PIB Backgrounder
संघ लोक सेवा आयोग
योग्यता-आधारित चयन और समावेशिता की एक सदी
प्रविष्टि तिथि:
30 SEP 2026 11:34AM by PIB Delhi
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1 अक्टूबर 2026 को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सौ साल पूरे हो रहे हैं। इसकी संस्थागत यात्रा 1 अक्टूबर 1926 को शुरू हुई थी, जब भारत का पहला लोक सेवा आयोग बनाया गया था - यह एक सलाहकार संस्था थी जिसके चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति लंदन में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट करते थे। इसके बाद की सदी में, आयोग के ढांचे, दर्जे और ज़िम्मेदारियों में बदलाव आए और यह आज एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था बन गया है।
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1926 तक का सफर
सरकारी नौकरी में भर्ती 'सिफारिश' के बजाय 'योग्यता' के आधार पर होनी चाहिए - यह सिद्धांत 1855 में औपचारिक रूप से लागू हुआ। तब लंदन में इंडियन सिविल सर्विस (आईसीए) परीक्षा शुरू की गई, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी की 'नॉमिनेशन' (नामांकन) वाली व्यवस्था की जगह खुली प्रतियोगिता को अपनाया। हालांकि, ज्यादातर भारतीयों के लिए इसमें शामिल होना लगभग नामुमकिन था। परीक्षा सिर्फ लंदन में और अंग्रेजी भाषा में होती थी। इसमें ग्रीक और लैटिन जैसे विषयों की परीक्षा ली जाती थी - इसलिए नहीं कि बंगाल या पंजाब के किसी जिले का प्रशासन चलाने के लिए इनकी जरूरत थी, बल्कि इसलिए क्योंकि इनसे ब्रिटिश शिक्षा-प्रणाली में पढ़े-लिखे लोगों को फायदा मिलता था।
1862 में, रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई, 21 साल के सत्येंद्रनाथ टैगोर उस परीक्षा में बैठने उद्देश्य से कलकत्ता से इंग्लैंड गए, जिसे उनके अपने देश में देने की इजाजत नहीं थी। उन्होंने 1863 में परीक्षा पास की और 1864 में नौकरी शुरू की - वे ऐसे पहले भारतीय बने जो उस सेवा में शामिल हुए जिसे अंग्रेज "हेवन-बॉर्न सर्विस" (स्वर्ग से आई सेवा) कहते थे। उन्होंने बॉम्बे प्रेसिडेंसी में तीस से ज्यादा सालों तक सेवा की। उनकी सफलता के छह साल बाद, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, बिहारी लाल गुप्ता और रमेश चंद्र दत्त ने भी यही राह अपनाई। हालांकि, परीक्षा के लिए अधिकतम उम्र सीमा धीरे-धीरे 23 से घटाकर 19 साल कर दी गई, जिससे भारतीय उम्मीदवारों को तैयारी के लिए बहुत कम समय मिलता था। 1919 तक, 1,255 आईसीएस अधिकारियों में से सिर्फ 78 भारतीय थे।
लगातार राष्ट्रवादी मांगों के कारण धीरे-धीरे बदलाव आए। मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के बाद बने 'गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1919' में एक लोक सेवा आयोग बनाने का प्रावधान किया गया। 1922 में, लंदन के साथ-साथ भारत में भी पहली बार इलाहाबाद में आईसीएस परीक्षा आयोजित की गई। 1928 में भारतीय केंद्र दिल्ली स्थानांतरित हो गया। 1924 में, आर्थर हैमिल्टन ली की अध्यक्षता वाले ली आयोग ने तुरंत एक वैधानिक लोक सेवा आयोग स्थापित करने की सिफारिश की। इसने यह भी प्रस्ताव दिया कि हर 10 नए लोगों में से चार ब्रिटिश हों, चार भारतीय हों और दो भारतीय प्रांतीय सेवाओं से प्रोन्नत होकर आएं - कागज पर तो यह बराबरी का रास्ता था, लेकिन असल में हर भर्ती में 40 प्रतिशत सीटें ब्रिटिश लोगों के लिए पक्की थीं, जो प्रतियोगिता के बजाय जन्म के आधार पर मिलती थीं।
यह आयोग 1919 के एक्ट की धारा 96बी और 96सी के तहत बनाए गए लोक सेवा आयोग (कार्य) नियम, 1926' के अंतर्गत स्थापित किया गया था। यूनाइटेड किंगडम की होम सिविल सर्विस के सदस्य सर रॉस बार्कर इसके पहले चेयरमैन थे, जिनकी सहायता के लिए चार सदस्य थे, और आयोग का कार्यालय दिल्ली के मेटकाफ हाउस में स्थित था। इसकी सीमित शक्तियों के कारण स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने इसकी लगातार आलोचना की। फिर भी, अब भारत में भर्ती करने वाली एक स्थायी संस्था मौजूद थी, जिसका कार्यालय और कर्मचारी भारत में ही थे - इसीलिए आयोग अपने इतिहास की शुरुआत 1926 से मानता है।
संवैधानिक प्रावधान
22 अगस्त 1949 को, संविधान सभा में प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) के चेयरमैन डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से जुड़े ड्राफ्ट आर्टिकल (मसौदा अनुच्छेद) पेश किए। ये संविधान का भाग XIV (अनुच्छेद 315–323) बने। 26 नवंबर 1949 को अपने विदाई भाषण में, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी नियुक्तियों में निष्पक्षता बनाए रखने और नौकरी में धांधली, भाई-भतीजावाद और पक्षपात को रोकने के लिए लोक सेवा आयोगों की आजादी जरूरी है।
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अनुच्छेद
