राज्यसभा सचिवालय
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कार्डियक स्टेंट तथा अन्य चिकित्सा उपकरणों की अत्यधिक कीमतों पर नियंत्रण रखने हेतु एक प्रभावी तंत्र विकसित किए जाने के लिए प्रार्थना करने वाली याचिका पर राज्य सभा की याचिका समिति की 164वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:09PM by PIB Delhi

श्री नारायण दास गुप्ता, संसद सदस्य की अध्यक्षता में राज्य सभा की याचिका समिति ने सुश्री सुलग्ना चट्टोपाध्याय, निवासी वसंत कुंज, नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत तथा राज्य सभा के भूतपूर्व सदस्य श्री अविनाश राय खन्ना, तत्कालीन राज्य सभा सदस्य, द्वारा प्रति-हस्ताक्षरित याचिका पर अपना 164वां प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें देश में कार्डियक स्टेंट तथा अन्य चिकित्सा उपकरणों की अत्यधिक कीमतों पर नियंत्रण रखने हेतु एक प्रभावी तंत्र विकसित किए जाने का अनुरोध किया गया था। यह याचिका राज्य सभा के माननीय सभापति द्वारा 20 अक्तूबर, 2015 राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के अध्याय 10 के उपबंधों के अंतर्गत स्वीकार की गई थी । नियम 145 के अनुसरण में, 02 दिसंबर, 2017 को श्री अविनाश राय खन्ना द्वारा यह याचिका राज्य सभा में प्रस्तुत की गई, जिसके पश्चात् इसे नियम 150 के अनुसार जांच करने तथा प्रतिवेदन प्रस्तुत करने हेतु याचिका समिति को भेज दिया गया।

समिति ने दिसंबर, 2015 से मार्च, 2017 के मध्य आयोजित अपनी छह बैठकों में इस याचिका पर विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श किया तथा कार्डियक स्टेंट्स के मूल्य निर्धारण की पद्धतियों के संबंध में विभिन्न हितधारकों सहित याचिकाकर्ता, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा औषधि विभाग के सचिवों के साथ-साथ राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के अध्यक्ष को सुना। चूंकि याचिकाकर्ता ने यह मुद्दा विशेष रूप से कार्डियक स्टेंट्स के संदर्भ में उठाया था, इसलिए समिति ने सर्वप्रथम कार्डियक स्टेंट्स की अत्यधिक कीमतों के मुद्दे को उठाया। समिति ने याचिका पर प्रतिवेदन को दो भागों में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया; प्रथम, कार्डियक स्टेंट्स की कीमतों में कमी लाने के लिए किए गए उपायों पर प्रतिवेदन और द्वितीय, याचिका के समस्त पहलुओं को समाहित करने वाला एक व्यापक प्रतिवेदन। तदनुसार, समिति ने 6 अप्रैल, 2017 को उसपर विचार किया उसे राज्य सभा के समक्ष प्रस्तुत किया, जिसमें अन्य बातों के साथ साथ सरकार से कार्डियक स्टेंट्स की कीमतों में कमी लाने का आग्रह किया गया। समिति की सिफारिशों के अनुपालन में सरकार ने स्टेंट्स की कीमतों में कमी लाने हेतु तंत्र स्थापित किए, जिसके परिणामस्वरूप उनकी अधिकतम सीमा-कीमतों में तीव्र गिरावट आई। संबंधित मंत्रालय से प्राप्त की गई कार्यवाही संबंधी प्रतिवेदन (एटीआर) पर समिति ने विचार किया, उसे संतोषजनक पाया और 18 फरवरी, 2019 को आयोजित अपनी बैठक में उसे निस्तारित कर दिया। इसके पश्चात समिति ने वर्ष 2021 के दौरान याचिका की आगे का परीक्षण पुनः प्रारंभ किया।

4. समिति ने याचिका के आगे के परीक्षण के दौरान अन्य चिकित्सा उपकरणों पर ध्यान केंद्रित किया। समिति ने अपनी बैठक में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा औषध विभाग के सचिवों के साथ-साथ राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के अध्यक्ष, भारत के औषध महानियंत्रक (डीसीजीआई) तथा भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई), भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग मंडलों के महासंघ (एसोचैम) और भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया। इसके अतिरिक्त, समिति ने अपने अध्ययन दौरों के दौरान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा रसायन और उर्वरक मंत्रालय के औषधि विभाग के अधिकारियों के साथ देश भर के प्रमुख अस्पतालों, चिकित्सा उपकरणों के निर्माताओं तथा अन्य हितधारकों के प्रतिनिधियों के साथ भी संवाद किया।

