राज्यसभा सचिवालय
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शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 376वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:11PM by PIB Delhi

श्री दिग्विजय सिंह, संसद सदस्य, राज्य सभा  की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 25 मार्च, 2026 को समिति के 376वें प्रतिवेदन को संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया जो निम्नानुसार है:

  1. शिक्षा मंत्रालय से संबन्धित "स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग की अनुदान मांगों 2026-27" संबंधी  376वां प्रतिवदेन।

 2. समिति ने दिनांक 20 फरवरी, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग की अनुदान मांगों के विभिन्न पहलुओं की संवीक्षा की । 376वें प्रतिवेदन की तैयारी के दौरान, समिति ने इस विषय पर विस्तृत चर्चा की तथा स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय के सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस), नवोदय विद्यालय समिति (एनवीएस), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई), राष्ट्रीय बाल भवन (एनबीबी) इत्यादि के प्रतिनिधियों के विचार सुने। समिति ने अनुदान मांगों 2026-27 के संबंध में गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्नावलियों के माध्यम से भी स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से परामर्श किया। समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई समुक्तियां/सिफारिशें संलग्न हैं।

 

2.       समिति ने 23 मार्च, 2026 को  आयोजित अपनी बैठक में इस प्रतिवेदन पर विचार किया और उसे स्वीकार किया।

4.       प्रतिवेदन निम्नलिखित लिंक पर भी उपलब्ध है:-https://sansad.in/rs/committees/16?departmentally-related-standing-committees

376वां प्रतिवेदन

समिति की समुक्तियाँ/सिफारिशें एक नज़र में

 

1.       समिति समुक्ति करती है कि केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं के लिए बजट अनुमान 2025-26 में ₹62,660 करोड़ के संयुक्त निधि आवंटन के विरुद्ध, 13 फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार वास्तविक व्यय ₹32,296.54 करोड़ है, जो बजट अनुमान का मात्र 51.5 प्रतिशत तथा उसी वित्तीय वर्ष में ₹53,730.02 करोड़ के संशोधित अनुमान का केवल 60.1 प्रतिशत है। समिति आगे समुक्ति करती है कि केवल समग्र शिक्षा में, जो विभाग द्वारा संचालित सबसे बड़ी योजना है, वास्तविक व्यय ₹22,633.88 करोड़ है, जबकि बजट अनुमान ₹41,250 करोड़ है, जो आवंटित निधियों के मात्र 54.9 प्रतिशत उपयोग को दर्शाता है, जबकि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में छह सप्ताह से भी कम समय शेष है। अतः समिति अनुशंसा करती है कि केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) में निधियों के कम उपयोग के लिए उत्तरदायी विशिष्ट प्रशासनिक, प्रक्रियात्मक तथा अंतर-सरकारी अवरोधों की पहचान की जाए।

 (पैरा 2.11)

2.       वित्त वर्ष 2025-26 में स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के वास्तविक व्यय और सामान्य वित्तीय नियम के नियम 56(3) के प्रावधानों की पृष्ठभूमि में, समिति विभाग को सुझाव देती है कि वह नियम 56(3) का पालन करते हुए 2026-27 में अपने व्यय को सुव्यवस्थित करे, ताकि आबंटित निधियों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित हो और वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में व्यय के अनावश्यक संचयन से बचा जा सके।

(पैरा 2.12)

3.       समिति समुक्ति करती है कि विभाग ने 2026-27 के बजट प्राक्कलन के लिए वित्त मंत्रालय को ₹ 98,331.90 करोड़ का प्राक्कलन प्रस्तुत किया था, जबकि वास्तविक आबंटन ₹ 83,562.26 करोड़ है, यानी ₹ 14,769.64 करोड़ की कमी यानी 15.02% का संकुचन। समिति के अनुसार, विभाग को आवश्यक होने पर संशोधित प्राक्कलन के समय इस कमी का प्रक्षेपण करना चाहिए ताकि योजनाएँ निधि की कमी के कारण प्रभावित न हों।

(पैरा 2.13)

4.       समिति का विचार है कि पूंजीगत व्यय, जो बजट अनुमान 2026-27 में मात्र 0.85 करोड़ रुपये के नगण्य स्तर पर है, को महत्वपूर्ण अवसंरचना आवश्यकताओं के समर्थन हेतु पर्याप्त रूप से बढ़ाया जाना चाहिए, विशेषकर आकांक्षी जिलों, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों तथा जनजातीय क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए।

(पैरा 2.14)

5.       समिति स्वागत करती है कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने 363वें प्रतिवेदन में दी गई सिफारिश के पालन में कदम उठाए हैं और पीएमश्री के कार्यान्वयन हेतु केरल राज्य के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। अतः समिति 363वें प्रतिवेदन की अपनी सिफारिश दोहराती है कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल राज्यों के साथ इस मुद्दे को शीघ्र और सौहार्दपूर्ण ढंग से हल किया जाए, क्योंकि निधि न मिलने से करोड़ों छात्रों के शैक्षिक परिणाम प्रभावित होते हैं। इसके अतिरिक्त, समिति का मानना है कि अब राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों  में लागू किया जा रहा एसएनए-स्पर्श (राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों  में समय पर निधि जारी करने और निगरानी प्रणाली) पूरे राज्यों में शीघ्र विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि निधियों का समय पर जारी होना सुनिश्चित हो, निगरानी में सुधार हो और निधियों के उपयोग में पारदर्शिता बढ़े।

(पैरा 2.15)

6.       समिति का मानना है कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के लिए एक समर्पित परिणाम बजट (परिणाम बजट) दस्तावेज तैयार किया जाए, जिसमें व्यय की प्रत्येक रुपये को मापनीय सीखने के परिणामों, नामांकन लक्ष्यों और गुणवत्ता संकेतकों से जोड़ा जाए, जो सतत विकास लक्ष्य 4 के ढाँचे के अनुरूप हो।

(पैरा 2.16)

7.       समिति का मानना है कि शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में समयबद्ध रोडमैप पर रखा जाना चाहिए, जिसमें स्पष्ट रूप से परिभाषित वार्षिक लक्ष्य हों, ताकि 2030 तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के 6% लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

(पैरा 2.17)

