अंतरिक्ष विभाग
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संसद प्रश्न: भारत का अंतरिक्ष प्रक्षेपण कार्यक्रम

प्रविष्टि तिथि: 23 JUL 2026 4:01PM by PIB Delhi

पिछले 3 वर्षों (जुलाई 2023 से जून 2026) में भारत ने सफलतापूर्वक 12 प्रक्षेपण यान मिशन, 11 राष्ट्रीय उपग्रह तथा अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए 9 उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं। इस अवधि के दौरान प्राप्त कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ निम्नलिखित हैं:

  • भारत चंद्रयान-3 मिशन के माध्यम से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफल सॉफ्ट-लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बना।
  • भारत ने पीएसएलवी के माध्यम से अपना पहला सौर वेधशाला मिशन, आदित्य- एल1, प्रक्षेपित किया।
  • इसी अवधि के दौरान श्रीहरिकोटा स्थित भारत के अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्र से 100 प्रक्षेपणों की बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की गई।
  • SPADEX मिशन के माध्यम से भारत अंतरिक्ष में डॉकिंग/अनडॉकिंग का सफल प्रदर्शन करने वाला विश्व का चौथा देश बना।
  • स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) का विकास तीसरी विकासात्मक उड़ान के साथ पूरा हुआ तथा भारतीय उद्योग के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
  • पहला संयुक्त नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (निसार) मिशन भारत के जीएसएलवी  प्रक्षेपण यान से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया।
  • भारत ने एलवीएम3 प्रक्षेपण यान का उपयोग करते हुए सीएमएस-03 मिशन के माध्यम से अपनी धरती से अब तक का सबसे भारी उपग्रह जीटीओ में प्रक्षेपित किया।
  • इसके बाद के एलवीएम3 प्रक्षेपण में भारत ने एक अमेरिकी ग्राहक के लिए भारतीय धरती से अब तक का सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपित किया।

अंतरिक्ष विभाग ने अब तक चार प्रक्षेपण यान विकसित किए हैं और उन्हें परिचालन में लाया है, अर्थात् पीएसएलवी, जीएसएलवी, जीएसएलवी एमके III और एसएसएलवी, जिनका उपयोग पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेविगेशन तथा अंतरिक्ष विज्ञान एवं अन्वेषण के लिए उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ-साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाएँ प्रदान करने में किया जा रहा है।

सरकार ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में इसरो के अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों के लिए तीसरे प्रक्षेपण परिसर (थर्ड लॉन्च पैड) की स्थापना को मंजूरी दी है, जो श्रीहरिकोटा स्थित दूसरे प्रक्षेपण परिसर के लिए एक स्टैंडबाय के रूप में भी कार्य करेगा। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में एसएसएलवी लॉन्च कॉम्प्लेक्स (एसएलसी) का भी विकास किया जा रहा है, जो भारत का दूसरा रॉकेट प्रक्षेपण स्थल होगा, ताकि स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) के प्रक्षेपण के साथ-साथ निजी अंतरिक्ष स्टार्ट-अप्स और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले प्रक्षेपणों की आवश्यकताओं को भी पूरा किया जा सके। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) एसएचएआर के वर्तमान दो परिचालन प्रक्षेपण परिसर, अर्थात् प्रथम प्रक्षेपण परिसर और द्वितीय प्रक्षेपण परिसर तथा आगामी तृतीय प्रक्षेपण परिसर और एसएसएलवी लॉन्च कॉम्प्लेक्स मिलकर पर्याप्त प्रक्षेपण क्षमता प्रदान करते हैं।

इसके अतिरिक्त, भारत के प्रक्षेपण अवसंरचना को सुदृढ़ करने और अंतरिक्ष क्षेत्र में गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) की बढ़ती भागीदारी का समर्थन करने के उद्देश्य से सरकार ने निम्नलिखित सक्षम उपाय भी शुरू किए हैं :