समिति का प्रतिवेदन राज्य सभा की वेबसाइट https://sansad.in/rs/committees/8?standing-committees पर उपलब्ध है।

समिति की सिफारिशें/ समुक्तियां संदर्भ हेतु संलग्न हैं।

 

समिति की सिफ़ारिशें - एक नजर में

1. समिति नोट करती है चिकित्सा उपकरणों और औषधियों को एक ही नियमों के अंतर्गत लाना विशिष्ट चुनौतियाँ उत्पन्न करता है, जैसे कि औषधियों के लिए बनाए गए मूल्य नियंत्रण का उपकरणों पर लागू होना, जिसके परिणामस्वरूप अनपेक्षित आर्थिक प्रभाव, लाभ मार्जिन में कमी और कुछ मामलों में उच्च-स्तरीय उपकरणों का बाज़ार से हटना शामिल है। चिकित्सा उपकरण नियम अक्सर उच्च-स्तरीय और जटिल चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव और सॉफ़्टवेयर से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहते हैं, और उन्हें औषधियों के लिए बनाए गए ढाँचे में समाहित कर देते हैं। समिति समुक्ति करती है कि यह स्थिति इस क्षेत्र में उत्पादन और निवेश को हतोत्साहित करती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार को औषधियों और चिकित्सा उपकरणों की अलग-अलग श्रेणीकरण पर विचार करना चाहिए और इनके लिए अलग-अलग नियम बनाए जाने चाहिए।

(पैरा 3.5)

2. समिति समुक्ति करती है कि रोगियों को स्वास्थ्य नीतियों के केंद्र में होना चाहिए और सरकार द्वारा बनाई गई कोई भी नीति यदि उनके हितों के विपरीत होगी तो वह समाज के विकास और कल्याण के लिए हानिकारक होगी। अस्पताल और स्वास्थ्य प्रदाता मध्यस्थ हैं। सरकार को उपभोक्ता जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने चाहिए ताकि रोगियों को विभिन्न चिकित्सा उपकरणों के बारे में शिक्षित किया जा सके। उपकरणों की कीमत और उपलब्धता से संबंधित जानकारी को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

(पैरा 3.5.1)

3.  केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) को चिकित्सा उपकरण क्षेत्र में विनिर्माण और नवाचार को बढ़ावा देने में निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए, जिसके लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था को सरल बनाया जाना आवश्यक है। लाइसेंस जारी करने की समयसीमा की समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि यह रिपोर्ट किया गया है कि विलंब की रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं, जिससे आवेदकों को अनुचित उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। एक सरल लाइसेंसिंग प्रणाली विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करेगी, जो अर्थव्यवस्था और इस क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

(पैरा 3.5.2)

4.  समिति ने विस्तृत क्लिनिकल परीक्षणों के कारण लागत में वृद्धि से संबंधित जानकारी को नोट करती है। समिति सिफ़ारिश करती है कि सरकार इस क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों के अध्ययन हेतु एक समिति का गठन करे।

(पैरा 3.5.3)

5. समिति इस तथ्य पर चिंता व्यक्त करती है कि उपभोक्ताओं को विनिर्माताओं से अधिक शुल्क वसूली के मामलों में की गई वसूली का कोई लाभ नहीं मिलता। कानून बनाने का उद्देश्य यह था कि लाभ उपभोक्ता तक पहुँचे और उपभोक्ता के लिए मूल्य संवेदनशीलता बनी रहे। किंतु उपभोक्ता को अधिक वसूले गए खर्च की कोई प्रतिपूर्ति नहीं मिलती। अतः आवश्यक है कि किसी भी प्रकार के अधिक शुल्क वसूली को रोकने के लिए एक सशक्त निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए। वसूली गई राशि का कोषागार में वापस जाना समाधान नहीं है क्योंकि अंततः लाभ उपभोक्ता को ही मिलना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। दंड को और कठोर बनाया जाना चाहिए तथा नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।

(पैरा 4.5)