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यह क्या प्रदान करता है
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315
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संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग, जिसमें दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त आयोग का प्रावधान है
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316
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अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है
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317
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सदस्य को हटाने या निलंबित करने का काम केवल राष्ट्रपति के आदेश से, उच्चतम न्यायालय की जांच के बाद ही किया जा सकता है
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318
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सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा की शर्तों पर नियम बनाने की शक्ति
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319
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सदस्य का कार्यकाल खत्म होने के बाद पद संभालने पर रोक; अध्यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य के तहत आगे किसी नौकरी के लिए अयोग्य होता है
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320
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काम: संघ की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएं आयोजित करना, और भर्ती, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों के तरीकों पर सलाह देना
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321
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आयोग के कामों का दायरा बढ़ाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडल की शक्ति
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322
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आयोग का खर्च भारत की संचित निधि से किया जाता है
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323
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राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट; जिन मामलों में आयोग की सलाह नहीं मानी गई, उन्हें कारणों सहित संसद के सामने रखा जाता है
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आयोग के काम
- परीक्षा के जरिए भर्ती: सिविल सेवा, भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, संयुक्त चिकित्सा सेवा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी, संयुक्त रक्षा सेवा और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सहायक कमांडेंट) जैसी परीक्षाएं।
- चयन के जरिए भर्ती: मंत्रालयों और विभागों द्वारा प्रस्तावित विशेष पदों के लिए साक्षात्कार और भर्ती टेस्ट।
- सरकार को सलाह: भर्ती नियमों, विभागीय पदोन्नति समितियों के ज़रिए पदोन्नति, अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल करने और अनुशासनात्मक मामलों पर। 2023-24 में, इसने पदोन्नति के लिए 24,581 अधिकारियों के रिकॉर्ड पर कार्रवाई की और 532 अधिकारियों को अखिल भारतीय सेवाओं में शामिल किया गया।
- पुलिस नेतृत्व: 2012–13 से, प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 22 सितंबर 2006 के आदेश के अनुसार, आयोग राज्यों में पुलिस महानिदेशक/पुलिस बल के प्रमुख के तौर पर नियुक्ति के लिए वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की सूची तैयार करता है।
अहम घटनाएं: 1926–2026
शुरुआत: 1926–1949
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वर्ष
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अहम पड़ाव
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1935
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भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत नियुक्ति की शक्ति गवर्नर-जनरल को सौंपी गई; इसमें एक संघीय पीएससी और प्रांतीय पीएससी का प्रावधान किया गया; और भर्ती, नियुक्ति, पदोन्नति, अनुशासनात्मक मामलों और सेवा नियमों के संबंध में आयोग से परामर्श करना अनिवार्य कर दिया गया।
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1937
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इसका नाम बदलकर संघीय लोक सेवा आयोग (1 अप्रैल) कर दिया गया।
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1938
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कई सेवाओं के लिए संयुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू हुईं - यानी एकीकृत, बहु-सेवा भर्ती की शुरुआत।
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1940
