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लक्ष्य जीरो डंपसाइट: स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहरी कचरा स्थलों को हटाना भारत का अभियान
प्रविष्टि तिथि:
31 JAN 2026 1:30PM by PIB Delhi
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- भारत डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम के माध्यम से “जीरो डंपसाइट” का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
- अब तक 61 प्रतिशत से अधिक पुराने कचरे का प्रसंस्करण किया जा चुका है। इस कार्यक्रम के तहत 214 अत्यधिक प्रभाव वाले कचरा स्थलों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां लगभग 80 प्रतिशत कचरा शेष है।
- उपचारित कचरे को पुनः उपयोगी संसाधनों में परिवर्तित किया जाता है, जैसे सड़क निर्माण सामग्री, निम्न भू-भागों के भरान के लिए, रिसाइकल योग्य वस्तुएं और रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ)।
- डंपसाइटों के रेमेडिएशन (उपचार) के उपरांत शहरों को स्वच्छ वायु, सुरक्षित भूमिगत जल, आगजनी की घटनाओं में कमी तथा अवसंरचना या हरित आवरण विकसित करने के लिए इस प्रकार खाली की गई भूमि का लाभ मिलता है।
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परिचय
पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत में स्वच्छता के क्षेत्र में निरंतर प्रगति देखी जा रही है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत की गई पहलों ने शहरों में स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ किया है, जिससे अधिक स्वच्छ शहरी परिवेश की नींव पड़ी है।
इस आधार पर आगे बढ़ते हुए, अब प्रयास पुरानी कचरा डंपसाइटों के रेमेडिएशन पर केंद्रित हैं। ये वे बड़े-बड़े कचरे के पहाड़ हैं, जो कई वर्षों से इकट्ठा होते जा रहे कचरे से बने हैं। इन कचरा स्थलों का उन्मूलन भारत के शहरी स्वच्छता प्रयासों के अगले चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इस कार्य में तेजी लाने के लिए, भारत सरकार ने नवंबर 2025 में डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (डीआरएपी) का शुभारंभ किया, जिसका उद्देश्य अक्टूबर 2026 तक “लक्ष्य: जीरो डंपसाइट” हासिल करना है, और अधिकांश डंपसाइटों को इसी अवधि के भीतर साफ करने का लक्ष्य रखा गया है।
पुरानी डंपसाइट: वर्तमान स्थिति
डंपसाइट से तात्पर्य उस भूमि से है जिसका उपयोग शहरी स्थानीय निकायों द्वारा शहरी ठोस कचरा निपटान के लिए किया जाता है। प्रायः दशकों तक अवैज्ञानिक निपटान के कारण यह कचरा संचित होता रहता है। खुली डंपसाइट में कचरे के निपटान से भूमिगत जल और मृदा प्रदूषित होती है, वायु की गुणवत्ता में गिरावट आती है तथा मीथेन जैसी अत्यंत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है, जिससे आसपास के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसी डंपसाइटें आगजनी की घटनाओं का जोखिम भी उत्पन्न करती हैं, रोगवाहक जीवाणओं को आकर्षित करती हैं और विषैली गैसों का उत्सर्जन करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप निकटवर्ती समुदायों के लिए दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा होते हैं।
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पुरानी डंपसाइटों का रेमेडिएशन वह प्रक्रिया है जिसमें पुरानी कचरा डंपसाइटों की वैज्ञानिक तरीके से सफाई की जाती है, साथ ही निष्क्रिय एवं निर्माण कार्य के मलबे (सीएंडडी) जैसे अपशिष्ट का उपयोग सड़क निर्माण में तथा ज्वलनशील अंश का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।
