लोकसभा सचिवालय
azadi ka amrit mahotsav

विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 409 वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:54PM by PIB Delhi

श्री भुबनेश्वर कालिता, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की अनुदान मांगों (2026-27) के संबंध में अपना 409वां प्रतिवेदन 25 मार्च, 2026 को संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया/सभा पटल पर रखा। समिति ने 24 मार्च, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में प्रारूप प्रतिवेदन पर विचार किया और उसे स्वीकार किया। समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई सिफारिशें समुक्तियां संलग्न हैं।

2.         संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs पर भी उपलब्ध है।

सिफारिशें/समुक्तियां - एक नज़र में

वित्तीय वर्ष 2025- 26 के लिए समग्र बजटीय विवरण )बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविक व्यय ( और वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए आवंटन

     समिति समुक्ति करती ​​है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए विभाग द्वारा निधि का कुल उपयोग, संशोधित अनुमान 2025-26 का 11,921.58 करोड़ के आवंटन का लगभग 59.95% है। समिति यह भी समुक्ति करती ​​है कि बजट अनुमान आवंटन 28,508.90 करोड़ को संशोधित अनुमान में घटाकर 11,921.58 करोड़ कर दिया गया था; इसका मुख्य कारण आरडीआई योजना में आवंटन को बीई के 20,000 करोड़ से घटाकर आरई में 3,000 करोड़ करना था। हालाँकि समिति इस बात को नोट करती है कि इस योजना को आधिकारिक तौर पर नवंबर 2025 में शुरू किया गया था, लेकिन सच यह है कि इस योजना के अंतर्गत किसी भी निधि का उपयोग नहीं किया जा सका और 31 जनवरी 2026 तक इस मद के तहत वास्तविक व्यय शून्य ही रहा। इसलिए, समिति यह सिफ़ारिश करती है कि विभाग को अपनी योजनाओं के लिए बीई की माँग करते समय एक यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। सभी नई योजनाओं के लिए दिशानिर्देश और प्रशासनिक ढाँचे, उनके संबंधित बजट की माँग करने से पहले ही तय कर लिए जाने चाहिए, ताकि प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक देरी के कारण आरई चरण में निधि में भारी कटौती हो।    

                            (पैरा 2.7)

 

     समिति मिशन की अवधि को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ाए जाने को नोट करती है। समिति अपेक्षा करती है कि मिशन के लिए आवश्यक निधि को जल्द से जल्द आवंटित कर दिया जाएगा। समिति सिफ़ारिश करती है कि विभाग मौजूदा 47 पेटाफ्लॉप्स अवसंरचनाओं के रखरखाव और उसे बनाए रखने को सुनिश्चित करे, और यह सुझाव देती है कि विभाग एनएसएम के अगले चरण पर विचार करे और अगली पीढ़ी की एक्सास्केल कंप्यूटिंग के लिए एक रोडमैप तैयार करे।

(पैरा 2.10)

 

     समिति उपरोक्त चार्ट में देखती है कि हाल के वर्षों में पहली बार, 2026–27 के लिए कुल बजट अनुमान (बीई) (28,049.32 करोड़) पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में लगभग 459 करोड़ की मामूली गिरावट दर्शाता है। यद्यपि यह कमी पूर्ण रूप में मामूली है, यह पिछले वर्षों में लगातार बढ़ते रुझान से विचलन को दर्शाती है और इसलिए मौजूदा वित्तीय प्राथमिकताओं और संसाधन तर्कसंगतता के संदर्भ में इसे सावधानीपूर्वक विचार करने योग्य बनाती है।                                             (पैरा 2.12)

    

     समिति इस निरंतर वृद्धि को क्वांटम तकनीकों को सरकार द्वारा एक महत्वपूर्ण और उभरते हुए क्षेत्र के रूप में दी गई कार्यनीतिक प्राथमिकता का प्रतीक मानती है। समिति आशा करती है कि वैज्ञानिक नेतृत्व, तकनीकी संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए दीर्घकालिक महत्व रखने वाली उन्नत और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों में राष्ट्रीय क्षमताओं को सुदृढ़ करने के इस महत्वपूर्ण मिशन हेतु, सरकार का पर्याप्त बजटीय सहयोग भविष्य में भी जारी रहेगा।                                            (पैरा 2.14)