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आईसीएस में पहली बार यूरोपियनों (575) की तुलना में भारतीयों (625) की संख्या अधिक हो गई।
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1947
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श्री एच.के. कृपलानी पहले भारतीय अध्यक्ष बने।
आजादी के बाद पहली परीक्षा दिसंबर में आयोजित हुई; आईसीएस की जगह आईएएस ने ले ली।
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1948
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संयुक्त परीक्षा के माध्यम से भारतीय विदेश सेवा के अधिकारियों का पहला बैच भर्ती किया गया।
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गणराज्य की सेवाओं का विकास: 1950–1979
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वर्ष
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अहम पड़ाव
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1950
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26 जनवरी को फ़ेडरल पीएससी, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) बन गया और श्री आर.एन. बनर्जी इसके चेयरमैन बने।
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1950–51
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संविधान के तहत अखिल भारतीय सेवाओं के लिए पहली नियमित भर्ती: आईएएस के लिए 29 और IPS के लिए 31 उम्मीदवारों की सिफारिश की गई।
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1951
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अखिल भारतीय सेवा अधिनियम लागू किया गया।
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1966
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भारतीय वन सेवा को तीसरी अखिल भारतीय सेवा के तौर पर बनाया गया; पहला चयन 1967 में हुआ।
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1969
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सिविल सर्विसेज़ परीक्षा के निबंध और जनरल स्टडीज़ पेपर के लिए आठवीं अनुसूची की भाषाओं को विकल्प के तौर पर शामिल किया गया।
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1976
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स्वर्ण जयंती। पहली बार आवेदनों की संख्या एक लाख के पार पहुंची।
डी.एस. कोठारी कमेटी ने तीन चरणों वाली परीक्षा का प्रस्ताव रखा।
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1977
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पहली संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा।
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1978
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आयोग ने आवेदनों, उत्तर पुस्तिका और रिकॉर्ड्स को प्रोसेस करने के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल शुरू किया।
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1979
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तीन चरणों वाली सिविल सेवा परीक्षा - प्रारंभिक, मुख्य और साक्षात्कार- शुरू की गई।
मुख्य परीक्षा में आठवीं अनुसूची की भाषाओं को आधिकारिक तौर पर शामिल किया गया; लंदन केंद्र बंद कर दिया गया।
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सुधार और आधुनिकीकरण: 1985–2010
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वर्ष
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अहम पड़ाव
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1985
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स्वीकृत संख्या बढ़ाकर एक चेयरमैन और 10 सदस्य कर दी गई।
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1988–89
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सतीश चंद्र समिति ने और केंद्र बनाने, 200 नंबर का निबंध, प्रारंभिक परीक्षा में नकारात्मक मार्किंग और साक्षात्कार के लिए ज्यादा नंबर देने की सिफारिश की।
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1989
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ऑप्टिकल मार्क रिकग्निशन (ओएमआर) तकनीक शुरू की गई।
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1992
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श्रीमती रोज मिलियन बाथेव खारबुली पहली महिला चेयरमैन बनीं।
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1993
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सिविल सेवा (मुख्य) परीक्षा में निबंध का पेपर शुरू किया गया; इंटरव्यू के नंबर 250 से बढ़ाकर 300 कर दिए गए।
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1994
