विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
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डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और लंदन स्थित वेलकम ट्रस्ट की संयुक्त निधियों से ‘बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम’ (बीआरसीपी) का तीसरा चरण शुरू किया


जैव प्रौद्योगिकी विभाग के 1,000 करोड़ रुपये तथा वेलकम ट्रस्ट, ब्रिटेन के 500 करोड़ रुपये के योगदान के साथ, 1,500 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय से बीआरसीपी का तृतीय चरण फेलोशिप एवं अनुसंधान अनुदानों के लिए निरंतर सहयोग सुनिश्चित करेगा ताकि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव-चिकित्सा अनुसंधान कार्यबल की सहायता की जा सके: डॉ. जितेन्‍द्र सिंह

अगली औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व जैव प्रौद्योगिकी करेगी और भारत इसके नेतृत्व के लिए पूरी तरह तैयार है: डॉ. जितेन्‍द्र सिंह

सरकार द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव-चिकित्सा अनुसंधान कार्यबल को मजबूत किए जाने के साथ भारत की जैव-अर्थव्यवस्था वर्ष 2030 तक 300 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की ओर अग्रसर है: डॉ. जितेन्‍द्र सिंह

प्रविष्टि तिथि: 15 JUL 2026 5:09PM by PIB Delhi

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने आज ‘बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम’ (बीआरसीपी) के तीसरे चरण का शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम का कुल परिव्यय 1,500 करोड़ रुपये है, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा 1,000 करोड़ रुपये तथा ब्रिटेन स्थित वेलकम ट्रस्ट द्वारा 500 करोड़ रुपये का योगदान दिया जाएगा।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी भारत की आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक उन्नति और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के अगले चरण की प्रमुख प्रेरक शक्ति बनने जा रही है। उन्होंने कहा कि भारत अब केवल जैव प्रौद्योगिकी क्रांति में भागीदार नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में उभरता हुआ वैश्विक अग्रणी देश बन रहा है।

डॉ. सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में जबरदस्‍त बदलाव आया है और यह लगभग बीस गुना बढ़ गई है। वर्ष 2014 में इसका आकार 10 अरब अमेरिकी डॉलर था, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 195 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया है और वर्ष 2030 तक इसके 300 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। उन्होंने कहा कि आज भारत में लगभग 12,000 जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप कार्यरत हैं, देश विश्व के अग्रणी वैक्सीन निर्माताओं में शामिल है तथा वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी केन्‍द्र के रूप में अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रहा है।

डॉ. सिंह ने एक समारोह में सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट द्वारा डीबीटी-वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस के माध्यम से संयुक्त रूप से संचालित इस प्रमुख कार्यक्रम का शुभारंभ किया। समारोह में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव एवं बीआरआईसी के महानिदेशक प्रो. राजेश एस. गोखले, ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की उपाध्यक्ष प्रो. डेम फियोना पॉवरी, डीबीटी-वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अपूर्वा सरीन, बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ एवं स्ट्रैटेजिक एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य, प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के प्रमुख, जैव-चिकित्सीय शोधकर्ता तथा बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम के लगभग 80 पुरस्कार विजेता शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान तीसरे चरण का औपचारिक शुभारंभ किया गया। साथ ही, इस पहल से अपने वैज्ञानिक करियर को नई दिशा देने वाले शोधकर्ताओं के साथ संवाद आयोजित किया गया तथा कार्यक्रम की वैज्ञानिक उपलब्धियों और इसके दीर्घकालिक प्रभाव को प्रदर्शित करने वाली प्रस्तुतियाँ भी दी गईं।

जैव प्रौद्योगिकी को उभरती वैश्विक ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक क्षेत्रों में से एक बताते हुए डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने कहा कि यह विषय अब केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक नीतियों, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय विकास रणनीतियों को भी प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी को तेजी से अगली औद्योगिक क्रांति की आधारशिला के रूप में मान्यता मिल रही है, जिससे वैज्ञानिक अनुसंधान, उद्यमिता और उन्नत विनिर्माण के माध्यम से वैश्विक नवाचार का नेतृत्व करने की दिशा में भारत एक मजबूत स्थिति में है।

