विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने जलवायु अनुकूल फसलों के विकास में तेजी लाने के लिए ब्रिक-एनआईपीजीआर में स्वदेशी एस. पी. आर. ओ. यू. टी सुविधा का उद्घाटन किया


एस. पी. आर. ओ. यू. टी विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में फसल अनुसंधान को सक्षम बनाएगा और जीनोमिक्स तथा जीन तकनीकों को तेजी से गुणों के मूल्यांकन और फसल सुधार से जोड़ने में मदद करेगा: डॉ. जितेंद्र सिंह

बायोई3 नीति और मोदी सरकार के जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के प्रयासों के अंतर्गत भारत में पौधा और मानव जैव प्रौद्योगिकी में एक साथ प्रगति हो रही है: डॉ. जितेंद्र सिंह

स्पीडसीड तकनीक से चने की पीढ़ी तैयार करने का चक्र लगभग 40 दिन तक कम किया जा सकता है, इससे उगाने की समय-सीमा काफी कम होगी: डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रविष्टि तिथि: 15 SEP 2026 4:31PM by PIB Delhi

विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज नई दिल्ली में ब्रिक-राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान (ब्रिक-एनआईपीजीआर) में एकीकृत लक्षण विश्लेषण के लिए स्पीडसीड फेनोटाइपिंग और संसाधन अनुकूलन (एस. पी. आर. ओ. यू. टी) सुविधा का उद्घाटन किया। उन्होंने इसे विभिन्न मौसम परिस्थितियों के अनुकूल जलवायु-सक्षम फसलों के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण स्वदेशी क्षमता बताया।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत जैसे भौगोलिक और कृषि-जलवायु की दृष्टि से विविध देश में विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में फसलों का अध्ययन और मूल्यांकन करने की क्षमता कृषि क्षेत्र को जलवायु के प्रति अधिक सक्षम बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यह पहल व्यापक बायोई3 नीति और मोदी सरकार द्वारा जैव प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के प्रयासों का हिस्सा है। इसके अंतर्गत पौधा जैव प्रौद्योगिकी के साथ-साथ मानव जैव प्रौद्योगिकी में भी एक साथ प्रगति हो रही है। बायोई3 नीति में जलवायु-अनुकूल कृषि को भी रणनीतिक विषयगत क्षेत्रों में शामिल किया गया है।

कार्यक्रम में ब्रिक-एनआईपीजीआर के निदेशक प्रोफेसर मनोज प्रसाद, ब्रिक-एनआईपीजीआर के डॉ. सेंथिल के. मुथप्पा और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिक-एच डॉ. नितिन जैन उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह ने एस. पी. आर. ओ. यू. टी सुविधा का उद्घाटन किया और एक पेड़ मां के नाम अभियान के अंतर्गत पौधारोपण किया। उन्होंने ब्रिक-एनआईपीजीआर के वैज्ञानिकों और अधिकारियों से भी बातचीत की।

एस. पी. आर. ओ. यू. टी एक मौसम-स्वतंत्र, नियंत्रित पर्यावरण वाली सुविधा है। इसे  उच्च क्षमता वाली फेनोटाइपिंग, सटीक तनाव परीक्षण तथा जर्मप्लाज्म, प्रजनन आबादी, म्यूटेंट, ट्रांसजेनिक और जीनोम-संपादित लाइनों के मूल्यांकन के लिए तैयार किया गया है। इसका प्रमुख ध्यान चने पर है। यह सुविधा जीनोमिक्स और जीनोम एडिटिंग में हुई प्रगति को फसल के गुणों के सटीक मूल्यांकन और उगाने से जोड़ने में मदद करेगी। इससे जीन की खोज से लेकर गुणों के सत्यापन और अंततः फसल सुधार तक की प्रक्रिया को अधिक कुशल बनाया जा सकेगा।

यह सुविधा ऐसे समय में स्थापित की गई है जब जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम के कारण कृषि क्षेत्र में तेज समाधान की तत्काल आवश्यकता है। कृषि जैव प्रौद्योगिकी में समर्थित अनुसंधान से चावल, गेहूं, तिलहन, दलहन, मोटे अनाज, फलों और सब्जियों सहित आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण फसलों में उन्नत पौध किस्मों और जीनोटाइप का विकास हुआ है। वहीं, पौधों के माइक्रोबायोम के साथ होने वाली अंतःक्रियाओं पर काम से लाभकारी सूक्ष्मजीवों के उपयोग के माध्यम से टिकाऊ फसल उत्पादकता, मिट्टी के स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने की संभावनाएं खुल रही हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी को ऐसी तकनीकों में तेजी से परिवर्तित किया जाना चाहिए, जो वास्तविक कृषि चुनौतियों का समाधान कर सकें और किसानों को प्रत्यक्ष लाभ प्रदान करें। उन्होंने कहा कि आज जीनोमिक्स, जीन तकनीकों, सटीक फेनोटाइपिंग और त्वरित उगाने के क्षेत्र में हो रही वैज्ञानिक प्रगति आने वाले वर्षों में और अधिक महत्वपूर्ण होगी।

