राज्यसभा सचिवालय
राज्यसभा की अधीनस्थ विधान समिति की 257वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति
प्रविष्टि तिथि:
21 JUL 2026 4:15PM by PIB Delhi
(i) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (प्रतिबद्धता) विनियम, 2024; (ii) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (परिनिर्धारण) विनियम, 2024; (iii) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (व्यापारावर्त या आय का अवधारण) विनियम, 2024; और (iv) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (धनीय शास्ति का अवधारण) मार्गदर्शक सिद्धांत, 2024 के संबंध में राज्य सभा की अधीनस्थ विधान संबंधी समिति का 257वां प्रतिवेदन
श्री मिलिंद मुरली देवरा ने संसद सदस्य की अध्यक्षता में राज्य सभा की अधीनस्थ विधान संबंधी समिति ने 21 जुलाई 2026 को राज्य सभा में (i) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (प्रतिबद्धता) विनियम, 2024; (ii) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (परिनिर्धारण) विनियम, 2024; (iii) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (व्यापारावर्त या आय का अवधारण) विनियम, 2024; और (iv) भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (धनीय शास्ति का अवधारण) मार्गदर्शक सिद्धांत, 2024 के संबंध में राज्य सभा की अधीनस्थ विधान संबंधी समिति का 257वां प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
समिति ने अपनी जांच के दौरान नियमों पर विस्तार से चर्चा की और कारपोरेट कार्य मंत्रालय तथा भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) के प्रतिनिधियों के विचार और सुझाव सुने।
समिति का प्रतिवेदन राज्य सभा की वेबसाइट https://sansad.in/rs/hi/committees/12?standing-committees पर उपलब्ध है।
समिति की सिफारिशें/समुक्तियां संदर्भ हेतु संलग्न हैं।
उपाबंध
समिति की सिफारिशें/समुक्तियां – एक नज़र में
प्रतिस्पर्धा कानून के ढांचे और विनियमों की समय-समय पर समीक्षा
1. समिति यह सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) को पूरे प्रतिस्पर्धा कानून ढांचे की नियामकीय संरचना की समय-समय पर व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। समिति सिफ़ारिश करती है कि इन समीक्षाओं में सभी संबंधित हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श किया जाए तथा वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप घरेलू ढांचे को व्यवस्थित रूप से बेंचमार्क किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारतीय बाजार प्रतिस्पर्धी, निष्पक्ष तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप बना रहे। समिति का मत है कि विशेष रूप से डिजिटल युग में हो रहे तीव्र परिवर्तनों के अनुरूप प्रतिस्पर्धा कानूनों का निरंतर अद्यतन होना आवश्यक है। अतः इन कानूनों को समय-समय पर अद्यतन किया जाना चाहिए, जिससे उभरती हुई नई समस्याओं एवं विशिष्ट चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सके।
पैरा 9 ( 9.2)
स्वत: संज्ञान मामलों में कमी एवं जन-जागरूकता तथा जनसंपर्क की आवश्यकता
2. यह नोट करते हुए कि समय के साथ प्रतिस्पर्धा कानून के प्रति जन-जागरूकता में वृद्धि हुई है, समिति का मत है कि इस दिशा में अभी और अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। समिति यह भी नोट करती है कि बाजार के विभिन्न प्रतिभागियों के बीच प्रतिस्पर्धा कानून के संबंध में प्रभावी जागरूकता से इस कानून का प्रवर्तन और अधिक सुदृढ़ एवं प्रभावी होगा। समिति यह भी समुक्ति करती है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों, स्टार्ट-अप्स तथा उभरते हुए व्यवसायों को प्रतिस्पर्धा कानून के सिद्धांतों एवं नियामकीय प्रक्रियाओं के संबंध में अपेक्षाकृत अधिक जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि वे प्रतिस्पर्धी बाजारों में प्रभावी भागीदारी कर सकें। समिति यह सिफ़ारिश करती है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) उद्योग मंडलों, व्यापार संघों और व्यावसायिक संगठनों के साथ और अधिक गहन सहभागिता स्थापित करते हुए अपने जागरूकता एवं संपर्क संबंधी कार्यक्रमों को निरंतर सुदृढ़ बनाए। इन प्रयासों में विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), स्टार्ट-अप्स तथा आम जनता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