  • एनजीई को इसरो परिसरों के भीतर अस्थायी परीक्षण सुविधाएँ स्थापित करने की अनुमति दी गई है, जिससे उन्हें महत्वपूर्ण अवसंरचना तक पहुँच प्राप्त हुई है और प्रक्षेपण प्रणालियों के विकास एवं सत्यापन से जुड़े समय और लागत में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • साथ ही, कुलसेकरपट्टिनम में दूसरे प्रक्षेपण परिसर का विकास निरंतर प्रगति पर है। परिचालन शुरू होने के बाद, यह सुविधा विशेष रूप से स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल्स (एसएसएलवी) के लिए देश की प्रक्षेपण क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करेगी, प्रक्षेपण की आवृत्ति में सुधार करेगी तथा वाणिज्यिक प्रक्षेपणों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अधिक लचीलापन प्रदान करेगी।

अवसंरचना विकास के अतिरिक्त, इन-स्पेस ने नवाचार, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए कई नीतिगत सुधार और प्रोत्साहन योजनाएँ शुरू की हैं। इन पहलों में स्टार्टअप्स और एमएसएमई के लिए वित्तीय सहायता, सरल एवं सुव्यवस्थित प्राधिकरण प्रक्रियाएँ, कौशल विकास कार्यक्रम, प्रौद्योगिकी का व्यावसायीकरण तथा घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने के लिए अंतरिक्ष विनिर्माण क्लस्टरों को बढ़ावा देना शामिल है। सामूहिक रूप से ये उपाय एक सशक्त और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी भारतीय अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित कर रहे हैं।

पिछले तीन वर्षों के दौरान प्रक्षेपण सेवाओं के माध्यम से एम/एस न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) द्वारा अर्जित राजस्व (लेखा परीक्षित वित्तीय विवरणों के अनुसार) निम्नानुसार है :

राजस्व (लाखों में)

 

2024-25

 

2023-24

 

2022-23

प्रक्षेपण सेवाएँ

44,743.13

21,821.10

1,16,613.16

 

इसरो ने विभिन्न उन्नत प्रौद्योगिकियों के विकास का कार्य शुरू किया है, जो भारत के वैश्विक नेतृत्व को और सुदृढ़ करेंगी, जैसे:

  1. 200 टन थ्रस्ट वाले सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का विकास,
  2. एलवीएम3 प्रक्षेपण यान की पेलोड क्षमता बढ़ाने के लिए सेमी-क्रायोजेनिक बूस्टर चरण का विकास,
  3. रॉकेटों के कोर चरण के पुनः उपयोग को संभव बनाने के लिए वर्टिकल टेक-ऑफ और वर्टिकल लैंडिंग (वीटीवीएल) प्रौद्योगिकी के माध्यम से बूस्टर चरण की रिकवरी का प्रदर्शन,
  4. उच्च थ्रस्ट वाले एलओएक्स-मीथेन इंजन का विकास,
  5. एलओएक्स-मीथेन प्रणोदन प्रणालियों के साथ आंशिक रूप से पुनः प्रयोज्य अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान (एनजीएलवी) का विकास,
  6. पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (आरएलवी) के लिए विंग्ड बॉडी ऑर्बिटल री-एंट्री व्हीकल (ओआरवी) का विकास, जिसे एक असेंट वाहन द्वारा कक्षा में प्रक्षेपित किया जाएगा और बाद में वायुमंडल में पुनः प्रवेश करके रनवे पर उतरेगा, तथा
  7. एयर-ब्रीदिंग प्रणोदन प्रौद्योगिकी और एयर-ब्रीदिंग प्रणोदन का उपयोग करने वाले एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन (टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर) वाहन का विकास।

इसके अलावा, इन-स्पेस ने वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप भी तैयार किया है। इस दृष्टि के तहत, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लक्ष्य 2033 तक 44 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए रणनीतिक प्राथमिकताओं और सक्षम क्षमताओं का एक समूह चिन्हित किया गया है, जिसमें अवसंरचना को सुदृढ़ करना, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना, नवाचार को प्रोत्साहित करना, विनिर्माण को बढ़ावा देना तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना शामिल है।

यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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पीके/केसी/जेएस


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