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देशभर में लगभग 2,479 डंपसाइटों की पहचान की गई है, जिनमें मुख्यतः 1,000 टन या उससे अधिक पुराना कचरा मौजूद है। इन स्थलों में कुल मिलाकर अनुमानित लगभग 25 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा है, जो लगभग 15,000 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। पुराने कचरे की यह व्यापकता शहरी अपशिष्ट उत्पादन में निरंतर वृद्धि के कारण और अधिक गंभीर हो जाती है। वर्तमान में शहर प्रतिदिन लगभग 1,62,000 टन शहरी ठोस अपशिष्ट उत्पन्न कर रहे हैं, और कुल अपशिष्ट उत्पादन के साल 2030 तक 165 मिलियन टन तथा साल 2050 तक 436 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। समयबद्ध उपचार और वैज्ञानिक प्रसंस्करण के अभाव में, शहरी ठोस अपशिष्ट क्षेत्र से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन साल 2030 तक बढ़कर 41.09 मिलियन टन CO₂-समतुल्य तक पहुंच सकता है।
वर्तमान में, देशभर में 1,428 डंपसाइटों पर रेमेडिएशन कार्य चल रहा है। अब तक 62 प्रतिशत से अधिक पुराने कचरा स्थलों का प्रसंस्करण किया जा चुका है। डंपसाइट रेमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (डीआरएपी) के तहत, 214 डंपसाइटों को उच्च-प्रभाव वाले स्थल के रूप में चिन्हित किया गया है क्योंकि इनमें भारत के शेष पुराने कचरे का लगभग 80 प्रतिशत संचित है। ये स्थल, जो 30 राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों में फैले 200 शहरी स्थानीय निकायों को कवर करते हैं, जिनमें लगभग 8.6 करोड़ मीट्रिक टन जमा कचरा मौज़ूद है और इसलिए इन्हें त्वरित उपचार (एक्सेलेरेटिड रेमेडिएशन) के लिए प्राथमिकता दी गई है। पुरानी डंपसाइटों का समाधान करने की रणनीति दोहरा दृष्टिकोण यानी पुरानी डंपसाइटों को हटाने और नई डंपसाइटें बनने से रोकने के लिए अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं की स्थापना करने जैसे उपायों को अपनाती है।
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साल 2025 में, 26 राज्यों के 438 शहरों में 459 डंपसाइटों का पूर्ण उपचार किया गया, जिसमें 183 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) पुराने कचरे का उपचार किया गया। इस तरह से अब तक 29 राज्यों के कुल 1,048 शहरों की 1,138 डंपसाइटों का पूरी तरह से रेमेडिएशन हो चुका है, और कुल 877 एलएमटी पुराने कचरे का उपचार किया गया है। मौजूदा डंपसाइटों के रेमेडिएशन के साथ-साथ, सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि नए डंपसाइट का निर्माण न हो।
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रेमेडिएशन के साथ-साथ, यह कार्यक्रम सारे नए कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण करके नई डंपसाइट के निर्माण को रोकने पर भी जोर देता है। रेमेडिएशन से पुनः प्राप्त की गई भूमि को प्राथमिकता के आधार पर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) अवसंरचना या हरित आवरण के विकास के लिए उपयोग किया जाएगा।
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शहरी अपशिष्ट: स्वच्छ भारत से मिशन जीरो तक
पिछले दशक के दौरान, भारत ने स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के माध्यम से अपने स्वच्छता परिदृश्य को बदल दिया है, जिससे देश भर में अपशिष्ट संग्रह, स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। इस मिशन ने जागरूकता बढ़ाई, 10 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण किया और स्वच्छ व सुरक्षित समुदायों के लिए प्रणालियों को मजबूत किया। इसी क्रम में, सरकार ने साल 2021 में एसबीएम-शहरी 2.0 की शुरुआत की, जिसने ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार, स्रोत पर अपशिष्ट पृथक्करण को बढ़ावा और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ करके इस दिशा में हो रही प्रगति को और बढ़ाया गया।