8.       समिति नोट करती है कि यह योजना 2019 में घोषित की गई थी, लेकिन अब तक इसके अंतर्गत कोई वास्तविक व्यय नहीं हुआ है। अतः समिति सिफारिश करती है कि ध्रुव योजना का लंबित अनुमोदन शीघ्र किया जाए और योजना के कार्यान्वयन हेतु समय-सीमा निर्धारित की जाए। समिति यह भी सुझाव देती है कि 2026-27 के बजट प्राक्कलन में आबंटित ₹ 50 करोड़ का उपयोग उत्पादक तरीके से किया जाए और विभाग यह सुनिश्चित करे कि अप्रयुक्त शेष राशियों को आगामी वर्षों में स्थानांतरित न किया जाए।

(पैरा 3.5)

 

9.       समिति का मानना है कि प्रतिभाशाली और कुशल बच्चों की पहचान हेतु एक पारदर्शी और वैज्ञानिक पद्धति विकसित की जानी चाहिए, जिसमें सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों  और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों, जिनमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/महिलाएँ और ग्रामीण समुदाय शामिल हैं, का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए। विशेष रूप से लड़कियों और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए विभाग द्वारा विशेष पहुंच कार्यक्रम संचालित किया जाना चाहिए, ताकि ध्रुव योजना के अंतर्गत मार्गदर्शन का समान और न्यायसंगत अवसर मिल सके।

(पैरा 3.6)

10.     समिति का मानना है कि योजना में प्रतिभाशाली बच्चों की पहचान के लिए केवल एसटीईएम क्षेत्र तक सीमित न रहकर, दृश्य कला, प्रदर्शन कला, खेल और पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस संबंध में, राज्य सरकारों को कार्यान्वयन भागीदार के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, जिसमें अभ्यर्थियों की पहचान और नामांकन में राज्यों की भूमिका सुनिश्चित हो।

(पैरा 3.7)

11.     समिति का मानना है कि योजना के लिए एक डिजिटल मंच तैयार किया जाना चाहिए, जिससे मेंटर-मेंटी संवाद, लाभार्थियों की प्रगति की निगरानी और ज्ञान संसाधनों का वास्तविक समय में प्रसार सुनिश्चित हो सके। समिति यह भी सुझाव देती है कि योजना में प्रारंभ से ही वार्षिक प्रदर्शन समीक्षा और स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था शामिल की जाए, ताकि उचित निगरानी संभव हो।

(पैरा 3.8)

12.    समिति समुक्ति करती है कि छात्रवृत्ति की वार्षिक राशि ₹ 12,000 योजना के प्रारंभ से अपरिवर्तित रही है। समिति का मानना है कि मुद्रास्फीति और शहरी, अर्ध-शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रों की वास्तविक जीवनयापन लागत को ध्यान में रखते हुए छात्रवृत्ति की राशि न्यूनतम ₹ 24,000 प्रति वर्ष (₹ 2,000 प्रति माह) की जानी चाहिए। समिति यह भी समुक्ति करती है कि वर्ष 2024-25 में कुल 19,42,199 उम्मीदवार उपस्थित हुए, जिनमें केवल 97,754 (5%) चयनित हुए। अतः समिति का मत है कि अनुमोदित कुल छात्रवृत्तियों (वर्ष में 1,00,000) की संख्या को हर वर्ष परीक्षा में उपस्थित होने वाले योग्य छात्रों की बड़ी संख्या के अनुरूप पर्याप्त रूप से बढ़ाया जाना चाहिए।

(पैरा 3.17)

13.    समिति समुक्ति करती है कि 13 फरवरी 2026 तक राष्ट्रीय साधन-संयुक्त योग्यता छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2025-26 में वास्तविक व्यय ₹ 27.36 करोड़ है, जबकि बजट प्राक्कलन ₹ 374 करोड़ था, जो केवल 7.31% उपयोग दर्शाता है और वित्तीय वर्ष में सात सप्ताह से कम शेष हैं। समिति सिफारिश करती है कि विभाग 2025-26 में राष्ट्रीय साधन-संयुक्त योग्यता छात्रवृत्ति योजना निधियों के अत्यंत कम उपयोग के कारणों की पहचान करे, जिसमें शामिल हैं: () प्राप्त आवेदन, एल1 और एल 2 स्तर पर सत्यापन और 13 फरवरी 2026 तक स्वीकृत आवेदन की संख्या;() राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल के प्रत्येक चरण में लंबित आवेदन की संख्या।
साथ ही, विभाग को प्राथमिकता पर इन बाधाओं का समाधान करना चाहिए, ताकि योग्य छात्र जिनके लिए छात्रवृत्ति पात्रता सुनिश्चित हो चुकी है, उनसे वंचित न रहें।

(पैरा 3.18)

14.    समिति का मत है कि जो राज्य निर्धारित समयसीमा में एनएमएमएसएस परीक्षा आयोजित नहीं करते, उन्हें निरंतर निगरानी तंत्र और सुधारात्मक क्रियान्वयन प्रोटोकॉल के अधीन रखा जाना चाहिए। समिति यह भी मानती है कि जिन राज्यों में ऐतिहासिक रूप से कम उपयोग दर रही है, उन्हें उनके कोटा के पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने हेतु समर्पित क्षमता निर्माण सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

(पैरा 3.19)

15.    समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल पूरी तरह बहुभाषी बनाया जाए और इसे सभी क्षेत्रीय भाषाओं में छात्रों के लिए सुलभ किया जाए, ताकि आवेदन में बाधाओं को कम किया जा सके और दूरदराज़ क्षेत्रों के छात्रों की भागीदारी बढ़े। समिति यह भी सिफारिश करती है कि सत्यापन और वितरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जाए, ताकि अकादमिक वर्ष प्रारंभ होने के 30 दिनों के भीतर नवीनीकरण संपन्न हो और छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान न आए।

(पैरा 3.20)

 

16.    समिति सिफारिश करती है कि ₹ 500 करोड़ (संशोधित प्राक्कलन 2025-26) से ₹ 3,200 करोड़ (बजट प्राक्कलन 2026-27) तक भारी वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, एक व्यापक राष्ट्रीय क्रियान्वयन ढांचा तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें उपकरण खरीद, शिक्षक प्रशिक्षण, और स्कूल चयन के स्पष्ट मानक शामिल हों, इससे पहले कि भाग लेने वाले स्कूलों को निधि जारी की जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि एटीएल की संस्थापना के लिए आकांक्षी जिलों, आदिवासी क्षेत्रों और शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के स्कूलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि नवाचार अवसंरचना तक समान पहुँच सुनिश्चित हो सके। इस संबंध में, योजना में एटीएल संचालन की स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए संरचित रखरखाव और नवीनीकरण बजट शामिल होना चाहिए।

