विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
संसद प्रश्न: बायो ई3 नीति का कार्यान्वयन
प्रविष्टि तिथि:
23 JUL 2026 4:05PM by PIB Delhi
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2024 में देशभर में ‘उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने’ के लिए बायोई3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव-प्रौद्योगिकी) नीति को मंजूरी दी। इस नीति का उद्देश्य जैव-आधारित उत्पादों के विकास के लिए देश में एक सुदृढ़ जैव-विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
व्यापक राष्ट्रीय परामर्शों और क्षेत्रीय विशेषज्ञ बैठकों के माध्यम से जैव-विनिर्माण पहल के अंतर्गत कार्यान्वयन के लिए छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की गई। इन विषयगत क्षेत्रों के अंतर्गत, प्रस्तावों के लिए 11 आमंत्रण जारी किए गए और वित्त पोषण के लिए 2000 से अधिक प्रस्ताव प्राप्त हुए। कई चरणों की स्क्रीनिंग के साथ चयन समिति बैठकों के बाद, उत्पाद और प्रौद्योगिकी विकास के लिए दो श्रेणियों के अंतर्गत 270 से अधिक परियोजनाओं को वित्त पोषण हेतु अनुशंसित किया गया: खोज और अनुप्रयोग-उन्मुख नेटवर्क अनुसंधान तथा बड़े पैमाने पर विस्तार के लिए अंतर को पाटना। ये परियोजनाएँ वर्तमान में कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं।
इन क्षेत्रों को सुदृढ़ करने के लिए, बायो-एनाब्लर्स अर्थात बायो-आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) हब, बायो फाउंड्री और जैव-विनिर्माण हब देशभर में स्थापित किए जा रहे हैं। व्यवहार्य वाणिज्यिक जैव-आधारित उत्पादों के पायलट एवं पूर्व-वाणिज्यिक स्तर के जैव-विनिर्माण के लिए स्टार्ट-अप्स, एसएमई, उद्योगों और शिक्षाविदों को साझा बुनियादी ढांचे और सुविधाओं तथा संसाधनों तक पहुंच उपलब्ध कराने हेतु बायो फाउंड्री और जैव-विनिर्माण हब स्थापित करने के लिए अब तक प्रस्तावों हेतु दो आमंत्रण जारी किए गए हैं। छह विषयगत क्षेत्रों में 450 से अधिक प्रस्ताव प्राप्त हुए। अब तक, बायो-एनाब्लर्स पर पहले आमंत्रण के अंतर्गत 17 सुविधाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। डीबीटी और बायरेक ने भी बायोई3 नीति के अंतर्गत मूलांकुर बायो-एआई हब की स्थापना के लिए संयुक्त रूप से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इस आमंत्रण के उत्तर में कुल 284 आशय पत्र प्राप्त हुए और 15 बायो-एआई हब को सहायता के लिए अनुशंसित किया गया है। इन बायो एआई हब द्वारा राष्ट्रीय एआई अवसंरचना तक पहुंच के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं।
बायोई3 नीति को आगे बढ़ाने के लिए, विभाग ने बीआरआईसी-एनसीसीएस, पुणे में ‘उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए बायोई3-स्ट्रेन रिसोर्स सेंटर (एसआरसी)’ की स्थापना की है। बायोई3- एसआरसी वाणिज्यिक उपयोग के लिए ‘फ्रीडम-टू-ऑपरेट’ के साथ उच्च-प्रदर्शन वाले स्वदेशी सूक्ष्मजीवी स्ट्रेनों तक पहुंच प्रदान करता है, जिससे अप्रतिबंधित वाणिज्यिक उपयोग, तेज़ी से स्केल-अप, नियामक अनुपालन और भारत के भीतर आर्थिक मूल्य का संरक्षण संभव होता है। इस प्रकार बायोई3- एसआरसी आयातित स्ट्रेनों और प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को कम करके और जैव-आधारित उत्पादों के स्वदेशी जैव-विनिर्माण को सशक्त बनाकर मेक-इन-इंडिया पहल का समर्थन करता है।