एनआईपीजीआर ने पीढ़ियों के विकास को तेज करने के लिए स्पीडसीड नामक एक अलग तकनीक भी विकसित की है। चने में अनुकूलित प्रक्रियाओं के माध्यम से एक पीढ़ी तैयार करने का चक्र लगभग 40 दिन तक कम किया जा सकता है। इससे पारंपरिक उगाने और अनुसंधान में लगने वाला समय काफी कम हो जाता है। इस तकनीक का उपयोग एस. पी. आर. ओ. यू. टी के भीतर किया जा सकता है या अन्य उपयुक्त नियंत्रित-पर्यावरण वाली सुविधाओं के अनुसार इसे अपनाया जा सकता है। एस. पी. आर. ओ. यू. टी और स्पीडसीड मिलकर संभावित उपयोगी फसल गुणों के मूल्यांकन और विकास को तेज कर सकते हैं तथा अनुसंधान से उन्नत किस्मों तक पहुंचने में लगने वाला समय कम कर सकते हैं।

पिछले बारह वर्षों में जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने भारत के कृषि जैव प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और प्रयोगशाला अनुसंधान से लेकर किसानों के खेतों तक नवाचार को समर्थन दिया है। वर्ष 2014 से 2026 के बीच कृषि जैव प्रौद्योगिकी और संबंधित क्षेत्रों में 300 से अधिक परियोजनाओं को सहायता दी गई। चावल, गेहूं, चना, सरसों, सब्जियों और वानिकी प्रजातियों सहित 50 से अधिक उन्नत किस्में विकसित की गई हैं। इनमें सूखा, बाढ़, लवणता, कीट और रोगों के प्रति बेहतर सहनशीलता है।

एक प्रमुख उपलब्धि एक महत्वपूर्ण जीनोमिक्स-सहायता प्राप्त प्रजनन कार्यक्रम के अंतर्गत जलवायु अनुकूल चावल की 17 किस्मों का विकास है। इन किस्मों की अब लगभग 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की जा रही है। यह उन्नत जीनोमिक्स और आणविक प्रजनन की उस क्षमता को दर्शाता है। इसके माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों और खाद्य सुरक्षा के लिए सीधे उपयोगी समाधानों में बदला जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी इकोसिस्टम अब अलग-अलग तकनीकों और प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। पादप जैव प्रौद्योगिकी, मानव जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स और अन्य उभरते क्षेत्रों में एक साथ प्रगति हो रही है। उन्होंने कहा कि देश की जैव प्रौद्योगिकी यात्रा अब उन्नत विज्ञान, प्रौद्योगिकी और ऐसे अनुप्रयोगों के समन्वय से तेजी से आगे बढ़ रही है, जो कृषि, स्वास्थ्य, सतत विकास और राष्ट्रीय विकास से जुड़ी चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।

उन्होंने आनुवंशिक तकनीकों और पुनर्चक्रण/परिपत्र दृष्टिकोण जैसे क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी की व्यापक भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने तेजी से बदलते वैज्ञानिक परिदृश्य के अनुरूप संस्थागत क्षमताओं और मानव संसाधन प्रणालियों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसी तरह बायोई3 ढांचा जैव प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और डिजिटल प्रौद्योगिकी के समन्वय के माध्यम से टिकाऊ और परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक उपलब्धियां प्रयोगशालाओं या वैज्ञानिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए और विज्ञान संचार तथा जनसंपर्क की मजबूत संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक संस्थानों के आधिकारिक दौरे केवल औपचारिक गतिविधियों या प्रचार तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन लोगों को यह समझने में मदद करनी चाहिए जिनके लिए ये तकनीकें विकसित की जा रही हैं कि क्या काम हो रहा है और इससे उन्हें कैसे लाभ मिलेगा।