(पैरा 3.26)

17.    समिति सिफारिश करती है कि प्रत्येक एटीएल के लिए एक समर्पित प्रशिक्षित शिक्षक/सुविधाकार अनिवार्य किया जाना चाहिए, और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संबंधित राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद और जिला संस्थागत प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से संचालित किए जाएँ। एटीएल स्थापना के लिए राज्यवार लक्ष्य स्पष्ट समयसीमा के साथ निर्धारित किए जाने चाहिए और प्रगति को प्रबंध पोर्टल या समकक्ष निगरानी तंत्र के माध्यम से ट्रैक किया जाना चाहिए।

(पैरा 3.27)

18.    समिति का मत है कि योजना का समाकलन केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के मौजूदा एटीएल नेटवर्क और नीति आयोग के अटल नवाचार मिशन ढांचे के साथ सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि प्रयासों और अवसंरचना की दोहराव से बचा जा सके।

(पैरा 3.28)

 

19.    समिति सिफारिश करती है कि वार्षिक एटीएल प्रतियोगिताएँ और नवाचार उत्सव जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किए जाएँ ताकि छात्र प्रतिभा का प्रदर्शन हो और विशेष रूप से छात्राओं के लिए सहभागिता बनाए रखी जा सके। इस संबंध में, एटीएल गतिविधियों में लैंगिक समावेशी डिज़ाइन सिद्धांतों को शामिल किया जाना चाहिए, और नवाचार चुनौतियों में भाग लेने के लिए छात्राओं को विशेष प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए।

समग्र शिक्षा

(पैरा 3.29)

20.    समिति नोट करती है कि समग्र शिक्षा के अंतर्गत निधि आबंटन और वास्तविक उपयोग में लगातार अंतर बना हुआ है उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2025-26 में बजट अनुमान ₹ 41,250 करोड़ के मुकाबले 13.02.2026 तक वास्तविक व्यय ₹ 22,634 करोड़। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग एक कड़ाई से व्यय-सम्बंधित निधि रिहाई तंत्र लागू करे और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के निधि उपयोग के पैटर्न की मासिक समीक्षा करे ताकि योजना प्रभावी बन सके।

(पैरा 3.38)

21.    समिति नोट करती है कि कुछ राज्यों में स्कूल छोड़ने की दर लगातार राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जो चिंता का विषय है। अतः समिति सिफारिश करती है कि विभाग प्रत्येक ऐसे राज्य में, जहाँ माध्यमिक विद्यालय छोड़ने की दर 15% से अधिक है, कम से कम दस जिलों की पहचान करे और राज्य सरकार के सहयोग से समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत स्थानीय कारणों पर आधारित जिला-विशेष हस्तक्षेप योजना तैयार करे।

(पैरा 3.39)

22.    समिति का मानना है कि सार्वभौमिक स्कूल अवसंरचना (100% स्कूलों में शौचालय, पेयजल, बिजली, रैम्प और पुस्तकालय) का लक्ष्य समयबद्ध तरीके से प्राप्त किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में, समिति का विचार है कि वर्तमान में 2024-25 में रैम्प की उपलब्धता 87.7% और खेल का मैदान पहुँच 79.9% होने के कारण इन पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है।

(पैरा 3.40)

23.    समिति नोट करती है कि कुछ राज्य सकल नामांकन में लिंग अंतर को कम करने में पीछे हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि माध्यमिक स्तर पर नामांकन में लिंग अंतर को लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से संबोधित किया जाए, विशेष रूप से बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जहाँ लड़कियों की स्कूल छोड़ने की दर अधिक बनी हुई है।

(पैरा 3.41)

24.    समिति नोट करती है कि निपुण भारत मिशन ने कुछ सफलताएँ प्राप्त की हैं, किन्तु इसे इस वित्तीय वर्ष में समाप्त किए जाने की स्थिति में रखा गया है। समिति समुक्ति करती है कि इसे वर्ष 2032 तक अन्य 5 वर्षों के लिए विस्तारित किया जाए तथा इसके दायरे को कक्षा 3 से 5 तक के बच्चों को सम्मिलित करने हेतु विस्तृत किया जाए, जिसमें मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता के अतिरिक्त मौखिक पठन प्रवाहिता पर विशेष बल दिया जाए। समिति यह भी समुक्ति करती है कि मंत्रालय मिशन के विस्तारित फोकस को सक्षम बनाने तथा प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा, शिक्षण-अधिगम सामग्री तथा शिक्षकों के लिए क्षमता-विकास समर्थन हेतु वित्तपोषण को सुदृढ़ करने के लिए वार्षिक बजटीय आबंटन को ₹ 2,500 करोड़ से बढ़ाकर ₹ 6,000 करोड़ करने का प्रयास करे। इस वृद्धि से प्रति वर्ष 2.5 करोड़ से बढ़ाकर 6 करोड़ बच्चों तक पहुँच का विस्तार होगा, जबकि प्रति-बालक ₹ 1,000 का निवेश बनाए रखा जाएगा और कुल व्यय को राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा बजट के 1% से कम रखा जाएगा।

(पैरा 3.42)

25.    समिति यह भी समुक्ति करती है कि मंत्रालय कक्षा 5 के सभी विद्यार्थियों (सरकारी तथा निजी) के लिए एक जनगणना-आधारित आकलन पर विचार करे, जिससे तंत्र की स्थिति का निदान किया जा सके तथा विस्तारित निपुण भारत मिशन की पूर्णता के पश्चात् शीघ्र पाठ्यक्रम-संशोधन संभव हो सके। मंत्रालय बच्चों में शिक्षा के समर्थन के लिए प्रौद्योगिकी में हुई प्रगतियों का उपयोग करते हुए वैयक्तिक अनुकूलन अधिगम (पीएएल) उत्पादों के उपयोग पर भी विचार कर सकता है।

(पैरा 3.43)

