प्रविष्टि तिथि:
21 OCT 2026 3:46PM by PIB Delhi
घरेलू और शहरी गतिविधियों से प्रतिदिन अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है। जैसे-जैसे कस्बे और शहर फैलते हैं, वैसे-वैसे सीवेज की मात्रा भी बढ़ती जाती है, जिसे इकट्ठा करने, एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और उपचार की आवश्यकता वाले अपशिष्ट जल की मात्रा भी बढ़ती जाती है। इसलिए प्रभावी उपचार के लिए अपशिष्ट जल की प्रकृति, स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध अवसंरचना के आधार पर विभिन्न प्रौद्योगिकी दृष्टिकोणों की आवश्यकता होती है। शहरी इलाकों में, अपशिष्ट जल भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से केंद्रीकृत उपचार संयंत्रों तक पहुँचता है। हालांकि, जिन इलाकों में पूरा सीवर नेटवर्क नहीं है, वहां सेप्टिक टैंक और अन्य स्थानीय प्रणालियों के माध्यम से एकत्रित अपशिष्ट जल के लिए समाधान की आवश्यकता होती है। उपचार की आवश्यकताएं अपशिष्ट जल की विशेषताओं, उपलब्ध भूमि, निर्वहन मानकों और उपचारित जल के पुन: उपयोग के अवसरों के अनुसार भी भिन्न होती हैं। इन भिन्नताओं को दूर करने के लिए पारंपरिक उपचार प्रणालियों और विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप नवीन प्रौद्योगिकियों के संयोजन की आवश्यकता होती है।
यह दृष्टिकोण 'नमामि गंगे कार्यक्रम' (एनजीपी) का आधार है, जिसे 2014 में शुरू किया गया था। यह एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसके दो मुख्य उद्देश्य हैं: प्रदूषण को प्रभावी ढंग से कम करना और राष्ट्रीय नदी गंगा का संरक्षण व पुनरुद्धार करना। नमामि गंगे कार्यक्रम के मुख्य स्तंभ हैं—सीवरेज उपचार अवसंरचना, रिवर-फ्रंट डेवलपमेंट, नदी की सतह की सफाई, जैव विविधता, वृक्षारोपण, जन जागरूकता, औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी और 'गंगा ग्राम'।
यह कार्यक्रम प्रदूषण कम करने के अपने प्रयासों में सीवेज उपचार अवसंरचना को केंद्र में रखता है। इसमें नई उपचार क्षमता का विकास और विभिन्न उपचार प्रौद्योगिकियों को अपनाना शामिल है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग 35,664 करोड़ रुपये की लागत वाली 219 परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें से 147 पूरी हो चुकी हैं। यह गंगा बेसिन के 10 राज्यों में किए गए हस्तक्षेपों का विवरण दर्ज करता है। इनमें 6,603 एमएलडी क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का विकास शामिल है, जिसमें से 4,341 एमएलडी क्षमता का निर्माण किया जा चुका है। इन प्रयासों से उपचार क्षमता का विस्तार होता है और साथ ही मौजूदा अवसंरचना के प्रदर्शन में भी सुधार आता है।

नमामि गंगे का प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष दृष्टिकोण
नमामि गंगे कार्यक्रम एक प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें स्थानीय जरूरतों के अनुसार सीवेज उपचार प्रक्रियाओं का चयन किया जाता है। अपनाई गई प्रौद्योगिकियों में कन्वेंशनल एक्टिवेटेड स्लज प्रोसेस (पारंपरिक सक्रिय कीचड़ प्रक्रिया), अपफ्लो एनारोबिक स्लज ब्लैंकेट (और एरेटेड लैगून के साथ इसके संयोजन), सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर, मूविंग बेड बायोफिल्म रिएक्टर, फ्लुइडाइज्ड एरेटेड बेड और फूड चेन रिएक्टर शामिल हैं। अन्य समाधानों में इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन, कृत्रिम आर्द्रभूमि और 'जोकासो' जैसे पैकेज्ड सिस्टम शामिल हैं।