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग-डीबीटी ने अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष जैव- विनिर्माण में सहयोग के लिए इसरो के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए और प्रस्तावों के लिए एक संयुक्त आह्वान किया गया। इसरो-नासा सहयोग के माध्यम से तीन डीबीटी- बीआरआईसी अन्वेषकों ने एक्सिओम-4 मिशन में भाग लिया।
बायोई3 नीति के अंतर्गत केंद्र-राज्य साझेदारी को मजबूत करने के लिए, 7 फरवरी 2025 को नई दिल्ली में ‘बायोई3 नीति पर केंद्र-राज्य साझेदारी सम्मेलन’ आयोजित किया गया। सम्मेलन के दौरान हुई चर्चाओं में जैव-विनिर्माण के लिए राज्य-विशिष्ट विषयगत क्षेत्रों की पहचान करना, राज्य बायोई3 कार्य योजनाओं का निर्माण करना, राज्य में जैव-विनिर्माण गतिविधियों के समन्वय इकाइयों के रूप में संबंधित राज्य सरकारों द्वारा ‘बायोई3 प्रकोष्ठों’ की स्थापना करना, तथा बायोई3 नीति के अंतर्गत राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ क्षेत्रीय क्षमताओं का समायोजन करना शामिल था। अब तक असम, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश में बायोई3 प्रकोष्ठों को अधिसूचित किया जा चुका है। बड़े इलायची में कीट या रोगजनकों को नियंत्रित करने और रोग-सहिष्णु किस्मों के विकास एवं परीक्षण के लिए जैव-आधारित समाधान विकसित करने हेतु बीआरआईसी (आईबीआरआईसी) के संस्थानों और सिक्किम राज्य सरकार के एस&टी परिषद को शामिल करते हुए केंद्र-राज्य साझेदारी मॉडल में एक नेटवर्क प्रस्ताव को समर्थन प्रदान किया गया है।
एक राष्ट्रव्यापी प्रतियोगिता, जो ‘बायोई3 के लिए डि़जाइन’ के अंतर्गत वास्तविक जीवन की चुनौतियों के समाधान के लिए युवा नवप्रवर्तकों और देश के सभी नागरिकों की भागीदारी का आह्वान करते हुए दो श्रेणियों में आयोजित की गई (श्रेणी 1 कक्षा 6 से 12 तक के स्कूली छात्रों के लिए और श्रेणी 2 भारत के किसी भी नागरिक के लिए)। नवंबर 2025 से जून 2026 तक, श्रेणी 1 के अंतर्गत कुल 748 प्रविष्टियाँ और श्रेणी 2 के अंतर्गत 4,166 प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं।
व्यापक राष्ट्रीय परामर्शों और क्षेत्रीय विशेषज्ञ बैठकों के माध्यम से, जैव-विनिर्माण पहल के अंतर्गत कार्यान्वयन के लिए छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की गई। इनमें शामिल हैं (i) जैव-आधारित रसायन, बायोपॉलिमर, सक्रिय औषधीय घटक (एपीआई) और एंजाइम, (ii) स्मार्ट प्रोटीन और कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, (iii) प्रिसीजन बायोथेरेप्यूटिक्स, (iv) जलवायु-सहिष्णु कृषि, (v) कार्बन कैप्चर और उपयोग; तथा (vi) भविष्यवादी समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान।