6. समिति इस तथ्य पर चिंता व्यक्त करती है कि औषधि विभाग की डायग्नोस्टिक, स्कैनिंग और इमेजिंग सेवाओं  के मूल्य निर्धारण में कोई भूमिका नहीं है। यह तथ्य चिंताजनक है क्योंकि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय भी यह कहता है कि मूल्य निर्धारण उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि संबंधित मंत्रालय — स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, औषधि विभाग, रसायन और उर्वरक मंत्रालय — आपसी समन्वय से डायग्नोस्टिक सेवाओं  के लिए एक एकीकृत मूल्य निर्धारण नीति तैयार करें ताकि रोगियों को नुकसान न हो; क्योंकि डायग्नोस्टिक प्रक्रियाओं पर होने वाला खर्च, इलाज की कुल लागत में काफ़ी बढ़ोतरी कर देता है। अनेक विनियमों का होना कोई उद्देश्य पूरा नहीं करता यदि अंतिम उपभोक्ता को चिकित्सा उपकरणों की अत्यधिक कीमत और अपनी जेब से अधिक खर्च का बोझ उठाना ही पड़े। यह व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया है कि देशभर में रोगियों को अपनी जेब से अत्यधिक खर्च उठाना पड़ता है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकार द्वारा बनाए गए अनेक नियम उपभोक्ता तक नहीं पहुँचते और इस प्रकार कल्याणकारी नीति ढाँचे का मूल उद्देश्य विफल हो जाता है।

(पैरा 4.5.1)

7. समिति समुक्ति करती है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तथा वास्तविक उत्पादन लागत के बीच पर्याप्त अंतर है, जो चिंता का विषय है, और समिति हितधारकों के इस मत से सहमत है कि चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को नियंत्रित एवं कम करने तथा कम लागत वाले आयातित उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने हेतु आयात पर निर्भरता को घटाने के लिए स्थानीयकरण/स्वदेशीकरण ही भावी मार्ग है।

(पैरा 4.9.2)

8. समिति एनपीपीए द्वारा हृदय स्टेंट की कीमतों में लगभग 85% तथा घुटने के प्रत्यारोपण की कीमतों में लगभग 70% तक की कमी किए जाने की महत्वपूर्ण उपलब्धि की सराहना करती है, जिससे आम जनता को प्रतिवर्ष लगभग ₹5,900 करोड़ की बचत हुई है। तथापि, समिति इस बात को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करती है कि मूल्य-सीमा निर्धारित किए जाने के बावजूद कुल उपचार लागत अभी भी अधिक बनी हुई है, क्योंकि प्रक्रियागत शुल्क विनियमित नहीं हैं और वे कुल उपचार लागत का लगभग 60–70% हिस्सा बनाते हैं।

(पैरा 4.10.1)

9. समिति एसकेआईएमएस द्वारा व्यक्त इस चिंता को भी नोट करती है कि आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) के अंतर्गत कार्डियक कैथेटराइजेशन के लिए बीमा कवरेज को 100% से घटाकर 50% कर दिया गया है, जिसके कारण मरीजों को अपनी जेब से पर्याप्त व्यय वहन करना पड़ रहा है। समिति दृढ़तापूर्वक सिफ़ारिश  करती है कि सरकार एबी-पीएमजेएवाई के अंतर्गत बीमा पैकेज कवरेज की समीक्षा करे तथा उसे बढ़ाए, ताकि वह वास्तविक प्रक्रियागत लागत के अनुरूप हो सके, विशेषकर कार्डियक कैथेटराइजेशन, कार्डियक सर्जरी, न्यूरोसर्जरी और इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी जैसी प्रक्रियाओं के लिए। साथ ही, पैकेज दरों का नियमित रूप से संशोधन किया जाना चाहिए, ताकि वे पुराने आकलनों के बजाय जमीनी वास्तविकताओं पर आधारित हों।

(पैरा 4.10.2)

10. समिति इस तथ्य से अत्यंत चिंतित है कि मरीजों को प्रीमियम न्यूरोसर्जिकल उपकरण जैसे एन्यूरिज़्म क्लिप्स, पीक (पॉलीईथरईथरकीटोन) केज और 3डी मेश पूरी तरह स्वयं खरीदने पड़ते हैं, क्योंकि ये रियायती सरकारी चैनलों के माध्यम से उपलब्ध नहीं हैं। इसी प्रकार, कार्डियक सर्जरी में मरीजों को हृदय वाल्व की लागत का लगभग 40% तथा एओर्टिक स्टेंट की लागत का लगभग 70% स्वयं वहन करना पड़ता है, जो एक अत्यधिक वित्तीय बोझ है। समिति पुरजोर सिफ़ारिश करती है कि सरकार द्वारा मूल्य-नियमन के दायरे को तत्काल विस्तारित करते हुए निम्नलिखित जीवन-रक्षक चिकित्सा उपकरणों को इसमें शामिल किया जाए

(i) कृत्रिम हृदय वाल्व (यांत्रिक और जैव-कृत्रिम)

(ii)   पेसमेकर (एकल कक्ष, दोहरे कक्ष, सी.आर.टी.)