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मेडिकल साइंस को एक वैकल्पिक विषय के तौर पर जोड़ा गया।
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2000
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एसएएमपीईआरए (SAMPERA) कॉमन एप्लीकेशन फ़ॉर्म (1999–2000) के बाद ऑनलाइन रिक्रूटमेंट एप्लीकेशन (ओआरए) व्यवस्था शुरू की गई; 2010 तक, कई परीक्षाओं के लिए आवेदन पूरी तरह से ऑनलाइन हो गए।
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2003
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पहली केंद्रीय पुलिस बल (असिस्टेंट कमांडेंट) परीक्षा आयोजित की गई (12 अक्टूबर)।
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2005
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नए कार्यालय भवन, ‘आयोग सचिवालय’ का उद्घाटन किया गया (22 दिसंबर)।
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2009
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राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने ‘शासन और लोक सेवा’ पर स्थापना दिवस व्याख्यान श्रृंखला का उद्घाटन किया (12 नवंबर); भारतीय कॉर्पोरेट विधि सेवा को सिविल सेवा परीक्षा में जोड़ा गया।
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2010
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यूपीएससी ने सार्क (SAARC) देशों के लोक सेवा आयोग के प्रमुखों के सम्मेलन की मेज़बानी की (20–22 नवंबर)।
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डिजिटल, पारदर्शी और समावेशी: 2011–2026
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वर्ष
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अहम पड़ाव
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2011
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सिविल सेवा अभिरुचि परीक्षा (सीसैट) शुरू किया गया; सिंगल विंडो सिस्टम (1 सितंबर)।
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2013
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सिविल सेवा (मुख्य) परीक्षा का नया ढांचा: सामान्य अध्ययन (जिनमें नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा, और अभिरुचि शामिल हैं) के चार पेपर और एक वैकल्पिक विषय। पहली बार कंप्यूटर-आधारित भर्ती परीक्षाएं। सीएस (प्रारंभिक) परीक्षा के जरिए आईएफओएस की स्क्रीनिंग।
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2015
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सीसैट को क्वालिफाइंग पेपर (33 प्रतिशत) बनाया गया।
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2017
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इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा तीन चरणों वाली बनी; सवालों पर आपत्तियों के लिए सात दिन की ऑनलाइन विंडो।
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2018
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सवाल-आधारित मार्क्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम (1 जून)।
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2019
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परीक्षाओं की साल भर निगरानी के लिए खास नियंत्रण कक्ष।
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2021
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एनडीए और एनए परीक्षा में पहली बार महिलाओं को शामिल किया गया - एनडीए और एनए परीक्षा (II), 2021, 14 नवंबर 2021 को आयोजित हुई।
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2022
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सिविल सेवा परीक्षा के तहत मौजूद रेलवे की चार ग्रुप ए सेवाओं को मिलाकर 'भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा' बनाई गई।
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2025 और 2026 में हुई गतिविधियां सेक्शन 7 में दी गई हैं।
तथ्य और आंकड़े
आयोग का दायरा
पिछले कुछ वर्षों में यूपीएससी के काम का दायरा और जटिलता काफी बढ़ गई है। परीक्षाओं और चयन के जरिए भर्ती के लिए आवेदन 1950-51 में 42,727 से बढ़कर 2022-23 में 45,10,044 के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए - यानी सौ गुना से भी ज्यादा की बढ़ोतरी। उस साल, आयोग ने 15 परीक्षाएं आयोजित कीं (33,51,916 आवेदन) और चयन के जरिए भर्ती के तहत 4,411 पदों के लिए 233 अनुरोध प्राप्त किए (11,58,128 आवेदन)।
तब और अब
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संकेतक
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तब
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अब
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बदलाव
