कोयला मंत्रालय
एसईसीएल की 2014 से कायापलट
मध्य भारत में अवसरों को बढ़ाते हुए कोयला उत्पादन और बुनियादी ढांचे का विस्तार
प्रविष्टि तिथि:
12 SEP 2026 3:48PM by PIB Delhi
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, वर्ष 2014 से भारत के कोयला क्षेत्र में व्यापक कायापलट हुई है। यह परिवर्तन भारत सरकार द्वारा पारदर्शिता, दक्षता, प्रौद्योगिकी को अपनाने, बुनियादी ढांचे के विकास, परिचालन में सुगमता और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने के उद्देश्य से किए गए अनेक नीतिगत और संरचनात्मक सुधारों से प्रेरित है। इन सुधारों के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है, खदानों की योजना को आधुनिक बनाया गया है, कोयला निकासी के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया है और पूरे क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाई गई है। इसके परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष 1 बिलियन टन (बीटी) के महत्वपूर्ण आंकड़े को पार कर 1.04 बिलियन टन (अनंतिम) तक पहुंच गया। कोयला देश के लगभग 73 प्रतिशत बिजली उत्पादन के लिए काम में आता है और इस प्रकार देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल), जो कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की एक मिनी रत्न मातहत कंपनी है और छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के कोयला क्षेत्रों में कार्यरत है, इस राष्ट्रीय उपलब्धि के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक रही है। वित्त वर्ष 1985-86 में अपनी स्थापना के वर्ष केवल 34.2 मिलियन टन (एमटी) कोयला उत्पादन करने वाली एसईसीएल ने स्वयं को एक प्रमुख कोयला उत्पादक कंपनी के रूप में परिवर्तित करते हुए वित्त वर्ष 2025-26 में 176.28 मिलियन टन कोयला उत्पादन का आंकड़ा हासिल किया है। वित्त वर्ष 2025-26 में एसईसीएल ने सीआईएल के कुल उत्पादन में लगभग 23 प्रतिशत और भारत के कुल कोयला उत्पादन में लगभग 17 प्रतिशत का योगदान दिया। एसईसीएल के परिचालन से 36,000 से अधिक नियमित कर्मचारी और ठेके पर 24,000 कर्मी जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही, परिवहनकर्ताओं, आपूर्तिकर्ताओं और सेवा प्रदाताओं का एक व्यापक इकोसिस्टम भी इससे जुड़ा हुआ है।
उत्पादन क्षमता बढ़ाकर आपूर्ति सुनिश्चित करना
एसईसीएल के परिचालन के केन्द्र में कोरबा स्थित गेवरा, कुसमुंडा और दीपका खदानें हैं। संयुक्त रूप से, ये तीनों मेगा खदानें 185 मिलियन टन की क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह क्षेत्र कोयला खनन और बिजली उत्पादन का एक प्रमुख केन्द्र है और इसे अक्सर भारत का पावरहाउस कहा जाता है।
पिछले एक दशक के दौरान एसईसीएल के परिचालन विस्तार की कहानी पैमाने और दक्षता में वृद्धि को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। कोयला उत्पादन वर्ष 2013-14 में 124.26 मिलियन टन (एमटी) से बढ़कर 2025-26 में 176.28 मिलियन टन हो गया है। इसी वर्ष कंपनी ने 13 राज्यों में खानों से 178.63 मिलियन टन कोयले की आपूर्ति भी दर्ज की, जो 2013-14 के 122.03 मिलियन टन की तुलना में 46 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि उत्पादकता में हुई वृद्धि है। खनन दक्षता के प्रमुख मापदंड प्रति मानव-पाली उत्पादन (ओएमएस) में दो गुने से अधिक वृद्धि हुई है और यह 2013-14 के 7.23 टन से बढ़कर 2025-26 में 16.47 टन हो गया है।
एसईसीएल, इरकॉन और छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ ईस्ट रेलवे और छत्तीसगढ़ ईस्ट-वेस्ट रेलवे कॉरिडोर का विकास कर रही है। इस परियोजना में लगभग 13,685 करोड़ रुपये मूल्य का कुल निवेश और करीब 342.6 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइनों का निर्माण शामिल है। यह रेल नेटवर्क मांड-रायगढ़ और कोरबा कोयला क्षेत्रों के सुदूर हिस्सों को राष्ट्रीय रेल प्रणाली से जोड़ेगा, जिससे निकट भविष्य में वस्तुओं के साथ-साथ लोगों की भी सुगम आवाजाही संभव हो सकेगी।
