पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय
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पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने 'अमृत काल विज़न 2047' के तहत समुद्री क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए तटीय राज्यों के साथ राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की


भारत की वैश्विक समुद्री प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्र-राज्य तालमेल, डिजिटल एकीकरण और बंदरगाह-आधारित विकास पर ज़ोर

प्रविष्टि तिथि: 28 APR 2026 7:44PM by PIB Delhi

पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने आज नई दिल्ली में तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ राष्ट्रीय परामर्श कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यशाला में समुद्री क्षेत्र के प्रमुख हितधारक एक मंच पर आए, ताकि 'मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047' के तहत भारत के समुद्री विकास के अगले चरण की रूपरेखा तैयार की जा सके।

इस कार्यशाला ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को राज्य-स्तरीय योजनाओं के साथ जोड़ने के लिए सहयोगात्मक मंच के रूप में काम किया। इसका मुख्य उद्देश्य बंदरगाह-आधारित विकास को गति देना, लॉजिस्टिक्स दक्षता को मज़बूत करना और डिजिटल टिकाऊ समुद्री प्रथाओं को बढ़ावा देना है।

इस अवसर पर मुख्य भाषण में पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सचिव श्री विजय कुमार (आईएएस) ने हाल के वर्षों में भारत के समुद्री क्षेत्र में आए महत्वपूर्ण बदलावों पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि बंदरगाहों के प्रदर्शन में सुधार, वैश्विक रैंकिंग में बढ़त और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क के साथ बढ़ते एकीकरण से ये बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि भारत नीतिगत सुधारों, बुनियादी ढांचे के विस्तार और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के सहारे, प्रतिस्पर्धी समुद्री राष्ट्र के रूप में अपनी स्थिति लगातार मज़बूत कर रहा है।

'मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047' पर आधारित, सरकार की यह दीर्घकालिक रूपरेखा बंदरगाहों, तटीय नौवहन, अंतर्देशीय जलमार्गों, जहाज़ निर्माण और हरित नौवहन (ग्रीन शिपिंग) जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की परिकल्पना करती है। जैसा कि पृष्ठभूमि रूपरेखा में रेखांकित किया गया है, यह विज़न विकास के प्रमुख वाहक के रूप में आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण और स्थिरता पर विशेष ज़ोर देता है।

अवसरों की व्यापकता की जानकारी देते हुए, सचिव ने कहा कि भारत की बंदरगाह क्षमता और परिचालन क्षमताओं में आने वाले दशकों में उल्लेखनीय विस्तार होने की उम्मीद है। इसमें वर्तमान निवेश, मशीनीकरण और बंदरगाह-आधारित औद्योगीकरण की योजनाओं का महत्वपूर्ण योगदान होगा। उन्होंने वैश्विक समुद्री मूल्य श्रृंखला में भारत की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए, रणनीतिक प्राथमिकता के तौर पर जहाज़ निर्माण क्षेत्र पर सरकार के विशेष ज़ोर का भी ज़िक्र किया।

चर्चाओं का मुख्य केंद्र गैर-प्रमुख बंदरगाहों (प्रमुख बंदरगाहों के अलावा) की भूमिका थी, जो देश के लगभग 46% कार्गो को संभालते हैं। सचिव ने क्षेत्रीय विकास और तटीय लॉजिस्टिक्स में उनके महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार किया। उन्होंने विशेष रूप से प्रक्रिया मानकीकरण, डिजिटल एकीकरण और परिचालन दक्षता के क्षेत्रों में इन बंदरगाहों को राष्ट्रीय ढांचों के साथ और अधिक निकटता से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यशाला की चर्चाएं तीन मुख्य विषयों के इर्द-गिर्द केंद्रित थीं: क्षेत्रीय अवलोकन, विनियामक और डिजिटल सुधार, तथा क्षमता विस्तार और दक्षता वृद्धि के लिए राज्य-स्तरीय पहल। चर्चाओं ने बुनियादी ढांचे के विकास, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) ढांचों और 'ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस' (व्यापार करने में आसानी) उपायों में हुई प्रगति की जानकारी दी। इसके साथ ही सुधार के भावी क्षेत्रों की भी पहचान की गई।

विनियामक और प्रौद्योगिकी मोर्चे पर, प्रतिभागियों ने 'वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस' (ओएनओपी) के कार्यान्वयन पर चर्चा की। इसका उद्देश्य बंदरगाह प्रक्रियाओं का मानकीकरण करना है। इस दौरान 'मैरीटाइम सिंगल विंडो' (एमएसडब्ल्यू) – सागर सेतु पर चर्चा की गई, जिससे निर्बाध और शुरू से अंत तक (end-to-end) डिजिटल लेनदेन संभव होने की उम्मीद है। 'भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025', अन्य हालिया समुद्री कानूनों के साथ मिलकर, केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करने और पारदर्शी तथा भविष्य के लिए तैयार विनियामक पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करने में प्रमुख सहायक के रूप में पहचाना गया।

तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने वर्तमान कार्यक्रमों और योजनाओं की जानकारी दी, जिनमें बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटलीकरण, हरित बंदरगाह पहल, तथा जहाज निर्माण और समुद्री औद्योगिक समूहों का विकास शामिल है। ये प्रस्तुतियां राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ उनके मजबूत तालमेल और सुदृढ़ तथा कुशल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए उनकी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाती थीं।

कार्यशाला में गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरलम, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तथा केंद्र शासित प्रदेशों - दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और लक्षद्वीप के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जैसा कि कार्यक्रम की समय-सारिणी में विस्तार से बताया गया था, इन चर्चाओं ने विभिन्न क्षेत्रों के बीच विचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं के व्यापक आदान-प्रदान को संभव बनाया।

समापन भाषण में, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के संयुक्त सचिव (बंदरगाह, आईटी और -गवर्नेंस), श्री वेंकटेशपति एस. ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन चर्चाओं से बंदरगाह-आधारित विकास, डिजिटलीकरण और स्थिरता को आगे बढ़ाने के प्रति मज़बूत और साझा प्रतिबद्धता झलकती है। उन्होंने बताया कि 'वन नेशन वन पोर्ट प्रोसेस', 'मैरीटाइम सिंगल विंडो' (सागर सेतु) और ' भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025' जैसी योजनाएं और प्रयास समुद्री क्षेत्र में कार्यकुशलता, पारदर्शिता और एकीकरण को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाएंगे। उन्होंने इन चर्चाओं को ठोस नतीजों में बदलने के लिए राज्यों और केंद्र के बीच प्रणालियों और नीतियों में निरंतर तालमेल बनाए रखने का आह्वान किया।

मंत्रालय ने कहा कि यह कार्यशाला समुद्री क्षेत्र में सहकारी संघवाद को मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। केंद्र और राज्यों के बीच निरंतर सहयोग से, भारत अपने समुद्री क्षेत्र की पूरी क्षमता का दोहन करने और अग्रणी वैश्विक समुद्री राष्ट्र बनने की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।

 

 

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