 

अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) निधि

     समिति इस बात को स्वीकार करती है कि टीडीबी और बाइरैक का द्वितीय स्तर निधि प्रबंधकों (एसएलएफएम) के रूप में नामांकन आरडीआई निधि के अंतर्गत एक सकारात्मक शुरुआत है। विभाग वर्तमान वित्त वर्ष 2025-26 (दिनांक 31.01.2026 तक) में 3,000 करोड़ के आरई आवंटन में से किसी भी धनराशि का उपयोग नहीं कर सका। समिति सिफारिश करती है कि वित्त वर्ष 2026-27 में, विभाग को शीघ्र शुरुआत करनी चाहिए और निजी क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों और वेंचर कैपिटल फर्मों से अतिरिक्त एसएलएफएम के चयन और नियुक्ति में तेजी लाए। निधि प्रबंधन पूल में विविधता लाने से योजना की पहुंच विभिन्न उद्योग क्षेत्रों में बढ़ेगी और यह सुनिश्चित होगा कि परियोजनाओं का मूल्यांकन प्रक्रिया तकनीकी रूप से तीव्र और वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य दोनों हो।           (पैरा 4.6)

 

समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग त्रैमासिक वितरण और प्रगति समीक्षा तंत्र स्थापित करे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि विशाल कोष का पूरे वर्ष प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाए, वर्ष के बीच में इसे वापस करने से बचा जा सके और औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास की गति बनी रहे साथ ही आरडीआई के लिए आवंटित निधियों का भी अधिकतम उपयोग किया जाए।       

(पैरा 4.7)

     यह ध्यान में रखते हुए कि आरडीआई निधि विशेष रूप से प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (टीआरएल) 4 और उससे ऊपर को लक्षित करता है, समिति सिफारिश करती है कि विभाग को उन परियोजनाओं के लिए स्पष्ट व्यवसायीकरण मीट्रिक परिभाषित करना चाहिए जिनका वह वित्त पोषण करता है। आरडीआई निधि की सफलता को केवल वितरित पूंजी की राशि से नहीं बल्कि उन स्वदेशी प्रौद्योगिकियों की संख्या से मापा जाना चाहिए जो सफलतापूर्वक प्रयोगशाला से व्यावसायिक बाजार में स्थानांतरित होती हैं। विभाग को उन परियोजनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनका उत्पादन की और मार्ग स्पष्ट है, विशेष रूप से सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा जैसे 'उभरते हुए (सूर्योदय) क्षेत्रों' में।                                                                                             (पैरा 4.8)

 

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन

     समिति एएनआरएफ के तहत विभाग द्वारा शुरू किए गए काम पर ध्यान देती है। हालाँकि, समिति यह भी समुक्ति करती है कि मौजूदा वित्त वर्ष 2025-26 के लिए, विभाग 1,948 करोड़ के आरई आवंटन में से केवल 1,191 करोड़ (31.01.2026 तक) का ही उपयोग कर पाया है, जो आरई का केवल 61.13% है। समिति को इस बात की आशंका है कि क्या विभाग मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान आवंटित राशि को उपयोग कर पाएगा। इसलिए समिति सिफ़ारिश करती है कि विभाग को देश के अनुसंधान ढाँचे को मज़बूत करने के लिए, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान उसे उपलब्ध कराई गई निधि का इष्टतम उपयोग के प्रयास करने चाहिए।                                                                      (पैरा 5.9)