(iii) न्यूरोसर्जिकल प्रत्यारोपण (एन्यूरिज्म क्लिप, पीईईके पिंजरे, 3डी जाल)

(iv) उन्नत स्टेंट (महाधमनी स्टेंट, फ्लो डायवर्टर, न्यूरोकोइलिंग डिवाइस)

(v)   अन्य क्लास सी और क्लास डी जीवन रक्षक उपकरण जो वर्तमान में अनियमित हैं।

(पैरा 4.10.3)

11. समिति बेंगलुरु स्थित श्री जयदेव हृदय विज्ञान संस्थान की इस सिफारिश का समर्थन करती है कि रिंग्स, मैकेनिकल वाल्व और पेसमेकर जैसे उपकरणों को मूल्य-नियंत्रण के दायरे में लाया जाना चाहिए, ताकि हृदय रोगियों के लिए उपचार अधिक किफायती बनाया जा सके।

(पैरा 4.10.4)

12. समिति एआईएमईडी द्वारा कृत्रिम रूप से बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए एमआरपी तंत्र के संबंध में उठाई गई चिंताओं पर ध्यान देती है, जहाँ अस्पताल मरीज की सामर्थ्य के बजाय लाभ के उद्देश्यों से प्रेरित होकर कम लागत वाले विकल्पों की तुलना में उच्च-एमआरपी वाली वस्तुओं को प्राथमिकता देते हैं। समिति सिफारिश करती है कि:—

(i) एनपीपीए को आयातित चिकित्सा उपकरणों के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी)  की निगरानी करते हुए उनकी      तुलना आयात के लैंडेड प्राइस से करनी चाहिए तथा   जहाँ लाभ-मार्जिन अनुचित रूप से अधिक पाया जाए वहाँ आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।

(ii)  आयातित लैंडेड प्राइस अथवा एक्स-फैक्टरी प्राइस (अर्थात वह प्रथम बिक्री बिंदु जब वस्तु आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करती है) के ऊपर एमआरपी को सीमित करने के लिए परीक्षण-आधारित एक पायलट अध्ययन प्रारंभ किया जाना चाहिए।

(iii)   अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे मरीजों को विभिन्न ब्रांडों के  विकल्प अलग-अलग मूल्य स्तरों पर उपलब्ध कराएँ तथा उनकी तुलनात्मक कीमतों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करें।

(iv)  घरेलू तथा आयातित दोनों प्रकार के उत्पादों पर व्यापार मार्जिन संबंधी प्रतिबंध     समान   रूप से लागू किए जाने चाहिए, ताकि विदेशी ब्रांडों को अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ न मिल सके।

(पैरा 4.10.5)

13.  समिति ने हितधारकों द्वारा बताए गए एमआरपी और उत्पादन लागत के बीच के अंतर पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। समिति सिफ़ारिश करती है कि सरकार चिकित्सा उपकरणों की मूल्य निर्धारण संरचना पर एक व्यापक अध्ययन कराए, जिसमें घटकों की लागत, विनिर्माण लागत, वितरण मार्जिन तथा खुदरा स्तर पर लगाए जाने वाले अतिरिक्त मूल्य का विस्तृत विश्लेषण शामिल हो। इस अध्ययन का उद्देश्य आपूर्ति श्रृंखला के प्रत्येक स्तर पर संभावित अत्यधिक लाभार्जन की पहचान करना तथा उस पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना होना चाहिए।

(पैरा 4.10.6)

14. समिति यह सिफ़ारिश करती है कि जन औषधि केंद्रों तथा अमृत फार्मेसी नेटवर्क का उल्लेखनीय विस्तार किया जाए ताकि देश के सभी जिलों को इसके दायरे में लाया जा सके, विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। इन केंद्रों के माध्यम से उपलब्ध चिकित्सा उपकरणों की श्रेणी का भी विस्तार किया जाना चाहिए। वर्तमान में उपलब्ध 121 उपकरणों के 277 प्रकारों से आगे बढ़ते हुए इसमें अधिक उच्च-मूल्य वाले इम्प्लांट तथा जीवनरक्षक चिकित्सा उपकरणों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