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रूपरेखा: 5पी मॉडल
डीआरएपी, साल 2021 में लॉन्च किए गए स्वच्छ भारत मिशन–शहरी 2.0 के 5पी ढांचे पर आधारित है, जिसमें राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक वित्त, साझेदारी, जनता की भागीदारी और परियोजना प्रबंधन शामिल हैं। यह सुनिश्चित करता है कि डंपसाइट रेमेडिएशन का प्रत्येक चरण, जिसमें योजना और कार्यान्वयन भी शामिल हैं, जवाबदेह, पर्याप्त वित्तपोषित, साझेदारी-संचालित, समुदाय-केंद्रित और निगरानी में हो।

राजनीतिक नेतृत्व: डीआरएपी के तहत, वरिष्ठ राजनीतिक और प्रशासनिक हितधारक डंपसाइटों को अपनाकर रेमेडिएशन में तेजी लाने में सीधे भूमिका निभाते हैं। यह तरीका उच्च स्तर की निगरानी को सुदृढ़ करता है, समय पर निर्णय लेने में मदद करता है और कार्यान्वयन के दौरान आने वाली चुनौतियों को अधिक कुशलता से हल करने में सहायता करता है।
दिल्ली की 70 एकड़ की भलस्वा डंपसाइट इसका एक उदाहरण है, जिसे केंद्रीय मंत्री श्री मनोहर लाल ने अपनाया। 17 सितंबर से 6 नवंबर 2025 के बीच, भलस्वा में 4,79,500 मीट्रिक टन पुराने कचरे का उपचार किया गया। वर्तमान में चल रही रूपांतरण प्रक्रिया के तहत, साइट के 25 एकड़ हिस्से का रेमेडिएशन किया जा चुका है। इसमें से 5 एकड़ पर बांस की पंक्तियाँ लगाई गई हैं, जबकि शेष 20 एकड़ को स्वच्छता-संबंधी गतिविधियों और प्रसंस्करण अवसंरचना के लिए तैयार किया जा रहा है।
सार्वजनिक वित्त: उन शहरों को अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जिनमें भारी मात्रा में पुराना कचरा मौजूद है। एसबीएम-शहरी 2.0 के तहत दिए गए धन के अतिरिक्त, वित्तीय सहायता में शामिल हैं:
- केंद्रीय वित्तीय सहायता (सीएफए) पुराने कचरे के लिए 550 रुपये प्रति टन के आधार प्रदान की जाती है।
- वितरण श्रेणियां, शहर के प्रकार के आधार पर, परियोजना लागत का 25 प्रतिशत, 33 प्रतिशत या 50 प्रतिशत होती हैं।
- वित्तीय सहायता केवल पुराने कचरे के उपचार के लिए ही नहीं, बल्कि नए कचरे के प्रसंस्करण के लिए भी उपलब्ध है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि नई डंपसाइट न बनें।
- 214 लक्षित स्थलों के लिए 6,700 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को पहले ही मंजूरी दे दी गई थी।
साझेदारियां: संस्थानों के साथ सहयोग, यह सुनिश्चित करने के लिए कि उपचार गतिविधियां कुशलतापूर्वक और व्यापक स्तर पर आगे बढ़ें। यह कार्यक्रम निम्नलिखित के साथ साझेदारियों को बढ़ावा देता है:
- वित्तीय योगदान, लॉजिस्टिक समर्थन, निपटान मार्ग और तकनीकी एकीकरण के लिए कॉरपोरेट और पीएसयू के साथ साझेदारी।
- बड़ी मात्रा में निष्क्रिय अपशिष्ट को सड़क निर्माण और अवसंरचना हेतु उपयोग करने के लिए राज्य पीडब्ल्यूडी, राज्य राजमार्ग विभाग और एनएचएआई के साथ साझेदारी।
- रेमेडिएशन से प्राप्त रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ) को अवशोषित और संसाधित करने के लिए सीमेंट संयंत्र, अपशिष्ट से ऊर्जा सुविधाओं और औद्योगिक इकाइयों के साथ साझेदारी।
- बायोमाइनिंग समाधान, साइट मूल्यांकन, इंजीनियरिंग डिजाइन और वैज्ञानिक सत्यापन के लिए तकनीकी विशेषज्ञ और इंजीनियरिंग साझेदार।
