विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
सीएसआईआर-आईआईपी, सीएसआईआर-सीआरआरआई और सीएसआईआर-एएमपीआरआई ने सतत सड़क अवसंरचना के लिए स्वदेशी बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया
- बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि एवं बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में परिवर्तित करती है
- यह प्रौद्योगिकी आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम कर आत्मनिर्भर भारत और परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था (सर्कुलर बायोइकोनॉमी) को बढ़ावा देती है
- सीएसआईआर-सीआरआरआई मार्च 2027 तक राष्ट्रीय बायो-बाइंडर परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करेगा
प्रविष्टि तिथि:
05 AUG 2026 10:25AM by PIB Dehradun
सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर-आईआईपी), देहरादून ने सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) तथा सीएसआईआर-उन्नत सामग्री एवं प्रक्रिया अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-एएमपीआरआई) के सहयोग से सतत सड़क अवसंरचना के लिए स्वदेशी हरित प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को गति देने के उद्देश्य से आयोजित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन कार्यक्रम में बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों तथा अनुसंधान सहयोगियों ने भाग लिया और प्रौद्योगिकी आधारित राष्ट्रीय विकास एवं सतत नवाचार को बढ़ावा देने पर बल दिया।

कार्यक्रम में सीएसआईआर-आईआईपी के निदेशक डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट, सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. सी. रवि शेखर, सीएसआईआर-एएमपीआरआई के निदेशक डॉ. थल्लाडा भास्कर, सीएसआईआर-आईआईपी से डॉ. वी. सी. एस. पल्ला एवं उनकी टीम, सीएसआईआर-सीआरआरआई से डॉ. जी. भरत एवं उनकी टीम तथा बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी के वाणिज्यिक विस्तार एवं क्रियान्वयन में सहयोग कर रहे उद्योग प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।
सभा को संबोधित करते हुए सीएसआईआर-आईआईपी के निदेशक डॉ. हरेंद्र सिंह बिष्ट ने कहा कि बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि एवं बायोमास अपशिष्ट को पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन के पर्यावरण-अनुकूल विकल्प में परिवर्तित कर सतत सड़क निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि यह प्रौद्योगिकी तीनों सीएसआईआर प्रयोगशालाओं के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है, जो आयातित पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करने, कृषि अवशेषों के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने, किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर सृजित करने तथा भारत को हरित एवं सतत अवसंरचना की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
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इस अवसर पर सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. सी. रवि शेखर ने कहा कि भारत के तीव्र गति से विस्तार कर रहे सड़क नेटवर्क की निर्भरता अभी भी आयातित बिटुमेन पर है। उन्होंने बताया कि बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी कृषि अवशेषों, विशेषकर धान की पराली एवं अन्य बायोमास अपशिष्ट को पाइरोलिसिस प्रक्रिया के माध्यम से बायो-ऑयल, बायो-बाइंडर, बायोचार तथा बायोगैस जैसे उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करती है। इस प्रक्रिया से प्राप्त बायो-बाइंडर लचीले सड़क निर्माण में पारंपरिक पेट्रोलियम आधारित बिटुमेन का प्रभावी विकल्प अथवा पूरक बन सकता है, जिससे आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को बल मिलेगा, परिपत्र अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा तथा कृषि अवशेष जलाने से होने वाले पर्यावरणीय प्रदूषण में कमी आएगी।
