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जो लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, वे अपनी ही भाषा में बोलते हैं – लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला


इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वैश्विक हिंदी परिवार तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित तीसरे अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन का भव्य समापन

प्रविष्टि तिथि: 11 JAN 2026 9:30PM by PIB Delhi

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद, वैश्विक हिंदी परिवार तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीसरा अंतरराष्ट्रीय भारतीय भाषा सम्मेलन–2026  11 जनवरी को सम्पन्न हुआ। समापन सत्र में लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। दिल्ली विधान सभा के अध्यक्ष श्री विजेंद्र गुप्ता सम्‍मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद थे। सत्र की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष, पद्म भूषण से सम्मानित प्रख्यात विचारक श्री राम बहादुर राय ने की। विशिष्ट वक्ता के रूप में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय संयोजक श्री ए. विनोद उपस्थित रहे। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे ने भी अपनी उपस्थिति से सम्मेलन की शोभा बढ़ाई। सम्मेलन निदेशक श्री अनिल जोशी भी मंचासीन थे। इसके अतिरिक्त, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अधिष्ठाता (प्रशासन) श्री रमेश चंद्र गौर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा एवं साहित्य अध्ययन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी ने भी सम्मेलन में उपस्थित रहकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

सभा को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने कहा कि भारतीय भाषाएँ भारत की आत्मा हैं। सम्मेलन के आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन विचारों के आदान-प्रदान के लिए अपने-आप में एक सशक्त मंच है, जहाँ भारतीय भाषाओं के संवर्धन और प्रचार-प्रसार तथा आज की युवा पीढ़ी को उनसे जोड़ने के उपायों पर संवाद हुआ। उन्होंने कहा कि आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम अपनी वर्तमान पीढ़ी को विश्व की सबसे समृद्ध भाषाओं से कैसे जोड़ें—ऐसी भाषाएँ जिनके प्रत्येक शब्द में भारत की आत्मा और संस्कृति निवास करती है। इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने इससे जुड़े सभी लोगों को बधाई दी और उनके प्रयासों की प्रशंसा की।

भारतीय प्रवासी समुदाय की आने वाली पीढ़ियों को भारतीय भाषाओं से जोड़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि विश्व के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अनिवासी भारतीय निश्चित रूप से अपनी संस्कृति और मूल्यों पर गर्व करते हैं। हालांकि, उनकी भावी पीढ़ियों को भारतीय भाषाएँ सिखाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए।

भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संसद में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाती है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि लोकतंत्र के मंदिर संसद में अनेक संसद सदस्य अपनी-अपनी भाषाओं में बोलते हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनका प्रयास रहेगा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले सभी संसद सदस्यों को बजट सत्र के दौरान अपनी-अपनी मातृभाषा में बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे भारतीय भाषाओं का विस्तार संसद से ही प्रारंभ हो। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह प्रयास पहले ही शुरू किया जा चुका है और प्रधानमंत्री द्वारा इसकी सराहना भी की गई है।

उन्होंने आगे कहा कि जो अपने मूल और भारत की मिट्टी से जुड़े रहते हैं, वे अपनी मातृभाषा में बोलते हैं। विभिन्न देशों के अपने दौरों का उल्लेख करते हुए उन्होंने देखा कि कई राष्ट्राध्यक्ष केवल अपनी भाषा में ही बोलते हैं। उन्होंने कहा कि जब भी भारत के प्रधानमंत्री किसी वैश्विक या अंतरराष्ट्रीय मंच को संबोधित करते हैं, वे अपनी भाषा में बोलते हैं। इसी तरह, जब भारतीय प्रतिनिधि विश्व की संसदों या अन्य मंचों पर जाते हैं, वे अपनी भाषाओं में बोलते हैं। उन्होंने कहा, “हमें अपनी भाषा पर गर्व है। अगर हम वैश्विक मंचों पर स्वयं को अपनी भाषा में व्यक्त नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा?” उन्होंने आगे कहा,  कि इसलिए भारतीय भाषाओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं।

भाषा के प्रसार में सिनेमा के योगदान को उजागर करते हुए श्री बिरला ने कहा कि हिंदी फिल्मों ने भी भारतीय भाषाओं को दुनिया भर में ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने साझा किया कि जब वे अन्य देशों का दौरा करते हैं, लोग अक्सर उन्हें बताते हैं कि उन्हें हिंदी गीत कितने पसंद हैं, जो इस बात को दर्शाता है कि भारतीय भाषाएँ कितनी समृद्ध हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग भाषाएँ हैं, और हर भाषा समृद्ध है, जो भारत की मिट्टी और संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है।