26.    समिति नोट करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति सार्वभौमिक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का आह्वान करती है। समिति नोट करती है कि 5 वर्ष के बच्चों की शिक्षा पर शिक्षा मंत्रालय तथा महिला और बाल विकास मंत्रालय का संयुक्त रूप से कार्य करना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जिनकी टीकाकरण आदि से संबंधित स्वास्थ्य आवश्यकताएँ अधिकांशतः पूर्ण हो चुकी होती हैं और जो अधिगम के लिए तैयार होते हैं। मंत्रालय को 5 वर्ष के बच्चों के लिए उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान देते हुए एक लक्षित पैकेज विकसित करना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा कोई भी अधिगम नयाचार बाल वाटिकाओं और आंगनवाड़ियों में सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए।

(पैरा 3.44)

27.    समिति समुक्ति करती है कि वर्ष 2022-23 में इस योजना के अंतर्गत वास्तविक व्यय (एई) ₹ 12,680.97 करोड़ रहा, जो 10,233.75 करोड़ के बजट प्राक्कलन से अधिक था और 12,800 करोड़ के संशोधित प्राक्कलन के लगभग बराबर था। वर्ष 2023-24 में वास्तविक व्यय 11,600 करोड़ के बजट प्राक्कलन के मुकाबले घटकर 8,457.72 करोड़ रह गया। आगे, वर्ष 2024-25 में 12,467.39 करोड़ के बजट प्राक्कलन के मुकाबले वास्तविक व्यय 9,903 करोड़ रहा तथा वर्ष 2025-26 में 13 फरवरी 2026 तक 12,500 करोड़ के बजट प्राक्कलन के मुकाबले वास्तविक व्यय 6,639.22 करोड़ रहा है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि वर्ष दर वर्ष आबंटन और विद्यालयों द्वारा वास्तविक उपयोग के बीच अंतर बना हुआ है। समिति सिफ़ारिश करती है कि विभाग को पीएम पोषण के लिए वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही एक निश्चित त्रैमासिक निधि जारी करने का कार्यक्रम लागू करना चाहिए, ताकि निधि के उपयोग की व्यवस्थित निगरानी की जा सके। समिति यह भी सिफ़ारिश करती है कि वर्तमान में समग्र शिक्षा के अंतर्गत प्रायोगिक रूप से लागू किए जा रहे एसएनए-स्पर्श मॉडल को प्राथमिकता के आधार पर पीएम पोषण योजना तक विस्तारित किया जाए, ताकि निधि का प्रवाह वास्तविक व्यय के आधार पर हो, न कि एकमुश्त किश्तों में जो या तो बहुत देर से आती हैं या वित्तीय वर्ष के अंत के बहुत निकट पहुँचती हैं, जिससे उनका सुव्यवस्थित उपयोग कठिन हो जाता है।

(पैरा 3.51)

28.    समिति नोट करती है कि पीएम पोषण के अंतर्गत खाना पकाने की लागत के मानकों में 01.05.2025 से 9.5% की वृद्धि की गई है। इस संदर्भ में समिति का विचार है कि खाना पकाने की लागत के मानकों की कम से कम प्रत्येक दो वर्ष में एक बार व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए, जिसमें उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) से जुड़ी महँगाई को ध्यान में रखा जाए, ताकि भोजन की पोषणीय पर्याप्तता सुनिश्चित की जा सके।

(पैरा 3.52)

29.    समिति लाभार्थियों की संख्या में निरंतर गिरावट को नोट करती है, जो वर्ष 2022-23 में 12.16 करोड़ से घटकर वर्ष 2024-25 में 10.99 करोड़ हो गई है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग यह जाँच करे कि क्या यह गिरावट पात्र नामांकन में वास्तविक कमी को दर्शाती है या योजना के कवरेज में किसी कमी का संकेत है, तथा उसके अनुसार सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ।

(पैरा 3.53)

30.    समिति नोट करती है कि अनुपालन से संबंधित मुद्दों के कारण पश्चिम बंगाल को निधि जारी न होने से लाखों बच्चे पोषण संबंधी सहायता से वंचित हो रहे हैं। इसलिए समिति का विचार है कि ऐसे मामलों के लिए एक मैत्रीपूर्ण एवं शीघ्र समाधान तंत्र बनाया जाना चाहिए।

(पैरा 3.54)

31.    समिति का यह भी विचार है कि 3-6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए पीएम पोषण योजना के पूरक के रूप में आंगनवाड़ी केन्द्रों की भूमिका को औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए तथा राज्य स्तर पर स्कूल शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास (डब्ल्यूसीडी) विभाग की जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाना चाहिए।

(पैरा 3.55)

 

32.    समिति का विचार है कि एसटीएआरएस परियोजना में भाग लेने वाले छह राज्यों से प्राप्त सीखों का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए तथा उन्हें सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा किया जाना चाहिए, ताकि शैक्षणिक सुधार तथा मूल्यांकन सुधार के सफल मॉडलों को अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सके। समिति का यह भी विचार है कि विभाग को यह आकलन करना चाहिए कि एसटीएआरएस ढाँचे को अतिरिक्त राज्यों तक एक घरेलू योजना (बिना बाहरी वित्तपोषण) के रूप में विस्तारित किया जा सकता है या नहीं, क्योंकि इस परियोजना का सीखने के परिणामों पर स्पष्ट प्रभाव देखा गया है। इस संबंध में विभाग द्वारा समिति को अवगत कराया जाए।

(पैरा 3.60)

33.    समिति इस बात की सराहना करती है कि सभी छह एसटीएआरएस राज्यों ने राज्य मूल्यांकन प्रकोष्ठ स्थापित किए हैं, जो सीखने का एक प्रभावी केंद्र सिद्ध हुए हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि एसटीएआरएस के अंतर्गत सुदृढ़ की गई राज्य मूल्यांकन प्रणालियों को राष्ट्रीय परख ढाँचे के साथ एकीकृत किया जाए, ताकि मूल्यांकन प्रक्रियाओं की तुलनीयता तथा स्थायित्व सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 3.61)