इसके अलावा, 11 फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (एफएमसी) परियोजनाओं को लगभग 2,700 करोड़ रुपये के निवेश से चालू किया गया है। इन परियोजनाओं की संयुक्त वार्षिक क्षमता 156 मिलियन टन है और इनके माध्यम से कोयला निकासी से जुड़े कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद मिल रही है। भविष्य में ऐसी सात और परियोजनाएं प्रस्तावित हैं, जिनसे मशीनीकृत लोडिंग क्षमता में 85 मिलियन टन प्रतिवर्ष (एमटीवाई) की वृद्धि होगी। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान एफएमसी प्रणालियों के माध्यम से कोयले के प्रेषण में 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई और कुल प्रेषण में इसका हिस्सा 41.3 प्रतिशत रहा। यह उपभोक्ताओं तक कोयला पहुंचाने में मशीनीकृत बुनियादी ढांचे की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
खदानों के संचालन के तौर-तरीकों में बदलाव
खदानों के भीतर सरफेस माइनर्स और कंटीन्यूअस माइनर्स के बढ़ते उपयोग से मशीनीकरण की दिशा में निरंतर बदलाव स्पष्ट होता है। वर्तमान में 88 प्रतिशत से अधिक कोयले का उत्पादन पारंपरिक ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग के बिना सरफेस माइनर्स के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे इससे जुड़े कंपन और धूल को कम करने में मदद मिलती है। कंटीन्यूअस माइनर्स भूमिगत बड़े पैमाने पर उत्पादन में सहायता करते हैं और एसईसीएल के भूमिगत कोयला उत्पादन में 76 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
सिंघाली भूमिगत खदान में शुरू नई पेस्ट फिल प्रौद्योगिकी के तहत खनन से खाली हुए स्थानों को एक विशेष रूप से तैयार मिश्रण से भरने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य भूमिगत स्थिरता बनाए रखने में सहायता करना तथा उन सतही क्षेत्रों के नीचे स्थित कोयला भंडार के निष्कर्षण को संभव बनाना है, जहां पारंपरिक खनन सीमित होता है। माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर (एमडीओ) व्यवस्था और राजस्व-साझाकरण समझौते संसाधनों के विकास तथा कंपनी में विशेषज्ञ परिचालन क्षमताओं को शामिल करने के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध कराते हैं।
इन बदलावों को समर्थन देने में डिजिटल प्रणालियां भी तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। डिजीकोल के तहत मशीनरी की निगरानी, ड्रोन सर्वेक्षण, वीडियो विश्लेषण और श्रमिक सुरक्षा से जुड़े अनुप्रयोगों को एकीकृत किया गया है। फरवरी 2026 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की राष्ट्रीय कार्यशाला में डिजीकोल की प्रस्तुति ने पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने में डिजिटल प्रणालियों की भूमिका को भी रेखांकित किया। खदानों, रेलवे साइडिंग और प्रेषण केन्द्रों में लगाए गए 1,600 से अधिक सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क एक स्मार्ट और डिजिटल रूप से परस्पर जुड़ा खनन इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। इसके अगले चरण के रूप में एआई-सक्षम निगरानी विश्लेषण की योजना बनाई गई है।
महिलाओं के लिए नई भूमिकाओं के अवसर