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परीक्षा केंद्र
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8 (1950)
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86 (2026)
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10× से ज्यादा
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सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित महिला उम्मीदवार
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3 of 83 (1952)
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299 of 958 (2025)
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लगभग 100×
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सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित एससी उम्मीदवार
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9 (1955)
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158 (2025)
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लगभग 18×
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सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित एसटी उम्मीदवार
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2 (1956-57)
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73 (2025)
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लगभग 37×
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सभी परीक्षाओं में एससी आवेदक
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1,713 (1956-57)
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4,51,243 (2023-24)
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लगभग 382×
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सभी परीक्षाओं में एसटी आवेदक
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82 (1956-57)
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1,47,106 (2023-24)
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लगभग 1794×
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सिविल सेवा परीक्षा में अनुशंसित पीडब्ल्यूबीडी उम्मीदवार
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3 (2002)
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42 (2025)
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14×
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अनुशासनात्मक मामलों पर दी गई सलाह
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53 (1950-51)
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446 (2023-24)
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लगभग 8×
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आंकड़ों में भागीदारी
- महिलाएं: 1949 और 1951 के बीच, भारतीय विदेश सेवा के लिए सिर्फ एक महिला और आईएएस के लिए दो महिलाओं को चुना गया था। 1952 में चुने गए लोगों में महिलाओं की हिस्सेदारी 3.6 प्रतिशत थी और सीएसई 2025 में यह 31.2 प्रतिशत रही, जिसमें उन्होंने टॉप 25 रैंक में से 11 रैंक हासिल कीं।
- साक्षात्कार में भारतीय भाषाएं: 1970-71 में, आयोग ने सरकार को बताया कि व्यक्तित्व परीक्षण (पर्सनैलिटी टेस्ट) सिर्फ अंग्रेजी में ही हो सकता है। 1980-81 में स्थिति बदली और अब उम्मीदवार आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए दुभाषिये (इंटरप्रेटर) की मदद से किसी भारतीय भाषा में जवाब दे सकते हैं; 2010-11 में 803 और 2023-24 में 307 उम्मीदवारों ने ऐसा किया।
किस्से-कहानियां
आयोग के सौ सालों के सफर से जुड़ी छोटी-छोटी कहानियां।
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जहां 'स्टील फ्रेम' वाला भाषण दिया गया था
सर थॉमस मेटकाफ़ द्वारा 1835 में बनवाया गया मेटकाफ़ हाउस इतिहास में एक और वजह से भी अहम है। 21 अप्रैल 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने वहां सिविल सर्विस प्रोबेशनर्स के पहले बैच को संबोधित किया था और सिविल सेवा को "भारत का स्टील फ़्रेम" कहा था। अब हर साल इस तारीख को 'सिविल सेवा दिवस' के तौर पर मनाया जाता है।
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महाराजा का ट्रांजिट हाउस
शाहजहां रोड पर स्थित धौलपुर भवन को 1920 में धौलपुर के महाराजा राणा उदयभानु सिंह ने आर्ट डेको शैली में बनवाया था, ताकि दिल्ली आने-जाने के दौरान वे यहां रह सकें। 7 अप्रैल 1949 को धौलपुर रियासत के भारतीय संघ में विलय के बाद, यह इमारत सरकारी संपत्ति बन गई। तीन साल बाद, 1952 में, यह आयोग का स्थायी मुख्यालय बन गया।
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अस्सी में से एक