34.    समिति नोट करती है कि यह परियोजना अपनी प्रारंभिक कार्यान्वयन अवधि मार्च 2027 में पूर्ण करने जा रही है। इस संदर्भ में समिति का मत है कि परियोजना के समापन के बाद सटीएआरएस से लाभान्वित राज्यों के लिए स्पष्ट संक्रमण योजना तैयार की जानी चाहिए, ताकि परियोजना के अंतर्गत प्राप्त उपलब्धियाँ बनी रहें। समिति यह भी अनुशंसा करती है कि सटीएआरएस के अंतर्गत संचालित शिक्षक प्रशिक्षण गतिविधियों को समग्र शिक्षा के अंतर्गत डीआईईटी उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) कार्यक्रम से जोड़ा जाए, जिससे इन गतिविधियों की निरंतरता बनी रहे।

(पैरा 3.62)

35.    समिति का विचार है कि परियोजना के समापन से पहले सीखने के स्तर, शिक्षक प्रदर्शन तथा विद्यालय शासन व्यवस्था पर परियोजना के प्रभाव का स्वतंत्र तृतीय-पक्ष मूल्यांकन कराया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, विभाग को साक्ष्य-आधारित शैक्षिक हस्तक्षेपों को विस्तार देने के लिए संभावित अगली योजना अथवा अंतरराष्ट्रीय विकास साझेदारों से अतिरिक्त वित्तपोषण की संभावनाओं का भी अन्वेषण करना चाहिए।

(पैरा 3.63)

 

36.    समिति नोट करती है कि उच्च बजट प्राक्कलन आबंटन के बावजूद, पिछले तीन वित्तीय वर्षों अर्थात 2023-24, 2024-25 और 2025-26 में पीएम श्री के अंतर्गत आवंटित निधि का उपयोग लगातार अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया है। इसके मुख्य कारणों में राज्यों द्वारा व्यय की धीमी गति, एसएनए खातों में निधि हस्तांतरण में विलंब, तथा तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल द्वारा अभी तक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर न करने के कारण योजना का कार्यान्वयन न होना शामिल है। अतः समिति अपने पूर्व 363वें प्रतिवेदन में की गई सिफ़ारिश को पुनः दोहराते हुए विभाग को सुझाव देती है कि संबंधित राज्य सरकारों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से इस मुद्दे का समाधान किया जाए और लंबित निधियों को प्राथमिकता के आधार पर जारी किया जाए।

(पैरा 3.68)

37.    समिति का विचार है कि पीएम श्री विद्यालयों के चयन मानदंडों की समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि भौगोलिक दृष्टि से संतुलित वितरण सुनिश्चित किया जा सके तथा आकांक्षी जिलों, जनजातीय क्षेत्रों तथा अल्पसंख्यक-बहुल क्षेत्रों के विद्यालयों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल सके। समिति यह भी मानती है कि पीएम श्री के संतृप्ति के सभी 21 घटकों की निगरानी विद्यालय-वार और राज्य-वार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डैशबोर्ड पर की जानी चाहिए तथा त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट जारी की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त इन विद्यालयों में अधिगम परिणामों में सुधार की निगरानी राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र परख के मूल्यांकन के माध्यम से की जानी चाहिए, जिसमें पूर्व एवं पश्चात् तुलनात्मक आँकड़े उपलब्ध हों ताकि शिक्षा तंत्र पर इनके प्रभाव को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जा सके।

(पैरा 3.69)

38.    समिति का यह भी विचार है कि पीएम श्री के क्रियान्वयन में समुदाय की भागीदारी तथा विद्यालय प्रबंधन समिति (एसएमसी) की भूमिका को सक्रिय रूप से प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि स्थानीय स्तर पर स्वामित्व की भावना विकसित हो सके।

(पैरा 3.70)

39.    समिति का विचार है कि पीएम श्री के अंतर्गत शिक्षक क्षमता निर्माण केवल बुनियादी ढाँचे तक सीमित न रहकर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसके लिए इन विद्यालयों के शिक्षकों हेतु एक सुदृढ़ सेवा-कालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार कर उसे ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डीआईईटी) के सीओई नेटवर्क के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए।

(पैरा 3.71)

40.    समिति, माननीय प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार 50वीं प्रगति बैठक में अनिवार्य किए गए संयुक्त सचिव स्तर के क्षेत्रीय दौरों की सराहना करती है तथा अनुशंसा करती है कि इन क्षेत्रीय दौरों को जारी रखा जाए और प्रत्येक राज्य में प्रति वर्ष कम से कम दो दौरों तक विस्तारित किया जाए।

(पैरा 3.72)

41.    समिति समुक्ति करती है कि उल्लास के लिए 2024-25 से 2026-27 तक लगातार चार वर्षों तक 160 करोड़ का स्थिर आबंटन देश में वयस्क निरक्षरता के व्यापक स्तर को देखते हुए अपर्याप्त है। समिति का विचार है कि अनुमानित 25 करोड़ से अधिक कार्यात्मक रूप से निरक्षर वयस्कों को ध्यान में रखते हुए आबंटन में महत्त्वपूर्ण वृद्धि की जानी चाहिए, ताकि वर्ष 2030 तक 15 वर्ष से अधिक आयु के सभी वयस्कों को साक्षर बनाने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

(पैरा 3.78)

42.    समिति सिफ़ारिश करती है कि एफएलएनएटी (बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान मूल्यांकन परीक्षा) सभी राज्यों में वर्ष में दो बार आयोजित किया जाना चाहिए तथा इसके परिणामों को लिंग, सामाजिक वर्ग तथा आयु समूह के आधार पर अलग-अलग प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

(पैरा 3.79)

 

43.     समिति समुक्ति करती है कि कुछ बड़े राज्य जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक और झारखंड में इस योजना के अंतर्गत निधि जारी करने की स्थिति कम या नगण्य रही है। समिति का विचार है कि विभाग को इन राज्यों में क्रियान्वयन संबंधी बाधाओं की प्राथमिकता के आधार पर समीक्षा और समाधान करना चाहिए।

(पैरा 3.80)

44.    समिति का विचार है कि उल्लास के अंतर्गत कार्यरत स्वयंसेवी शिक्षकों को उनकी प्रेरणा और सहभागिता बनाए रखने के लिए कम से कम सांकेतिक मानदेय/प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त योजना को दूरदराज़ क्षेत्रों में शिक्षार्थियों तक पहुँचने के लिए मोबाइल ऐप, सामुदायिक रेडियो तथा स्थानीय भाषा में डिजिटल सामग्री जैसे प्रौद्योगिकी मंचों का अधिक उपयोग करना चाहिए।