आधुनिकीकरण से एसईसीएल के कार्यबल में अवसरों का दायरा भी बढ़ रहा है। प्रोजेक्ट धराशक्ति, जो एसईसीएल प्रबंधन की महिला कर्मचारियों को सशक्त बनाने की एक पहल है, कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी एवं परिचालन संबंधी भूमिकाओं, जिनमें हेवी अर्थ मूविंग मशीनरी (एचईएमएम) का संचालन भी शामिल है, में कार्य करने के अवसर प्रदान करता है। यह पहल भूमिधारक और आश्रित के रूप में नियुक्त महिलाओं को उनकी योग्यता और क्षमताओं के अनुरूप कार्य करने में सहायता करती है। 19 महिला प्रशिक्षुओं के एक समूह को उन्नत सिमुलेटरों के माध्यम से एचईएमएम ऑपरेटर का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे ऐसे व्यवसायों में प्रवेश का मार्ग तैयार हो रहा है, जहां परंपरागत रूप से महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। एसईसीएल ने कोयला इंडिया की पहली पूर्णतः महिला-संचालित डिस्पेंसरी वसंत विहार, बिलासपुर में तथा पहली पूर्णतः महिला-संचालित सेंट्रल स्टोर यूनिट सेंट्रल वर्कशॉप, कोरबा में भी स्थापित की है।
मजबूत वित्तीय योगदान
एसईसीएल की परिचालन क्षमताओं के साथ-साथ उसकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत हुई है। रिपोर्ट की गई निवल संपत्ति मार्च 2015 में लगभग 9,544 करोड़ रुपये से बढ़कर मार्च 2026 में 20,457 करोड़ रुपये हो गई, जो लगभग 114 प्रतिशत की वृद्धि है।
सार्वजनिक राजस्व में एसईसीएल का योगदान महत्वपूर्ण है। वित्त वर्ष 2025-26 में एसईसीएल ने प्रत्यक्ष करों, रॉयल्टी तथा अन्य करों और उपकरों के माध्यम से केन्द्र और राज्य सरकारों के राजकोष में लगभग 11,830 करोड़ रुपये का योगदान दिया। केवल रॉयल्टी भुगतान ही वित्त वर्ष 2014-15 के लगभग 2,075 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 3,485 करोड़ रुपये हो गया, जो लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि है। इन भुगतानों से कोयले की आपूर्ति और रोजगार के अलावा कंपनी का आर्थिक योगदान और व्यापक हुआ है।
कोयला क्षेत्रों के आसपास अवसरों का सृजन
एसईसीएल की कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) यात्रा जरूरत-आधारित बुनियादी ढांचे और आवश्यक सुविधाओं से आगे बढ़कर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बड़े पैमाने पर परिणामोन्मुखी और सतत पहलों तक पहुंची है। कंपनी का सीएसआर व्यय वित्त वर्ष 2013-14 के 43.91 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 127 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जो लगभग 188 प्रतिशत की वृद्धि है। एसईसीएल ने वर्ष 2014-15 से अब तक खनन से प्रभावित समुदायों के लिए लगभग 1,078 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इसमें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कौशल विकास, आजीविका, ग्रामीण बुनियादी ढांचे, जल संरक्षण और सामाजिक समावेशन पर विशेष ध्यान दिया गया है। सामुदायिक विकास एसईसीएल के दायित्व का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाते हुए, एसईसीएल ने वर्ष 2014-15 से अगस्त 2026 तक भूमि के बदले कुल 5,405 रोजगार प्रदान किए हैं।
विकास के मानवीय महत्व को उन कार्यक्रमों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए चलाए जा रहे हैं। वर्ष 2023 में शुरू की गई ‘एसईसीएल के सुश्रुत’ पहल के तहत एसईसीएल के परिचालन क्षेत्रों के मेधावी छात्रों को आवास और भोजन सहित निःशुल्क आवासीय नीट कोचिंग प्रदान की जाती है। इसके पहले दो बैचों में 80 में से 70 छात्रों ने नीट उत्तीर्ण किया और एमबीबीएस, दंत चिकित्सा, आयुर्वेद, फिजियोथेरेपी तथा पशु चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्राप्त किया। यह भारत सरकार के प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) पोर्टल पर सूचीबद्ध होने वाली कोयला क्षेत्र के किसी सार्वजनिक उपक्रम की पहली सीएसआर योजना भी है। इससे यह कार्यक्रम लाभों के पारदर्शी और जवाबदेह वितरण के लिए राष्ट्रीय व्यवस्था से जुड़ गया है। ‘एसईसीएल की धड़कन’ के तहत जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के लिए निःशुल्क सुधारात्मक हृदय शल्य चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक 300 शल्य चिकित्साएं पूरी की जा चुकी हैं और 1,060 शल्य चिकित्साओं के लक्ष्य की दिशा में कार्य जारी है। इससे परिवारों को ऐसी चिकित्सा सुविधा प्राप्त करने में मदद मिल रही है, जो बच्चे के भविष्य को बदलने में सक्षम हो सकती है।