1972 में, किरण बेदी भारतीय पुलिस सेवा के लिए आयोग द्वारा चुनी जाने वाली पहली महिला बनीं; यह एक ऐसी सेवा थी जिसमें पहले कभी कोई महिला अधिकारी नहीं थी। उस साल अस्सी वैकेंसी थीं, जिनमें वह अकेली महिला थीं।
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अखबार में फॉर्म
1989 में, जब धीमी डाक सेवा के कारण दूर-दराज के इलाकों तक आवेदन पत्र पहुंचाना मुश्किल हो गया, तो आयोग ने उन्हें सीधे अखबारों में छपवाया। 1984 में, जब भारी बर्फबारी की वजह से कांगड़ा का संपर्क कट गया, तो आयोग ने प्रभावित उम्मीदवारों के लिए आवेदन की समय-सीमा दो हफ़्ते बढ़ा दी।
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डाक टिकट पर सूरज
8 नवंबर 1977 को, डाक और तार विभाग ने आयोग की स्वर्ण जयंती के लिए 25 पैसे का डाक टिकट जारी किया। इस पर सूरज बना था - जो निष्पक्षता और सभी के लिए समान अवसर का प्रतीक था - और साथ में राष्ट्रीय तिरंगा भी था। 14 दिसंबर 2001 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शुरू की गई प्लेटिनम जयंती के लिए, डाक विभाग ने एक 'फर्स्ट डे कवर' जारी किया।
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क्या आप जानते हैं?
- 11 नवंबर 2016 को खुला यूपीएससी म्यूजियम आम लोगों के लिए मुफ्त है और हफ्ते के दिनों में सुबह 9:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक खुला रहता है; आयोग की वेबसाइट पर इसका 360-डिग्री वर्चुअल टूर भी उपलब्ध है।
- उम्र सीमा में काफी बदलाव हुए हैं। 1988 में, एक विशेषज्ञ समिति ने सिविल सेवा परीक्षा के लिए उम्र सीमा 21 से 26 साल रखने की सलाह दी थी। सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए 32 साल, ओबीसी के लिए 35 साल और एससी/एसटी उम्मीदवारों के लिए 37 साल की उम्र सीमा 2014 में तय की गई थी; साथ ही, दिव्यांग लोगों के लिए इसमें दस साल तक की छूट दी गई और दो अतिरिक्त प्रयास भी दिए गए।
- जिन उम्मीदवारों ने सिविल सेवा परीक्षा 2011 में हिस्सा लिया था, उन्हें सीएसई 2015 में एक और प्रयास करने का मौका दिया गया, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो या उन्होंने पहले कितने भी प्रयास क्यों न किए हों।
- आयोग ने हमेशा सिर्फ़ केंद्र सरकार के लिए ही भर्तियां नहीं की हैं। 1960-61 में, अनुच्छेद 320 के तहत, इसने दिल्ली नगर निगम, कर्मचारी राज्य बीमा निगम और केंद्र शासित प्रदेशों की क्षेत्रीय परिषदों जैसी संस्थाओं के लिए भी भर्तियां करने पर सहमति जताई थी।
- दूसरे विश्व युद्ध के दौरान खुली प्रतियोगिता बंद हो गई थी। लंदन में परीक्षा आखिरी बार 1939 में हुई थी; 1940, 1941 और 1942 के लिए अधिकारियों को सीधे मनोनीत किया गया था, और 1943 के बाद ब्रिटिश सिविल सेवा आयोग के जरिए भर्ती पूरी तरह बंद हो गई थी।
- संविधान के मसौदे में, जब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा में लोक सेवा आयोग से जुड़े प्रावधान पेश किए थे, तो उन्हें अनुच्छेद 284 और 285 का नंबर दिया गया था।
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केस स्टडीज: यह सिस्टम कैसे काम करता है
मुंबई में हर सुबह, लगभग 5,000 डब्बेवाले घर का बना खाना (लंच) इकट्ठा करते हैं और उसे लंच के समय तक सही डेस्क तक पहुंचाते हैं। इसके लिए वे सिर्फ डिब्बे के ढक्कन पर चॉक से बने कलर कोड का इस्तेमाल करते हैं। आयोग भी हर साल इसी तरह की एक समस्या को हल करता है, लेकिन इसमें दांव कहीं ज्यादा बड़ा होता है: सही प्रश्न-पत्र सही समय पर सही उम्मीदवार तक पहुंचना चाहिए, और फिर हर जवाब को सिर्फ़ उसकी मेरिट के आधार पर जांचा जाना चाहिए। नीचे दी गई केस स्टडीज बताती हैं कि यह कैसे होता है।
केस स्टडी 1: सही उम्मीदवार तक सही पेपर पहुंचाना
उम्मीदवार सिर्फ़ एक चुनाव करता है: शहर का। उस शहर के अंदर, सिस्टम परीक्षा केंद्र और कमरे का आवंटन करता है, ताकि परीक्षा के दिन तक हर उम्मीदवार का एक खास पता - शहर, केंद्र, कमरा, उम्मीदवार - तय हो जाए, जिसकी जानकारी पहले सिर्फ़ सिस्टम को होती है। एक ही कमरे में बैठे उम्मीदवार अलग-अलग पेपर लिख रहे हो सकते हैं - अकेले सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में, उम्मीदवार 48 वैकल्पिक विषयों में से चुनाव करते हैं - इसलिए हर सीलबंद पैकेट में ठीक वही पेपर होने चाहिए जिनकी उस केंद्र पर जरूरत है, और उन्हें कमरे के हिसाब से अलग-अलग किया गया हो।
केस स्टडी 2: ऐसा पेपर तैयार करना जिसे किसी ने न देखा हो
प्रश्न पत्र उन प्रश्न-बैंकों से बनाए जाते हैं जिन्हें शैक्षणिक विशेषज्ञ तैयार करते हैं। ये विशेषज्ञ पूरी गोपनीयता के साथ और बिना अपनी पहचान उजागर किए काम करते हैं। कोई एक एक्सपर्ट पूरा पेपर नहीं बनाता, और न ही किसी विशेषज्ञ को यह पता होता है कि कौन से सवाल इस्तेमाल किए जाएंगे या कब। पेपर बनाते समय, आयोग यह पक्का करता है कि इसमें पूरा सिलेबस कवर हो, कठिनाई का स्तर संतुलित हो और कोई भी सवाल पहले की किसी यूपीएससी परीक्षा में न पूछा गया हो।