(पैरा 3.81)

 

45.    समिति का विचार है कि योजना के अंतर्गत स्थापित सामुदायिक अधिगम केंद्र (सीएलसी) का मानचित्रण कर उनकी कार्यक्षमता की नियमित निगरानी की जानी चाहिए तथा उन्हें राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) से प्रमाणन हेतु जोड़ा जाना चाहिए।

(पैरा 3.82)

46.    समिति इस बात की सराहना करती है कि केंद्रीय विद्यालय संगठन के संबंध में वित्तीय वर्ष 2024-25 तक सभी उपयोगिता प्रमाणपत्र समय पर मंत्रालय को प्रस्तुत कर दिए गए हैं और 31.03.2025 तक कोई अप्रयुक्त राशि शेष नहीं थी, केवल ₹ 6.94 लाख की नाममात्र राशि को छोड़कर, जिसे मंत्रालय को वापस कर दिया गया है।

(पैरा 4.7)

47.     समिति समुक्ति करती है कि केवीएस में शिक्षण तथा गैर-शिक्षण दोनों पदों में पर्याप्त कमी है (शिक्षण में लगभग 17% रिक्ति और गैर-शिक्षण में लगभग 28% रिक्ति)।केवीएस जैसे संगठन के लिए, जो बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा प्रदान करता है, इतनी अधिक रिक्तियां इसके सुचारु संचालन में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि विशेष रूप से प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) तथा स्नातकोत्तर शिक्षक (पीजीटी) के पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए, ताकि इन विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।

(पैरा 4.8)

48.    समिति का विचार है कि केन्द्रीय विद्यालयों में गैर-केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षण की व्यवस्था की नियमित निगरानी की जानी चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) तथा वंचित समुदायों के बच्चों को समान अवसर मिल सके।

(पैरा 4.9)

49.    समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020के ढांचे के अंतर्गत केवीएस अपने व्यापक संसाधनों और अवसंरचना का उपयोग करते हुए निकटवर्ती सरकारी विद्यालयों के लिए मेंटर संस्थान के रूप में कार्य करे तथा केन्द्रीय विद्यालयों के अधिगम परिणामों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मापा जाए।

(पैरा 4.10)

50.    समिति सिफ़ारिश करती है कि विभाग को नए केन्द्रीय विद्यालयों के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, विशेषकर उत्तर-पूर्वी राज्यों और अविकसित क्षेत्रों में, तथा इनके निर्माण कार्य को समयबद्ध कार्यक्रम के अंतर्गत पूरा किया जाना चाहिए।

(पैरा 4.11)

51.    समिति नवोदय विद्यालय समिति द्वारा निधियों के उपयोग की प्रवृत्ति की सराहना करती है, क्योंकि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में लगभग 100 प्रतिशत निधि उपयोग दर्ज किया गया है।

(पैरा 4.17)

52.    समिति समुक्ति करती है कि एनवीएस में शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों पदों में पर्याप्त रिक्तियां हैं (शिक्षण में लगभग 29.5% और गैर-शिक्षण में लगभग 26%)। समिति ने अपनी पूर्व के 363वें और 368वें प्रतिवेदनों में भी इन रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरने की आवश्यकता पर बल दिया था। अतः समिति अपनी पूर्व सिफारिशों को दोहराते हुए सिफ़ारिश करती है कि एनवीएस में शिक्षण एवं गैर-शिक्षण दोनों प्रकार की रिक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए। साथ ही संगीत, कला, शारीरिक शिक्षा और क्षेत्रीय भाषाओं के विशेषज्ञ शिक्षकों के पदों को भी एनवीएस द्वारा नियमित भर्ती अभियानों के माध्यम से शीघ्र भरा जाए।

(पैरा 4.18)

 

53.    समिति नोट करती है कि आवासीय विद्यालय मॉडल में छात्रों के सामने विशिष्ट मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ हो सकती हैं, विशेषकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020के बाद डिजिटल परिवर्तन के संदर्भ में। समिति विभाग को सिफ़ारिश करती है कि वर्तमान में प्रचलित अंशकालिक या अस्थायी नियुक्तियों के स्थान पर प्रत्येक जवाहर नवोदय विद्यालयों (जेएनवी) में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के स्थायी स्वीकृत पद सृजित किए जाएं। साथ ही, "छात्र कल्याण" के लिए बजट को डीडीजी में एनवीएस के संचालन व्यय के अंतर्गत एक पृथक उप-शीर्ष के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।

(पैरा 4.19)

54      समिति समुक्ति करती है कि एनवीएस के विद्यालयों में छात्राओं की संख्या उल्लेखनीय है। इसलिए समिति सिफ़ारिश करती है कि जेएनवी छात्रावासों में छात्राओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए 24×7 सीसीटीवी निगरानी सुनिश्चित की जाए, छात्रावास अधीक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाए, तथा यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के प्रावधानों के अनुपालन के संबंध में संवेदनशील बनाया जाए।

(पैरा 4.20)

55.    समिति का विचार है कि जेएनवी में कक्षा IX और कक्षा XI में लैटरल एंट्री की प्रक्रिया की नियमित निगरानी की जानी चाहिए, ताकि प्रक्रियागत विलंब के कारण सीटें रिक्त न रहें।

(पैरा 4.21)

56.    समिति समुक्ति करती है कि जेएनवी का पूर्व छात्र नेटवर्क काफी बड़ा है और इसमें देश-विदेश में सफल पदों पर कार्यरत लोग शामिल हैं। समिति का विचार है कि इस नेटवर्क का उपयोग वर्तमान छात्रों के मार्गदर्शन, कैरियर परामर्श और संस्थागत विकास के लिए किया जाना चाहिए। इस उद्देश्य से स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग को जेएनवी पूर्व छात्रों के लिए एक समर्पित पोर्टल स्थापित करने की दिशा में कार्य करना चाहिए, ताकि छात्रों और पूर्व छात्रों के बीच एक ही मंच पर संवाद संभव हो सके।

(पैरा 4.22)

57.    समिति का मत है कि एनवीएस को परिणाम-आधारित मूल्यांकन कराना चाहिए, जिसमें जेएनवी के छात्रों के अधिगम स्तरों की तुलना राष्ट्रीय औसत से की जाए, ताकि योजना के प्रभाव का दस्तावेजीकरण हो सके तथा सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सके।