भूमि का जीर्णोद्धार और समुदायों को सहयोग
अगस्त 2026 तक एसईसीएल ने 28 परित्यक्त खदानों का वैज्ञानिक समापन पूरा कर लिया है, जो कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनियों में सर्वाधिक है। खनन भूमि के आगामी उपयोग की योजना बनाना स्थानीय समुदायों के साथ कंपनी के कार्यों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
पर्यावरण के क्षेत्र में, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 571 हेक्टेयर क्षेत्र में अब तक के सर्वाधिक 14.36 लाख पौधे लगाए गए। इसमें मियावाकी पद्धति से किए गए सघन पौधरोपण भी शामिल हैं। वर्ष 2014 में यह संख्या लगभग 5 लाख थी। ये प्रयास खनन क्षेत्रों के आसपास हरित आवरण के पुनर्स्थापन में सहायक हैं।
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में बिश्रामपुर के निकट स्थित केनापारा इको पार्क दर्शाता है कि खनन के लिए पहले इस्तेमाल की गई भूमि पर्यटन और सामुदायिक उद्यमों को किस प्रकार सहयोग दे सकती है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्थित बांकी 7 एवं 8 भूमिगत खदान में अब भूमि का उपयोग एक स्वास्थ्य केन्द्र और साप्ताहिक बाजार के लिए किया जा रहा है। ये उदाहरण खदानों के पुनः उपयोग को व्यावहारिक रूप प्रदान करते हैं—एक समय खनन के लिए इस्तेमाल किए गए स्थान आसपास की बस्तियों की सेवा करते रह सकते हैं। पुनः उपयोग किए गए खदान जल से 3,800 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई में सहायता मिली है, जबकि सौर परियोजनाएं खनन भूमि के एक अन्य उत्पादक उपयोग का मार्ग तैयार कर रही हैं। एसईसीएल अपने नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार लगातार कर रही है और उसकी स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता अब 44 मेगावाट तक पहुंच गई है, जबकि वर्ष 2014 में यह शून्य थी।
अगले चरण के लिए तैयारी
जैसे-जैसे भारत 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है और कोयला विश्वसनीय, किफायती तथा बेस-लोड ऊर्जा उपलब्ध कराना जारी रखे हुए है, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार संभव हो रहा है, उत्पादन, उत्पादकता, वित्तीय प्रदर्शन, बुनियादी ढांचे और सामुदायिक कल्याण में एसईसीएल की निरंतर वृद्धि इसे इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती है। वर्तमान में कोरबा कोयला क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा के सबसे बड़े केन्द्र के रूप में कार्य कर रहा है, वहीं विस्तारित रेल संपर्क के सहयोग से मांड-रायगढ़ कोयला क्षेत्र एक अतिरिक्त उत्पादन आधार के रूप में उभर रहा है।
इसलिए, वर्ष 2014 से एसईसीएल की कहानी केवल अधिक कोयला खनन करने की कहानी नहीं है। यह उच्च उत्पादकता, मजबूत वित्तीय स्थिति, आधुनिकीकृत लॉजिस्टिक्स, डिजिटल और तकनीकी प्रगति, पर्यावरणीय जिम्मेदारी तथा सार्थक सामुदायिक विकास की कहानी है। यह इस बात का व्यापक उदाहरण है कि किस प्रकार प्रगतिशील नीतिगत सुधार, संस्थागत प्रतिबद्धता और मानव पूंजी भारत के कोयला क्षेत्र की क्षमता को ठोस राष्ट्रीय मूल्य में परिवर्तित कर सकते हैं। आगे की दिशा में, एसईसीएल अधिक मात्रा में कोयले का कुशलतापूर्वक और जिम्मेदारी के साथ उत्पादन एवं आपूर्ति करने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि उसकी विकास यात्रा का लाभ उसके कर्मचारियों, समुदायों, उपभोक्ताओं और समूचे राष्ट्र तक पहुंच सके।
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पीके/केसी/केपी
(रिलीज़ आईडी: 2309517)
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