राज्यसभा सचिवालय
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विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 166वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 07 AUG 2026 7:38PM by PIB Delhi

श्री ब्रिज लाल,सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता वाली विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने दिनांक 07 अगस्त, 2026 को "देश में अधिकरण प्रणाली के कामकाज की समीक्षा" विषय पर एक सौ छियासठवां प्रतिवेदन संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया।

        इस विषय की जांच करते समय, समिति ने हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया और 11 जून, 2025 को रजिस्ट्रार, रेल दावा अधिकरण (आरसीटी) और रेलवे बोर्ड के अपर सदस्य (वाणिज्यिक) के विचार सुने; 10 नवंबर, 2025 को विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग के संयुक्त सचिव, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के रजिस्ट्रार जनरल और राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) के रजिस्ट्रार के विचार सुने; 20 नवंबर, 2025 को विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग के संयुक्त सचिव और दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपील अधिकरण (टीडीएसएटी) के निदेशक के विचार सुने; और 30 दिसंबर, 2025 को विधि और न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग के संयुक्त सचिव तथा आयकर अपीलीय अधिकरण (आईटीएटी) के अध्यक्ष के विचार सुने। समिति ने 05 अगस्त, 2026 को हुई अपनी बैठक में प्रतिवेदन पर विचार किया और उसे स्वीकार किया।  समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई सिफारिशें/समुक्तियां संलग्न हैं। संदर्भ के प्रयोजनार्थ प्रत्येक सिफ़ारिश/समुक्ति के अंत में प्रतिवेदन की पैरा संख्या का उल्लेख किया गया है। संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs/hi/committees/18?departmentally-related-standing-committees पर उपलब्ध है।

 

"देश में अधिकरण प्रणाली के कामकाज की समीक्षा" विषय पर एक सौ छियासठवें प्रतिवेदन की सिफारिशें/समुक्तियाँ

आयकर अपीलीय अधिकरण (आईटीएटी)

  1. समिति का मत है कि किसी न्यायिक संस्था की कार्यक्षमता न केवल सदस्यों की उपलब्धता पर बल्कि रजिस्ट्री, प्रशासनिक और सहायक कर्मचारियों की पर्याप्तता पर भी निर्भर करती है। विभिन्न स्तरों पर रिक्तियों से सुनवाई की समय-सारणी, अभिलेखों की तैयारी, अदालती कार्यवाही, प्रशासनिक पर्यवेक्षण और मामलों के समग्र निपटान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि अधिकरण में सदस्यों के सभी रिक्त पदों को समय पर और निरंतर भरा जाए ताकि संस्था अपनी अधिकतम क्षमता से कार्य कर सके। समिति आगे सिफारिश करती है कि विधि कार्य विभाग, अधिकरण, एसएससी और अन्य संबंधित एजेंसियों के समन्वय से, रजिस्ट्री और सहायक विभागों में विशेष रूप से रजिस्ट्रार, उप रजिस्ट्रार, सहायक रजिस्ट्रार, वरिष्ठ निजी सचिव और निजी सचिव के पदों की रिक्तियों को भरने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

(पैरा 2.13)

 

  1. समिति यह नोट करती है कि सरकारी संगठनों को समूह '' और समूह '' पदों के लिए चयनित उम्मीदवारों को बनाए रखने में लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि योग्यता से अधिक होने के बावजूद अक्सर उम्मीदवार या तो कार्यभार ग्रहण नहीं करते या नियुक्ति के तुरंत बाद नौकरी छोड़ देते हैं। इस संबंध में, समिति ने सिफारिश की है कि सरकार को चयनित उम्मीदवारों की एक आरक्षित सूची या प्रतीक्षा सूची बनाने की व्यवहार्यता की जांच करनी चाहिए, जो एक निश्चित अवधि के लिए वैध हो, ताकि कार्यभार ग्रहण न करने या जल्दी नौकरी छोड़ने के कारण उत्पन्न रिक्तियों को शीघ्रता से भरा जा सके। इस प्रकार की व्यवस्था से भर्ती में होने वाली देरी को कम करने और अधिकरण  के कामकाज में निरंतरता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

(पैरा 2.14)

 

  1. समिति यह सिफारिश करती है कि न्यायिक, रजिस्ट्री और सहायक विभागों में कर्मचारियों की आवश्यकताओं का मूल्यांकन करने के लिए समय-समय पर मानव संसाधन आकलन किया जाए और रिक्तियों को सक्रिय रूप से भरा जाए ताकि प्रशासनिक बाधाएं न्याय के कुशल वितरण में रुकावट न बनें।

(पैरा 2.15)

 

  1. हालांकि समिति काफी समय में लंबित मामलों को कम करने के लिए अधिकरण के निरंतर प्रयासों की सराहना करती है, लेकिन पांच महीने की अवधि के भीतर लंबित मामलों में 19,275 की तीव्र वृद्धि चिंताजनक है, जिसकी गहन जांच आवश्यक है। अतः समिति चाहती है कि वर्तमान अवधि के दौरान लंबित मामलों में हुई तीव्र वृद्धि के मुद्दे की जांच की जाए और सिफारिश करती है कि अधिकरण इस वृद्धि में योगदान देने वाले कारकों का विस्तृत विश्लेषण करे, जिसमें नई दायर की गई अपीलों के रुझान भी शामिल हैं।

(पैरा 2.20)

 

  1. समिति का मत है कि न्यायनिर्णय में एकरूपता सुनिश्चित करने और नए बकाया के संचय को रोकने के लिए ऐसी समय-सीमाओं के अनुपालन की नियमित निगरानी आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि अधिकरण अपीलों के निपटारे और आदेशों की घोषणा से संबंधित निर्धारित प्रदर्शन मानकों और समय-सीमाओं के अनुपालन के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि लंबे समय से लंबित और पुराने मामलों, विशेष रूप से कानून के बार-बार सामने आने वाले मुद्दों से संबंधित मामलों के निपटारे पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि कर प्रशासन में निश्चितता को बढ़ावा मिले और अनावश्यक मुकदमेबाजी कम हो।