डॉ. रवि शेखर ने बताया कि सीएसआईआर-सीआरआरआई ने शिलांग के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग-40 पर निर्मित 100 मीटर लंबे बायो-बाइंडर परीक्षण खंड का दीर्घकालिक मूल्यांकन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। इन सफल परीक्षणों के आधार पर आंध्र प्रदेश सरकार ने बायो-बाइंडर आधारित सड़क निर्माण के लिए पाँच किलोमीटर लंबा मूल्यांकन कार्यक्रम प्रारंभ किया है। उन्होंने बताया कि सीएसआईआर-सीआरआरआई सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (एमओआरटीएच), भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) तथा भारतीय सड़क कांग्रेस (आईआरसी) के साथ मिलकर इस प्रौद्योगिकी के देशव्यापी उपयोग हेतु मानकीकृत तकनीकी विनिर्देश एवं कार्यान्वयन दिशा-निर्देश तैयार कर रहा है।
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने सीएसआईआर-सीआरआरआई में एक समर्पित राष्ट्रीय बायो-बाइंडर परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की है। मार्च 2027 तक संचालन प्रारंभ करने के लक्ष्य के साथ यह प्रयोगशाला व्यावसायिक रूप से निर्मित बायो-बाइंडरों के परीक्षण, प्रमाणीकरण, गुणवत्ता आश्वासन तथा सत्यापन की व्यापक सुविधाएं उपलब्ध कराएगी, जिससे इनके बड़े पैमाने पर उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।
सीएसआईआर-एएमपीआरआई के निदेशक डॉ. थल्लाडा भास्कर ने शून्य-अपशिष्ट जैव-रिफाइनरी की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा कि बायोमास आधारित प्रौद्योगिकियों की दीर्घकालिक सफलता प्रत्येक उत्पाद धारा से अधिकतम मूल्य प्राप्त करने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला स्तर पर अनुसंधान एवं प्रक्रिया विकास अपेक्षाकृत सरल है, किन्तु सफल व्यावसायीकरण के लिए ऐसे उत्पादों की पहचान आवश्यक है जो बाजार की मांग को पूरा करें, आयात प्रतिस्थापन को बढ़ावा दें तथा आर्थिक रूप से लाभकारी हों।

उन्होंने बताया कि बायो-बाइंडर प्रक्रिया को एक एकीकृत जैव-रिफाइनरी के रूप में विकसित किया गया है, जिसमें प्रत्येक प्रक्रिया धारा को व्यावसायिक रूप से उपयोगी उत्पाद में परिवर्तित किया जाता है। बायोमास पाइरोलिसिस से प्राप्त भारी कार्बनिक अंश का उपयोग बायो-बाइंडर निर्माण में किया जाता है, जबकि जलीय अंश से एक पेटेंट प्राप्त जैविक कीटनाशक तैयार किया गया है। इसके भंडारण, परिवहन एवं उपयोग को सरल बनाने के लिए इसे स्थायी पाउडर रूप में भी विकसित किया गया है, जिसका राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में मूल्यांकन किया जा चुका है और कृषि क्षेत्र में इसके व्यावसायीकरण की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।
डॉ. भास्कर ने विश्वास व्यक्त किया कि सीएसआईआर-एएमपीआरआई, सीएसआईआर-आईआईपी तथा सीएसआईआर-सीआरआरआई द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह एकीकृत जैव-रिफाइनरी मॉडल भारत में आयात प्रतिस्थापन को सुदृढ़ करेगा तथा बायोमास उपयोग का एक सतत एवं आर्थिक रूप से व्यवहार्य मॉडल स्थापित करते हुए आत्मनिर्भर भारत और परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को आगे बढ़ाएगा।
कार्यक्रम का समन्वयन डॉ. ज्योति पोरवाल ने किया। इस दौरान आरपीपीएम के प्रमुख डॉ. ओ. पी. खत्री, व्यवसाय विकास प्रमुख डॉ. अतुल रंजन, एमआरईडी प्रमुख डॉ. अजय कुमार तथा सीएसआईआर-आईआईपी के अन्य अधिकारियों ने भी सहयोग प्रदान किया।
कार्यक्रम के समापन पर सीएसआईआर-आईआईपी और सीएसआईआर-सीआरआरआई ने उद्योग सहयोगियों के सक्रिय सहयोग एवं सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। संस्थानों ने प्रयोगशाला से व्यावसायिक उपयोग तक बायो-बाइंडर प्रौद्योगिकी को सफलतापूर्वक पहुंचाने के लिए साझा प्रतिबद्धता दोहराते हुए आत्मनिर्भर एवं सतत भारत के निर्माण के प्रति अपने संकल्प को पुनः व्यक्त किया।
(रिलीज़ आईडी: 2294668)
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