यह लचीलापन उपचार अवसंरचना को विभिन्न परिस्थितियों से निपटने में सक्षम बनाता है, जिनमें बड़े शहरी केंद्र, छोटी बस्तियां, पहाड़ी क्षेत्र और भूमि की कमी वाले स्थान शामिल हैं। यह कार्यक्रम 'नेरेडा', मृदा जैव-प्रौद्योगिकी, ऑन-साइट एडवांस्ड ऑक्सीकरण प्रक्रिया-आधारित उपचार, बहुमंजिला एसटीपी और विकेंद्रीकृत प्रणालियों जैसे नए नवाचारों को भी शामिल करता है। मल गाद और सेप्टेज प्रबंधन (फैकल स्लज एंड सेप्टेज मैनेजमेंट) पारंपरिक सीवेज नेटवर्क के अलावा उपचार के अन्य विकल्प भी प्रदान करता है।
सक्रिय कीचड़ से तात्पर्य उपचार प्रक्रिया में संवर्धित सूक्ष्मजीवों के समूह से है जो कार्बनिक पदार्थों को कार्बन डाइऑक्साइड, जल और अन्य अकार्बनिक यौगिकों में विघटित करते हैं।
सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर एक चक्रीय सक्रिय कीचड़ उपचार प्रक्रिया है जो एकल-चरण जैविक प्रक्रिया में उच्चतम संभव उपचार दक्षता प्रदान करती है।
फूड चेन रिएक्टर और इलेक्ट्रोकोएगुलेशन

भारत में एनजीपी के माध्यम से 'फूड चेन रिएक्टर' (एफसीआर) प्रौद्योगिकी लाई गई थी। यह तकनीक 'एक्टिवेटेड स्लज प्रोसेस' और 'सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर' का एक बेहतर रूप है, जिसमें कृत्रिम माध्यम और पौधों की जड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके फायदों में कम जगह की ज़रूरत, कम बिजली की खपत और पानी से पोषक तत्वों को हटाना शामिल है। इस कार्यक्रम के तहत एफसीआर पर आधारित पाँच एसटीपी काम कर रहे हैं: दो पश्चिम बंगाल के भाटपारा में और तीन उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में। बिहार के भागलपुर में भी एक ऐसा ही सयंत्र बन रहा है, जिसमें प्रति एमएलडी लगभग 175 वर्ग मीटर जगह की ज़रूरत होती है।

इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन और इलेक्ट्रो-ऑक्सीडेशन, इस कार्यक्रम के तहत शुरू की गई उपचार की एक और पद्धति हैं। इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन एक गैर-जैविक उपचार प्रक्रिया है, जिसमें निलंबित (सस्पेंडेड) और इमल्सीफाइड प्रदूषकों को अस्थिर करने के लिए विद्युत करंट और एक कोएगुलेंट धातु एनोड का उपयोग किया जाता है। ये प्रणालियाँ कम तापमान वाले ठंडे स्थानों, पहाड़ी इलाकों और उन जगहों के लिए उपयुक्त हैं जहाँ पहुँचना मुश्किल होता है। उत्तराखंड में बद्रीनाथ और चमोली जैसी जगहों पर ऐसी 17 प्रणालियाँ लगाई गई हैं। इनमें पुलिस चौकी पर 0.05 एमएलडी का एसटीपी, विवेकानंद कॉलोनी में 1.19 एमएलडी का प्लांट और पोखरी बेंड में 1.25 एमएलडी का प्लांट शामिल है। इस तरह, ये प्रणालियाँ उन जगहों तक भी उपचार की अवसंरचना को पहुँचा सकती हैं, जहाँ पारंपरिक तरीकों को लागू करना मुश्किल हो सकता है।
अपशिष्ट जल के स्रोत पर उपचार और बहुमंजिला एसटीपी