(पैरा 2.22)

 

  1. न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण में अधिकरण द्वारा की गई महत्वपूर्ण प्रगति की सराहना करते हुए, समिति अधिकरण  द्वारा पुराने हार्डवेयर, अप्रचलित सॉफ्टवेयर प्रणालियों और साइबर सुरक्षा उपायों की बढ़ती आवश्यकता के संबंध में व्यक्त की गई चिंताओं को ध्यान में रखती है। अधिकरण द्वारा संभाली जाने वाली करदाताओं की जानकारी की संवेदनशीलता को देखते हुए, समिति इस बात पर जोर देती है कि डेटा सुरक्षा और डिजिटल सुदृढ़ीकरण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि विधि मामलों का विभाग सभी पीठों में हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग अवसंरचना के आवधिक उन्नयन के लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि न्यायिक अभिलेखों और करदाताओं की जानकारी की सुरक्षा के लिए नियमित साइबर सुरक्षा ऑडिट, भेद्यता आकलन और डेटा संरक्षण समीक्षा समय-समय पर की जाए।

(पैरा 2.27)

 

  1. समिति का मानना ​​है कि न्यायिक संस्था के कुशल संचालन के लिए पर्याप्त भौतिक अवसंरचना आवश्यक है। आधुनिक न्यायालय कक्ष, अभिलेख प्रबंधन सुविधाएं, कार्यालय स्थान, डिजिटल अवसंरचना और वादियों तथा वकीलों के लिए उपयुक्त सुविधाएं न्यायनिर्णय की गुणवत्ता और दक्षता में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। अतः समिति विधि कार्य विभाग को देश भर में अधिकरण के भौतिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने को प्राथमिकता देने की सिफारिश करती है। समिति विशेष रूप से मुंबई में अधिकरण  के लिए एक स्थायी और आधुनिक मुख्यालय की स्थापना और अहमदाबाद, कोलकाता और गुवाहाटी में चल रही बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को निर्धारित समय-सीमा के भीतर पूरा करने की दिशा में शीघ्र कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देती है। समिति आगे सिफारिश करती है कि निजी भवनों से संचालित हो रही पीठों के लिए उपयुक्त सरकारी आवास या भूमि प्राप्त करके किराये के परिसरों पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को तेज किया जाए।

(पैरा 2.31)

  1. समिति का मत है कि विशिष्ट अधिकरणों की शक्ति केवल न्यायिक अनुभव से ही नहीं, बल्कि विषय-वस्तु विशेषज्ञता की उपलब्धता से भी प्राप्त होती है। इस संदर्भ में, विभिन्न व्यावसायिक पृष्ठभूमियों से आने वाले सदस्यों के लिए निरंतर व्यावसायिक विकास का महत्व बढ़ जाता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि अधिकरण , विधि मामलों के विभाग और अन्य संबंधित संस्थानों के समन्वय से, नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और ज्ञान-साझाकरण अभ्यासों के माध्यम से सदस्यों और रजिस्ट्री अधिकारियों के लिए क्षमता-निर्माण पहलों को मजबूत करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि कर न्यायशास्त्र के उभरते क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया जाए, जिनमें अंतर्राष्ट्रीय कराधान, हस्तांतरण मूल्य निर्धारण, कर चोरी रोधी उपाय और आयकर अधिनियम, 2025 का कार्यान्वयन शामिल है।

(पैरा 2.34)

 

  1. समिति यह सिफारिश करती है कि नवनियुक्त सदस्यों के लिए सतत व्यावसायिक शिक्षा और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों हेतु उपयुक्त व्यवस्थाएँ विकसित की जाएँ, ताकि उन्हें कर कानून और व्यवहार में आवश्यक विशेषज्ञता प्राप्त हो सके। इसके अतिरिक्त, अधिकरण  में वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियाँ करते समय, लागू वैधानिक ढाँचे के अनुरूप, कराधान और संबंधित क्षेत्रों में विशेष ज्ञान और अनुभव के महत्व पर उचित ध्यान दिया जाए। ऐसे उपाय यह सुनिश्चित करने में सहायक होंगे कि अधिकरण  तेजी से जटिल होते कर विवादों का प्रभावी ढंग से निपटारा करने में सक्षम बना रहे और एक प्रमुख विशेष न्यायिक संस्था के रूप में अपनी दीर्घकालीन प्रतिष्ठा को बनाए रखे।

(पैरा 2.35)

 

रेल दावा अधिकरण (आरसीटी)

  1. समिति का सुविचारित मत है कि अधिकरण के शीघ्र निपटान और कुशल संचालन के लिए पर्याप्त न्यायिक और प्रशासनिक कर्मचारियों का होना अनिवार्य है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सदस्यों और सहायक कर्मचारियों के पदों पर रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि सदस्यों के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया रिक्तियों के अपेक्षित होने से काफी पहले शुरू कर दी जाए, ताकि वर्तमान सदस्यों के कार्यकाल समाप्त होने से पहले नियुक्तियाँ पूरी हो जाएँ और अधिकरण के संचालन में निरंतरता सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 3.8)

 

  1. समिति नोट करती है कि यद्यपि सभी प्रमुख पीठों में लंबित मामलों में कमी आई है, फिर भी लंबित मामलों का एक बड़ा हिस्सा कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में केंद्रित है। समिति का मानना ​​है कि इस तरह के केंद्रीकरण के अंतर्निहित कारणों की गहन जांच आवश्यक है, जिसमें अवसंरचना की पर्याप्तता, मानव संसाधन की उपलब्धता, कार्यभार वितरण और अन्य क्षेत्र-विशिष्ट कारक शामिल हैं।

(पैरा 3.12)

 