     समिति त्वरित नवाचार और अनुसंधान के लिए साझेदारी (पीएआईआर) और इसके हब-एंड-स्पोक मॉडल की सफल शुरुआत की सराहना करती है। हालांकि, विज्ञान को वास्तव में लोकतांत्रिक बनाने के लिए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग स्पोकनेटवर्क में प्रत्येक महत्वाकांक्षी जिले से कम से कम एक राज्य विश्वविद्यालय या कॉलेज शामिल किये जाने के लिए इसका विस्तार करने का लक्ष्य निर्धारित करे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मेंटर-मेंटी संबंध अभिजात संस्थानों तक सीमित रहकर राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के मूल स्तर तक पहुंचे।                                                    (पैरा 5.11)

     समिति एनआरएफ को सोशल स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध करने की योजना को वैज्ञानिक वित्त पोषण के लिए एक अग्रणी कदम मानती है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग को इस सूचीकरण के लिए आवश्यक कानूनी और वित्तीय ढाँचे को अंतिम रूप देने को प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे फाउंडेशन को वैश्विक सीएसआर निधि और भारतीय डायस्पोरा के योगदान तक पहुँचने का अवसर मिलेगा, जिससे एक विविध और सतत वित्त पोषण आधार बन सकेगा, जो वार्षिक बजटीय अनुदानों पर कम निर्भर होगा।                                                                                     (पैरा 5.12)

विज्ञान धारा

     समिति 'विज्ञान धारा' के अंतर्गत निधि के उपयोग से संतुष्ट है, जो आरई 2025-26 का लगभग 83.54% है। समिति का मानना ​​है कि इस एकीकृत योजना के तहत वित्तपोषण की स्थिरता, मुख्य पहलों की निरंतरता सुनिश्चित करती है; इनमें बाहरी शोध सहायता, फेलोशिप और छात्रवृत्ति कार्यक्रम शामिल हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि शिक्षा जगत, सरकार और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाने पर कार्यनीतिक रूप से ध्यान दिया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वैज्ञानिक शोध, बाज़ार के लिए तैयार तकनीकों में परिवर्तित हो सके।                                                                  (पैरा 6.7)

     समिति यह भी अपेक्षा करती है कि वित्त वर्ष 2026-27 में, विभाग उसी गति से काम करेगा और विश्वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्थानों में आधारभूत अनुसंधान पारितंत्र और संस्थागत क्षमताओं को मज़बूत करने के लिए आवंटित निधियों का अधिकतम उपयोग करेगा।                                                                  (पैरा 6.8)

     समिति नोट करती है कि एसईईडी योजना के तहत स्वीकृत परियोजनाओं से संबंधित जानकारी, जिसमें एसयूएनआईएल कार्यक्रम भी शामिल है, विभाग की वेबसाइट पर अद्यतित नहीं है। समिति सिफारिश करती है कि इस दिशा में पारदर्शिता लाई जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संपूर्ण जानकारी सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध हो; इसमें प्राप्त प्रस्तावों की कुल संख्या और स्वीकृत प्रस्तावों की जानकारी भी शामिल हो। इसके अतिरिक्त, एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जाए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जिन आवेदकों के अनुरोध स्वीकृत नहीं हुए हैं, उन्हें इस निर्णय के बारे में विधिवत सूचित किया जाए।                                                                           (पैरा 6.9)

 

अंतर्विषयी साइबर भौतिक प्रणाली संबंधी राष्ट्रीय मिशन (एनएम-आईसीपीएस)

     समिति समुक्ति करती है कि एनएम-आईसीपीएस का वित्तीय मार्गक्रमण कार्यान्वयन की प्रगति और टीपीई समीक्षा के आधार पर कोषों को कार्यनीतिक 'सही आकार' दिये जाने को दर्शाता है।  समिति भारतजेन द्वारा सभी 22 आधिकारिक भाषाओं के लिए टेक्स्ट सेवाएं पूरी करने के महत्वपूर्ण पड़ाव की भी सराहना करती है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग को मॉडल विकास से पारितंत्र सक्षम करने की दिशा में बढ़ना चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि भारतजेन एपीआई सैंडबॉक्स शुरू किये जाने पर विचार किया जाए ताकि भारतीय स्टार्टअप और सरकारी विभाग (जैसे, कृषि, स्वास्थ्य, न्याय) इन संप्रभु आधारभूत मॉडलों पर स्थानीयकृत, बहुभाषी अनुप्रयोग बनाने के लिए सक्षम हो सकें। इससे यह सुनिश्चित होगा कि एआई में किया गया सार्वजनिक निवेश नागरिक-केंद्रित ठोस सेवाओं में परिवर्तित हो।                                                          (पैरा 7.6)

