पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय
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संसद प्रश्न: भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था

प्रविष्टि तिथि: 05 FEB 2026 11:49AM by PIB Delhi

केंद्र सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को समुद्री अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए मछली पालन के साथ-साथ समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा दे रही है। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) ने 'अंडमान तट पर व्यावसायिक समुद्री शैवाल की खेती के लिए पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन और प्रायोगिक स्तर की स्थापना' परियोजना शुरू की है। इसने समुद्री शैवाल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त स्थलों की पहचान करने के लिए 25 विभिन्न स्थानों का व्यापक विश्लेषण किया है। इस गहन अध्ययन से समुद्री शैवाल की वृद्धि और खेती के लिए सबसे अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों और पोषक तत्वों की उपलब्धता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है। समुद्री शैवाल की प्रजातियों ग्रैसिलारिया एडुलिस, ग्रैसिलारिया डेबिलिस, ग्रैसिलारिया सैलिसॉर्निया और कप्पाफाइकस अल्वारेज़ी का परीक्षण तैरते बांस के बेड़े, ट्यूब नेट, नेट बैग और मोनोलाइन विधियों का उपयोग करके किया गया। हाथी तापू (दक्षिण अंडमान), मायाबंदर (मध्य अंडमान) और डिगलीपुर (उत्तर अंडमान) में ग्रैसिलारिया एडुलिस और कप्पाफाइकस अल्वारेजी प्रजातियों का उपयोग करके व्यावसायिक समुद्री शैवाल की खेती सफलतापूर्वक स्थापित की गई है। इसके अलावा, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्थान, राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) ने अंडमान सागर में गहरे पानी में समुद्री शैवाल की खेती पर ध्यान केंद्रित करते हुए पहली बार खुले समुद्र में मछली पालन और समुद्री शैवाल की खेती की परियोजना शुरू की है। सीएसआईआर ने समुद्री शैवाल मिशन की भी शुरुआत की है ताकि ऐसे ज्ञान और नवाचारों को बढ़ावा दिया जा सके जो समुद्री शैवाल की खेती को लाभकारी, पर्यावरण के अनुकूल, टिकाऊ और बड़े पैमाने पर कृषि पद्धति बनाने में सहायक हों।

सीएसआईआर द्वारा कार्यान्वित समुद्री शैवाल मिशन के अंतर्गत, तमिलनाडु में 800 से अधिक स्वयं-सहायता समूहों (एसएचजी) ने कप्पाफाइकस की खेती को अपनी आजीविका का साधन बनाया है। समुद्री शैवाल अनुसंधान के परिणामस्वरूप एक नए समुद्री शैवाल उद्योग का विकास हुआ है, जिससे रोजगार के अवसर और राजस्व उत्पन्न हो रहे हैं। समुद्री शैवाल प्रौद्योगिकियों को विकसित किया गया है और व्यावसायीकरण के लिए 12 कंपनियों को हस्तांतरित किया गया है। विभिन्न योजनाओं के तहत, विशेष रूप से तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश में, अब तक लगभग 5000 मछुआरों को प्रशिक्षित किया गया है। सरकार ने महिला स्वयं-सहायता समूहों के माध्यम से समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए लक्षित वित्तीय और संस्थागत उपाय किए हैं। केंद्र सरकार की निधि और राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) से प्राप्त सहायता का उपयोग तटीय समुदायों को प्रशिक्षण, प्रदर्शन और प्रत्यक्ष सहायता प्रदान करने के लिए किया जा रहा है जिसमें विशेष रूप से महिला मछुआरों और महिला नेतृत्व वाले स्वयं-सहायता समूहों पर जोर दिया गया है। इसमें मूल्यवर्धन, स्थानीय प्रसंस्करण और विपणन के लिए सहायता शामिल है। मत्स्य पालन विभाग ने बीज/पौधों के आयात और संवर्धन प्रोटोकॉल पर तकनीकी दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, जो लाभार्थी समूहों पर केंद्रित हैं और मछुआरों के परिवारों और महिला स्वयं-सहायता समूहों को लाभार्थी के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता देते हैं।  इससे गुणवत्तापूर्ण बीज सामग्री, तकनीकी जानकारी, जैव सुरक्षा उपाय और बाजार संपर्क सुनिश्चित होते हैं। इसके अलावा, समुद्री शैवाल मूल्य श्रृंखला में क्षमता निर्माण, सूक्ष्म ऋण, समूह विपणन और उद्यमिता के लिए संस्थागत मंच के रूप में स्वयं-सहायता समूहों, संयुक्त देयता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों का लाभ उठाकर दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत, सरकार ने 2030 तक 1.12 लाख टन समुद्री शैवाल उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने के लिए विशेष पहल की है। सरकार ने समुद्री शैवाल क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण निवेश किया है जिसमें तमिलनाडु में एक बहुउद्देशीय समुद्री शैवाल पार्क तथा दमन और दीव में एक समुद्री शैवाल प्रजनन बैंक की स्थापना जैसी प्रमुख अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 194.09 करोड़ रुपए का आवंटन शामिल है। खेती की क्षमता बढ़ाने के लिए तटीय क्षेत्रों में 46,095 समुद्री शैवाल राफ्ट और 65,330 मोनोलाइन ट्यूब नेट की मंजूरी दी गई है। समुद्री शैवाल उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करने के लिए छोटे और बड़े उद्यमों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए भी पहल की गई है। इसके साथ ही, केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के मंडपम केंद्र को भारत सरकार के मत्स्य विभाग द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत समुद्री शैवाल की खेती के लिए उत्कृष्टता केंद्र और नाभिकीय प्रजनन केंद्र (एनबीसी) की स्थापना के लिए नोडल संस्थान के रूप में चिन्हित किया गया है। इस योजना का उद्देश्य अनुसंधान, उन्नत कृषि पद्धतियों और बीज बैंक विकास को बढ़ावा देना है, जिससे 20,000 से अधिक किसानों को लाभ मिलने और रोजगार के 5,000 से अधिक अवसर पैदा होने की संभावना है। 2024 में जारी जीवित समुद्री शैवाल के आयात संबंधी दिशानिर्देशों का उद्देश्य अनुसंधान को बढ़ावा देना, बीजों की गुणवत्ता में सुधार करना और समुद्री शैवाल की खेती के विनियमित विस्तार को सुनिश्चित करना है। पिछले पांच वर्षों में, सीएमएफआरआई ने प्रदर्शनी के लिए कुल 5,268 राफ्ट और 112 मोनोलाइन ट्यूब नेट स्थापित किए हैं और 14,000 से अधिक हितधारकों के लिए 169 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं।

पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा में यह जानकारी दी।

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पीके/केसी/बीयू/वाईबी


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