  1. समिति का यह मत है कि जिन क्षेत्रों में लंबित मामलों की संख्या अनुपातहीन रूप से अधिक है, वहां निरंतर और लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि रेल मंत्रालय लंबित मामलों की प्रवृत्ति का व्यापक क्षेत्र-वार और विभाग-वार विश्लेषण करे, विशिष्ट क्षेत्रों में मामलों के संकेंद्रण के लिए जिम्मेदार कारकों की पहचान करे और पहचाने गए संरचनात्मक अवरोधों को दूर करने के लिए समयबद्ध रणनीति तैयार करे। इसके लिए, यदि आवश्यक हो, तो उन क्षेत्रों में अतिरिक्त पीठ स्थापित किए जाएं जहां मामलों की संख्या अधिक बनी हुई है।

(पैरा 3.14)

 

  1. समिति यह सिफारिश करती है कि विभिन्न पीठों के कार्यनिष्पादन की समय-समय पर समीक्षा की जाए और बकाया मामलों में कमी लाने में हासिल की गई गति को बनाए रखने और न्यायनिर्णय प्रक्रिया की समग्र दक्षता में सुधार करने के लिए उचित उपाय किए जाएं।

(पैरा 3.15)

  1. डब्ल्यूएस चरण में लंबित मामलों को देखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि इन सांकेतिक समय-सीमाओं को और कम किया जाए, जिसमें डब्ल्यूएस आमतौर पर 45 दिनों के भीतर दाखिल किया जाए और डीआरएम रिपोर्ट 60 दिनों के भीतर पूरी की जाए, और क्षेत्रीय और रेल बोर्ड स्तरों पर मासिक समीक्षाओं के माध्यम से बेंच-वार अनुपालन की निगरानी की जाए।

(पैरा 3.18)

 

  1. समिति को सूचित किया गया कि उत्तर प्रदेश, बिहार और मुंबई में मामलों का उच्च संख्या में लंबित होने का संबंध घने रेल नेटवर्क, ट्रेनों की उच्च आवृत्ति, बड़ी आबादी और व्यवहार संबंधी कारकों जैसे कि फुटबोर्ड यात्रा, चलती ट्रेनों में चढ़ना/उतरना और पटरियों पर अतिक्रमण करने से है। उपरोक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि रेल मंत्रालय, आरसीटी के समन्वय से, इन क्षेत्रों में लक्षित सुरक्षा और जागरूकता अभियान तैयार करे, और दुर्घटनाओं की घटनाओं और दावा दाखिल करने पर उनके प्रभाव की समय-समय पर समीक्षा करे।

(पैरा 3.19)

 

  1. हाइब्रिड और वर्चुअल सुनवाई प्रणालियों ने अधिक सुलभता प्रदान की है और अधिवक्ताओं और वादियों को दूर से ही कार्यवाही में भाग लेने में सक्षम बनाया है। तथापि, समिति समुक्ति करती है कि अवसंरचना की कमियां और मानव संसाधन की कमी प्रौद्योगिकी के इष्टतम उपयोग और ई-आरसीटी परियोजना के तहत परिकल्पित लाभों की पूर्ण प्राप्ति में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। अतः समिति सभी पीठों में हाइब्रिड और वर्चुअल अदालती प्रणालियों के पूर्ण कार्यान्वयन और डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की सिफारिश करती है ताकि पहुंच में सुधार हो सके और वादियों, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले वादियों को होने वाली असुविधा और रसद संबंधी बोझ को कम किया जा सके।

(पैरा 3.21)

 

  1. समिति यह सिफारिश करती है कि आरसीटी को दावा याचिकाओं के लिए पूरी तरह से डिजिटल फाइलिंग प्रणाली (-फाइलिंग) शुरू करनी चाहिए, एक समर्पित पोर्टल और मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से वास्तविक समय में मामले की स्थिति की निगरानी प्रदान करनी चाहिए और अधिकरण पीठों से दूर रहने वाले पक्षों के लिए आभासी सुनवाई की सुविधा प्रदान करनी चाहिए। इसके लिए, पर्याप्त तकनीकी और प्रशासनिक जनशक्ति उपलब्ध कराई जानी चाहिए और आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, ताकि ई-आरसीटी परियोजना का प्रभावी कार्यान्वयन सुगम हो सके और अधिकरण के कामकाज में प्रौद्योगिकी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 3.22)

 

  1. समिति का सुविचारित मत है कि वित्तीय स्वायत्तता अधिकरण की संस्थागत स्वतंत्रता और कुशल कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त है। अतः समिति सिफारिश करती है कि रेल मंत्रालय रेल दावा अधिकरण के लिए एक अलग पूंजीगत बजट उपलब्ध कराने की व्यवहार्यता की जांच करें ताकि बुनियादी ढांचे के विकास, उपकरणों की खरीद और कार्यालय परिसर के रखरखाव के लिए समय पर धन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके और अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में अधिकरण की संस्थागत विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को सुदृढ़ किया जा सके।

(पैरा 3.25)

 

  1. समिति न्याय तक पहुंच बढ़ाने और इसके कामकाज की दक्षता में सुधार लाने के लिए अधिकरण द्वारा की गई पहलों की सराहना करती है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित वादियों को वित्तीय बाधाओं के कारण न्याय से वंचित न किया जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए विवादों के सौहार्दपूर्ण निपटारे के लिए लोक अदालतों का आयोजन और कानूनी सहायता योजना का कार्यान्वयन सराहनीय उपाय हैं। चल रही ई-आरसीटी परियोजना, जिसमें ई-फाइलिंग, ऑनलाइन केस सूचना प्रणाली और डिजिटल भुगतान गेटवे की शुरुआत के माध्यम से अधिकरण को कागज रहित वातावरण में बदलने की परिकल्पना की गई है, भी एक स्वागत योग्य पहल है जिसका उद्देश्य मामलों के निपटारे में तेजी लाना और निर्णय में लगने वाले समय को कम करना है।

(पैरा 3.28)

  1. समिति का सुविचारित मत है कि ऐसी पहलों से मामलों के शीघ्र निपटान और पीड़ितों एवं उनके परिवारों को समय पर राहत प्रदान करने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। समिति का मानना ​​है कि ये पद्धतियाँ कार्यकुशलता में सुधार और संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए उपयोगी आदर्श साबित हो सकती हैं।

(पैरा 3.29)

 