डॉ. सिंह ने कहा कि बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम अब सिर्फ़ एक फ़ेलोशिप पहल से कहीं आगे बढ़ चुका है और इसने भारत के सबसे सम्मानित वैज्ञानिक करियर प्लेटफ़ॉर्म में से एक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। कार्यक्रम के दौरान इससे फ़ायदा उठाने वाले कई लोगों से हुई बातचीत का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस पहल ने न सिर्फ़ आर्थिक मदद देकर, बल्कि वैज्ञानिकों की साख, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान और पेशेवर मौकों को बेहतर बनाकर उन्हें मज़बूत किया है। उन्होंने कहा कि पिछले अठारह वर्षों में यह प्रोग्राम एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में विकसित हुआ है, जो लगातार वैज्ञानिक उत्कृष्टता को बढ़ावा दे रहा है और उसे निखार रहा है।

डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने भारत सरकार और वेलकम ट्रस्ट के बीच साझेदारी को लंबे समय तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग और परोपकार का एक बेहतरीन उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह प्रोग्राम दिखाता है कि कैसे लंबी अवधि की साझेदारियां वैज्ञानिक खोजों को तेज़ कर सकती हैं, विश्व-स्तरीय मानव संसाधन तैयार कर सकती हैं और ऐसे रिसर्च इकोसिस्टम बना सकती हैं जो राष्ट्रीय और वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में सक्षम हों। उन्होंने परोपकारी संस्थाओं और उद्योग से भी ज़्यादा भागीदारी की अपील की। ​​उन्होंने कहा कि हालांकि भारत में वैज्ञानिक प्रतिभा और नए-नए विचार भरपूर हैं, फिर भी रिसर्च को टेक्नोलॉजी, डायग्नोस्टिक्स और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं में बदलने के लिए लगातार आर्थिक साझेदारी बहुत ज़रूरी है।

पिछले दशक में भारत के वैज्ञानिक बदलाव का ज़िक्र करते हुए, मंत्री ने कहा कि देश ने एक ऐसा शानदार सफ़र तय किया है जिसमें पहले उसकी हेल्थकेयर क्षमताओं को दुनिया में बहुत कम पहचान मिलती थी, लेकिन अब वह प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और वैक्सीन डेवलपमेंट में एक भरोसेमंद लीडर बन गया है। उन्होंने इस तरक्की का श्रेय रिसर्च में लगातार निवेश, मज़बूत पॉलिसी सपोर्ट, शानदार स्टार्टअप इकोसिस्टम और सरकार, एकेडेमिया और इंडस्ट्री के बीच बढ़ते सहयोग को दिया।

डॉ. जितेन्‍द्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्‍द्रीय कैबिनेट ने बीआरसीपी के तीसरे चरण को मंज़ूरी दी है। इसके लिए कुल 1,500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है, जिसमें बायोटेक्नोलॉजी विभाग से 1,000 करोड़ रुपये और वेलकम ट्रस्ट से 500 करोड़ रुपये शामिल हैं, ताकि फेलोशिप और अनुसंधान अनुदान के लिए लगातार मदद मिलती रहे। उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम का मकसद एक ऐसी बायोमेडिकल रिसर्च वर्कफोर्स तैयार करना है जो दुनिया भर में मुकाबला कर सके। इसमें बेसिक साइंटिस्ट, क्लिनिशियन-रिसर्चर, पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट, साइंस कम्युनिकेटर और रिसर्च मैनेजर शामिल होंगे। साथ ही, इसका मकसद इंटरडिसिप्लिनरी और सहयोगी रिसर्च के लिए ज़्यादा मौके पैदा करना भी है। उन्होंने आगे कहा कि इस पहल से नए परोपकारी और अंतरराष्ट्रीय पार्टनरशिप भी आकर्षित होंगी, जिससे बायोमेडिकल साइंस में भारत के निवेश का असर कई गुना बढ़ जाएगा।