कार्यक्रम ने अपशिष्ट जल के स्रोत के निकट काम करने वाले उपचार समाधानों की भी खोज की है। वाराणसी के अस्सी नाले में उन्नत ऑक्सीकरण प्रक्रिया पर आधारित एक पायलट परियोजना को अतिरिक्त अपशिष्ट जल का साइट पर ही उपचार करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिससे लंबी अवरोधन और जटिल मोड़ वाली सीवर लाइनों की आवश्यकता ही न पड़े। इस तरीके में कम से कम पक्के निर्माण (सिविल वर्क) की जरूरत होती है और काम तेजी से पूरा होता है। इसका उद्देश्य पानी की गुणवत्ता सुधारना, उसमें ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाना और बदबू को खत्म करना है। इस मॉडल की वित्तपोषण व्यवस्था भी काफी नई और अनूठी है। इसमें शुरुआत में कोई बड़ा खर्च नहीं करना पड़ता; इसके बजाय भुगतान इस बात पर निर्भर करता है कि कितना पानी साफ किया गया और काम के तय मानकों पर प्लांट कितना खरा उतरा। यह व्यवस्था उपचार प्रदर्शन के साथ पारिश्रमिक को जोड़ती है, साथ ही सयंत्र के डिजाइन और विन्यास में स्वतंत्रता भी प्रदान करती है।
एक और उदाहरण 'मुनि की रेती', चंद्रेश्वर नगर में स्थित बहु-मंजिला सीवेज उपचार सयंत्र है। यह एनजीपी के तहत किसी नगरपालिका के लिए बनाया गया देश का पहला चार-मंजिला एसटीपी है। कम जगह, तीन सीवेज नालियां, एक बरसाती नाला और ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट के ऊपर की ओर स्थित होने के कारण, यहाँ पारंपरिक तरीके से निर्माण करना चुनौतीपूर्ण था। 7.5 एमएलडी क्षमता वाला यह संयंत्र लगभग 900 वर्ग मीटर में फैला है, जहाँ जगह की कमी को दूर करने के लिए ऊर्ध्वाधर निर्माण तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें 'बायोलॉजिकल न्यूट्रिएंट रिमूवल' (जैविक पोषक तत्व हटाने) की प्रक्रिया के साथ प्रति एमएलडी लगभग 120 वर्ग मीटर जगह की जरूरत होती है, जबकि पारंपरिक विकल्पों में इसके लिए प्रति एमएलडी 400 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे उपचार सयंत्र का डिज़ाइन, अपशिष्ट जल प्रबंधन की जरूरतों को पूरा करते हुए, साइट की परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सकता है।

प्रकृति-आधारित और विकेंद्रीकृत उपचार समाधान

हर बस्ती को एक ही स्तर के सीवरेज बुनियादी ढांचे की आवश्यकता नहीं होती है। छोटी बस्तियों में, पारंपरिक नेटवर्क और सीवेज उपचार सयंत्र महंगे हो सकते हैं, जबकि जगह की कमी अतिरिक्त चुनौतियां पैदा करती है। एनजीपी के तहत, विकेंद्रीकृत और प्रकृति-आधारित समाधान ऐसी जगहों के लिए उपयुक्त विकल्प प्रदान करते हैं। कृत्रिम आर्द्रभूमि (सीडब्ल्यू) ऐसे इंजीनियर सिस्टम हैं, जो नियंत्रित परिस्थितियों में प्रदूषकों को हटाने के लिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। एक सीडब्ल्यू सिस्टम में पानी, पौधे, सब्सट्रेट, मिट्टी और सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं।
उत्तर प्रदेश का बिठूर इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है। लगभग 20,000 की आबादी वाले इस नगर पंचायत के सामने पारंपरिक सीवरेज अवसंरचना की भारी लागत और एसटीपी के लिए उपयुक्त जमीन की कमी जैसी चुनौतियां थीं। एक निष्पक्ष के मूल्यांकन के बाद, उपचार प्रौद्योगिकी के नए विकल्प के रूप में कृत्रिम आर्द्रभूमि को चुना गया। नालों पर ही छह आर्द्रभूमि वाले स्थानों को विकसित किया गया, जो लगभग 2 मिलियन लीटर प्रतिदिन सीवेज का वहीं पर उपचार करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, सीवेज के इनलेट पर लगभग 75 मिलीग्राम/लीटर रहने वाली बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) घटकर, उपचारित पानी में 10 मिलीग्राम/लीटर से भी कम रह गई। यह प्रौद्योगिकी उन नालों के लिए उपयुक्त मानी जाती है जिनमें पानी का बहाव कम और पतला होता है और जहां पर्याप्त लंबाई-चौड़ाई उपलब्ध हो।