उन्होंने वैज्ञानिक तकनीकों को सरल और सुगम तरीके से समझाने के लिए लघु फिल्मों, कार्यशालाओं और पेशेवर रूप से तैयार दृश्य सामग्री के अधिक उपयोग का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के संचार में यह दिखाया जा सकता है कि किसी तकनीक के विकसित होने से पहले कौन-सी चुनौतियां मौजूद थीं, वैज्ञानिक हस्तक्षेप ने उन चुनौतियों का किस प्रकार समाधान किया और इस तकनीक से किसानों, उद्योग तथा अन्य उपयोगकर्ताओं को किस तरह राहत या लाभ मिला। तकनीकी विशेषज्ञ और पेशेवर संचारक मिलकर इन कहानियों को इस तरह प्रस्तुत कर सकते हैं। इससे लोगों और मीडिया पर अधिक प्रभाव पड़े।

केन्दीय मंत्री ने वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग भागीदारों, किसानों तथा अन्य हितधारकों के बीच बेहतर संवाद का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि नियमित संस्थागत बैठकों और प्रस्तुतियों में तत्काल वैज्ञानिक इकोसिस्टम से बाहर के लोगों को भी शामिल होने का अवसर दिए जाने चाहिए, ताकि वैज्ञानिक और हितधारक एक-दूसरे के काम को समझ सकें और सहयोग के अवसर तलाश सकें।

सीएसआईआर संस्थानों के अनुभव का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि नियमित बैठकों का उपयोग वैज्ञानिक प्रस्तुतियों और बाहरी हितधारकों को चर्चाओं में शामिल करने के मंच के रूप में किया जा सकता है। उन्होंने ब्रिक-एनआईपीजीआर और अन्य संस्थानों को भी इसी तरह की प्रक्रियाएं अपनाने और उद्योग भागीदारों तथा अन्य संबंधित हितधारकों को संस्थागत संवाद में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि वैज्ञानिक अनुसंधान के लाभ वैज्ञानिक समुदाय से आगे भी पहुंच सकें।

उन्होंने किसानों को वैज्ञानिक संस्थानों में ले जाने और वहां हो रहे कार्य को उन्हें प्रत्यक्ष रूप से दिखाने के महत्व पर भी बल दिया। सीएसआईआर संस्थानों के अपने अनुभव को याद करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जिन किसानों ने पहले कभी ऐसे अनुसंधान संस्थानों का दौरा नहीं किया है, वे वहां किए जा रहे कार्य की प्रकृति को लेकर गलत धारणा बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष संवाद और अनुभव से ऐसी आशंकाएं दूर की जा सकती हैं और किसानों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि आधुनिक विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी उनके लाभ के लिए किस प्रकार विकसित की जा रही है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रयोगात्मक किट और इस उभरते क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य से जुड़ी जारी जैव प्रौद्योगिकी पहलों का भी उल्लेख किया। इनमें दिल्ली की एक जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला की किट का प्रयोगों के लिए उपयोग भी शामिल है। उन्होंने कहा कि भारत की जैव प्रौद्योगिकी की प्रगति के व्यापक संचार में ऐसे विकास को भी उचित स्थान मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संस्थानों को केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहने के बजाय वर्तमान वैज्ञानिक और तकनीकी रुझानों के अनुरूप अपनी संचार और मानव संसाधन संबंधी प्रक्रियाओं को लगातार विकसित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक संगठनों को अपनी उपलब्धियों के बारे में अधिक सक्रिय और प्रभावी ढंग से जानकारी देनी चाहिए, ताकि समाज, उद्योग और संभावित लाभार्थियों को किए जा रहे कार्यों की जानकारी हो।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकसित की जा रही तकनीकें भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं और आने वाले वर्षों में इनका महत्व और बढ़ेगा। उन्होंने इन प्रगतियों को इस तरह से लोगों तक पहुंचाने के निरंतर प्रयासों का आह्वान किया। इससे यह स्पष्ट हो सके कि भारतीय विज्ञान किसानों, उद्योग और समाज के लिए क्या कर रहा है।

उन्होंने कहा कि एस. पी. आर. ओ. यू. टी जैसी सुविधाएं यह दर्शाती हैं कि आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी जलवायु अनुकूल और अधिक उत्पादक फसलों के विकास में किस प्रकार योगदान दे सकती है। यह भारत की कृषि क्षमताओं को मजबूत कर सकती है और अधिक आत्मनिर्भर कृषि क्षेत्र के लक्ष्य को समर्थन दे सकती है। उन्होंने ब्रिक-एनआईपीजीआर के वैज्ञानिकों और तकनीकी टीमों को इस सुविधा के विकास के लिए बधाई दी और कहा कि ऐसी क्षमताएं विकसित भारत 2047 की दिशा में भारत की यात्रा में योगदान देंगी।

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पीके/केसी/एसके/एसएस


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