  1. समिति का मत है कि सौदेबाजी की शक्ति में इस प्रकार का असंतुलन, साथ ही रेल अधिकारियों की वास्तविक दावों के निपटारे में अनिच्छा, न्याय तक पहुंच को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है और योग्य मामलों के समय पर समाधान में बाधा डाल सकती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि निपटान प्रक्रियाओं में निष्पक्षता, पारदर्शिता और स्वैच्छिकता सुनिश्चित करने के लिए उचित सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं, ताकि योग्य मामलों में विवादों का समय पर समाधान प्रोत्साहित हो सके। समिति स्थगन की निर्धारित सीमा का कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता पर भी बल देती है और सिफारिश करती है कि अनावश्यक स्थगनों को सख्ती से हतोत्साहित किया जाए ताकि देरी को रोका जा सके और मामलों का शीघ्र निपटारा सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 3.31)

 

  1. समिति का सुविचारित मत है कि एक सुव्यवस्थित और मानकीकृत प्रतिकर ढांचा मुआवज़े के शीघ्र भुगतान को सुगम बनाएगा, पीड़ितों के साथ न्यायसंगत व्यवहार सुनिश्चित करेगा और विवादित या तदर्थ समझौतों से उत्पन्न होने वाले अनावश्यक मुकदमों को कम करेगा। अतः समिति रेल मंत्रालय को नागर विमानन क्षेत्र की तर्ज पर, विशेष रूप से घातक दुर्घटना मामलों में, ऐसे ढांचे को लागू करने की व्यवहार्यता की जांच करने की सिफारिश करती है, ताकि पीड़ितों को समय पर राहत सुनिश्चित किया जा सके। समिति आगे सिफारिश करती है कि मानकीकृत दावा प्रपत्र को अपनाकर, रेल के पास पहले से उपलब्ध अभिलेखों के मामले में दस्तावेज़ीकरण को कम करके और दावा दाखिल करते समय दावेदार परिवारों की सहायता के लिए सहायता डेस्क की व्यवस्था करके दावा प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।

(पैरा 3.33)

 

  1. समिति का सुविचारित मत है कि आरसीटी तक पहुंच काफी हद तक इसकी भूमिका और प्रक्रियाओं के बारे में जन जागरूकता पर निर्भर करती है, और एक समर्पित प्रचार तंत्र की अनुपस्थिति, सीमित भाषा उपलब्धता और कानूनी सहायता की असमान उपलब्धता के कारण दावेदारों, विशेषकर कानूनी सहायता से वंचित लोगों के लिए, अधिकरण तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सूचना के बहुभाषी प्रसार और सभी अधिकरण पीठों में सुविधा तंत्र की स्थापना के माध्यम से अधिकरण के कामकाज के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं। ऐसे कदम पहुंच में सुधार करेंगे और व्यक्तियों को समय पर और प्रभावी निवारण प्राप्त करने में सक्षम बनाएंगे।

(पैरा 3.35)

 

  1. समिति रेल मंत्रालय को विवादों के शीघ्र समाधान और अनावश्यक मुकदमों को कम करने के उद्देश्य से एक संरचित पूर्व-मुकदमेबाजी तंत्र शुरू करने की व्यवहार्यता की जांच करने की सिफारिश करती है। समिति दावों के निपटारे के संबंध में निर्णय लेने में मार्गदर्शन करने और अनावश्यक मुकदमों को कम करने के लिए एक व्यापक मुकदमेबाजी नीति तैयार करने की भी सिफारिश करती है।

(पैरा 3.37)

 

  1. समिति सिफारिश करती है कि मुकदमेबाजों द्वारा दावों को दाखिल करने में सुगमता और पहुंच में सुधार के लिए "जीरो एफआईआर" मॉडल की तर्ज पर एक सार्वभौमिक फाइलिंग प्रणाली अपनाई जाए। यह व्यवस्था न्याय तक पहुंच बढ़ाने और मुकदमेबाजों की असुविधा को कम करने की क्षमता रखती है। इससे याचिकाकर्ता क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की बाधाओं के बिना किसी भी स्थान पर कार्यवाही शुरू कर सकेंगे और संबंधित क्षेत्राधिकार वाली उपयुक्त पीठ को मामलों का सुचारू हस्तांतरण सुनिश्चित होगा।

(पैरा 3.39)

 

  1. समिति यह सिफारिश करती है कि यात्री रिकॉर्ड और दुर्घटना रिपोर्टों के त्वरित सत्यापन के लिए रेल दावा अधिकरण और भारतीय रेल के बीच एक डिजिटल इंटरफ़ेस स्थापित किया जाए। मामलों के शीघ्र निपटान के लिए, आरसीटी को सुनवाई की तारीख तय करने और कारण सूची तैयार करने के साथ-साथ एसएमएस और ईमेल के माध्यम से स्वचालित सूचनाएं भेजने के लिए प्रौद्योगिकी और एआई का उपयोग करना चाहिए। एआई की सहायता से आदेश भी जारी किए जा सकते हैं।

(पैरा 3.40)

 

दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपीलीय अधिकरण (टीडीएसएटी)

 

  1. समिति नोट करती है कि टीडीएसएटी की संस्वीकृत संख्या स्थापना के बाद से 52 पदों पर ही बनी हुई है, जबकि विवादों में अत्यधिक विशिष्ट तकनीकी मुद्दे शामिल होते हैं जिनके लिए विशिष्ट क्षेत्र की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। अतः समिति का मानना ​​है कि अधिकरण के मानव संसाधन और तकनीकी क्षमताओं को सुदृढ़ करने की तत्काल आवश्यकता है। समिति का मत है कि सदस्यों और सहायक कर्मचारियों की वर्तमान संख्या अधिकरण के विस्तारित क्षेत्राधिकार और बढ़ते कार्यभार को प्रभावी ढंग से संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है। अतः समिति सिफारिश  करती है कि विभाग अधिकरण के विस्तारित जनादेश के संदर्भ में उसकी संस्वीकृत संख्या की समीक्षा करे और आवश्यकतानुसार अतिरिक्त सदस्यों, अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति करके संस्वीकृत संख्या में वृद्धि करे। विभाग को अधिकरण के विस्तारित जनादेश के अनुरूप नियमित क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी लागू करने चाहिए ताकि उसके विविध क्षेत्राधिकारों में विवादों का कुशल और समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 4.7)