जोकासो सीवेज उपचार के लिए एक और विकेंद्रीकृत विकल्प प्रदान करता है। यह एक पैकेज्ड उपचार सुविधा है, जो घरेलू सीवेज को आवश्यक नियामक मानकों और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के नियमों के अनुसार उपचारित करने में सक्षम है। इस प्रणाली में कई सीवेज-उपचार प्रक्रियाओं को एक पहले से तैयार, 'प्लग-एंड-प्ले' इकाई में शामिल किया गया है। जोकासो-आधारित विकेंद्रीकृत सीवेज उपचार सयंत्र उन जगहों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जहाँ सीवेज का बहाव कम हो, जहाँ निर्माण कार्य करना कठिन हो या जहाँ जगह सीमित हो। इसमें वे स्थान भी शामिल हैं जहाँ सिस्टम को ज़मीन के नीचे लगाया जा सकता है। उत्तराखंड में कई जगहों पर इस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है, जहाँ अब तक इसके छह सयंत्र लगाए जा चुके हैं।
इन प्रणालियों से पूर्णकालिक ऑपरेटरों की आवश्यकता कम हो जाती है और साइट पर प्रतिदिन कीचड़ प्रबंधन की ज़रूरत भी कम हो जाती है। सिलेंडर और कैप्सूल जैसे कई विन्यास विभिन्न प्रवाह आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। विन्यास के आधार पर, उपचार प्रक्रिया में छँटाई, प्राथमिक उपचार, जैविक उपचार, द्वितीयक निपटान, पुनर्चक्रण, कीटाणुशोधन और निस्पंदन शामिल हैं। ये विशेषताएं जोकासो को उन बस्तियों के लिए उपयुक्त बनाती हैं जहां पारंपरिक सीवेज अवसंरचना का निर्माण या पर्यवेक्षण करना कठिन है। उत्तराखंड में इसका उपयोग स्थानीय भूगोल के अनुसार विकेंद्रीकृत स्वच्छता समाधानों को अपनाने की आवश्यकता को दर्शाता है।
नेरेडा: कुशल जैविक उपचार
नेरेडा, एनजीपी के माध्यम से शुरू की गई एक और जैविक अपशिष्ट जल उपचार प्रौद्योगिकी है, जिसमें 'एरोबिक ग्रैनुलर स्लज' (वायवीय दानेदार कीचड़) का उपयोग किया जाता है। इसमें पारंपरिक 'एक्टिवेटेड स्लज' प्रक्रिया वाले बैक्टीरिया का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन ये बैक्टीरिया सघन 'एरोबिक ग्रैन्यूल्स' (वायवीय दाने) बनाते हैं, जो आसानी से नीचे बैठ जाते हैं। इस प्रौद्योगिकी के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है, निर्माण लागत कम आती है और परिचालन खर्च भी कम होता है। 'एक्टिवेटेड स्लज प्रोसेस' की तुलना में इसमें लगभग 50% और 'सीक्वेंशियल बैच रिएक्टर' (एसबीआर) की तुलना में लगभग 20% बिजली की बचत होती है।

पहाड़ी पटना में स्थित 60 एमएलडी का 'नेरेडा' आधारित एसटीपी इन फायदों को दर्शाता है। इसके बायोरिएक्टर के लिए लगभग 1,900 वर्ग मीटर जगह की आवश्यकता होती है, जबकि इसी तरह के एसबीआर बायोरिएक्टर के लिए 5,400 वर्ग मीटर जगह की जरूरत पड़ती है। 'नेरेडा' यह दिखाता है कि किस तरह उन्नत जैविक उपचार के जरिए बड़े संयंत्रों में जगह और ऊर्जा की खपत को कम किया जा सकता है।
मृदा जैव-प्रौद्योगिकी और मल-कीचड़ एवं सेप्टेज प्रबंधन
इस कार्यक्रम के अंतर्गत, मृदा जैव-प्रौद्योगिकी उपचार का एक प्राकृतिक तरीका प्रदान करती है। अपशिष्ट जल के उपचार की यह प्रणाली भौतिक प्रक्रियाओं (जैसे अवसादन और अंतःस्यंदन) को जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं के साथ जोड़ती है। यह अपशिष्ट जल से हवा में तैरते ठोस पदार्थों तथा कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों को हटाती है। इस प्रणाली में मुख्य घटकों के रूप में उपयुक्त खनिज संरचना, स्थानीय सूक्ष्म वनस्पतियों और जैव-संकेतक पौधों का उपयोग किया जाता है।