- सामुदायिक भागीदारी, कार्यकर्ताओं को एकजुट करने, जागरूकता अभियान, और सफाईमित्रों एवं साइट कर्मचारियों हेतु स्वास्थ्य एवं सुरक्षा गतिविधियों के लिए एनजीओ और नागरिक समाज संगठनों के साथ साझेदारी।
जनता की भागीदारी: डंपसाइटों के पास रहने वाले समुदायों पर धुएं, आग, दुर्गंध और रोगों का सीधा प्रभाव पड़ता है। यह कार्यक्रम लक्षित जागरूकता और भागीदारी की पहलों के माध्यम से डंपसाइट के पास रहने वाले समुदायों को इस कार्यक्रम से जोड़ता है, जिसमें शामिल हैं:
· एनजीओ के साथ मिलकर स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता अभियान और सूचना अभियान आयोजित करना।
· सफाईमित्रों और रेमेडिएशन कार्यकर्ताओं के लिए सुरक्षित कार्य परिस्थितियों को बढ़ावा देना।
· स्थानीय गौरव, दृश्यता और स्वामित्व पैदा करने के लिए साइट-विशिष्ट ब्रांडिंग का उपयोग करना।
सबसे प्रभावित जनसंख्या की आवाज़ को प्रभावी बनाकर, डीआरएपी का उद्देश्य डंपसाइट रेमेडिएशन को केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक रूप से समावेशी परिवर्तन बनाना है।
परियोजना प्रबंधन: डीआरएपी की रीढ़ एक मजबूत, प्रौद्योगिकी-सक्षम परियोजना प्रबंधन प्रणाली है, जो विलम्ब घटाती है और जवाबदेही बढ़ाती है।
डंपसाइट से संसाधन तक: रेमेडिएशन के बाद अपशिष्ट कहां जाता है
पुराने कचरे की बायोमाइनिंग की जाती है, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें पुराने कचरे को वैज्ञानिक तरीके से स्थिर किया जाता है और विभिन्न उपयोगी हिस्सों में अलग किया जाता है, जिससे लैंडफिल पर दबाव कम होता है और यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी सामग्री डंपसाइट में वापस न जाए। प्रत्येक प्राप्त सामग्री को उपयुक्त पुन: उपयोग या प्रसंस्करण के लिए भेजा जाता है, व्यापक सर्कुलर-इकोनॉमी दृष्टिकोण का पालन करते हुए, जिसका उद्देश्य घटाना, पुन: उपयोग करना, रिसाइकल, उपचार, पुनर्प्राप्ति और मरम्मत जैसे सिद्धांतों के ज़रिए कच्चे माल की खपत और अपशिष्ट उत्पादन को सीमित करके संसाधनों का सतत् उपयोग सुनिश्चित करना है।
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बायोमाइनिंग का अर्थ है डंपसाइट से पुराने कचरे को निकालना और उसे वैज्ञानिक तरीके से साफ करना। अपशिष्ट को खोदने के बाद, उसे लंबी कतारों में फैलाया जाता है और हवा में छोड़ा जाता है, जबकि विशेष सूक्ष्मजीव प्राकृतिक अपघटन को तेज करते हैं। जब अपशिष्ट स्थिर हो जाते हैं और सूखा जाते हैं, तो उसे छांटा जाता है और विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया जाता है, जैसे मिट्टी जैसी बारीक सामग्री, ईंटें, पत्थर, धातु, प्लास्टिक, कपड़े और अन्य रिसाइकल योग्य वस्तुएं। इन सभी सामग्रियों को उसके प्रकार के अनुसार उचित पुन: उपयोग के लिए भेजा जाता है, जैसे सड़क निर्माण, रिसाइकल, उद्योगों में सह-प्रसंस्करण या कंपोस्टिंग। बायोमाइनिंग एक मिश्रित कचरे के ढेर को उपयोगी संसाधनों में बदल देता है, जिससे लैंडफिल में बहुत कम अपशिष्ट जाता है।
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डंपसाइट रेमेडिएशन के तहत, पुराने कचरे को वैज्ञानिक तरीके से विभिन्न सामग्री श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। निम्नलिखित खंड में प्रत्येक अपशिष्ट श्रेणी के लिए अपनाए गए अंतिम-उपयोग मार्गों का विवरण दिया गया है।
- निष्क्रिय और मिट्टी जैसी सामग्री: निष्क्रिय और निर्माण-विध्वंस (सी एंड डी) अपशिष्ट का पुन: उपयोग सड़क बनाने, तटबंध मजबूत करने और निम्न भू-भागों को समतल करने में किया जाता है, जिससे नए कच्चे माल का उपयोग किए बिना शहरी विकास को समर्थन मिलता है। यह नई रेत और मिट्टी की आवश्यकता को कम करने में मदद करता है।