समिति का मत है कि ऐसी पहलें स्वैच्छिक अनुपालन को बढ़ावा देने तथा विभिन्न क्षेत्रों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की संस्कृति विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। समिति का मानना है कि यदि इन व्यवस्थाओं के व्यावसायिक लाभों, प्रक्रियात्मक समय-सीमाओं तथा न्यायिक कार्यवाहियों में होने वाली बचत का व्यापक एवं प्रभावी प्रचार-प्रसार किया जाए, तो आयोग से इन कारपोरेट संस्थाओं को स्वैच्छिक अनुपालन के लिए प्रोत्साहन मिल सकेगा। साथ ही, इससे आम जनता भी प्रतिस्पर्धा-विरोधी समझौतों तथा मजबूत स्थिति के दुरुपयोग के मामलों की सूचना आयोग को दे पाएगी। यदि आवश्यकता पड़े, तो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को अपनी स्वतः संज्ञान लेने की शक्तियों का उपयोग भी जारी रखना चाहिए।
पैरा 9 ( 9.4 और 9.5)
लघु व्यवसायों, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), स्टार्ट-अप आदि को संरक्षण तथा प्रतिस्पर्धा कानूनों व विनियमों को सख्ती से लागू करना
3. समिति का विचार है कि एकाधिकार की प्रवृत्तियों का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव सबसे कम लाभान्वित क्षेत्रों, विशेषकर लघु व्यवसायों, एमएसएमई तथा स्टार्ट-अप्स पर पड़ता है। यह मानते हुए कि लघु व्यवसायों, एमएसएमई एवं स्टार्ट-अप्स आदि को प्रतिस्पर्धा करने की अपनी क्षमता की रक्षा के लिए प्रतिस्पर्धा संबंधी कानूनों के सतत एवं प्रभावी प्रवर्तन पर निर्भर रहने में सक्षम होना चाहिए, समिति सिफ़ारिश करती है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) उन्हें पर्याप्त संरक्षण प्रदान करे तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रतिस्पर्धा संबंधी कानूनों का कहीं अधिक दृढ़ता एवं प्रभावशीलता के साथ प्रवर्तन किया जाए, जिससे अनुचित अथवा प्रतिस्पर्धा-विरोधी आचरण के कारण पहले से ही अपेक्षाकृत कमजोर हितधारकों की स्थिति और अधिक प्रतिकूल न हो। समिति का विचार है कि बाजार में मुक्त प्रतिस्पर्धा तथा नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिस्पर्धा-विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना अनिवार्य है।
पैरा 9 ( 9.6)
बार-बार होने वाले उल्लंघन
4. समिति कारपोरेट संस्थाओं द्वारा प्रतिस्पर्धा संबंधी कानूनों एवं विनियमों के बार-बार किए जाने वाले उल्लंघनों के मुद्दे पर चिंता व्यक्त करती है। ऐसे बार-बार होने वाले उल्लंघनों को केवल 'व्यवसाय की लागत' मान लिए जाने का जोखिम रहता है,, जिससे कानूनों एवं विनियमों की निवारक प्रभावशीलता गंभीर रूप से कमजोर हो सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में समिति का विचार है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) को मौद्रिक दण्ड निर्धारण दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करना चाहिए, जिनमें बार-बार किए गए उल्लंघनों को एक गंभीर कारक माना गया है। इससे भविष्य में होने वाले उल्लंघनों के विरुद्ध निवारक प्रभाव सुनिश्चित किया जा सकेगा।
पैरा 9 ( 9.8)
दण्ड राशि की वसूली
5. समिति यह नोट कर प्रसन्न है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने विधिक रूप से प्रवर्तनीय/वसूली योग्य दण्ड राशि की वसूली में 98 प्रतिशत से अधिक की उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। तथापि, यह तथ्य कि आयोग द्वारा अधिरोपित दण्ड का एक बड़ा भाग अपीलीय न्यायालयों द्वारा स्थगित अथवा निरस्त कर दिया गया है, इस बात का संकेत देता है कि जांच प्रक्रिया, साक्ष्य संकलन तथा दण्ड निर्धारण की प्रक्रिया को और अधिक सुदृढ़ बनाए जाने की आवश्यकता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएँ, जिससे न्यायिक परीक्षण के दौरान भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के आदेशों की स्थिरता बेहतर हो सके तथा समग्र प्रक्रिया की प्रभावशीलता में वृद्धि सुनिश्चित हो सके।
पैरा 9 ( 9.10)
दण्ड राशि की गणना हेतु पारदर्शी कार्यप्रणाली