इसे निर्मित मृदा निरोधक (कंस्ट्रक्टेड सॉइल फिल्टर) भी कहा जाता है, जिसे सुदृढ़ीकृत सीमेंट कंक्रीट (आरसीसी), पत्थर की चिनाई या मिट्टी के बांधों का उपयोग करके बनाया जा सकता है। इसके घटकों में कच्चे पानी का टैंक, बायोरेक्टर कंटेनमेंट, उपचारित पानी का टैंक, पाइप और पंप शामिल हैं। जल की वांछित गुणवत्ता के आधार पर, यह प्रक्रिया एकल-चरण या बहु-चरण प्रणाली के रूप में संचालित हो सकती है। यह दृष्टिकोण यांत्रिक या गतिशील उपकरणों को कम करता है और संचालन को आसान बनाता है। देवप्रयाग में, 1.2 एमएलडी मृदा जैव प्रौद्योगिकी आधारित एसटीपी का निर्माण किया गया, जिसके अपशिष्ट जल मानक एनजीटी मापदंडों पर आधारित हैं।
मल कीचड़ और सेप्टेज प्रबंधन, स्वच्छता श्रृंखला के एक अन्य हिस्से का समाधान करता है। उत्तर प्रदेश के चुनार में, 2.70 करोड़ रुपये की निर्माण लागत से 10 किलोलीटर प्रतिदिन (केएलडी) क्षमता वाले 'मल कीचड़ उपचार संयंत्र' (एफएसटीपी) की एक प्रायोगिक परियोजना को मंजूरी दी गई। छोटी आबादी वाले इस क्षेत्र के लिए पारंपरिक 'अवरोधन और मार्ग परिवर्तन' नेटवर्क तथा 'सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) को अत्यधिक लागत के कारण अव्यावहारिक माना गया। यहाँ सेप्टिक टैंक और सोक पिट (सोखने के गड्ढे) का चलन अधिक था, जबकि नालियों में बहाव बहुत कम था और कुछ नालियाँ तो पूरी तरह सूख चुकी थीं। निष्पक्ष मूल्यांकन के बाद, 'कृत्रिम आर्द्रभूमि' या प्रकृति-आधारित अन्य समाधानों को अधिक उपयुक्त पाया गया।
एफएसटीपी सीवेज उपचार संयंत्र का विकल्प नहीं है, क्योंकि यह सोख गड्ढों से समय-समय पर उत्पन्न होने वाले अर्द्ध-ठोस अपशिष्ट का उपचार करता है। सह-प्रसंस्करण से असंबद्ध क्षेत्रों से आने वाले अर्द्ध-ठोस अपशिष्ट को व्यापक उपचार प्रणाली में शामिल किया जा सकता है। इसमें अर्द्ध-ठोस अपशिष्ट ले जाने वाले टैंकरों के लिए एक प्राप्ति स्टेशन और एकत्रित सामग्री को शहर के सीवेज के साथ उपचार के लिए बदलना शामिल है।

ऊर्जा पुनर्प्राप्ति, कचरा प्रबंधन और संसाधनों का उपयोग
'नमामि गंगे' के अंतर्गत, कचरा प्रबंधन, ऊर्जा पुनर्प्राप्ति, तथा परिचालन और संसाधनों की आवश्यकताओं को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कचरे के 'एनारोबिक डाइजेशन' (ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक अपघटन) के माध्यम से बायोगैस का उत्पादन, ऊर्जा पुनर्प्राप्ति प्रदान करता है। 'एनारोबिक डाइजेशन' ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में कार्बनिक पदार्थों का जैविक अपघटन है। बायोगैस का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है। वाराणसी के 140 एमएलडी दीनापुर एसटीपी में लगभग 110 एमएलडी का वास्तविक प्रवाह और प्रति माह 4,20,000 यूनिट की वास्तविक कुल बिजली खपत दर्ज की गई है। बायोगैस-आधारित उत्पादन लगभग 2,20,000 से 3,00,000 यूनिट मासिक तक पहुंच गया, जो लगभग 52% से 72% है। प्रयागराज के 80 एमएलडी नैनी एसटीपी में, बायोगैस उत्पादन दैनिक बिजली खपत का लगभग 50% था। अन्य उदाहरणों में कानपुर के जाजमऊ और भागलपुर की परियोजनाएं शामिल हैं, जबकि मेरठ में 220 एमएलडी एसटीपी को बायो-सीएनजी उत्पादन के लिए चिन्हित किया गया है।