 

     समिति चार टीआईएच (आईआईएससी, आईआईटी-के, आईएसएम धनबाद, और आईआईटी इंदौर) के टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशनल रिसर्च पार्क्स (टीटीआरपी) में सफलतापूर्वक उन्नयन की सराहना करती है। यह सिफारिश की जाती है कि विभाग को शेष 21 टीआईएच के लिए एक पारदर्शी, योग्यता-आधारित मार्ग स्थापित करना चाहिए। अगले 3 से 5 हब के समूह को टीटीआरपी का दर्जा देने के लिए तकनीकी तैयारी स्तर (टीआरएल) और निजी क्षेत्र के निवेश के आधार पर प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन का उपयोग किया जाना चाहिए। यह परिवर्तन शैक्षणिक अनुसंधान से औद्योगिक पैमाने पर अनुप्रयोग की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है।                                                       (पैरा 7.7)

 

2026-26 के दौरान विभाग के अधीन स्वायत्त संस्थाओं का प्रदर्शन

समिति नोट करती है कि विगत तीन वित्तीय वर्षों को दौरान, स्वायत्त संस्थानों (एआई) ने उन्हें किए गए आवंटन का अधिकतर व्यय कर दिया है। समिति आशा करती है कि ये संस्थान इसी गति को बनाए रखेंगे और अगले वित्तीय वर्ष के दौरान उन्हें आवंटित निधियों का इष्टतम उपयोग करेंगे, साथ ही अपेक्षित भौतिक परिणामों की प्राप्ति भी सुनिश्चित करेंगे।                                                     (पैरा 8.4)

     समिति जैव चिकित्सा प्रौद्योगिकी विकास को आगे बढ़ाने, उद्योग सहयोग को बढ़ावा देने और अनुसंधान को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य उत्पादों में बदलने में एससीटीआईएमएसटी के प्रयासों की सराहना करती है। इन घटनाक्रमों के प्रभाव को देखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग स्वास्थ्य देखभाल लागत और आयात निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार के सभी अस्पतालों में दूसरी पीढ़ी के टाइटेनियम चित्रा हार्ट वाल्व के लिए एक खरीद नीति बनाए। समिति हार्ट फेलियर बायो-बैंक और आनुवांशिक अध्ययनों को एक डिजिटल वेधशाला में परिवर्तित करने की भी सिफारिश करती है जो सटीक औषधि के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को वास्तविक समय में जीनोमिक डेटा प्रदान करती हो।                                                   (पैरा 8.8)

     समिति ऊर्जा भंडारण, नैनोपदार्थ, इंजीनियर्ड कोटिंग्स, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, और उन्नत पाउडर धातुकर्म जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अनुसंधान को आगे बढ़ाने में एआरसीआई के महत्वपूर्ण योगदान को मानती है। समिति ने सिविलियन हैवी-ड्यूटी वाली गैस टरबाईन और औद्योगिक भट्टियों में ऊर्जा दक्षता सुधारने के लिए स्क्रैमजेट इंजन के लिए विकसित उच्च-कार्य निष्पादन थर्मल बैरियर कोटिंग्स (टीबीसी) का उपयोग शुरू किये जाने की सिफारिश करती है। यह भी सिफारिश की गई है कि 1 किलोवॉट क्षार इलेक्ट्रोलाइज़र प्रौद्योगिकी का बड़े मॉड्यूलर सिस्टम में उन्नयन किया जाए ताकि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के सहयोग से हरित हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशनों में फील्ड परीक्षण किया जा सके।                                                                (पैरा 8.11)