(पैरा 4.23)

58.    समिति वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट प्राक्कलन में 681.79 करोड़ के बढ़े हुए आबंटन की सराहना करती है, जो बजट प्राक्कलन 2025-26 (593.71 करोड़) की तुलना में लगभग 14% की वृद्धि दर्शाता है। समिति पिछले कुछ वर्षों में निधि उपयोग की स्वस्थ प्रवृत्ति बनाए रखने के लिए एनसीईआरटी की सराहना करती है, यद्यपि इसमें और सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि वित्तीय वर्ष 2023-24 में उपयोग 71.45% और वित्तीय वर्ष 2024-25 में 92.26% दर्ज किया गया।

(पैरा 4.29)

59.    समिति एनसीईआरटी में रिक्तियों को नोट करती है और समुक्ति करती है कि 528 स्वीकृत अकादमिक पदों में से 130 पद रिक्त हैं। इसी प्रकार 271 स्वीकृत शिक्षण पदों में से 133 पद रिक्त हैं। समिति ने अपनी 349 वें प्रतिवेदन में यह सिफ़ारिश की थी कि इन रिक्तियों को 2023 के अंत तक समयबद्ध तरीके से भरा जाए, ताकि एनईपी 2020 का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके। इस अनुशंसा को 363 वें प्रतिवेदन में भी दोहराया गया था, फिर भी ये पद अभी तक रिक्त हैं। अतः समिति अपनी पूर्व सिफ़ारिशों को दोहराते हुए निर्देश देती है कि एनसीईआरटी सभी रिक्तियों, विशेषकर बैकलॉग रिक्तियों, को मिशन मोड में और अधिकतम 2026 के अंत तक भरने की कार्रवाई करे।

(पैरा 4.30)

60.    समिति सिफ़ारिश करती है कि एनसीईआरटी कक्षा IX से XII तक की नई पाठ्यपुस्तकों का विकास और प्रकाशन स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023के अनुरूप प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र करे। साथ ही एनसीईआरटी को पाठ्यपुस्तकों को संविधान की आठवीं अनुसूची की सभी भाषाओं तथा प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित करना चाहिए, ताकि मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके।

(पैरा 4.31)

61.     समिति कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को एक बुनियादी सार्वभौमिक कौशल के रूप में शामिल किए जाने का स्वागत करती है। समिति अनुशंसा करती है कि विभाग कक्षा 3 से आगे के लिए एआई और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग पाठ्यक्रम को वित्तीय वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही तक अंतिम रूप दे। इसके अतिरिक्त, इन मॉड्यूलों को 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं में विकसित किया जाना चाहिए ताकि समावेशिता सुनिश्चित हो सके। साथ ही एनसीईआरटी को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीज़ के साथ सहयोग कर विद्यालयों में कंटेंट क्रिएटर प्रयोगशालाओं की स्थापना करनी चाहिए, जैसा कि बजट भाषण 2026-27 में प्रस्तावित है।

(पैरा 4.32)

62.     समिति सिफ़ारिश करती है कि एनसीईआरटी परख के कार्यक्षेत्र का विस्तार कर इसमें स्कूल बोर्ड समकक्षता के लिए राष्ट्रीय मानक शामिल किए जाएं। विभिन्न राज्य बोर्डों के छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु एनसीईआरटी  कोकॉमन असेसमेंट ब्लूप्रिंटविकसित करना चाहिए, जो एनईपी 2020 में सोचे गए रटने की प्रवृत्ति के बजाय कौशल-आधारित मूल्यांकन पर आधारित हो।

(पैरा 4.33)

63.     समिति सिफ़ारिश करती है कि एनसीईआरटी को डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी का दर्जा प्रदान करने के प्रस्ताव को शीघ्र स्वीकृति दी जाए, जिससे एनसीईआरटी शिक्षा अनुसंधान में पीएचडी और पोस्ट-डॉक्टोरल कार्यक्रम प्रारंभ कर सके।

(पैरा 4.34)

64.    समिति का विचार है कि एनसीईआरटी को अपने रीजनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन (आरआईई) नेटवर्क का विस्तार करना चाहिए और उन्हें बेहतर अवसंरचना तथा पर्याप्त संकाय उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि वे शिक्षण-पद्धति उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य कर सकें। साथ ही समिति सिफ़ारिश करती है कि विभाग एनसीईआरटी के लिए अनुसंधान और नवाचारअनुदान को प्रतिवर्ष 10% बढ़ाए, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित अध्ययन तथा उसे आधुनिक विज्ञान और गणित पाठ्यक्रम में समाहित करने को बढ़ावा मिल सके।

(पैरा 4.35)

65.     समिति का विचार है कि एनसीईआरटी को अपने सभी पाठ्यपुस्तकों, शिक्षण-अधिगम सामग्री और शोध प्रकाशनों तक ओपन एक्सेस प्रदान करने के लिए एक मजबूत डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करना चाहिए।

(पैरा 4.36)

66.     समिति का विचार है कि एनसीईआरटी को अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे यूनेस्को, आईईए तथा पीआईएसए के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए, ताकि भारतीय विद्यालय शिक्षा के मानकों को वैश्विक स्तर पर तुलनीय बनाया जा सके।

(पैरा 4.37)

67.     समिति समुक्ति करती है कि सभी श्रेणियों में कुल स्वीकृत 154 पदों में से केवल 48 पदों पर ही कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि शेष 106 पद (कुल स्वीकृत पदों का 68.83%) रिक्त पड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त वर्ष 2021 से अब तक एनबीबी द्वारा कुल 222 व्यक्तियों की संविदा के आधार पर नियुक्ति की गई है। अतः समिति स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग तथा राष्ट्रीय बाल भवन (एनबीबी) को यह सिफ़ारिश करती है कि इन रिक्त पदों को स्थायी नियुक्तियों के माध्यम से प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र भरा जाए।

(पैरा 4.42)

68.     समिति का विचार है कि बजट प्राक्कलन 2026-27 में ₹ 30.51 करोड़ का आबंटन एनबीबी जैसी संस्था के महत्त्व और दायित्वों की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। इसलिए समिति अनुशंसा करती है कि संशोधित प्राक्कलन चरण में एनबीबी के लिए निधि आबंटन में पर्याप्त वृद्धि पर विचार किया जाए, जिससे संस्था अपनी गतिविधियों का विस्तार कर सके। इसके अतिरिक्त, निजी क्षेत्र की सीएसआर पहलों के साथ साझेदारी की संभावनाओं का भी अन्वेषण किया जाना चाहिए ताकि सरकारी वित्तपोषण को पूरक समर्थन मिल सके और एनबीबी की पहुँच का विस्तार हो सके।