डीबीटी और बीआईआरएसी ‘उत्पादन स्ट्रेन्स में जैव-आधारित रसायनों, बायोपॉलिमर और एपीआई के जैव-विनिर्माण’ के लिए उन परियोजनाओं का समर्थन कर रहे हैं जिनके पास व्यवसायीकरण के लिए ‘फ्रीडम- टू-ऑपरेट’ है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य चयनित जैव-आधारित रसायनों (इटाकोनिक एसिड, सक्सिनिक एसिड, स्क्वैलीन, रैम्नोलिपिड्स आदि), बायोपॉलिमर (पीएलए, पीएचए, नैनोसेलुलोज आदि) और एपीआई (एक्टिनोमाइसिन डी आदि) के लिए आयात विकल्प विकसित करना है। डीबीटी और बीआईआरएसी ‘एंजाइमों के जैव-विनिर्माण’ के लिए 18 परियोजनाओं का समर्थन कर रहे हैं। इन परियोजनाओं को तीन श्रेणियों के अंतर्गत स्वीकृति दी गई: (i) कम लागत वाले फीडस्टॉक्स को उच्च-मूल्य वाले कार्यात्मक जैव-अणुओं में परिवर्तित करने वाले एंजाइम, (ii) बायोमास-हाइड्रोलाइजिंग एंजाइम, और (iii) विशेष रसायनों तथा सक्रिय औषधीय घटकों (एपीआई) के उत्पादन के लिए एंजाइम।
‘स्मार्ट प्रोटीन’ क्षेत्र के अंतर्गत, तीन श्रेणियों में 9 परियोजनाओं को समर्थन दिया गया है: 1. किण्वन-व्युत्पन्न स्मार्ट प्रोटीन और एकल कोशिका प्रोटीन; 2. पौधा-आधारित स्मार्ट प्रोटीन; 3. कोशिका संवर्धन-आधारित स्मार्ट प्रोटीन। ये परियोजनाएँ टिकाऊ और बड़े पैमाने पर विस्तार योग्य वैकल्पिक प्रोटीन उत्पादन प्रौद्योगिकियों के विकास पर केंद्रित हैं, जिनमें नवीन स्वदेशी प्रोटीन स्रोत, उन्नत प्रोटीन निष्कर्षण और टेक्सचराइजेशन प्रौद्योगिकियाँ, तथा बेहतर पोषण, कार्यात्मक, संवेदी और वाणिज्यिक गुणों वाले मूल्यवर्धित प्रोटीन घटक शामिल हैं।
‘प्रिसीजन थेरेप्यूटिक्स’ के अंतर्गत, डीबीटी और बीआईआरएसी सीजीटी, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और एमआरएनए थेरेप्यूटिक्स के अनुसंधान एवं विकास तथा स्वदेशी विनिर्माण को सुगम बना रहे हैं। सीजीटी के अंतर्गत परियोजनाएँ प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट से लेकर आईएनडी-सक्षम अध्ययनों तक विस्तृत हैं, जिनमें नेत्र और न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों के लिए आईपीएससी-व्युत्पन्न उपचार, गैर-वायरल जीन डिलीवरी प्रणालियाँ और कैंसर के लिए उन्नत सीएआर-टी सेल थेरेपी के क्षेत्र शामिल हैं। एमआरएनए थेरेप्यूटिक्स के विषयगत उप-क्षेत्र में एमआरएनए डिलीवरी पर एक परियोजना को समर्थन दिया गया है और मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के क्षेत्र में क्रिप्टोकोकल मेनिन्जाइटिस, उन्नत-चरण के कैंसर और मेलियोइडोसिस की तीव्र पहचान के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित करने हेतु परियोजनाओं को समर्थन दिया गया है। इस क्षेत्र में कुल 27 परियोजनाएँ कार्यान्वयन के अंतर्गत हैं।
क्षेत्र के अंतर्गत, ‘जलवायु आधारित लचीली कृषि’ के लिए जैव-विनिर्माण में कुल 15 प्रस्तावों को समर्थन के लिए अनुशंसित किया गया है। ये परियोजनाएं पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार, जैव-संरक्षण या जैव-उत्तेजक गतिविधि के लिए पेप्टाइड्स, वनस्पति-आधारित उत्पादों आदि जैसे जैव-आधारित कृषि इनपुट्स; फसल वृद्धि के लिए सूक्ष्मजीवी संघटन निर्माण और समुद्री जैव-उत्तेजकों; जैविक तनाव सहनशीलता के लिए नए जीनों की पहचान हेतु पारंपरिक और स्थानीय किस्मों के उपयोग; फसल पौधों में जलवायु सहनशीलता प्रदान करने वाले लक्ष्य जीनों की पहचान और सत्यापन; इनपुट उपयोग दक्षता और फसल पौधों में जलवायु सहनशीलता के लिए जीनोम संपादन और जीनोमिक चयन पर केंद्रित हैं।