 

  1. समिति का यह मत है कि विवादों का समय पर निपटारा विनियामक निश्चितता सुनिश्चित करने, निवेशकों का विश्वास बढ़ाने और टीडीएसएटी के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में हितधारकों के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है। अतः समिति,सिफारिश की जाती है कि टीडीएसएटी को लंबित मामलों की संख्या को कम करने के लिए एक व्यापक, समयबद्ध कार्य योजना तैयार और कार्यान्वित करनी चाहिए, जिसमें लंबे समय से लंबित मामलों पर उनके निपटान को प्राथमिकता देकर, यथार्थवादी समयसीमा निर्धारित करके और लंबित मामलों की आवधिक निगरानी और समीक्षा करके विशेष जोर दिया जाए।

(पैरा 4.9)

  1. समिति का मत है कि स्थायी कार्यालय परिसर के अभाव से प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है, भविष्य में विस्तार के अवसर सीमित होते हैं और किराये के आवास पर आवर्ती व्यय होता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार अधिकरण के कार्यों के कुशल निर्वहन के लिए आवश्यक आधुनिक न्यायालय कक्षों, डिजिटल अवसंरचना और अन्य सहायक सुविधाओं से सुसज्जित स्थायी कार्यालय परिसर की स्थापना के लिए पर्याप्त बजटीय सहायता प्रदान करे।

(पैरा 4.11)

 

  1. समिति का मानना ​​है कि उपभोक्ता न्यायालयों में अक्सर क्षेत्र-विशिष्ट तकनीकी विशेषज्ञता की कमी होती है और उन पर लंबित मामलों का बोझ बहुत अधिक होता है, जिससे दूरसंचार संबंधी शिकायतों का समय पर और प्रभावी समाधान प्रभावित हो सकता है। अतः समिति दूरसंचार क्षेत्र में एक स्वतंत्र दूरसंचार लोकपाल की स्थापना और एक सुदृढ़ बहुस्तरीय शिकायत निवारण ढांचा तैयार करने की सिफारिश करती है। समिति आगे सिफारिश  करती है कि सरकार टीडीएसएटी के अधिकार क्षेत्र को कुछ विशेष उपभोक्ता विवादों तक विस्तारित करने की व्यवहार्यता की जांच करे।

(पैरा 4.14)

 

  1. समिति नोट करती है कि तकनीकी प्रगति और डिजिटल परिवर्तन ने अधिकरण के समक्ष आने वाले विवादों की प्रकृति को काफी हद तक बदल दिया है। समिति टीडीएसएटी द्वारा आभासी और हाइब्रिड सुनवाई तंत्र अपनाने, -फाइलिंग प्रणाली को क्रियान्वित करने के निरंतर प्रयासों और विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान को सुगम बनाने के लिए मध्यस्थता केंद्र की स्थापना की सराहना करती है। समिति का मानना ​​है कि न्यायनिर्णय प्रक्रियाओं में सुगमता, पारदर्शिता और दक्षता में सुधार के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों का प्रभावी उपयोग आवश्यक है।

(पैरा 4.16)

 

  1. समिति का मानना ​​है कि बढ़ते मामलों और हितधारकों के विस्तृत भौगोलिक विस्तार को देखते हुए, प्रौद्योगिकी-आधारित विवाद समाधान तंत्रों पर अधिक निर्भरता आवश्यक है। अतः समिति का मत है कि सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना से न केवल मामलों का प्रबंधन और प्रक्रियात्मक दक्षता में सुधार होगा, बल्कि देश भर के हितधारकों, विशेषकर प्रमुख शहरी केंद्रों से बाहर स्थित हितधारकों को, अधिकरण की सेवाओं तक अधिक सुगमता और प्रभावी ढंग से पहुंच प्राप्त करने में भी सहायता मिलेगी।

(पैरा 4.17)

33.      समिति ई-फाइलिंग सुविधाओं के विस्तार, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और एकीकृत केस-प्रबंधन प्रणालियों के माध्यम से डिजिटल न्यायनिर्णय प्रणालियों को मजबूत करने की सिफारिश करती है। समिति आगे शिकायतों और विवादों को दर्ज करने, निगरानी करने और ट्रैक करने के लिए उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने की सिफारिश करती है ताकि सुलभता, पारदर्शिता और मामलों के समय पर निपटान को बढ़ाया जा सके।

(पैरा 4.18)

 

34.      समिति का दृढ़ मत है कि प्रभावी आधार शिकायत निवारण प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए जन जागरूकता और पहुंच को मजबूत करना आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार, यूआईडीएआई और टीडीएसएटी के समन्वय से, डिजिटल प्लेटफॉर्म, जनसंचार माध्यमों, सामान्य सेवा केंद्रों (सीएससी) और अन्य उपयुक्त माध्यमों से निरंतर जागरूकता और संपर्क पहलें शुरू करें ताकि नागरिकों को आधार शिकायत निवारण तंत्र, उपलब्ध अपीलीय उपायों और सक्षम अधिकारियों से संपर्क करने की प्रक्रियाओं के बारे में शिक्षित किया जा सके। समिति आगे सिफारिश करती है कि उपयोगकर्ता के अनुकूल मार्गदर्शन सामग्री और ऑनलाइन संसाधन आसानी से उपलब्ध कराए जाएं ताकि नागरिक शिकायत निवारण प्रणाली का प्रभावी ढंग से लाभ उठा सकें, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में, जहां अपीलीय उपायों के बारे में जागरूकता सीमित हो सकती है।

(पैरा 4.22)

 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी)

 

35.      समिति इस बात पर जोर देती है कि न्यायिक सदस्यों और विशेषज्ञ सदस्यों के रिक्त पदों को शीघ्रता से भरना अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अधिकरण न्यूनतम वैधानिक सदस्य संख्या से कम सदस्यों के साथ कार्य कर रहा है, सरकार से अनुरोध करती है कि वह चल रही नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दे, ताकि अधिकरण एनजीटी अधिनियम, 2010 के विधायी ढांचे के अनुरूप कार्य कर सके।

