश्विक मोबाइल फोन विनिर्माण केंद्र बन गया है।
  • पहले तीन वर्षों में,पीएलआई के तहत फार्मास्यूटिकल्स की बिक्री 2.63 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई,जिसमें 1.69 लाख करोड़ रुपये का निर्यात भी शामिल है,और मार्च 2025 तक घरेलू मूल्यवर्धन 83.74 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

  • ऑटोमोबाइल और ऑटो-कंपोनेंट्स के लिए पीएलआई योजना ने सितंबर 2025 तक 35,657 करोड़ रुपये के संचयी निवेश को आकर्षित किया है, जिसके परिणामस्वरूप 48,974 नौकरियों का सृजन हुआ है।

राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन

बजट 2025-26 में घोषित राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन (एनएमएम) औद्योगिक विकास के लिए एक प्रमुख उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर रहा है,जिसका लक्ष्य 2035 तक जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी को 25 प्रतिशत तक बढ़ाना,143 मिलियन रोजगारों का सृजन करना और वैश्विक वैल्यू चेन के गहन एकीकरण के माध्यम से माल निर्यात को 1.2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाना है। राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन के कार्यान्वयन के तहत निम्नलिखित प्रमुख कदम उठाए गए हैं:

  • राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन पर कार्य प्रगति पर है, जिसका ध्यान व्यापार करने में सुगमता और लागत, कार्यबल की तैयारी, एमएसएमई विकास, विनियमन में ढील, प्रौद्योगिकी तक पहुंच और गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण पर केंद्रित है।
  • एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया गया है,जिसमें नीति आयोग परामर्शों का समन्वय कर रहा है और कार्यान्वयन प्रस्तावों को आगे बढ़ा रहा है।
  • एनएसक्यूएफ-आधारित प्रशिक्षण, लक्षित कौशल विकास हस्तक्षेपों और औद्योगिक गलियारों तथा खिलौने, चमड़ा और जूते जैसे क्षेत्र-विशिष्ट उद्योगों के साथ समन्वय के माध्यम से कौशल विकास पहलों को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय वस्त्र निर्माण मिशन का गठन किया जा रहा है, जिसके लिए एक कोर कमेटी बनाई गई है और रूपरेखा को अंतिम रूप देने के लिए परामर्श प्रक्रिया जारी है।

 

निवेश से औद्योगिक विस्तार को गति मिल रही है

वित्तीय वर्ष 2026 में निवेश की गति से आर्थिक विकास को निरंतर समर्थन मिल रहा है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीसीएफ) में इसकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत रहने का अनुमान है और पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष की पहली छमाही में इसमें 7.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

निवेश में यह तेजी सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के व्यय में परिलक्षित होती है। सरकारी पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2019 में 3.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 11.21 लाख करोड़ रुपये हो गया,जबकि निजी कंपनियों द्वारा निवेश की घोषणाएं वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में बढ़कर 14.6 लाख करोड़ रुपये हो गईं,जो वित्त वर्ष 2025 की इसी अवधि में 7.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।

 

भारत के नवाचार इकोसिस्टम को मजबूत करने वाली पहलकदमियां

  • भारत के अनुसंधान एवं विकास इकोसिस्टम को समर्थन देने वाला एक प्रमुख संस्थागत सुधार एएनआरएफ अधिनियम,2023 के तहत अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) की स्थापना है। इसका उद्देश्य रणनीतिक दिशा-निर्देश,वित्तीय सहायता और उद्योग,शिक्षा जगत एवं सरकार के बीच मजबूत सहयोग प्रदान करना है।
  • नवाचार वित्तपोषण को मजबूत करने के लिए,सरकार ने छह वर्षों में 1 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ एक अनुसंधान, विकास एवं नवाचार (आरडीआई) कोष की घोषणा की, जिसमें वित्त वर्ष 2026 के लिए 20,000 करोड़ रुपये शामिल हैं। इसका उद्देश्य उच्च-तकनीकी अनुसंधान एवं विकास में निजी निवेश को बढ़ावा देना, उन्नत प्रौद्योगिकी परियोजनाओं का समर्थन करना, रणनीतिक प्रौद्योगिकियों के अधिग्रहण को सक्षम बनाना और डीप-टेक फंड ऑफ फंड्स को क्रियान्वित करना है।
  • 2016 में स्टार्टअप इंडिया के शुभारंभ के बाद से,एक बढ़ता हुआ स्टार्टअप इकोसिस्टम, जिसमें अब 2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप शामिल हैं,विस्तारित उद्यमिता संस्कृति को दर्शाता है। भारत अब 64 महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में से 45 में शीर्ष पांच देशों में शुमार है, जिससे उन्नत विनिर्माण और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में क्षमताओं को मजबूती मिल रही है।

 

नवाचार-आधारित विनिर्माण वृद्धि का प्रभाव

भारत का नवाचार इकोसिस्टम काफी मजबूत हुआ है,जिससे उच्च-मूल्य विनिर्माण की दिशा में इसका विकास हुआ है। वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग 2019 में 66वें स्थान से बढ़कर 2025 में 38वें स्थान पर पहुंच गई है,जो निम्न मध्यम आय वर्ग के देशों में सबसे उच्च स्थान है।