विभाग ने ‘कार्बन कैप्चर उपयोग’ क्षेत्र के अंतर्गत 37 परियोजनाएं लागू की हैं। बिंदु स्रोत उत्सर्जन से संबंधित सीसीयू परियोजनाओं में औद्योगिक प्रतिष्ठानों जैसे सीमेंट, इस्पात, बीईसीसीएस (बायोएनर्जी विद कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज) आधारित बायोरिफाइनरियों के लिए सीसीयूएस एकीकृत जैव-विनिर्माण समाधान उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। विभाग ने एकीकृत कार्बन कैप्चर और उसके उपयोग के माध्यम से जैव-विनिर्माण में उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए उद्योग और अकादमिक संस्थानों की 10 से अधिक साझेदारियों को भी समर्थन दिया है।
‘भविष्यगत समुद्री अनुसंधान’ क्षेत्र के अंतर्गत, सतत झींगा पालन, समुद्री एक्वाफीड विकास, सायनोबैक्टीरियल/सूक्ष्मशैवाल बायोमास का मूल्य संवर्धन, खाद्य समुद्री शैवाल की खेती और समुद्री शैवाल एक्वाकल्चर की वास्तविक समय निगरानी के लिए सेंसरों पर 11 परियोजनाओं को समर्थन दिया गया है। ‘भविष्यगत अंतरिक्ष अनुसंधान’ के अंतर्गत, अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी और जैव-विनिर्माण के क्षेत्र में इसरो-डीबीटी अवसर घोषणा के तहत प्राप्त 23 प्रस्तावों (डीबीटी से 15 और इसरो से 8) को कार्यान्वयन के लिए अनुशंसित किया गया है।
सार्वजनिक-निजी सह-निर्माण मॉडल बायोई3 नीति का एक अभिन्न हिस्सा है, जिसके अंतर्गत जैव-विनिर्माण पहल के कार्यान्वयन में अकादमिक संस्थानों, स्टार्टअप्स और उद्योगों में उपलब्ध विशेषज्ञता को एक साथ लाकर नवाचारपूर्ण अनुसंधान, पायलट-स्तरीय उत्पादन और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य जैव-आधारित उत्पादों के पूर्व-वाणिज्यिक विनिर्माण को गति दी जाएगी। इस पहल के तहत, डीबीटी अनुदान-सहायता के माध्यम से अकादमिक संस्थानों को समर्थन प्रदान करता है। बीआईआरएसी अनुदान-सहायता के माध्यम से स्टार्टअप्स और अकादमिक संस्थानों का समर्थन करता है तथा सह-वित्त पोषण और रॉयल्टी साझाकरण के माध्यम से एसएमई और उद्योगों को सहायता प्रदान करता है।
नीति के परिणामों की निगरानी के लिए एक प्रभावी कार्यान्वयन योजना तैयार की गई है। प्रस्तावों के मूल्यांकन और स्वीकृत परियोजनाओं की समय-समय पर समीक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग द्वारा अकादमिक और उद्योग दोनों क्षेत्रों के सदस्यों से युक्त विषय-क्षेत्र आधारित स्क्रीनिंग-सह-चयन समितियां, वित्तीय मूल्यांकन समिति और शीर्ष समिति का गठन किया गया है, जो प्रस्तावों के लिए जारी आह्वान के तहत प्राप्त प्रस्तावों का मूल्यांकन करेंगी।
यह जानकारी आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा दी गई।
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पीके/केसी/जेएस/डीए
(रिलीज़ आईडी: 2288590)
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