(पैरा 5.11)

 

36.       समिति नोट करती  है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) अपने दैनिक कामकाज के लिए संविदा कर्मचारियों पर काफी हद तक निर्भर है, जिसके कारण मामलों का निपटारा धीमा होता है और लंबित मामलों की संख्या बढ़ जाती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि संविदा कर्मचारियों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने और नियमित प्रशासनिक, न्यायिक, रजिस्ट्री और तकनीकी सहायता कर्मियों की पीठ-वार स्थिर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अधिकरण की कर्मचारी संरचना की व्यापक और शीघ्र समीक्षा की जाए।

(पैरा 5.14)

 

37.       समिति यह भी नोट करती है कि यद्यपि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में 166 कर्मचारी पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 142 ही कार्यरत हैं। कई स्तरों पर रिक्तियां हैं और बेंच-वार वितरण असमान है, जिसमें चेन्नई बेंच में रजिस्ट्रार के पद पर कोई नहीं है और सेक्शन ऑफिसर, निजी सचिव और सहायक (न्यायिक) स्टाफ (अनुलग्नक-I) जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी कमी है। समिति का मानना ​​है कि कर्मचारियों की यह निरंतर कमी, बहु-कार्य और तदर्थ व्यवस्थाओं पर अत्यधिक निर्भरता के साथ मिलकर, कुशल केस प्रबंधन, रजिस्ट्री कामकाज और अनुपालन निगरानी को कमजोर करती है और बेंचों में देरी और लंबित मामलों में वृद्धि करती है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि प्रशासनिक मंत्रालय, अधिकरण के परामर्श से, समयबद्ध बेंच-वार कर्मचारी ऑडिट करे और उन क्षेत्रीय बेंचों में महत्वपूर्ण न्यायालय प्रबंधन और रजिस्ट्री पदों को प्राथमिकता देते हुए जहां रिक्तियां सबसे अधिक हैं, समूह '', 'बी' और 'सी' कैडर के सभी स्वीकृत पदों को भरे।

(पैरा 5.15)

 

38.       समिति का मानना ​​है कि ऐसे मामलों में लंबे समय तक लंबित रहने से निवारण कमजोर हो सकता है, उपचारात्मक निर्देशों का व्यावहारिक प्रभाव कम हो सकता है और पर्यावरणीय नुकसान जारी रह सकता है या समय के साथ बिगड़ सकता है, विशेष रूप से जहां अंतरिम व्यवस्था और आंशिक अनुपालन को समयबद्ध अंतिम समाधान के बिना जारी रहने दिया जाता है। अतः समिति यह सिफारिश करती है कि तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित मामलों की पहचान और निगरानी के लिए एक अलग तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें न्यायनिर्णय के चरण के आधार पर ऐसे मामलों का वर्गीकरण भी शामिल हो, ताकि अपरिहार्य देरी और सुधारात्मक देरी के बीच अंतर करने में मदद मिल सके और अधिक लक्षित हस्तक्षेप की अनुमति मिल सके।

(पैरा 5.24)

 

39.       समिति ने समुक्ति की कि डिजिटल प्रणालियों के बावजूद, कई वादियों को विभिन्न मामलों में समय पर राहत पाने में देरी और कठिनाई का सामना करना पड़ता है। साथ ही, समिति यह मानती है कि अधिकरण ने ऑनलाइन फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और नागरिकों एवं हितधारकों के लिए व्यापक पहुंच के मामले में वास्तविक प्रगति की है, और उसका मानना ​​है कि ऐसी सुविधाएं मामलों के तेजी से निपटारे और एनजीटी के आदेशों के अनुपालन की बेहतर निगरानी में सहायक हो सकती हैं।

(पैरा 5.27)

 

40.       अधिकरण ने सूचित किया है कि उसके सामने प्रमुख चुनौतियों में से एक समर्पित कंप्यूटर अनुभाग और संबंधित तकनीकी पदों का अभाव है। समिति को यह बात असामान्य लगती है कि ऐसे समय में जब सरकार डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने में सक्रिय रूप से लगी हुई है, राष्ट्रीय हरित अधिकरण जैसी महत्वपूर्ण संस्था बिना समर्पित कंप्यूटर/आईटी अनुभाग और आवश्यक तकनीकी पदों के कार्य करती रहे। अतः समिति यह सिफारिश करती है कि अधिकरण की सभी पीठों में एक समर्पित कंप्यूटर/आईटी अनुभाग स्थापित किया जाए और उसे उचित तकनीकी पदों और सहायक कर्मचारियों के साथ संचालित किया जाए ताकि विश्वसनीय डिजिटल अवसंरचना सुनिश्चित की जा सके और इसके कामकाज में प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग किया जा सके।

(पैरा 5.28)

 

41.       ई-फाइलिंग, हाइब्रिड सुनवाई और केस सूचना प्रणालियों पर पहले से ही उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए, समिति यह सिफारिश करती है कि दूरस्थ और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के वादियों के लिए लिस्टिंग, केस ट्रैकिंग, पारदर्शिता और पहुंच में सुधार के लिए डिजिटल उपकरणों का और अधिक उपयोग किया जाए, ताकि त्वरित लिस्टिंग, कम स्थगन और बेहतर निगरानी जैसे लाभ व्यवहारिक रूप से पूरी तरह से प्राप्त हो सकें।

(पैरा 5.29)

 

42.       समिति यह सिफारिश करती है कि अधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट में एक डैशबोर्ड शामिल किया जाना चाहिए जो मामलों के निपटारे की बेंच-वार स्थिति के साथ-साथ अधिकरण के लिए अन्य प्रासंगिक आंकड़े प्रदर्शित करे, ताकि जनता और नीति निर्माता एनजीटी और इसकी प्रत्येक बेंच की दक्षता और प्रदर्शन का आसानी से आकलन कर सकें।

(पैरा 5.30)

 