केन्‍द्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार ने अग्रणी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए लगातार एक अनुकूल नीतिगत वातावरण तैयार किया है। हाल के सुधारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने परमाणु चिकित्सा सहित रणनीतिक अनुसंधान के क्षेत्रों में निजी भागीदारी के अवसरों का विस्तार किया है, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में नवाचार को उल्लेखनीय मजबूती मिलेगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वैज्ञानिक विकास के शुरुआती चरणों से ही अनुसंधान संस्थानों, उद्योगों और स्टार्टअप्स के बीच घनिष्ठ सहयोग स्थापित करने से प्रयोगशालाओं में हुई खोजों को समाज के हित में उपयोगी उत्पादों और प्रौद्योगिकियों में बदलने की प्रक्रिया तेज होगी।

ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की उपाध्यक्ष प्रो. डेम फियोना पॉवरी ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग और वेलकम के बीच पिछले अठारह वर्षों से चली आ रही साझेदारी इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार अंतरराष्ट्रीय सहयोग विज्ञान को सशक्त बना सकता है और वैश्विक स्वास्थ्य में सुधार ला सकता है। उन्होंने कहा कि विज्ञान की प्रगति विभिन्न विषयों, संस्थानों और देशों के बीच सहयोग से होती है, जबकि सार्थक स्वास्थ्य परिणाम स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किए गए समाधानों पर निर्भर करते हैं। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के तीसरे चरण में अंतर्विषयक और टीम-आधारित अनुसंधान पर अधिक जोर दिया गया है, जो जटिल जैव-चिकित्सीय चुनौतियों का समाधान करने और वैज्ञानिक खोजों को व्यावहारिक स्वास्थ्य सेवाओं में परिवर्तित करने में सक्षम है। उन्होंने इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि इसके माध्यम से सैकड़ों शोधकर्ताओं को सहयोग मिला है तथा हजारों युवा वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है, जो आज विश्व-प्रसिद्ध संस्थानों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव एवं बीआरआईसी के महानिदेशक प्रो. राजेश एस. गोखले ने कहा कि वर्ष 2008 में अपनी शुरुआत के बाद से बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम विभाग की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में से एक बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम ने वैज्ञानिक नेतृत्व विकसित करने, अनुसंधान संस्थानों को सशक्त बनाने तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव-चिकित्सीय शोधकर्ताओं को तैयार करने में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम के तीसरे चरण के लिए दीर्घकालिक स्वीकृति ढांचा इसे निरंतरता और स्थिरता प्रदान करेगा, जिससे विकसित भारत 2047 की कल्‍पना के अनुरूप वैज्ञानिक प्रतिभाओं और उत्कृष्ट अनुसंधान में दीर्घकालिक निवेश सुनिश्चित हो सकेगा।

वर्ष 2008 में शुरू किए गए बायोमेडिकल रिसर्च करियर प्रोग्राम के तहत अब तक 500 से अधिक शोधकर्ताओं को सहयोग प्रदान किया गया है, 200 से अधिक संस्थानों में जैव-चिकित्सीय अनुसंधान को मजबूत किया गया है, हजारों विद्यार्थियों और शुरुआती करियर के वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया गया है तथा वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल की गई हैं। कार्यक्रम का तीसरा चरण विभिन्न करियर चरणों में उत्कृष्ट शोधकर्ताओं को अधिक व्यापक सहयोग प्रदान करेगा, सहयोगात्मक एवं अनुप्रयुक्त (ट्रांसलेशनल) अनुसंधान को बढ़ावा देगा, भारत के जैव-चिकित्सीय नवाचार इकोसिस्‍टम को मजबूत करेगा तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकियों, निदान (डायग्नोस्टिक्स) और स्वास्थ्य सेवा समाधानों के विकास में तेजी लाते हुए वैश्विक वैज्ञानिक नेतृत्व के क्षेत्र में भारत की स्थिति को और सुदृढ़ करेगा।

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पीके/केसी/केपी/एसएस


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