संसद में भारतीय भाषाओं के उपयोग के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि संवाद और चर्चा सभी 22 भारतीय भाषाओं में होने चाहिए, और लोग इसे अपनी पसंद की किसी भी भाषा में सुन सकते हों। उन्होंने कहा, “हम किसी पर भी कोई भाषा थोपते नहीं हैं,” और आगे जोड़ा कि प्रयास इस बात को सुनिश्चित करना है कि भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार हो, उनका विकास और कल्याण हो, और उनके माध्यम से भारतीय संस्कृति का संपूर्ण विश्व में प्रसार हो। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये प्रयास निश्चित रूप से परिणाम देंगे और आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय भाषाओं पर गर्व महसूस करेंगी। उन्होंने आयोजकों को उनके प्रयासों के लिए बधाई और धन्यवाद भी दिया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में, श्री राम बहादुर राय ने कहा कि सम्मेलन के दौरान व्यक्त की गई आशाएँ और अपेक्षाएं पूरी होनी चाहिए, लेकिन साथ ही वास्तविकता से जुड़े रहना भी आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह समझना महत्वपूर्ण है कि हम वर्तमान में कहाँ खड़े हैं। उन्होंने सम्मेलन को महत्वपूर्ण बताया और इसके महत्व को दो स्पष्ट तरीकों से समझाया। पहला, इस सम्मेलन ने साबित किया कि भारतीय भाषाओं का दायरा अंतरराष्ट्रीय, वास्तव में वैश्विक है। दूसरा, यदि भारतीय भाषाओं का दायरा वैश्विक है, तो सवाल उठता है कि इसका केंद्र क्या है। उन्होंने कहा कि जिस भाषा में इस सम्मेलन में चर्चाएँ हुईं, अर्थात् हिंदी — वही इसका केंद्र है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी, भारतीय भाषाओं की केंद्रीय भाषा है।

उन्होंने आगे कहा कि हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसे सम्मेलन की आवश्यकता ही क्यों पड़ी, क्योंकि जहाँ हिंदी को भाषाओं के केंद्र में होना चाहिए था, वहाँ अंग्रेज़ी को रानी की तरह सिंहासन पर बैठा दिया गया है—एक ऐसी जगह पर, जहां से अंग्रेज़ी जाने को तैयार नहीं है, और न ही हम उसे वहां से हटाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि यह बोझ पिछले 75 वर्षों से उठाया जा रहा है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आज लोकसभा के स्पीकर हिंदी के भक्त और प्रेमी हैं। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय भाषाओं का सम्मान किया जाना है और उन्हें सामान्य उपयोग में लाया जाना है, तो सरकार को प्रत्येक मंत्रालय में आठवें अनुसूची की सभी 22 भाषाओं के लिए अनुवादकों की नियुक्ति करनी चाहिए।

लोकसभा के स्पीकर की उपस्थिति में उन्होंने भारत सरकार से आग्रह किया कि एक ऐसा संस्थान स्थापित किया जाए, जो भाषा समन्वय, भाषा योजना और भाषा-संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए विशेषज्ञों को स्थान प्रदान करे। उन्होंने कहा कि हमें यह संकल्प करना चाहिए कि हमारी भाषाओं को केवल अनुवाद की भाषाओं में परिवर्तित नहीं होने दिया जाएगा और हम अपनी भाषाओं की मौलिकता को संरक्षित कर सकते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जहाँ समाज, व्यक्ति और संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहीं सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत सरकार की है।

श्री विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि भारतीय भाषाएँ, जिनका विश्व में अपना स्थान है, आत्म-सम्मान और गरिमा का विषय भी हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं पर चर्चा करना मूलतः निरंतरता पर चर्चा करना है। भारतीय भाषाएँ न तो एकरूपता में विकसित हुई हैं और न ही अलगाव में; बल्कि विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों, आस्थाओं और ज्ञान परंपराओं के सदियों के आपसी संवाद ने इन्हें आकार दिया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय भागीदारी ने इसके महत्व को और भी बढ़ा दिया और यह प्रदर्शित किया कि भारतीय भाषाएँ भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं हैं। श्री श्याम परांडे ने कहा कि किसी भी सभ्यता और संस्कृति की बौद्धिक सोच केवल उसकी अपनी भाषाओं में ही अस्तित्व में रह सकती है।

सम्मेलन निदेशक, श्री अनिल जोशी ने तीन दिनों में हुई चर्चाओं का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की रूपरेखा रेखांकित की। कार्यक्रम की शुरुआत में, श्री विनय शील चतुर्वेदी ने स्वागत भाषण दिया और अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। सत्र का संचालन डॉ. अनीता वर्मा द्वारा किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के तीन दिनों के दौरान, भारतीय भाषाओं से संबंधित मुद्दों पर 40 से अधिक सत्र आयोजित किए गए। यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, श्रीलंका, नेपाल, नीदरलैंड, फ्रांस, मॉरीशस, थाईलैंड और जापान सहित 100 से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में भाग लिया।

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