43.       समिति अधिकरण के इन प्रयासों का स्वागत करती है। हालांकि, समिति इस बात पर जोर देती है कि ऐसे कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर अधिक प्रभावी प्रवर्तन और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई में परिणत किया जाना चाहिए। वायु प्रदूषण, अवैध खनन, नदी प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियों और शहरी पारिस्थितिक असंतुलन जैसे क्षेत्रों से संबंधित मुद्दों को विशेष महत्व दिया जा सकता है।

(पैरा 5.33)

 

44.       समिति का मानना ​​है कि अधिकरण द्वारा किए गए जागरूकता निर्माण और क्षमता विकास कार्य सराहनीय हैं। हालांकि, न्यायनिर्णय प्रक्रियाओं, अनुवर्ती कार्रवाई तंत्रों और प्रवर्तन को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, ताकि इन पहलों से उत्पन्न अपेक्षाओं के अनुरूप पर्यावरणीय परिणामों में स्पष्ट सुधार हो सके।

(पैरा 5.34)

 

45.       समिति सिफारिश करती है कि एनजीटी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राज्य प्राधिकरणों के समन्वय से, जनता को अपने जनादेश और कामकाज, विशेष रूप से इसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पर्यावरणीय मामलों के प्रकार और निवारण प्राप्त करने की प्रक्रियाओं के संबंध में शिक्षित करने के लिए संरचित और सतत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करे।

(पैरा 5.35)

 

46.       समिति अधिकरण द्वारा अपने आदेशों को लागू कराने के लिए बाहरी एजेंसियों और सिविल डिक्री प्रक्रिया पर निर्भरता पर चिंता व्यक्त करती है। समिति यह नोट करने के लिए बाध्य है कि अधिकरण के कार्य की प्रभावशीलता काफी हद तक अधिकरण के आदेशों को लागू करने वाले प्राधिकारियों पर निर्भर करती है, जिससे मौजूदा प्रवर्तन ढांचे की अंतर्निहित कमजोरियां उजागर होती हैं।

(पैरा 5.37)

 

47.       समिति का मानना ​​है कि संबंधित अधिकारियों द्वारा अधिकरण के आदेशों के अनुपालन की अधिक बारीकी से निगरानी की जानी चाहिए। समिति नियमित कार्रवाई रिपोर्टों के माध्यम से अधिकरण और मंत्रालय द्वारा अधिक सुदृढ़ अनुपालन, संयुक्त समितियों का प्रभावी उपयोग, जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण और एनजीटी के आदेशों के शीघ्र कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के बेहतर तरीकों की सिफारिश करती है।

(पैरा 5.38)

 

48.       समिति ने दिल्ली के बार-बार होने वाले वायु प्रदूषण संकट, अवैध खनन और लंबे समय से प्रदूषण के हॉटस्पॉट जैसे कुछ प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों में सार्वजनिक अपेक्षाओं और अधिकरण के वास्तविक हस्तक्षेप के बीच अंतर को नोट किया है। समिति का मानना ​​है कि ऐसे मामलों में संस्थागत प्रतिक्रियाएं समयबद्ध, स्पष्ट और उनकी गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए, साथ ही वैधानिक सीमाओं और सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता का सम्मान करना चाहिए, जहां वह विशेष मुद्दों पर विचार करता है। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि एनजीटी स्वतः संज्ञान लेने के लिए, विशेष रूप से ऐसे बार-बार होने वाले पर्यावरणीय मुद्दों के संबंध में, मामलों की पहचान और प्राथमिकता तय करने के लिए स्पष्ट आंतरिक प्रक्रियाओं को अपनाए।

(पैरा 5.41)

राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी)

 

49.       समिति नोट करती है कि अधिकरण के 95 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी वर्तमान में संविदा आधार पर कार्यरत हैं और प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारियों के बार-बार तबादलों के साथ-साथ संविदा कर्मचारियों के बीच नौकरी छोड़ने की उच्च दर प्रशासन की निरंतरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप संस्थागत स्मृति का नुकसान होता है और संबंधित क्षेत्र की विशेषज्ञता के विकास में बाधा आती है। समिति का यह मत है कि एक विशिष्ट अधिकरण संस्था की प्रभावशीलता न केवल पर्याप्त न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की उपलब्धता पर निर्भर करती है, बल्कि एक स्थिर, अनुभवी और पेशेवर रूप से प्रबंधित प्रशासनिक कार्यबल पर भी निर्भर करती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के पदों पर रिक्तियों को शीघ्रता से भरा जाए और बढ़ते कार्यभार के आलोक में अतिरिक्त पीठों और सदस्यों की आवश्यकता की समय-समय पर समीक्षा की जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि कारपोरेट कार्य मंत्रालय राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण भर्ती नियम, 2020 की व्यापक समीक्षा करे ताकि भर्ती में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके, सीधी भर्ती के अधिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकें और सभी पदों पर रिक्तियों को समय पर भरा जा सके।

(पैरा 6.9)

 

50.       समिति यह सिफारिश करती है कि अधिकरण की कर्मचारी आवश्यकताओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और संविदा एवं प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत कर्मियों पर निर्भरता कम करने के लिए पर्याप्त स्थायी पद सृजित किए जाएं। संस्थागत स्मृति को संरक्षित रखने, विशेषज्ञता को सुदृढ़ करने, प्रशासन में निरंतरता सुनिश्चित करने और अधिकरण की समग्र दक्षता एवं प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए एक स्थिर एवं स्थायी कार्यबल आवश्यक है।

(पैरा 6.10)

 

51.       समिति समुक्ति करती ​​है कि आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मामलों की बड़ी संख्या में आईबीसी के तहत निर्धारित वैधानिक समयसीमा का पालन नहीं हो रहा है, विशेषकर उन मामलों में जहां समाधान योजना आवेदन दाखिल करने में देरी होती है। परिणामस्वरूप, दिवालियापन के मामलों की लंबितता काफी अधिक बनी हुई है, जो संहिता के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सीआईआरपी मामलों के शीघ्र निपटान की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

(पैरा 6.17)

 

