विधि एवं न्याय मंत्रालय
विधायी सुधारों पर प्रगति
प्रविष्टि तिथि:
07 AUG 2026 11:57PM by PIB Delhi
सरकार, हितधारकों की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (कारोबार में आसानी) को बढ़ावा देने के लिए लगातार कानूनी और नीतिगत बदलाव और सुधार कर रही है। सरकार छोटी-मोटी गलतियों के लिए आपराधिक सजा को कम करने और उनकी जगह उचित सिविल जुर्माना और प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने के लिए अलग-अलग कानूनों के तहत कदम उठा रही है। इसी क्रम में, कानूनों को ज्यादा संतुलित और व्यावहारिक बनाने की जरूरत को समझते हुए, सरकार ने प्रावधानों की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की। इस दिशा में एक अहम कदम 'जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2023' था, जिसने कई केंद्रीय कानूनों के तहत छोटी-मोटी गलतियों के लिए आपराधिक सजा को खत्म कर दिया। इसके बाद, 8 अप्रैल 2026 को सरकारी राजपत्र में 'जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2026' प्रकाशित किया गया, जो 23 मंत्रालयों और विभागों द्वारा संचालित 79 केंद्रीय कानूनों के प्रावधानों को तर्कसंगत बनाता है। इन सुधारों का उद्देश्य भरोसे पर आधारित शासन को बढ़ावा देना, नियमों के पालन का बोझ कम करना, 'ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस' को बेहतर बनाना और नियमों को उचित तरीके से लागू करना है
(क): सरकार देश में मध्यस्थता और सुलह सहित वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) तंत्र को बढ़ावा देना जारी रखती है, क्योंकि ये तंत्र कम प्रतिकूल हैं और विवादों को हल करने के पारंपरिक तरीकों का बेहतर विकल्प प्रदान करने में सक्षम हैं। सरकार इन तंत्रों को मजबूत करने और उन्हें अधिक प्रभावशाली और शीघ्र बनाने के लिए नीतिगत और विधायी हस्तक्षेप कर रही है।
इस संबंध में पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा की गई प्रमुख पहल, कदम और उपाय मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 के संबंध में शामिल हैं, जिसे मध्यस्थता परिदृश्य में वर्तमान विकास के साथ तालमेल बनाए रखने और मध्यस्थता को एक व्यवहार्य विवाद समाधान तंत्र के रूप में सक्षम करने के लिए वर्ष 2015, 2019 और 2020 में उत्तरोत्तर संशोधित किया गया है। संशोधनों का उद्देश्य मध्यस्थता कार्यवाही का समय पर निष्कर्ष सुनिश्चित करना, मध्यस्थों की तटस्थता, मध्यस्थता प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप को कम करना, मध्यस्थता फैसलों को प्रभावी ढंग से लागू करना और संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देना है।
व्यावसायिक न्यायालय अधिनियम (कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट), 2015 में 2018 में संशोधन किया गया था, ताकि 'प्री-इंस्टीट्यूशन मीडिएशन एंड सेटलमेंट' (पीआईएमएस) सिस्टम जैसी व्यवस्थाएं की जा सकें। इस व्यवस्था के तहत, जब किसी तय कीमत वाले व्यावसायिक विवाद में किसी तुरंत अंतरिम राहत की जरूरत नहीं होती है, तो संबंधित पक्षों को न्यायालय जाने से पहले पीआईएमएस की अनिवार्य प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसका उद्देश्य पक्षों को मध्यस्थता के जरिए व्यावसायिक विवादों को सुलझाने का मौका देना है।
भारत अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र अधिनियम, 2019 को इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर की स्थापना के लिए बनाया गया था। इसका उद्देश्य संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देने के लिए एक स्वतंत्र, स्वायत्त और विश्व स्तरीय संस्था बनाना और इस केंद्र को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करना था। तब से यह केंद्र स्थापित हो चुका है और इसका उद्देश्य मध्यस्थता के जरिए व्यावसायिक विवादों को सुलझाने के लिए एक निष्पक्ष मंच प्रदान करके घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह की पार्टियों में भरोसा जगाना है।
