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सेंसिंग में उपयोग होने वाली सामग्री के बनने की विशेष प्रक्रिया को समझना गैस सेंसर और लिथियम-आयन बैटरियों का प्रदर्शन बेहतर बना सकता है

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 3:52PM by PIB Delhi

वैज्ञानिकों ने मेसोपोरस टिन ऑक्साइड (एसएनओ) बीड्स के निर्माण के पीछे लंबे समय से चले आ रहे रहस्य को सुलझा लिया है। यह एक उन्नत सामग्री है, जिसका व्यापक रूप से सेंसिंग और ऊर्जा एप्लीकेशन में उपयोग किया जाता है। इससे कणों के आकार, आकृति और संबंधित मानकों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है, जो गैस सेंसर, लिथियम-आयन बैटरियों और उन्नत सौर कोशिकाओं के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मेसोपोरस एसएनओ बीड्स को उनके उच्च सतह क्षेत्र और ट्यून करने योग्य छिद्रता के कारण महत्व दिया जाता है, फिर भी उनके निर्माण की विस्तृत प्रक्रिया अब तक स्पष्ट नहीं थी। पहले के मॉडलों में यह प्रस्तावित किया गया था कि सॉल्वोथर्मल चरण के दौरान क्रिस्टलीय नैनोकण बनते हैं और बाद में मिलकर बीड्स का निर्माण करते हैं।

हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल एडवान्स्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मैटलर्जी एंड न्यू मैटीरियल्स (एआरसीआई), जो विज्ञान और प्रोद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का एक स्वायत्तशासी संस्थान है, के शोधकर्ताओं की एक टीम ने लंबे समय से चली आ रही वैज्ञानिक अस्पष्टता को दूर करते हुए उनके निर्माण के लिए एक स्पष्ट मॉडल प्रस्तुत किया है।

उन्होंने प्रदर्शित किया कि प्रारंभिक रूप से तैयार किए गए बीड्स वास्तव में अमोर्फस (अक्रिस्टलीय) होते हैं। ये टिन-समृद्ध कार्बनिक नेटवर्क से बने होते हैं, जिनमें लगभग 1.2 से 1.4 नैनोमीटर के नैनो-स्तरीय असमानताएँ (हेटेरोजिनिटी) होती हैं। सॉल्वोथर्मल प्रक्रिया (140 से 180 डिग्री सेल्सियस) के दौरान क्रिस्टलीय प्राथमिक एसएनओ कणों का निर्माण नहीं होता है। इसके बजाय, क्रिस्टलीकरण केवल 400 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान पर कैल्सिनेशन के दौरान शुरू होता है।

चित्र 1: टिन-समृद्ध जटिल नेटवर्क और हिलाने (स्टिरिंग) तथा सॉल्वोथर्मल उपचार के दौरान बने अमोर्फस गोलों से मेसोपोरस एसएनओ बीड्स का निर्माण, तथा 400 °सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर कैल्सिनेशन के दौरान पीवीपी के गलने के साथ क्रिस्टलीय प्राथमिक एसएनओ कणों और मेसोपोरस संरचना का विकास

कैल्सिनेशन के दौरान पॉलीविनाइल पाइरोलिडोन (पीवीपी) गल जाता है, जिससे आपस में जुड़े रिक्त स्थान (वॉयड्स) बनते हैं, जो आगे चलकर मेसोपोरस संरचना में विकसित होते हैं। क्रिस्टलीकरण और छिद्र निर्माण एक साथ होते हैं। यह वृद्धि पारंपरिक ओस्टवाल्ड रिपनिंग तंत्र का अनुसरण करती है, जिसमें बड़े कण सतह ऊर्जा को कम करने के लिए छोटे कणों की कीमत पर बढ़ते हैं। लगभग 0.3 का कोर्सनिंग एक्सपोनेंट यह पुष्टि करता है कि यह प्रक्रिया आयतन-आधारित प्रसार (वॉल्यूमेट्रिक डिफ्यूजन) द्वारा नियंत्रित होती है।

स्मॉल एंगल एक्स-रे स्कैटरिंग (एसएएक्‍सएस) विश्लेषण, जो सामग्री में नैनो-स्तरीय विशेषताओं को मापने की एक उन्नत तकनीक है, ने पारंपरिक टीईएम की तुलना में कई गुना बड़े सैंपल वॉल्यूम पर औसत संरचनात्मक जानकारी प्रदान की। इससे अमोर्फस बीड्स के भीतर नैनो-स्तरीय असमानताओं की सटीक पहचान संभव हुई और सूक्ष्म संरचनात्मक विकास तथा क्रिस्टलीकरण व्यवहार के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित किया गया।

चित्र 2 : () विभिन्न सॉल्वोथर्मल तापमानों पर संश्लेषित प्रारंभिक बीड्स की संरचना (मॉर्फोलॉजी) को दर्शाते हुए एसईएम माइक्रोग्राफ; () प्रारंभिक बीड्स के एसएएक्सएस प्रोफाइल; () विभिन्न तापमानों पर ऊष्मा उपचार के बाद बीड्स के एक्सआरडी पैटर्न; () ऊष्मा-उपचारित बीड्स के एसएएक्सएस प्रोफाइल, जो सूक्ष्म संरचना में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाते हैं; (ड.) कैल्सिनेशन तापमान के अनुसार प्राथमिक कणों का आकार, जिसमें इनसेट में विभिन्न अवधियों के लिए 500°सेंटीग्रेड पर कैल्सिन किए गए बीड्स के ओस्टवाल्ड रिपनिंग व्यवहार को दिखाया गया है; () विभिन्न लंबाई-मानकों पर बीड्स की पदानुक्रमित संरचना को दर्शाती टीईएम छवियाँ

इस अध्ययन से प्राप्त यांत्रिक (मैकेनिस्टिक) समझ संश्लेषण मापदंडों को सूक्ष्म रूप से नियंत्रित (फाइन-ट्यून) करने में सक्षम बनाती है, जिससे कणों के आकार, छिद्रता और क्रिस्टलीयता को नियंत्रित किया जा सकता है—जो उनके एप्लीकेशनों में प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह शोध इंडियन जरनल ऑफ फिजिक्स में प्रकाशित हुआ है और एसएनओ को अन्य मेसोपोरस धातु ऑक्साइड जैसे टीआईओ, जैडएनओ और एफई को समझने के लिए एक संदर्भ प्रणाली के रूप में स्थापित करता है।

ये निष्कर्ष एआरसीआई की उन्नत सामग्री अनुसंधान में नेतृत्व क्षमता को मजबूत करते हैं और ऊर्जा, पर्यावरण तथा सेंसिंग प्रौद्योगिकियों के लिए उच्च-प्रदर्शन वाली सामग्रियों के अभियांत्रिकीकरण के नए मार्ग खोलते हैं।

प्रकाशन सम्पर्क : https://doi.org/10.1007/s12648-024-03419-6)

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पीके/केसी/केपी/ डीके


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