52.       समिति नोट करती है कि कारपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के कई मामलों में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत निर्धारित वैधानिक समय-सीमा का पालन नहीं किया गया है। इसलिए समिति का मानना ​​है कि समाधान में देरी से लेनदारों का विश्वास कम होता है, संपत्ति का मूल्य घटता है और समयबद्ध दिवालियापन समाधान ढांचे का उद्देश्य विफल हो जाता है। एनसीएलटी द्वारा उजागर की गई बाधाओं को ध्यान में रखते हुए, समिति का मानना ​​है कि दिवालियापन कार्यवाही के समय पर समाधान के लिए सभी हितधारकों, जिनमें कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई), समाधान पेशेवर और एनसीएलटी शामिल हैं, के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।

(पैरा 6.18)

 

53.       समिति नोट करती  है कि न्यायकक्षों और कर्मचारियों की कमी, संविदा कर्मियों के बीच नौकरी छोड़ने की उच्च दर, बुनियादी ढांचे की बाधाएं और -कोर्ट प्रणाली के उन्नयन में देरी ने अधिकरण की समय पर मामलों का निपटारा करने की क्षमता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। अतः समिति यह सिफारिश करती है कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, एनसीएलटी, आईबीबीआई और अन्य हितधारकों के परामर्श से, अधिकरण द्वारा पहचानी गई प्रक्रियात्मक और संस्थागत बाधाओं को दूर करने के लिए लक्षित उपाय करे, जिनमें नोटिस जारी करने में देरी, जवाब दाखिल करने में देरी, अंतरिम आवेदनों के निपटान में देरी और न्यायिक, प्रशासनिक और डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ करना शामिल है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि एनसीएलटी वैधानिक समय-सीमाओं का अधिक से अधिक पालन सुनिश्चित करने के लिए सुदृढ़ मामला प्रबंधन पद्धतियों को अपनाए, लंबे समय से लंबित सीआईआरपी मामलों के निपटान को प्राथमिकता दे और समय-सीमा से अधिक समय से लंबित मामलों की समय-समय पर समीक्षा करे ताकि देरी के मूल कारणों की पहचान की जा सके और उचित सुधारात्मक उपाय किए जा सकें।

(पैरा 6.20)

 

54.       समिति का यह सुविचारित मत है कि एनसीएलटी के दिवालियापन संबंधी क्षेत्राधिकार का लगातार विस्तार होने से कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत उसकी समान रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में कोई कमी नहीं आनी चाहिए, जिनमें विलय और समामेलन, कॉर्पोरेट प्रशासन और हितधारकों के हितों की सुरक्षा से संबंधित मामले शामिल हैं। समिति यह भी नोट करती है कि दिवालियापन संबंधी मामलों के लिए विशेष और समयबद्ध निर्णय की आवश्यकता होती है और अब अधिकरण के कुल मामलों में से आधे से अधिक मामले इसी श्रेणी में आते हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय एनसीएलटी के भीतर पर्याप्त न्यायिक और तकनीकी सदस्यों, रजिस्ट्री सहायता और बुनियादी ढांचे के साथ समर्पित आईबीसी बेंच/वर्टिकल स्थापित करने की व्यवहार्यता की जांच करे। इस प्रकार का विशेष तंत्र दिवालियापन संबंधी मामलों के शीघ्र निपटान में सहायक होगा, साथ ही यह सुनिश्चित करेगा कि अधिकरण के कंपनी कानून क्षेत्राधिकार पर भी समान ध्यान दिया जाए।

(पैरा 6.24)

 

55.       समिति को यह देखकर प्रसन्नता हुई कि एनसीएलटी डिजिटल प्रक्रियाओं और सुनवाई के हाइब्रिड तरीकों को अपनाने वाले अग्रणी अधिकरणों में से एक के रूप में उभरा है, जिससे न्यायनिर्णय में सुगमता और दक्षता में वृद्धि हुई है। प्राप्त प्रगति की सराहना करते हुए, समिति अधिकरण द्वारा मौजूदा आईटी बुनियादी ढांचे की सीमाओं और प्रस्तावित एनसीएलटी 2.0 परियोजना के समयबद्ध कार्यान्वयन की आवश्यकता के संबंध में व्यक्त की गई चिंताओं को नोट करती है।

(पैरा 6.28)

 

56.       समिति सिफारिश करती है कि प्रस्तावित एनसीएलटी 2.0 परियोजना के त्वरित कार्यान्वयन को सक्षम बनाने के लिए अधिकरण के डिजिटल बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता के आधार पर सुदृढ़ किया जाए। कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय को परियोजना के अंतर्गत परिकल्पित डिजिटल पहलों के कार्यान्वयन हेतु अधिकरण को पर्याप्त और पूर्वानुमानित बजटीय सहायता सुनिश्चित करनी चाहिए। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि एनसीएलटी 2.0 के कार्यान्वयन के साथ-साथ मामले के रिकॉर्ड और सिस्टम की निरंतरता को सुरक्षित रखने के लिए एक सुदृढ़ आपदा निवारण तंत्र स्थापित किया जाए, और उन्नत प्लेटफॉर्म के संचालन और रखरखाव के लिए समर्पित तकनीकी कर्मचारियों की पर्याप्त नियुक्ति की जाए।

(पैरा 6.29)

57.       समिति का यह मत है कि अधिकरण के कुशल संचालन और न्याय की समयबद्ध डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त और आधुनिक न्यायिक अवसंरचना आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय, राष्ट्रीय कम्पनी विधि अधिकरण के परामर्श से, सभी एनसीएलटी बेंचों की अवसंरचना आवश्यकताओं का व्यापक मूल्यांकन करे और राष्ट्रीय न्यायालय प्रबंधन प्रणाली के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुरूप समर्पित न्यायालय परिसर और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए त्वरित कदम उठाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि अधिकरण की दक्षता, सुगमता और समग्र कार्यप्रणाली का संवर्धन करने के लिए मौजूदा बेंचों की अवसंरचना के उन्नयन को प्राथमिकता दी जाए।

(पैरा 6.31)

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आरकेके

 


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