विधि एवं न्याय मंत्रालय
सरकार मध्यस्थता सहित वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा दे रही है
सरकार मध्यस्थता के संबंध में जागरूकता बढ़ाने और हितधारकों की क्षमता निर्माण के लिए उच्च न्यायालयों और नालसा सहित विभिन्न हितधारकों के साथ निरंतर संवाद कर रही है
प्रविष्टि तिथि:
13 AUG 2026 3:49PM by PIB Delhi
सरकार मध्यस्थता सहित वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) तंत्रों को बढ़ावा दे रही है, क्योंकि ये तंत्र अपेक्षाकृत कम विवादात्मक होते हैं और विवादों के समाधान के पारंपरिक तरीकों के बेहतर विकल्प के रूप में प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।
- वाणिज्यिक न्यायालय कानून, 2015 की धारा 12A में निर्धारित मूल्य की वाणिज्यिक विवादों में वाद दायर करने से पहले अनिवार्य पूर्व-संस्थागत मध्यस्थता और समझौते (पीआईएमएस) का प्रावधान किया गया है। इसका अपवाद वे मामले हैं, जिनमें पक्षकार द्वारा तत्काल राहत की मांग की जाती है। अतः पक्षकारों को न्यायालय का रुख करने से पहले पीआईएमएस के अनिवार्य उपाय को अपनाना होगा। इसका उद्देश्य पक्षकारों को मध्यस्थता के माध्यम से वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने का अवसर प्रदान करना और इस प्रकार सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटाए गए विवादों को न्याय निर्णय के लिए न्यायालयों में ले जाने से रोकना है। विधिक सेवा प्राधिकरण कानून, 1987 के तहत स्थापित प्राधिकरणों को वाणिज्यिक न्यायालय कानून, 2015 के अंतर्गत पीआईएमएस संचालित करना आवश्यक है।
- मध्यस्थता कानून, 2023 में भी विवाद के पक्षकारों द्वारा अपनाई जाने वाली मध्यस्थता के लिए एक वैधानिक ढांचा निर्धारित किया गया है, विशेष रूप से संस्थागत मध्यस्थता के संबंध में। इसमें देश में एक सुदृढ़ और प्रभावी मध्यस्थता इकोसिस्टम स्थापित करने के लिए विभिन्न हितधारकों की भी पहचान की गई है। कानून की धारा 31 में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मध्यस्थता परिषद की स्थापना का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य अन्य बातों के साथ-साथ विवाद समाधान के पसंदीदा माध्यम के रूप में मध्यस्थता को बढ़ावा देना और देश में मध्यस्थता सेवा प्रदाताओं को मान्यता प्रदान करना है। इसके अलावा, कानून की धारा 43 में ऐसे किसी भी विवाद, जिससे किसी क्षेत्र या स्थानीयता के निवासियों अथवा परिवारों के बीच शांति, सौहार्द और सौहार्दपूर्ण वातावरण प्रभावित होने की संभावना हो, के समाधान के लिए सामुदायिक मध्यस्थता का प्रावधान किया गया है।
सरकार मध्यस्थता के संबंध में जागरूकता बढ़ाने और हितधारकों के क्षमता निर्माण के लिए उच्च न्यायालयों और नालसा सहित विभिन्न हितधारकों के साथ निरंतर संवाद कर रही है। मार्च 2025 में भारत के माननीय महान्यायवादी द्वारा विधि कार्य विभाग और इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर के सहयोग से नई दिल्ली के भारत मंडपम में राष्ट्रीय स्तर के मध्यस्थता सम्मेलन का आयोजन किया गया।
इसके अलावा, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) देशभर में मध्यस्थता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कदम उठा रहा है। इनमें विधिक सेवा प्राधिकरणों के अंतर्गत कार्यरत वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) केन्द्रों और मध्यस्थता केन्द्रों को मजबूत करना, मध्यस्थों का पैनल तैयार करना और उन्हें प्रशिक्षण देना, वाद-पूर्व तथा समुदाय-आधारित विवाद समाधान को बढ़ावा देना तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (एसएलए) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों (डीएलएसए) के माध्यम से सामुदायिक मध्यस्थता पहल को लागू करना शामिल है।
नालसा, सरकार से प्राप्त सहायता अनुदान में से भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति (एमसीपीसी) को धनराशि उपलब्ध कराता है। एमसीपीसी अधिवक्ताओं को प्रशिक्षित मध्यस्थ बनने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करती है।
इसके अलावा, नालसा ने इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ मीडिएटर्स के सहयोग से 14 अक्टूबर से 16 अक्टूबर 2024 (बैच-1) तथा 3 मार्च से 5 मार्च 2025 (बैच-2) तक भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 15 घंटे के उन्नत वाणिज्यिक मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम में अनुभवी विधि विशेषज्ञों, मध्यस्थों और न्यायाधीशों ने भाग लिया, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से जटिल वाणिज्यिक विवादों से निपटने के लिए मध्यस्थता संबंधी कौशल को बढ़ाना था।
मार्च 2026 तक देशभर में 452 एडीआर केनद्र और 1,394 मध्यस्थता केन्द्र कार्यरत हैं। कुल 4,681 न्यायिक अधिकारियों, 10,124 अधिवक्ताओं और 753 अन्य मध्यस्थों को प्रशिक्षित कर मध्यस्थ के रूप में तैनात किया गया है।
यह जानकारी कानून और न्याय मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
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पीके/केसी/केपी
(रिलीज़ आईडी: 2299135)
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