कीचड़ का निर्जलीकरण भी परिचालन दक्षता में योगदान देता है। निर्जलीकरण ठोस और तरल पदार्थों को अलग करने की प्रक्रिया है, जिसमें तरल अंश के एक हिस्से को हटाकर कचरे में ठोस पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जाती है। 50 एमएलडी रमाना एसटीपी में ऊर्जा खपत और भूमि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वॉल्यूट प्रेस (कीचड़ से पानी को अलग करने का उपकरण) लगाया गया था। इसकी ऊर्जा दक्षता और कम जगह घेरने के कारण इसके अन्य अनुप्रयोगों पर विचार किया जा रहा है। ये सभी उपाय मिलकर अपशिष्ट जल प्रबंधन को प्रदूषक हटाने से आगे बढ़ाकर अवशिष्ट कीचड़ उपचार और संयंत्र के अधिक कुशल संचालन को भी शामिल करते हैं।
हरित एसटीपी: ऊर्जा दक्षता और संवहनीय संचालन

सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) का दीर्घकालिक प्रदर्शन उपचार के मानकों, कुशल संचालन और संसाधनों के संवहनीय उपयोग पर निर्भर करता है। नमामि गंगे के तहत, कई पहलें पर्यावरण-अनुकूल और ऊर्जा-कुशल एसटीपी को बढ़ावा देती हैं।
ऊर्जा खपत की गारंटी को पूरा करने के लिए, शुरुआत में 42 एमएलडी नैनी एसटीपी में ऑन-साइट सौर ऊर्जा की व्यवस्था की गई थी। यहाँ लगा 1,000 किलोवाट का सौर संयंत्र रोज़ाना लगभग 3,850 यूनिट बिजली बनाता है, जबकि यहाँ कुल 5,700 यूनिट की ज़रूरत होती है। 80 एमएलडी नैनी एसटीपी में, सौर ऊर्जा से रोज़ाना लगभग 1,400 यूनिट बिजली मिलती है, और बायोगैस से 4,500 यूनिट बिजली प्राप्त होती है; यहाँ कुल ज़रूरत लगभग 8,900 यूनिट की है। अन्य परियोजनाओं और संयंत्रों में 16 एमएलडी झूंसी और 14 एमएलडी फाफामऊ एसटीपी शामिल हैं। इसके अलावा, बरेली, भगवानपुर, वृंदावन, हाथरस, शामली और सहारनपुर में भी ऐसी ही परियोजनाएं चल रही हैं।
मेरठ में 220 एमएलडी क्षमता वाले एक एसटीपी को 'ग्रीन एसटीपी' के रूप में प्रस्तावित किया गया है, जिसमें इस सयंत्र और इससे जुड़ी सुविधाओं के लिए 100% सौर ऊर्जा का उपयोग करने की योजना है। रियायतग्राही द्वारा एक 10 मेगावाट के ऑफसाइट सौर सयंत्र पर विचार किया जा रहा था और इसके लिए भारत सरकार की 'मुक्त पहुंच नीति' के तहत बिजली की आपूर्ति का प्रस्ताव रखा गया था।
कीचड़ का उपचार भी स्थिरता में योगदान देता है। ऋषिकेश में कचरे को जलाए जाने की एक प्रायोगिक परियोजना उष्मीय स्थायीकरण और आयतन में कमी लाने के तरीकों का पता लगा रही है। लगभग 20% ठोस पदार्थ वाले जलरहित नगरपालिका कीचड़ को गर्म हवा का उपयोग करके लगभग 90% ठोस पदार्थ तक सुखाया जा सकता है। फिर सूखे कीचड़ को गर्म हवा जनरेटर में ऑक्सीकृत किया जाता है। इससे प्राप्त सूखी राख जैव-खाद नहीं है, लेकिन स्थायीकृत राख का उपयोग अग्निरोधी ईंटें या कंक्रीट बनाने के लिए किया जा सकता है। मुनि की रेती में, यह प्रायोगिक परियोजना सीमित भूमि उपलब्धता से उत्पन्न कीचड़ निपटान की चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। ये सभी प्रयास नवीकरणीय ऊर्जा, कुशल उपकरण और बेहतर कीचड़ प्रबंधन को मिलाकर एसटीपी (जल-ऊर्जा संयंत्र) की पर्यावरणीय और परिचालन संवहनीयता को मजबूत करते हैं।

जीर्णोद्धार, मुख्य सीवर और दीर्घकालिक प्रदर्शन