6. समिति यह नोट करती है कि दण्ड निर्धारण दिशानिर्देश, 2024 में प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 की विभिन्न धाराओं के उल्लंघन के मामलों में दण्ड राशि के निर्धारण की कार्यप्रणाली निर्धारित की गई है। पारदर्शिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समिति सिफ़ारिश करती है कि इन दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू किया जाए। साथ ही, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को अपने आदेशों में विस्तृत कार्यप्रणाली प्रदानकरनी चाहिए कि दण्ड राशि की गणना कैसे की जाए।
पैरा 9 ( 9.11)
क्षमता निर्माण एवं कौशल विकास
7. समिति नोट करती है कि तीव्र तकनीकी प्रगति, डिजिटलीकरण तथा नवीन युग के बाजारों के उद्भव ने प्रतिस्पर्धा के आकलन एवं उसके प्रवर्तन की प्रक्रिया को अत्यधिक जटिल बना दिया है। समिति आगे यह भी समुक्ति करती है कि बदलते बाजार की वास्तविकताओं का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए अधिकारियों को आवश्यक ज्ञान एवं कौशल से सुसज्जित करने हेतु सतत क्षमता निर्माण अपरिहार्य है। इसलिए, समिति यह सिफ़ारिश करती है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) अपने अधिकारियों के लिए संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से क्षमता निर्माण के प्रयासों को निरंतर सुदृढ़ करे। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेष रूप से उभरती प्रौद्योगिकियों, समकालीन प्रतिस्पर्धा संबंधी मुद्दों तथा अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। समिति का विचार है कि ऐसे प्रयासों से आयोग की संस्थागत क्षमता में वृद्धि होगी तथा वह प्रतिस्पर्धा संबंधी निरंतर जटिल होती जा रही चुनौतियों का अधिक प्रभावी एवं दक्षतापूर्वक सामना करने में सक्षम होगा।
पैरा 9 (9.12 और 9.13)
अंतर-नियामकीय समन्वय
8. समिति नोट करती है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा से संबंधित अनेक मुद्दे ऐसे हैं जो विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े होते हैं तथा जिनका विनियमन अलग-अलग वैधानिक एवं क्षेत्रीय नियामक संस्थाओं द्वारा किया जाता है। समिति यह भी नोट करती है कि प्रतिस्पर्धा (संशोधन) अधिनियम, 2023 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) तथा अन्य नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर सहयोग एवं समन्वय स्थापित करने के लिए एक सक्षम वैधानिक ढाँचा प्रदान किया गया है। इसलिए, समिति यह सिफ़ारिश करती है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) क्षेत्रीय नियामक संस्थाओं के साथ सहयोग के लिए संस्थागत तंत्र तलाश करे, जिसमें, जहाँ कहीं भी उचित हो,समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करना भी शामिल हो। ऐसे सहयोगात्मक तंत्रों से सूचना के आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलेगा, नीतिगत सामंजस्य सुनिश्चित होगा तथा साझा हित के विषयों पर नियामक समन्वय स्थापित किया जा सकेगा।
पैरा 9 (9.14 और 9.15)
बाजार अध्ययन
9. समिति नोट करती है कि बाजार अध्ययन बाजार की संरचना, व्यावसायिक व्यवहार, उभरती प्रवृत्तियों तथा प्रतिस्पर्धा संबंधी चिंताओं की बेहतर समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समिति आगे यह भी समुक्ति करती है कि ऐसे अध्ययन प्रतिस्पर्धा कानून के प्रभावी प्रवर्तन, जन-जागरूकता तथा नीतिगत निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार एवं उपयोगी इनपुट उपलब्ध कराते हैं। समिति, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) द्वारा समय-समय पर किए गए बाजार अध्ययनों की सराहना करते हुए सिफ़ारिश करती है कि आयोग ऐसे अध्ययनों को एक सुव्यवस्थित एवं नियमित प्रक्रिया के रूप में निरंतर संचालित करता रहे। समिति का विचार है कि इससे साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण को और अधिक सुदृढ़ता मिलेगी तथा प्रतिस्पर्धी एवं सक्षम बाजारों के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
पैरा 9 ( 9.16)
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आरकेके
(रिलीज़ आईडी: 2287063)
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