- निर्माण और विध्वंस (सी एंड डी) अपशिष्ट: गिराए गए भवनों या संरचनाओं से उत्पन्न अपशिष्ट इस श्रेणी में आता है। इस अपशिष्ट को पेवर ब्लॉक, टाइल, ईंट और एग्रीगेट में प्रसंस्कृत किया जाएगा।
- रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (आरडीएफ): इसका तात्पर्य ऐसे ईंधन से है जो ज्वलनशील प्रकृति का होता है लेकिन रिसाइकल योग्य नहीं है, जैसे गंदे कागज, गंदे कपड़े, प्रदूषित प्लास्टिक, मल्टीलेयर पैकेजिंग सामग्री, अन्य पैकेजिंग सामग्री, चमड़े के टुकड़े, रबर, टायर, पॉलीस्टाइरीन (थर्मोकॉल), लकड़ी आदि। आरडीएफ को कोयले के विकल्प के रूप में सीमेंट कारखानों, अपशिष्ट से ऊर्जा संयंत्रों और अन्य उद्योगों को भेजा जाता है।
- रिसाइकल योग्य वस्तुएं: रिसाइकल योग्य वस्तुओं में प्लास्टिक, कागज, धातु, कांच और गत्ते जैसी सामग्री शामिल होती है, जिन्हें मिश्रित अपशिष्ट से अलग करके वर्गीकृत किया जाता है। इन्हें रिसाइकल के माध्यम से संसाधित किया जाता है, जहां इन्हें नया उत्पाद बनाने के लिए पुनःप्रसंस्कृत किया जाता है।
- जैव-अपघटनीय अपशिष्ट: जैव-अपघटनीय अपशिष्ट से तात्पर्य किसी भी जैविक सामग्री से है जिसे सूक्ष्मजीव सरल, स्थिर यौगिकों में तोड़ सकते हैं। इसमें खाद्य अवशेष, रसोई अपशिष्ट, बाग़ का कचरा और अन्य प्राकृतिक रूप से अपघटनीय सामग्री शामिल हैं।
- केवल गैर-पुन:प्रयोग योग्य अपशिष्ट: वैज्ञानिक लैंडफिल में भेजा जाता है, खुले में नहीं फेंका जाता।
यह सर्कुलर पहल सुनिश्चित करती है कि, सतत् संसाधन पुनःप्राप्ति को सक्षम बनाते हुए, पुरानी डंपसाइट स्थायी रूप से समाप्त हो जाएं।
एसबीएम–शहरी 2.0 के तहत अपशिष्ट प्रसंस्करण इकोसिस्टम

मैटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) को सुदृढ़ करना: इस मिशन का उद्देश्य प्रत्येक शहर में कम से कम एक मैटीरियल रिकवरी फैसिलिटी स्थापित करना है। वर्तमान में 2,900 एमआरएफ संयंत्र संचालन में हैं, जिनकी कुल क्षमता 67,000 टीपीडी है। इसके अतिरिक्त, एसबीएम–शहरी 2.0 के तहत 43,800 टीपीडी एमआरएफ क्षमता को स्वीकृति दी गई है। एसबीएम–शहरी 2.0 के अंतर्गत, आवास और शहरी कार्य मंत्रालय 50 टीपीडी से अधिक क्षमता वाले एमआरएफ में यंत्रीकरण को बढ़ावा दे रहा है, जिससे अपशिष्ट प्रबंधन प्रक्रियाओं में मानवीय हस्तक्षेप को कम किया जा सके।

गीले अपशिष्ट के प्रसंस्करण और कंपोस्टिंग का विस्तार: वेस्ट-टु-कंपोस्ट संयंत्र शहरी क्षेत्रों में गीले अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ कर रहे हैं। वर्तमान में 2,800 कंपोस्ट संयंत्र संचालन में हैं, जिनकी कुल क्षमता 1.14 लाख टीपीडी है। एसबीएम–शहरी 2.0 के तहत अतिरिक्त 47,200 टीपीडी कंपोस्टिंग क्षमता को स्वीकृति दी गई है।

बायोमीथेनेशन और कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) संयंत्र: वर्तमान में देशभर में 4,253 टीपीडी की कुल क्षमता वाले 131 बायोमीथेनेशन संयंत्र संचालन में हैं, जबकि 20,155 टीपीडी क्षमता वाले 145 संपीडित बायोगैस (सीबीजी) संयंत्र कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं।

बड़े शहरों में अपशिष्ट-से-विद्युत (डब्ल्यूटीई) सुविधाएं: 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में सूखे अपशिष्ट के उपचार के लिए अपशिष्ट-से-विद्युत (डब्ल्यूटीई) जैसे उच्च-स्तरीय प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करना अनिवार्य है। वर्तमान में 20,100 टीपीडी की कुल प्रसंस्करण क्षमता तथा लगभग 261 मेगावाट-ऑवर (एम़डब्ल्यूएच) की विद्युत उत्पादन क्षमता वाले 17 डब्ल्यूटीई संयंत्र संचालन में हैं।
