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दिहाड़ी मजदूरी से वैज्ञानिक-सी तक: एनएफएससी के सहयोग से तमिलनाडु के शोध छात्र कर्णन ए. ने एक प्रतिष्ठित शोध करियर बनाया

प्रविष्टि तिथि: 27 AUG 2026 7:36PM by PIB Delhi

उचित समय पर प्रदान की गई वित्तीय सहायता वंचित वर्गों के प्रतिभाशाली शोध छात्रों को उच्च शिक्षा जारी रखने, सार्थक शोध करने और ऐसे करियर का निर्माण करने में सक्षम बना सकती है, जो राष्ट्रीय विकास में योगदान दे।

तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के 30 वर्षीय शोध छात्र कर्णन ए. ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति छात्र फेलोशिप (एनएफएससी) योजना के तहत मिले सहयोग से यह बदलाव अनुभव किया। वर्तमान में वे बेंगलुरु स्थित सीएसआईआर फोर्थ पैराडाइम इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक-सी के पद पर पूर्णकालिक कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं।

कर्णन अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं और अपने परिवार में पहले शोधकर्ता हैं। वे अपने समुदाय के भी गिने-चुने शोधकर्ताओं में से एक हैं। उनके माता-पिता मौसमी किसान हैं, जिनकी आय सीमित और अनियमित है। वहीं, उनके दो भाई भी अपनी शिक्षा के लिए इसी पारिवारिक आय पर निर्भर थे।

स्कूली शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर अध्ययन तक, कर्णन ने अपनी फीस भरने और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सप्ताह के अंत में दिहाड़ी मजदूरी की। अपने स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के अंतिम वर्ष के दौरान उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, लेकिन इससे होने वाली आय भी पर्याप्त नहीं थी। वर्ष 2017 में उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में लेक्चररशिप के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) उत्तीर्ण की, लेकिन जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआएफ) की कट-ऑफ से मामूली अंतर से चूक गए।

फेलोशिप नहीं मिलने के कारण कर्णन को अपनी ट्यूशन कक्षाओं से होने वाली आय से ही पीएचडी की फीस और शोध संबंधी खर्च पूरी तरह वहन करना पड़ा। अपने गांव के पहले शोधकर्ता और अपने तालुक के गिने-चुने शोधकर्ताओं में से एक होने के कारण उन्हें शैक्षणिक मार्गदर्शन, परामर्श और पेशेवर नेटवर्क का भी अभाव था। इन आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक बाधाओं के कारण उनके लिए परिवार पर आर्थिक बोझ डाले बिना डॉक्टरेट की पढ़ाई जारी रखना बेहद कठिन हो गया था।

वर्ष 2019 में उस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब दिसम्बर 2018 की सीएसआईआर-यूजीसी नेट लेक्चररशिप परीक्षा के अंकों के आधार पर कर्णन का चयन एनएफएससी फेलोशिप के लिए हुआ। उन्हें सितम्बर 2019 से फेलोशिप सहायता मिलनी शुरू हुई और फेलोशिप, मकान किराया भत्ता (एचआरए) तथा आकस्मिक सहायता के रूप में लगभग 16 लाख रुपये प्राप्त हुए।

फेलोशिप ने कर्णन को उनके शैक्षणिक जीवन में पहली बार आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की। अब उन्हें फीस और शोध संबंधी खर्चों को पूरा करने के लिए न तो दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहना पड़ा और न ही ट्यूशन से होने वाली आय पर। इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ा और मानसिक शांति मिली, जिससे वे पूरी तरह अपने शोध पर ध्यान केन्द्रित कर सके। इस सहयोग से प्रेरित होकर उन्होंने दोबारा नेट परीक्षा दी और जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) के लिए सफलतापूर्वक अर्हता प्राप्त की।

कर्णन ने अपनी पीएचडी पूरी की और उनके शोध-प्रबंध कोअत्यधिक सराहनीयश्रेणी से सम्मानित किया गया। उन्होंने एससीआई/एससीआईई-इंडेक्स्ड अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में छह शोध लेख प्रकाशित किए। डॉक्टरेट पूरी करने के बाद उनका चयन बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) में इंस्टीट्यूशन ऑफ एमिनेंस पोस्टडॉक्टोरल फेलो के रूप में हुआ, जहाँ उन्हें एचआरए के साथ 67,000 रुपये प्रतिमाह की फेलोशिप प्रदान की गई।

इसके बाद कर्णन बेंगलुरु स्थित सीएसआईआर फोर्थ पैराडाइम इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक-सी के पद पर नियुक्त हुए। वर्तमान में वे सातवें वेतन आयोग के तहत लेवल-11 में कार्यरत हैं और उनका मूल वेतन 69,700 रुपये प्रतिमाह है। इस सहायता से उन्हें अपने परिवार की मदद करने और अपने भाई की शिक्षा में योगदान देने में भी सक्षम हुए। आज वे अपने माता-पिता का सहयोग करते हैं और अपने समुदाय के बच्चों की शिक्षा में भी योगदान देते हैं।

सहायता के प्रभाव के बारे में बताते हुए कर्णन ने कहा, “इस फेलोशिप ने केवल मेरे शोध के लिए वित्तीय सहायता ही प्रदान नहीं की, बल्कि मुझे स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और एक बेहतर भविष्य दिया। पीएचडी पूरी करने के बाद मैंने अपने जीवन में जो भी उपलब्धियां हासिल की हैं, वे इस फेलोशिप की वजह से संभव हो पाई हैं।”

कर्णन की यात्रा दर्शाती है कि समय पर प्रदान की गई फेलोशिप सहायता किस प्रकार दृढ़ संकल्प वाले शोधार्थी को आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को दूर करने, शैक्षणिक उत्कृष्टता हासिल करने और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में करियर बनाने में मदद कर सकती है। उन्होंने फेलोशिप प्रदान करने के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के प्रति तथा इसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

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पीके/केसी/केपी

 


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