मध्यस्थता अधिनियम, 2023 विवाद वाले पक्षों के लिए खासकर संस्थागत मध्यस्थता के तहत, मध्यस्थता अपनाने का कानूनी ढांचा तैयार करता है। उम्मीद है कि मध्यस्थता अधिनियम, 2023 मध्यस्थता पर एक अलग कानून बनाने और न्यायालय के बाहर विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने की संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कानूनी कदम साबित होगा।
इसके अलावा, समय-समय पर किए गए इन उपायों ने एडीआर (वैकल्पिक विवाद समाधान) व्यवस्था को बेहतर और मजबूत बनाने, 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' में मदद करने और देश को निवेश और आर्थिक विकास के लिए एक आकर्षक जगह के तौर पर स्थापित करने में योगदान दिया है।
कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत गठित प्राधिकरण भी मध्यस्थता सहित विवाद समाधान के वैकल्पिक तरीकों को बढ़ावा दे रहे हैं। ये प्राधिकरण कानूनी जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से और न्यालाय से जुड़े मध्यस्थता के साथ-साथ मुकदमा दर्ज होने से पहले की मध्यस्थता को मजबूत करने के प्रयास कर रहे हैं।
पिछले दो वर्षों में कानूनी सेवा प्राधिकरणों द्वारा मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाए गए मामलों का विवरण इस प्रकार है:
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वर्ष
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निस्तारित मुकदमे
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2024-25
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98,406
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2025-26
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2,25,647
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(ख): भारत ने पिछले कुछ सालों में अपने कारोबारी विनियामक माहौल को बेहतर बनाने के लिए लगातार सुधार किए हैं। सरकार का ध्यान धीरे-धीरे नियमों के पालन पर बहुत ज्यादा जोर देने वाली व्यवस्था से हटकर, काम आसान बनाने वाले इकोसिस्टम की ओर बढ़ा है। इन सुधारों का उद्देश्य सभी प्रक्रियाओं में तेजी, पारदर्शिता और भरोसे पर आधारित शासन को बढ़ावा देना रहा है। नतीजतन, भारत के कारोबारी माहौल में निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' में सुधार हुआ है।
विश्व बैंक द्वारा 24 अक्टूबर, 2019 को जारी 'डूइंग बिजनेस रिपोर्ट, 2020' में भारत 190 देशों में कुल मिलाकर 63वें स्थान पर है। 2014 के बाद से, भारत की रैंकिंग 142 से सुधरकर 2019 में 63 हो गई है। हालांकि, विश्व बैंक ने 2020 में ईओडीबी की प्रक्रिया बंद कर दी थी।
(ग): जिला और अधीनस्थ अदालतों के लिए बुनियादी ढांचे की सुविधाओं के विकास की केंद्र-प्रायोजित योजना की नियमित रूप से विभाग-संबंधी संसदीय स्थायी समिति और आंतरिक ऑडिट टीमों द्वारा समीक्षा की जाती है। इसके अलावा, योजना के विस्तार के समय नीति आयोग की देखरेख में किसी तीसरे पक्ष द्वारा भी इसका मूल्यांकन किया गया है। नवीनतम थर्ड-पार्टी रिपोर्ट में अन्य बातों के साथ-साथ यह बताया गया है कि यह योजना बुनियादी ढांचे के विकास के अपने उद्देश्य को राष्ट्रीय नीतियों, सतत विकास लक्ष्यों और लाभार्थियों की जरूरतों के साथ मजबूती से जोड़कर अपनी उच्च प्रासंगिकता प्रदर्शित करती है। साथ ही, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिन जिलों में कोर्ट रूम की संख्या (घनत्व) अधिक है, वहां लंबित मामलों की औसत संख्या में 3-8% की कमी आई है; और यह भी बताया गया है कि जिला अदालतों में मामलों के निपटारे के समय में 16% की कमी आई है, जो 3.1 साल से घटकर 2.6 साल हो गया है।
यह जानकारी विधि और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में दी।
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पीके/केसी/एमपी
(रिलीज़ आईडी: 2296448)
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