भविष्य की दिशा: स्वच्छ शहर, स्वस्थ समुदाय
साल 2026 तक जीरो डंपसाइट का लक्ष्य हासिल करना आधुनिक शहरी शासन की नींव को सुदृढ़ करेगा, क्योंकि इससे वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन को दैनिक नगरपालिका कार्यप्रणालियों में समाहित किया जाएगा और कचरा बीनने वालों तथा स्वच्छता कर्मियों को औपचारिक अपशिष्ट प्रबंधन श्रृंखला में जोड़ा जाएगा। पुरानी डंपसाइटों का उन्मूलन खुले में डंपिंग से सर्कुलर अपशिष्ट पद्धतियों की ओर बदलाव को समर्थन देता है, जिससे सतत् विकास लक्ष्य 11 (चिरस्थायी शहर और समुदाय) और सतत विकास लक्ष्य 12 (उत्तरदायी उपभोग और उत्पादन) में योगदान होता है, जबकि अव्यवस्थित अपशिष्ट से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में कमी सतत् विकास लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) को आगे बढ़ाती है।
दीर्घकाल में, डंपसाइटों का उन्मूलन बेहतर भूमि-उपयोग नियोजन, पर्यावरणीय दबाव में कमी और अधिक स्वस्थ शहरी जीवन स्थितियों को समर्थन देगा। स्वच्छ, अधिक संसाधन-कुशल और बेहतर प्रबंधित शहरों को सक्षम बनाकर, मिशन जीरो डंपसाइट विकसित भारत 2047 के व्यापक विजन में योगदान देता है, जहां शहरी विकास को स्थायित्व, उत्पादकता और दीर्घकालिक जीवन संबंधी गुणवत्ता के साथ जोड़ दिया गया है।
संदर्भ
आवास और शहरी कार्य मंत्रालय
https://static.pib.gov.in/WriteReadData/specificdocs/documents/2025/nov/doc2025118687701.pdf
https://mohua.gov.in/upload/uploadfiles/files/2688HUA-ENGLISH-19-4-2023.pdf
https://sbmurban.org/storage/app/media/pdf/sbm_knowledge_center/Guidelines_on_Usage_of_RDF_in_various_industries_GIZ.pdf
https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=155276&ModuleId=3®=3&lang=2
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2167622®=3&lang=2
https://swachhbharatmission.ddws.gov.in/sites/default/files/Technical-Notes/10Years_of_SBM_Brochure.pdf
https://mohua.gov.in/upload/uploadfiles/files/Part1%281%29.pdf
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https://sbmurban.org/storage/app/media/pdf/SBM%20Advisory%20on%20Landfill%20Reclamation.pdf
एसबीएम डैशबोर्ड
https://sbmurban.org/swachh-bharat-mission-progess
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
https://cpcb.nic.in/uploads/LegacyWasteBiomining_guidelines_29.04.2019.pdf
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/1711/AU4229.pdf?source=pqals
https://cpcb.nic.in/uploads/hwmd/MoEFCC_guidelines_contaminatedsites.pdf
नीति आयोग
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2032857®=3&lang=2
https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2021-12/Waste-Wise-Cities.pdf
कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय
https://darpg.gov.in/sites/default/files/CSD-2023/Circular_Economyt.pdf#:~:text=INTRODUCTION.%20The%20Circular%20Economy%20refers%20to%20an,Recycle%2C%20Refurbishment%2C%20Recover%2C%20and%20Repairing%20of%20materials.
लक्ष्य जीरो डंपसाइट: स्वच्छ भारत मिशन के तहत शहरी कचरा स्थलों को हटाना भारत का अभियान
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