यह पूरी व्यवस्था 'जरूरत के हिसाब से जानकारी' के सिद्धांत पर टिकी है: किसी भी एक व्यक्ति को - यहां तक कि चेयरमैन को भी - पूरी जानकारी नहीं होती।
केस स्टडी 3: परीक्षा भवन को सुरक्षित बनाना
नेशनल ई-गवर्नेंस डिवीजन के साथ मिलकर, आयोग ने 14 सितंबर 2025 को एनडीए & एनए (II) और सीडीएस (II) परीक्षाओं के दौरान गुरुग्राम के कुछ चुने हुए केंद्रों पर एआई-आधारित फेशियल ऑथेंटिकेशन (उम्मीदवार की लाइव तस्वीर का एप्लीकेशन वाली तस्वीर से मिलान) का पायलट प्रोजेक्ट चलाया। इसे 24 मई 2026 को सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा में बड़े पैमाने पर लागू किया गया, जहां लगभग 5.50 लाख उम्मीदवारों का फेस ऑथेंटिकेशन इनविजिलेटर के मोबाइल फोन के जरिए किया गया; इसमें हर उम्मीदवार पर लगभग 6-8 सेकंड का समय लगा।
सीएस (प्रारंभिक) परीक्षा 2026 से पहले, उम्मीदवारों के पिछले पंद्रह वर्षों के डेटा की जांच की गई और ऐसे 569 आवेदकों की पहचान करके उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया, जिन्होंने अतिरिक्त प्रयास पाने के लिए गलत जानकारी दी थी।
केस स्टडी 4: जरूरत के हिसाब से तेजी से भर्ती
जब भी देश को जरूरत पड़ी, आयोग ने अपने मानदंडों से समझौता किए बिना बार-बार भर्ती बढ़ाई। जुलाई 1948 में, एक स्पेशल रिक्रूटमेंट बोर्ड ने रिकॉर्ड और साक्षात्कार के आधार पर 27 से 45 साल की उम्र के अनुभवी लोगों को आईएएस और आईपीएस में भर्ती किया। 1956–57 में, एक विशेष अभियान के जरिए 22,000 से ज्यादा उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की गई। 1958 में, एक स्पेशल रिक्रूटमेंट बोर्ड ने एक राष्ट्रीय पूल के लिए 197 वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविद चुने - जिनमें विदेश से आए उम्मीदवार भी शामिल थे - और 1962 तक इस पूल में लोगों की संख्या बढ़कर 500 हो गई। 1962 की इमरजेंसी के दौरान, एक आपात आयोग ने दो महीनों में रक्षा से जुड़े 1,353 पद भरे।
कोविड-19 के दौरान, जब ट्रेन सेवा बंद थीं, तो आयोग ने एक बार के उपाय के तौर पर साक्षात्कार देने वाले उम्मीदवारों का हवाई किराया वापस किया, राज्यों से कहा कि वे ई-समन लेटर वाले उम्मीदवारों को प्रतिबंधित क्षेत्र से गुज़रने दें, रहने और परिवहन में मदद की, और हर उम्मीदवार को मास्क, फेस शील्ड, सैनिटाइजर और ग्लव्स की एक सीलबंद किट दी।
केस स्टडी 5: डिजाइन के जरिये समावेश
सबसे पहले पहुंच की बात आती है। आयोग ने 1994 में दृष्टिबाधित उम्मीदवारों के लिए स्क्राइब (लिखने में मदद करने वाले) की सुविधा शुरू की थी। आज, बेंचमार्क विकलांगता वाले लोगों के लिए स्क्राइब और अतिरिक्त समय का अधिकार एक हक है; उन्हें अपनी पसंद का केंद्र मिलता है, वे साथ में एक सहायक ला सकते हैं और साक्षात्कार के दौरान एक फैसिलिटेटर उनकी मदद करता है। महिला उम्मीदवारों को शुल्क में छूट मिलती है। उम्र में छूट उन लोगों को भी दी गई है जिनकी तैयारी ऐसी घटनाओं के कारण बाधित हुई जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं - जैसे गोवा मुक्ति संग्राम (1961–62) के स्वतंत्रता सेनानी, बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और युगांडा-ज़ंजीबार संकट (1971–72) के कारण विस्थापित भारतीय, और खाड़ी युद्ध (1991) से प्रभावित भारतीय।
इसके बाद निष्पक्षता आती है: एक ऐसा मूल्यांकन सिस्टम - लिखित परीक्षा से लेकर साक्षात्कार बोर्ड तक - जो उम्मीदवार की पहचान से प्रभावित नहीं होता। आयोग ने आरक्षण की नीति नहीं बनाई, लेकिन उसने इसे लागू करने वाला राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म तैयार किया। इसमें सीएसई 2019 से आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की श्रेणी और 2020 से ऑनलाइन रिक्रूटमेंट एप्लीकेशन फॉर्म में ट्रांसजेंडर के लिए एक अलग कैटेगरी को शामिल करना शामिल है।
केस स्टडी 6: मेरिट लिस्ट से परे मेरिट: प्रतिभा सेतु
जो उम्मीदवार परीक्षा के सभी चरण पास कर लेते हैं लेकिन फ़ाइनल लिस्ट में जगह बनाने से बहुत कम अंतर से चूक जाते हैं, वे सार्वजनिक सेवा को नहीं गंवाते। 20 अगस्त 2018 से लागू और सबसे पहले संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा, 2017 के लिए इस्तेमाल की गई 'पब्लिक डिस्क्लोज़र स्कीम' के तहत, ऐसे इच्छुक उम्मीदवारों की जानकारी नियोक्ताओं को उपलब्ध कराई गई थी। 9 जून 2025 को नए रूप में और 'प्रतिभा सेतु' नाम से शुरू की गई यह स्कीम उन्हें सत्यापित नियोक्ताओं से जोड़ती है, जिनमें मंत्रालय, पीएसयू, स्वायत्त संस्थाओं और निजी संगठन शामिल हैं।
हालिया घटनाक्रम
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कब
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घटनाक्रम
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विवरण