भारत 2024 में ट्रेडमार्क में वैश्विक स्तर पर चौथे,पेटेंट में छठे और औद्योगिक डिजाइन में सातवें स्थान पर है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डबल्यूआईपीओ)ने भारत को उसकी उद्यमिता नीतियों और उद्यमिता संस्कृति के लिए वैश्विक स्तर पर 12वें स्थान पर रखा है।

रक्षा,अंतरिक्ष,रोबोटिक्स,क्वांटम कंप्यूटिंग,कृत्रिम बुद्धिमत्ता,जैव प्रौद्योगिकी,उन्नत सामग्री, ऊर्जा और संचार सहित महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी अनुसंधान उत्पादन में भारत वैश्विक स्तर पर शीर्ष चार देशों में शामिल है।

 

अवसंरचनात्मक सुधारों से विनिर्माण क्षेत्र में हो रहे विस्तार को बल मिल रहा है

सरकार द्वारा किए जा रहे अवसंरचनात्मक और लॉजिस्टिक्स सुधारों से संपर्क सुवधा, औद्योगिक अवसंरचना और कौशल विकास सहायता में निरंतर निवेश के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार संभव हो रहा है।

पीएम गतिशक्ति ने 57 मंत्रालयों और विभागों के 1,700 से अधिक डेटा स्तरों को एकीकृत करने वाले एक एकीकृत मंच के माध्यम से अवसंरचनात्मक योजना में क्रांति ला दी है,जबकि पीएम गतिशक्ति पब्लिक और एकीकृत भू-स्थानिक इंटरफ़ेस अब निवेश और लॉजिस्टिक्स की योजना के लिए 230 डेटासेट उपलब्ध कराते हैं। राज्य स्तर पर,27 राज्यों ने राज्य-स्तरीय लॉजिस्टिक्स नीतियों को अधिसूचित किया है,और 28 आकांक्षी जिले पहले से ही क्षेत्र नियोजन के लिए गतिशक्ति जिला मास्टर प्लान मॉड्यूल का उपयोग कर रहे हैं, जिसे बाद में सभी 112 आकांक्षी जिलों तक विस्तारित किया जाएगा।

इसके पूरक के रूप में राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (एनएलपी) है,जिसके तहत एकीकृत लॉजिस्टिक्स इंटरफ़ेस प्लेटफॉर्म (यूएलआईपी) के माध्यम से लॉजिस्टिक्स एकीकरण को मजबूत किया जा रहा है। यह 11 मंत्रालयों में फैले 44 सिस्टमों को जोड़ता है, जिसमें 2,000 डेटा फ़ील्ड शामिल हैं, 1,700 से अधिक कंपनियों को सहायता प्रदान करता है और 200 करोड़ एपीआई लेनदेन को सक्षम बनाता है।

इस बीच,औद्योगिक कॉरिडोर परियोजनाओं के तहत धोलेरा और ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों में परिचालन शुरू हो गया है,जहां 350 औद्योगिक भूखंड आवंटित किए गए हैं और 2.02 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है,जिससे प्रमुख महानगरों से परे नए विनिर्माण केंद्रों को समर्थन मिल रहा है।

ये पहलकदमियां देश में विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने के लिए समन्वित प्रयासों को दर्शाती हैं। कार्यान्वयन में प्रगति के साथ,इन उपायों से औद्योगिक क्षमता में वृद्धि,वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वृद्धि और विनिर्माण-आधारित सतत आर्थिक विकास को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

 

निष्कर्ष

 

भारत का विनिर्माण क्षेत्र सरकार की आत्मनिर्भरता की परिकल्पना और केंद्रीय बजट 2026-27 में उल्लिखित तीन प्रमुख कर्तव्यों पर आधारित संकल्पों के मार्गदर्शन में विस्तार के एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। प्रतिस्पर्धात्मकता,प्रौद्योगिकी अपनाने,आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण और कौशल विकास पर निरंतर ध्यान विनिर्माण क्षेत्र को स्थायी ग्रोथ इंजन के रूप में स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

इन सभी प्रयासों से विनिर्माण क्षेत्र भारत की वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, सशक्त और आत्मनिर्भर आर्थिक शक्ति बनने की यात्रा के केंद्र में जाता है।

 

संदर्भ

वित्त मंत्रालय

https://www.indiabudget.gov.in/economicsurvey/doc/echapter.pdf

https://www.indiabudget.gov.in/doc/budget_speech.pdf

https://www.indiabudget.gov.in/doc/impbud2025-26.pdf

वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय

https://eaindustry.nic.in/eight_core_infra/eight_infra.pdf

https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?id=155242&NoteId=155242&ModuleId=3&reg=3&lang=2

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2219602&reg=3&lang=2

भारतीय रिजर्व बैंक

https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/Publications/PDFs/IOSR111OCT0120257B0D827F5D6C4B9B9A625D35985D8649.PDF

अन्य रिलीज

https://www.pmi.spglobal.com/Public/Home/PressRelease/cf844f6598f24d3d97639f641b315fca

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