नई उपचार क्षमता के निर्माण के साथ-साथ मौजूदा एसटीपी और मुख्य सीवरों का जीर्णोद्धार भी आवश्यक है। पुराने उपकरण, उपचार मानकों का अनुपालन न होना और तृतीयक उपचार घटकों की कमी उन्नयन को अनिवार्य बना सकती है। नमामि गंगा योजना के तहत, जीर्णोद्धार कार्यों में कई स्थानों पर इन समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, प्रयागराज में स्थित 80 एमएलडी नैनी एसटीपी में विद्युत-यांत्रिक कार्य, बायोगैस विद्युत और ओसीईएमएस (पानी, गैस और गैस प्रबंधन प्रणाली) का कार्य किया गया है। कानपुर में स्थित 130 एमएलडी जाजमऊ एसटीपी में सिविल और विद्युत-यांत्रिक र्जीर्णोद्धार कार्य, बायोगैस विद्युत, क्लोरीनीकरण और ओसीईएमएस (पानी, गैस और गैस प्रबंधन प्रणाली) का कार्य किया गया है।
मुख्य सीवर का जीर्णोद्धार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पुराने हो रहे नेटवर्क में गाद जमा होने, टूट-फूट और छेदों की समस्याओं को दूर करता है। वाराणसी में, 2,400 मिमी तक के व्यास वाले 7 किमी लंबे पुराने ईंटों के मुख्य सीवर के लिए 'ग्लास रीइन्फोर्स्ड पाइप लाइनर' का इस्तेमाल किया गया। कानपुर में, 2,250 मिमी तक के व्यास वाले 9.3 किमी लंबे पुराने ईंटों के मुख्य सीवर के लिए 'मशीन वाउंड स्पाइरल लाइनिंग' का उपयोग किया गया।
इस कार्यक्रम में नए और मौजूदा सीवेज अवसंरचना को जोड़ने के लिए हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (एचएएम) पर आधारित सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की भागीदारी (पीपीपी) और 'वन सिटी/क्लस्टर-वन ऑपरेटर' मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। इसमें 15 वर्षों तक निर्माण से जुड़े भुगतान और प्रदर्शन से जुड़े भुगतान को एक साथ शामिल किया गया है, जिससे जवाबदेही बढ़ती है और कामकाज लगातार सुचारू रूप से चलता रहता है। इस मॉडल के तहत 1,955 एमएलडी क्षमता वाली 31 परियोजनाएं शुरू की गईं। इनमें से 454 एमएलडी क्षमता वाली 11 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जबकि 235 एमएलडी क्षमता वाली 6 परियोजनाएं पूरी होने के अंतिम चरण में हैं। जीर्णोद्धार, संचालन और रखरखाव पर ध्यान देने से, अपशिष्ट जल उपचार अवसंरचना का केवल एक बार का काम न रहकर, एक निरंतर चलने वाली सेवा बन जाता है।
सीवेज उपचार से लेकर संवहनीय अपशिष्ट जल प्रबंधन तक
'नमामि गंगे' के अपशिष्ट जल उपचार दृष्टिकोण में बुनियादी ढांचा, विभिन्न प्रौद्योगिकियां, विकेंद्रीकृत समाधान, जीर्णोद्धार और दीर्घकालिक संचालन शामिल हैं। पारंपरिक और उन्नत उपचार प्रक्रियाएं, प्रकृति-आधारित प्रणालियां और नई प्रौद्योगिकियां स्थानीय स्तर की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करती हैं। प्रदर्शन-आधारित संचालन मॉडल, संसाधनों की पुनर्प्राप्ति, ऊर्जा दक्षता, कचरा प्रबंधन और उपचारित पानी का पुन: उपयोग, पूरे उपचार ढांचे को मजबूत बनाते हैं। अंततः, इसका उद्देश्य केवल एसटीपी बनाना नहीं, बल्कि ऐसी संवहनीय अपशिष्ट जल प्रबंधन प्रणालियां तैयार करना है, जो पूरे नदी बेसिन में प्रभावी उपचार, भरोसेमंद प्रदर्शन और संसाधनों की पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित कर सकें।
संदर्भ
जल शक्ति मंत्रालय
https://nmcg.nic.in/NamamiGanga.aspx
https://ejalshakti.gov.in/misc/Innovative_LRT_S.aspx/1000
https://nmcg.nic.in/pdf/NGP-At%20a%20Glance%20(Final%20Version%20Printed).pdf
अन्य
https://gwilws.gujarat.gov.in/web/public/content/cms.portal.document/302/document/Sewage-Treatment-Technologies.pdf
https://www.niti.gov.in/node/306
पीआईबी शोध
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