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मई 2025
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यूनिवर्सल पंजीकरण संख्या
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upsconline.nic.in पर नया पोर्टल 'वन-टाइम रजिस्ट्रेशन' की जगह लेगा; सभी परीक्षाओं के लिए एक ही स्थायी पहचान होगी; प्रोफ़ाइल पहले से ही पूरी की जा सकती हैं।
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2025
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रैंडम तरीके (याद्दच्छिक) से चुने गए साक्षात्कार बोर्ड
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इसे 'संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा, 2025' से शुरू किया गया है, जिसमें सॉफ्टवेयर कॉल करने का क्रम तय करता है।
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2025
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संस्थानों के लिए ईमेल अलर्ट
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शैक्षिक और पेशेवर संस्थान ra-upsc[at]gov[dot]in पर लिखकर भर्ती विज्ञापनों के अलर्ट के लिए सब्सक्राइब कर सकते हैं।
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1 फरवरी 2026 से
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उम्मीदवार हेल्पडेस्क
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30-चैनल वाला आईपी-आधारित कॉल सेंटर जिसमें एस्केलेशन के दो स्तर हैं; 50,000 से ज्यादा कॉल हैंडल किए गए।
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2026
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नए परीक्षा केंद्र
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सीएस (पी) 2026 के लिए भुवनेश्वर (10,656 आवेदन), कानपुर (6,938) और मेरठ (5,902) को जोड़ा गया, जिससे केंद्रों की संख्या 80 से बढ़कर 83 हो गई; एनडीए और एनए (II) 2026 के लिए अलवर, हिसार और किन्नौर को जोड़ा गया।
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2026
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प्रोविज़नल आंसर की
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सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा के तुरंत बाद प्रोविजनल आंसर की जारी की जाती है; ऑनलाइन ओपीआरईपी (QPRep) पोर्टल के जरिए आपत्तियां/सुझाव दिए जा सकते हैं।
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2026
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ऑनलाइन डीपीसी सिस्टम
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लगभग 101 मंत्रालयों, विभागों और संगठनों के विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) प्रस्तावों के लिए पेपरलेस प्लेटफ़ॉर्म विकसित किया जा रहा है।
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2026
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तकनीक और सुरक्षा
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एनआईईएलआईटी के जरिए एआई समेत नई तकनीक में अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया गया; आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सिक्योरिटी के लिए उच्च स्तरीय नेटवर्क समिटि बनाई गई।
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आज का आयोग
आयोग के प्रमुख चेयरमैन डॉ. अजय कुमार हैं (15 मई 2025 से)। इसके आठ सदस्य हैं - लेफ्टिनेंट जनरल राज शुक्ला (रिटायर्ड), सुश्री सुमन शर्मा, श्री विद्युत बिहारी स्वैन, डॉ. दिनेश दासा, श्री शील वर्धन सिंह, श्री संजय वर्मा, श्रीमती सुजाता चतुर्वेदी और श्रीमती अनुराधा प्रसाद। इन आठ सदस्यों में से तीन महिलाएं हैं - यह संरचना दिखाती है कि यह संस्था सौ सालों में कितनी आगे बढ़ चुकी है।
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“कोई संस्था जो सौ सालों से कायम है, वह इसलिए नहीं कि वह बदलाव का विरोध करती है, बल्कि इसलिए कि वह जानती है कि क्या कभी नहीं बदलना चाहिए।”
- डॉ. अजय कुमार, चेयरमैन, यूपीएससी
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सौ सालों से, यह आयोग देश की सबसे अहम जिम्मेदारियों में से एक निभा रहा है: काबिलियत को पहचानना, निष्पक्षता बनाए रखना और यह पक्का करना कि मौके सिर्फ़ विशेषाधिकार, जगह, भाषा या हालात तक ही सीमित न रहें। एक सदी पहले, लड़ाई भारतीयों के मुक़ाबला करने के अधिकार के लिए थी। आज, काम यह पक्का करना है कि यह अधिकार असल में हर उस काबिल भारतीय तक पहुंचे जो देश की सेवा करना चाहता है।
Refrences
- कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग
PIB Research
कृपया PDF देखें।
पीके/केसी/आरटी/एमपी
(रिलीज़ आईडी: 2316845)
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