(पैरा 4.10.7)

15. समिति, चिकित्सा उपकरणों की कीमत से जुड़े एक अहम पहलू पर मंत्रालय के उत्तर को चिंता के साथ नोट करती है। किसी भी सरकारी योजना या नीति की सफलता उसके परिणामों पर निर्भर करती है। यदि परिणामों का आकलन नहीं किया जाता, तो योजना का उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाता है। यद्यपि पीएलआई योजना का चिकित्सा उपकरणों की कीमतों पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं है, फिर भी इस योजना का उद्देश्य चिकित्सा उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है, इससे अंततः उपभोक्ताओं को चिकित्सा उपकरण उचित एवं किफायती दरों पर उपलब्ध होने की संभावना है। एक चर्चा के दौरान, समिति को बताया गया था कि उपभोक्ताओं को होने वाले लाभों का आकलन करने के लिए एक अध्ययन किया जाएगा, लेकिन समिति ने चिंता के साथ यह नोट किया है कि मंत्रालय ने वह अध्ययन नहीं किया है। इसलिए समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय को उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के क्रियान्वयन से उपभोक्ताओं को प्राप्त लाभों का आकलन करने हेतु एक अध्ययन कराना चाहिए, जिसमें डायग्नोस्टिक सेवाओं की कीमतें भी शामिल होनी चाहिए।  इसके अतिरिक्त समिति यह भी सिफ़ारिश करती है कि सरकार को आयातित चिकित्सा उपकरणों की लैंडेड कॉस्ट और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच अंतर का अध्ययन कराना चाहिए, ताकि मूल्य निर्धारण की स्थिति के संबंध में स्पष्टता प्राप्त हो सके।

(पैरा 5.5)

16. मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर समिति समुक्ति करती है कि पीएलआई योजना में मुख्यतः बड़े खिलाड़ी ही भाग ले रहे हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि एमएसएमई क्षेत्र  को भी इस योजना का लाभ और आवश्यक वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे भी देश में चिकित्सा उपकरण क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने में योगदान दे सकें और रोज़गार के अवसर सृजित कर सकें।

(पैरा 5.5)

17. समिति, एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड द्वारा संचालित अमृत फार्मेसी पहल की सराहना करती है, जो औसत बाजार मूल्य की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत कम कीमत पर दवाएँ और चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराती है तथा केवल 5 प्रतिशत मार्जिन रखती है। वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों में 207 अमृत स्टोर संचालित हो रहे हैं। समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि इस मॉडल का समयबद्ध तरीके से देशभर के सभी केंद्रीय सरकारी अस्पतालों, एम्स  संस्थानों तथा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुख राज्य सरकारी अस्पतालों में विस्तार किया जाए।

(पैरा 5.7.1)

18. समिति, बेंगलुरु स्थित श्री जयदेव इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी के रोगी-केंद्रित मॉडल की सराहना करती है, जहाँ प्रक्रियाओं की लागत वास्तविक लागत पर बिना किसी लाभ के निर्धारित की जाती है। इसके परिणामस्वरूप उपचार की लागत निजी अस्पतालों की तुलना में 30–40 प्रतिशत कम होती है, जबकि संस्थान के 70–80 प्रतिशत मरीज गरीब और जरूरतमंद वर्ग से आते हैं। समिति सिफारिश करती है कि चिकित्सा उपकरणों और प्रक्रियाओं के लिए यह शून्य-लाभ मॉडल देशभर के सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में एक मानक पद्धति के रूप में अपनाया जाए।

(पैरा 5.7.2)

19. समिति यह जानकर चिंतित है कि मेडिपार्क विकसित करने की परियोजनाएँ, केंद्रीय सरकार द्वारा स्वीकृत होने के बावजूद, कई वर्षों से लंबित पड़ी हैं और अधिकांश अभी तक क्रियाशील नहीं हो पाई हैं। औषधि विभाग, रसायन और उर्वरक मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार केवल तीन राज्यों को ही मेडटेक पार्क आवंटित किए गए हैं, जबकि इन्हें देशभर में समान रूप से वितरित किया जाना चाहिए था। समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि केंद्रीय सरकार तत्काल हस्तक्षेप कर संबंधित राज्य सरकारों के साथ वार्ताओं को तेज करे ताकि इन मेडिपार्कों को यथाशीघ्र क्रियाशील बनाया जा सके। इन्हें चिकित्सा क्लस्टर और ज्ञान पार्क के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिनमें विनिर्माण सुविधाएँ भी उपलब्ध हों।