     समिति एआरआई द्वारा जैव विविधता, जैव ऊर्जा, जैव पूर्वेक्षण, विकासात्मक जीव विज्ञान, आनुवंशिकी और पौधों की प्रजनन और नैनो-जैवविज्ञान के क्षेत्रों में किए गए महत्वपूर्ण उपलब्धियों की सराहना करती है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग कृषि मंत्रालय के साथ एक औपचारिक साझेदारी करे ताकि एआरआई के मीथेनोट्रॉफ जीवाणु बायोइनोकुलेंट्स को चावल की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में वितरित किया जा सके, जिसका उद्देश्य लक्षित समूहों में राष्ट्रीय पैदावार में 10% वृद्धि करना है। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि बायोहाइड्रोजन और बायोमीथेन पायलट प्लांट का अवधारणा के प्रमाण के रूप में उपयोग किया जाए ताकि ग्रामीण नगरपालिकाओं में विकेंद्रीकृत, अपशिष्ट-से-ईंधन इकाइयों के लिए एक योजना बनाई जा सके, और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जा सके।                                                         (पैरा 8.14)

     समिति समुक्ति करती ​​है कि पिछले दो वित्तीय वर्षों के दौरान नेक्टर का व्यय काफी कम हुआ है, और अपेक्षा करती है कि भविष्य में वह इस संबंध में सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। समिति इस बात पर ज़ोर देती है कि पूर्वोत्तर में आजीविका बढ़ाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी (एसएंडटी) के उपयोग में नेक्टर की सफलता को अन्य अविकसित क्षेत्रों के लिए एक आदर्श मॉडल के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।                                                                                     (पैरा 8.17)

     समिति नेक्टर द्वारा आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और क्षेत्र में रोजगार क्षमता में सुधार हेतु उत्तर पूर्वी भारत के विकास और कौशल-संवर्धन के लिए किए जा रहे कार्य को स्वीकार करती है। समिति सिफारिश करती है कि बनाना सूडोस्टेम और अशरिकांडी मिट्टी के पॉटरी परियोजनाओं को क्षेत्रीय ब्रांड में विकसित किया जाए ताकि उत्तर पूर्वी कारीगरों को भारत और वैश्विक बाजारों से सीधे जोड़ा जा सके। यह भी सिफारिश की जाती है कि स्टेमेजाइन प्रदर्शनी मॉडल को सभी आठ उत्तर पूर्वी राज्यों में विज्ञान और नवाचार हब में बदल दिया जाए ताकि क्षेत्रीय युवाओं के बीच स्टार्टअप और नवाचार संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके।                                                  (पैरा 8.18)

     समिति एरीज द्वारा खगोल विज्ञान और खगोलीय भौतिकी, सौर भौतिकी और वायुमंडलीय विज्ञान में किए जा रहे शोध कार्य की सराहना करती है। उपग्रह प्रक्षेपण में वृद्धि के साथ, स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (एसएसए) में एरीज का कार्य अब राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन गया है। समिति का सुझाव है कि एरीज को राष्ट्रीय एसएसए ढांचे (इसरो के नेतृत्व में) के लिए तकनीकी साझेदार के रूप में नामित किया जाए, ताकि उनके ऑप्टिकल/इंफ्रारेड दूरबीनों का उपयोग कर कक्षा में मलबे को ट्रैक करने और भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा करने के लिए किया जा सके। समिति यह भी सिफारिश करती है कि पांच साल के हिमालयी जीएचजी निगरानी डेटा को राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (एनएपीसीसी) में शामिल किया जाए ताकि पर्वतीय क्षेत्रों के लिए कार्बन अवशोषण कार्यनीतियों को परिष्कृत किया जा सके।                                 (पैरा 8.21)

*****

आरकेके


(रिलीज़ आईडी: 2245311) आगंतुक पटल : 94
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English