पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
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संसद प्रश्न: वन संरक्षण योजनाएं

प्रविष्टि तिथि: 03 AUG 2026 5:28PM by PIB Delhi

वनों पर निर्भर समुदाय विभिन्न कार्यक्रमों और संस्थागत तंत्रों के माध्यम से वन संरक्षण और सतत वन प्रबंधन में सक्रिय रूप से शामिल हैं। राज्य सरकारों द्वारा गठित संरक्षित क्षेत्रों के आसपास संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (जेएफएमसी) और पर्यावरण विकास समितियों (ईडीसी) के माध्यम से स्थानीय समुदायों को शामिल करके सहभागी वन प्रबंधन को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है। ये संस्थाएं अवैध कटाई की रोकथाम, वन अग्नि प्रबंधन, वृक्षारोपण गतिविधियां, विक्षुब्ध वनों का पुनर्स्थापन और वन संसाधनों का सतत प्रबंधन जैसी वनों की सुरक्षा के लिए विभिन्न गतिविधियों में भाग लेती हैं।

इसके अलावा, अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006 पात्र वनवासी समुदायों को वन अधिकार प्रदान करता है और ग्राम सभाओं को सतत उपयोग के लिए सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, पुनर्जनन, संरक्षण और प्रबंधन करने का अधिकार देता है, जिससे वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका मजबूत होती है।

वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने और खराब हो चुकी वन भूमि को पुनर्स्थापित करने के लिए मंत्रालय विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों जैसे राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (जीआईएम), क्षतिपूर्ति वनीकरण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (कैंपा), नगर वन योजना, तटीय आवास और मूर्त आय के लिए मैंग्रोव पहल (मिष्टी) आदि के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

इसके अतिरिक्त, वन अग्नि पर राष्ट्रीय कार्य योजना, 2018 क्षमता निर्माण, आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग, सामुदायिक भागीदारी और वन अग्नि प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ करने के माध्यम से वन अग्नि की रोकथाम, पहचान, नियंत्रण और प्रबंधन के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान करती है। मंत्रालय, केंद्र प्रायोजित योजना 'वन अग्नि रोकथाम एवं प्रबंधन' के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वन अग्नि के एकीकृत प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

सरकार वन क्षेत्रों में खनन प्रस्तावों के पर्यावरणीय और पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 और अन्य लागू कानूनों एवं नियमों के तहत निर्धारित वैधानिक मूल्यांकन प्रक्रियाओं के माध्यम से करती है। वन क्षेत्रों में खनन प्रस्तावों की जांच प्रत्येक मामले के आधार पर की जाती है, जिसमें स्थल-विशिष्ट पारिस्थितिक विशेषताओं, वन्यजीवों और उनके आवासों पर संभावित प्रभावों और प्रस्तावित शमन उपायों को ध्यान में रखा जाता है।

भारत की वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2023 के अनुसार, देश का वन और वृक्ष आवरण 8,27,356.95 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है। आईएसएफआर 2021 के पिछले आकलन की तुलना में देश के वन और वृक्ष आवरण में 1445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत, महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों को कवर करने वाले राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण आरक्षित क्षेत्र और सामुदायिक आरक्षित क्षेत्रों का एक नेटवर्क पूरे देश में अधिसूचित किया गया है, ताकि वन्य जीवों और उनके आवासों का संरक्षण किया जा सके। संरक्षित क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 1134 हो गई है। इसके अलावा, 58 बाघ आरक्षित क्षेत्र और 33 हाथी आरक्षित क्षेत्र हैं। साथ ही, पारिस्थितिक संपर्क बनाए रखने के लिए 32 बाघ गलियारे और 150 हाथी गलियारे चिन्हित किए गए हैं।

वनभूमि का उपयोग गैर-वन संबंधी उद्देश्यों के लिए करना वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 और इसके अंतर्गत जारी नियमों एवं दिशा-निर्देशों के प्रावधानों के अधीन विनियमित है, जिनमें इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर परियोजनाएं भी शामिल हैं। वनभूमि के उपयोग से संबंधित प्रस्तावों की जांच वानिकी, वन्यजीव और पर्यावरण संबंधी दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए मामले-दर-मामले आधार पर की जाती है। ऐसे प्रस्तावों पर विचार करते समय, वनभूमि की आवश्यकता को कम करने और वनों के विखंडन को रोकने या कम करने पर जोर दिया जाता है।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री कीर्ति वर्धन सिंह ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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