(पैरा 5.7.3)

20. समिति आंध्र प्रदेश मेडटेक ज़ोन मॉडल की सराहना करती है, जिसे रिकॉर्ड 342 दिनों में स्थापित किया गया और जहाँ वर्तमान में 100 से अधिक कंपनियाँ चिकित्सा उपकरणों के अनुसंधान, विकास और उत्पादन में कार्यरत हैं। महामारी के दौरान एएमटीजेड ने स्वदेशी क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए प्रतिदिन 100 से अधिक वेंटिलेटर, 500 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और 10 लाख आरटी-पीसीआर किट का उत्पादन किया। समिति सिफारिश करती है कि एएमटीजेड मॉडल को कम से कम 10 अन्य राज्यों में भी दोहराया जाए, विशेष रूप से उन राज्यों में जहाँ पहले से फार्मास्युटिकल और बायोटेक्नोलॉजी पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और केरल।

(पैरा 5.7.4)

21. समिति, एम्स जम्मू द्वारा अपनाई गई बहु-आयामी खरीद रणनीति की सराहना करती है, जिसमें अनेक विक्रेताओं के साथ दर अनुबंध, एचएलएल लाइफकेयर, पीएमबीजेके और केंद्रीय भंडार के साथ समझौता ज्ञापन, उपकरण खरीद के लिए एचआईटीईएस के साथ साझेदारी, तथा आपातकालीन आवश्यकताओं के लिए सरकारी ई-मार्केटप्लेस का उपयोग शामिल है।  समिति सिफारिश करती है कि इस व्यापक खरीद मॉडल को एक श्रेष्ठ प्रक्रिया के रूप में प्रलेखित किया जाए और इसे सभी एम्स संस्थानों तथा प्रमुख केंद्रीय सरकारी अस्पतालों में अपनाया जाए, ताकि समान मूल्य निर्धारण, गुणवत्ता आश्वासन, वहनीयता और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

(पैरा 5.7.5)

22. समिति, कार्डिएक कैथ लैब से संबंधित वस्तुओं की खरीद के लिए जेकेएमएससीएल द्वारा अपनाई गई पारदर्शी निविदा प्रक्रिया की सराहना करती है, जिसमें कड़े पात्रता मानदंड, वित्तीय बोली खोलने से पहले नमूना स्वीकृति तथा दरों की युक्तिसंगतता की जाँच शामिल है।  समिति सिफारिश करती है कि सभी राज्य मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशनों को खरीद प्रक्रियाओं में इसी प्रकार के पारदर्शिता उपाय अपनाने चाहिए, जिनमें वित्तीय बोली खोलने से पहले अनिवार्य तकनीकी मूल्यांकन तथा दरों की युक्तिसंगतता की यादृच्छिक जाँच शामिल हो, ताकि कार्टेलाइजेशन को रोका जा सके और वास्तविक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 5.7.6)

23. समिति ने नोट किया कि भारत में केवल 5 कंपनियाँ सिरिंज इन्फ्यूजन पंप बनाती हैं और उन्हें निर्यात सब्सिडी के कारण सस्ते चीनी उत्पादों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। यह भारतीय निर्माताओं के लिए नीति समर्थन की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता को उजागर करता है। समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि सरकार को:

(i)      आयातित चिकित्सा उपकरणों पर वर्तमान 5–7.5% की सीमा से आयात शुल्क  बढ़ाकर 10–15% करने पर विचार किया जाए, ताकि घरेलू निर्माताओं को       समान अवसर  मिल सके और “मेक-इन-इंडिया” पहल की रक्षा की जा सके।

(ii)     सब्सिडी प्राप्त चीनी आयातों से प्रतिस्पर्धा कर रहे भारतीय निर्माताओं को लक्षित  वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए।

(ii)     सरकारी खरीद में न्यूनतम घरेलू घटक सामग्री अनिवार्य की जाए, जिसे 5 वर्षों में 40% से बढ़ाकर 75% किया जाए।

(पैरा 6.3.1)

24.    समिति खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की तर्ज पर दवाओं से अलग चिकित्सा उपकरणों के लिए एक पृथक कानूनी ढाँचे की सिफारिश का समर्थन करती है। समिति सिफ़ारिश करती है कि प्रस्तावित मेडिकल डिवाइस अधिनियम में छोटे प्रक्रियात्मक उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए और उनकी जगह स्तरीय दंड प्रणाली लागू की जाए, जिससे दंडात्मक दृष्टिकोण के बजाय अनुपालन-उन्मुख दृष्टिकोण को बढ़ावा मिले। इससे डेवलपर्स और निर्माताओं को तकनीकी अनुपालन में छोटी त्रुटियों के कारण आपराधिक अभियोजन के भय के बिना नवाचार में निवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