(पैरा 4.43)

69.     समिति ने अपने 363 वें प्रतिवेदन में देश भर में भौगोलिक विस्तार के विषय में भी टिप्पणियाँ की थीं। अतः समिति अनुशंसा करती है कि राष्ट्रीय बाल भवन प्रत्येक राज्य की राजधानी और संघ राज्य क्षेत्रों  के मुख्यालय में क्षेत्रीय बाल भवनों की स्थापना करे, जिससे देशभर के बच्चों तक इसकी गतिविधियों की पहुँच बढ़ाई जा सके।इसके अतिरिक्त, एनबीबी को एक एकीकृत डिजिटल मंच विकसित करना चाहिए, जिससे दूरदराज़ क्षेत्रों के बच्चे भी ऑनलाइन माध्यम से इसकी गतिविधियों में भाग ले सकें। साथ ही, दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष कार्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए ताकि रचनात्मक गतिविधियों में समावेशी भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।

(पैरा 4.44)

70.     समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय बाल भवन अपने बच्चों के कार्यक्रमों के माध्यम से पारंपरिक कला रूपों और सांस्कृतिक परंपराओं का दस्तावेजीकरण और संरक्षण करे, जिससे यह संस्था सांस्कृतिक विरासत के एक महत्त्वपूर्ण भंडार के रूप में भी कार्य कर सके।

(पैरा 4.45)

71.     समिति समुक्ति करती है कि देश के कुल 14,71,473 विद्यालयों में से केवल 9,51,868 (64.69%) विद्यालयों में ही कंप्यूटर सुविधा उपलब्ध है, जबकि 9,33,987 (63.47%) विद्यालयों में ही इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है। समिति सिफ़ारिश करती है कि सभी माध्यमिक विद्यालयों में आईसीटी लैब की उपलब्धता के लक्ष्य को समयबद्ध कार्ययोजना के साथ निर्धारित किया जाए, जिसमें राज्य-वार लक्ष्य और वार्षिक मील के पत्थर निर्धारित हों।

(पैरा 5.4)

72.    समिति विद्यालयी पाठ्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शामिल करने के लिए उठाए गए कदमों का स्वागत करती है। इस संदर्भ में समिति का विचार है कि एआई को पाठ्यक्रम में शामिल करना एक सुविचारित, आयु-उपयुक्त तथा शिक्षाशास्त्र-आधारित ढांचे के माध्यम से किया जाना चाहिए, जिसे एनसीईआरटी, सीबीएसई,आईआईटी तथा विषय विशेषज्ञों के परामर्श से विकसित किया जाए। समिति का यह भी विचार है कि यद्यपि एआई आधारित शिक्षण बच्चों की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है, फिर भी यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग बच्चों के बचपन और उनकी मासूमियत के ह्रास का कारण न बने।

(पैरा 5.5)

73.    समिति सिफ़ारिश करती है कि दीक्षा मंच को एआई आधारित अनुकूली शिक्षण क्षमताओं से सुदृढ़ किया जाए तथा कम इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों के लिए ऑफलाइन-प्रथम संरचना विकसित की जाए। साथ ही स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 के अनुरूप नई पाठ्यपुस्तकों के साथ सामग्री का समय-समय पर अद्यतन किया जाए।

(पैरा 5.6)

74. समिति सिफ़ारिश करती है कि बजट भाषण 2026-27 में घोषित एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब्स को स्पष्ट कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा मूल्यांकन ढांचे के साथ शीघ्र क्रियान्वित किया जाए।

(पैरा 5.7)

75.    समिति नोट करती है कि सभी विद्यालयों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को आवश्यक बुनियादी अवसंरचना के रूप में माना जाना चाहिए। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग को डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकम्युनिकेशन्स और भारतनेट के साथ के साथ समन्वय स्थापित कर विशेषकर ग्रामीण विद्यालयों तक अंतिम छोर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करनी चाहिए। डिजिटल मंचों का उपयोग करने वाले छात्रों के डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता को सख्ती से सुरक्षित किया जाना चाहिए तथा डिजिटल सेवा प्रदाताओं के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।

(पैरा 5.8)

76.    समिति समुक्ति करती है कि बजट प्राक्कलन 2026-27 में एनईआर के लिए आबंटन 51,522.77 करोड़ है, जो बजट प्राक्कलन 2025-26 के 51,505.21 करोड़ की तुलना में केवल नाममात्र की वृद्धि दर्शाता है। यह वृद्धि क्षेत्र के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और व्यापक विद्यालय नेटवर्क को देखते हुए पर्याप्त नहीं है। हालाँकि संशोधित प्राक्कलन 2025-26 की तुलना में यह आबंटन लगभग 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। समिति का विचार है कि क्षेत्र की विशिष्ट विकासात्मक और शैक्षिक चुनौतियों का समाधान करने के लिए अधिक वित्तीय सहायता आवश्यक है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग को संशोधित प्राक्कलन चरण में एनईआर के लिए आबंटन बढ़ाने पर विचार करना चाहिए तथा शैक्षिक अवसंरचना, पहुँच और गुणवत्ता को सुदृढ़ करने के लिए खास कदम उठाने चाहिए।

(पैरा 5.12)

77.    समिति सिफ़ारिश करती है कि एनईआर के विद्यालयों में अवसंरचनात्मक कमियों, विशेषकर दूरस्थ और सीमा क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों के लिए, समग्र शिक्षा के अंतर्गत एक विशेष उप-योजना बनाई जाए। इसमें क्षेत्र की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और परिवहन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अधिक इकाई लागत प्रदान की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, एनईआर में शिक्षकों की भर्ती और तैनाती से जुड़ी चुनौतियों को राज्य सरकारों के साथ मिलकर दूर किया जाना चाहिए। विशेष रूप से दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों में स्थानांतरित किए जाने वाले शिक्षकों के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने पर भी विचार किया जाना चाहिए।

(पैरा 5.13)

 

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आरकेके


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