(पैरा 6.3.2)

25.    समिति यह नोट करती है कि कीमतों को नियंत्रित करने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए स्थानीयकरण और स्वदेशीकरण ही भावी रास्ता है। हालांकि, विशेष रूप से उच्च-स्तरीय घटकों के लिए 70–80% से अधिक आयात निर्भरता के कारण स्वदेशी विनिर्माण को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। समिति सिफारिश करती है कि:

(i)      सरकार उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का विस्तार करे ताकि उच्च-  स्तरीय घटकों के निर्माण की व्यापक श्रेणी को शामिल किया जा सके, जिसमें सेंसर,           इलेक्ट्रॉनिक सब-असेंबली, विशेष सामग्री और प्रिसीजन पार्ट्स शामिल हों।

(ii)     मेडिकल डिवाइस पार्कों को उच्च लागत वाली साझा अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, जैसे    गामा रेडिएशन स्टरलाइजेशन प्लांट, उन्नत परीक्षण प्रयोगशालाएँ और प्रोटोटाइपिंग केंद्र, ताकि एमएसएमई के लिए पूंजीगत व्यय कम हो सके।

(iii)    मेडिकल डिवाइस पार्कों के भीतर समर्पित उत्कृष्टता स्थापित किए जाएँ, ताकि बायोमेडिकल इंजीनियरिंग,विनियामकीय अनुपालन और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणालियों में  विशेषज्ञ कार्यबल को प्रशिक्षित किया जा सके।

(पैरा 6.3.3)

26.    समिति यह नोट करती है कि मेडिकल उपकरण के लिए निर्यात संवर्धन परिषद की स्थापना की जा चुकी है, लेकिन इसे पूर्ण रूप से कार्यात्मक बनाने की आवश्यकता है। समिति दृढ़तापूर्वक अनुशंसा करती है कि सरकार पर्याप्त बजट आवंटन के साथ ईसीपी-एमडी को तुरंत क्रियाशील बनाए और उसे निम्नलिखित कार्यों के लिए अधिकृत करे:

(i)      निर्माताओं को वैश्विक विनियामकीय आवश्यकताओं (ईयू-एमडीआर, यूएस-एफडीए).

          को समझने में सहायता प्रदान करना।

(ii)     ब्रांड इंडिया को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों तथा खरीदार-विक्रेता बैठकों का आयोजन करना।

(iii)    निर्यात अवसरों और प्रतिस्पर्धी स्थिति के बारे में बाजार संबंधी जानकारी प्रदान करना।

(iv)    उच्च संभार लागत और इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर जैसी निर्यात बाधाओं को दूर करना।

(पैरा 6.3.4)

27.    समिति विभिन्न उत्पादन चरणों में भौतिक, रासायनिक, जैविक तथा सूक्ष्मजीवविज्ञानी परीक्षण के साथ व्यापक गुणवत्ता प्रणालियों को बनाए रखने के लिए मॉरिसन लाइफकेयर की सराहना करती है। समिति सिफारिश करती है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों (आईएसओ 13485, आईएसओ 13485:2016, आईईसी 60601) को अपनाने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करे, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित उपाय किए जाएँ:

(i) एमएसएमई के लिए रियायती (सब्सिडी युक्त) प्रमाणन कार्यक्रम।

(ii) आईएसओ/ आईईसी प्रमाणित निर्माताओं को कर लाभ (टैक्स बेनिफिट्स) प्रदान करना।

(iii) सरकारी निविदाओं (टेंडर) में प्रमाणित घरेलू निर्माताओं से प्राथमिकता के आधार पर खरीद सुनिश्चित करना।

(पैरा 6.3.5)

28.    समिति ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए लगभग ₹5,000 की लागत में कंपनयुक्त छड़ी तैयार करने में फीनिक्स मेडिकल सिस्टम्स द्वारा प्रदर्शित स्वदेशी नवाचार की सराहना की है, जो विशेष रूप से शिक्षण जैसे पेशों के लिए उपयोगी है। समिति सिफारिश करती है कि सरकार दिव्यांगजनों तथा सहायक प्रौद्योगिकियों से संबंधित चिकित्सा उपकरणों के लिए विशेष रूप से एक नवाचार कोष स्थापित करे। इस कोष के अंतर्गत प्रत्येक नवाचार के लिए अनुदान प्रदान किया जाए तथा ऐसे सामाजिक रूप से लाभकारी उपकरणों के लिए शीघ्र  विनियामक स्वीकृति की व्यवस्था की जाए।

(पैरा 6.3.6)

29.    समिति ने यह भी नोट किया कि यद्यपि विदेशी अनुमोदन (यूएस-एफडीए या सीई) तकनीकी दस्तावेज़ को मजबूत बनाने में सहायक होते हैं, लेकिन  वे 2025 से भारतीय सरकारी निविदाओं में वे अब सीडीएससीओ लाइसेंसिंग का विकल्प नहीं हैं। इसका अर्थ है कि वैश्विक नवोन्मेषकों को कड़े अंतरराष्ट्रीय परीक्षणों को पार करने के बाद भी एक दूसरी और लंबी स्थानीय स्वीकृति प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए, 2030 तक 50 अरब डॉलर के बाजार के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समिति “डीम्ड अप्रूवल” मार्ग का प्रस्ताव करती है। इसके अंतर्गत उन उपकरणों को, जिन्हें पहले से वैश्विक मान्यता प्राप्त प्राधिकरणों (जैसे एफडीए, ईयू-एमडीआर) द्वारा प्रमाणित किया गया है, राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली के माध्यम से स्थानीय सुरक्षा और लेबलिंग के मूल मानकों को पूरा करने की शर्त पर 30–45 दिनों के भीतर अंतरिम भारतीय विपणन लाइसेंस प्रदान किया जा सके।

(पैरा 6.3.7)

30.    समिति यह नोट करती है कि चिकित्सा पेशेवरों के आचरण को नियंत्रित करने वाला विनियामक ढाँचा पहले से ही इस जोखिम को मान्यता देता है कि फार्मास्यूटिकल और संबद्ध स्वास्थ्य क्षेत्र उद्योग का अनुचित प्रभाव डॉक्टरों के नैदानिक निर्णयों को प्रभावित कर सकता है, जिसमें दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और उपचार प्रक्रियाओं का चयन शामिल है। समिति यह भी समुक्ति करती है कि भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002 की  धारा 6.8 स्पष्ट रूप से डॉक्टरों को पहार, यात्रा सुविधाएँ, आतिथ्य, नकद या मौद्रिक अनुदान स्वीकार करने से तथा किसी भी दवा या उत्पाद के प्रचारात्मक समर्थन में शामिल होने से प्रतिबंधित करती है। साथ ही, यह प्रावधान राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड (ईएमआरबीए) तथा राज्य चिकित्सा परिषदों को ऐसे उल्लंघनों के मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार भी प्रदान करता है। समिति का विचार है कि इन नैतिक सुरक्षा उपायों का सख्ती और पारदर्शी रूप से अनुपालन सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि कार्डियक स्टेंट और अन्य चिकित्सा उपकरणों के चयन और उपयोग का निर्णय केवल रोगी के हित और साक्ष्य-आधारित चिकित्सा पर आधारित हो, न कि किसी वित्तीय या प्रचारात्मक प्रलोभन के प्रभाव में।

(पैरा 7.1)

31.    समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और राज्य चिकित्सा परिषदों के समन्वय से भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002  के खंड 6.8 के निगरानी और प्रवर्तन को सुदृढ़ किया जाए, विशेष रूप से चिकित्सा व्यवासायियों, अस्पतालों और हृदय संबंधी स्टेंट तथा अन्य उच्च मूल्य वाले चिकित्सा उपकरणों के निर्माताओं/आपूर्तिकर्ताओं के बीच संपर्कों के संदर्भ में। इसमें शिकायतों का समयबद्ध निपटान, उल्लंघनों की संख्या और प्रकृति तथा लगाए गए दंड पर उचित सुरक्षा उपायों के साथ गुप्त डेटा का प्रकाशन, और चिकित्सा समुदाय को उपहार, प्रलोभन और उत्पाद समर्थन पर प्रतिबंधों को पुनः स्पष्ट करने वाले समय-समय पर परिपत्र/स्मरण पत्र जारी करना शामिल होना चाहिए।

(पैरा 7.2)

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आरकेके


(रिलीज़ आईडी: 2245267) आगंतुक पटल : 70
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