जल शक्ति मंत्रालय
नमामि गंगे कार्यक्रम की स्थिति
प्रविष्टि तिथि:
23 MAR 2026 5:03PM by PIB Delhi
नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत (जून 2014 से 15 मार्च 2026) के बाद से, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा विभिन्न कार्यान्वयन/निष्पादन एजेंसियों को 21,340 करोड़ रुपए वितरित किए गए हैं, जिसमें से 16025.97 करोड़ रूपए सीवेज उपचार परियोजनाओं के लिए है।
भारत सरकार ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के पुनरुद्धार के लिए नमामि गंगे कार्यक्रम (एनजीपी) का चरण-I मार्च 2021 तक लागू किया। इसके बाद, चरण-II को मार्च 2026 तक की अवधि के लिए स्वीकृत किया गया।
नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत, कुल 524 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 355 परियोजनाएं (68%) फरवरी 2026 तक पूरी हो चुकी हैं। पिछले पांच वर्षों में, कुल 208 परियोजनाएं पूरी हुई हैं। पिछले पांच वर्षों की प्रमुख उपलब्धियां निम्नलिखित हैं:
- पिछले 5 वर्षों में कुल 76 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाएं पूरी की गई हैं जिनकी संयुक्त उपचार क्षमता 3200 एमएलडी है।
- ii. इसके अतिरिक्त, 12,641 करोड़ रूपए की अनुमानित लागत से 71 नई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनका उद्देश्य 2,210 एमएलडी की अतिरिक्त उपचार क्षमता का सृजन करना है।
- औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए, दो परियोजनाएं अर्थात् मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) और जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी) पूरी हो चुकी हैं;
- iv. जैव विविधता संरक्षण: उत्तर प्रदेश के सात जिलों (मिर्जापुर, बुलन्दशहर, हापुड, बदायूं, अयोध्या, बिजनौर और प्रतापगढ़) में सात जैव विविधता पार्क और उत्तर प्रदेश (3), बिहार (1) और झारखंड (1) में 5 प्राथमिकता वाले वेटलेंड स्वीकृत किए गए हैं;
- एनएमसीजी ने राज्य वन विभाग के माध्यम से गंगा नदी के मुख्य धारा में एक फॉरेस्ट्री इंटरवेंशन प्रोजेक्ट लागू की है। लगभग 414 करोड़ रूपए के व्यय से 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया गया है;
- vi. केंद्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) द्वारा लागू किए गए विशेष परियोजना के तहत मछली जैवविविधता और नदी डॉल्फिन के शिकार आधार को संरक्षित करने तथा गंगा बेसिन में मछुआरों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए गंगा में कुल 203 लाख भारतीय मेजर कार्प (आईएमसी) के फिंगरलिंग्स का रैंच किया गया है।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून और राज्य वन विभाग के सहयोग से डॉल्फ़िन, ओटर, हिलसा, कछुए और घड़ियाल जैसी जलीय प्रजातियों के लिए विज्ञान आधारित प्रजाति पुनर्वास कार्यक्रम, बचाव और पुनर्स्थापन कार्यक्रम ने जैव विविधता में उल्लेखनीय सुधार दिखाया है, जिसमें डॉल्फ़िन, ओटर, हिलसा, कछुए और अन्य नदी प्रजातियों में वृद्धि हुई है;
- गंगा डॉल्फिन संरक्षण: गंगा डॉल्फिन सर्वेक्षणों में 28 नदियों में 8507 किमी का क्षेत्र शामिल था। गंगा डॉल्फिन की राष्ट्रव्यापी जनसंख्या स्थिति – 6324 है।
- ix. भारत की पहली डॉल्फिन बचाव एम्बुलेंस का विकास और उद्घाटन 13 जनवरी 2026 को माननीय मंत्री द्वारा भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में किया गया, जिससे सुरक्षित बचाव और स्थानांतरण संभव हुआ; 8 गंगा डॉल्फिन को बचाया गया और छोड़ा गया।
- नागरिकों द्वारा संचालित सून्स-साथी नेटवर्क (250 किमी में फैले 100 स्वयंसेवक), 160 प्रशिक्षित कर्मी, 2,000 जागरूक समुदाय सदस्य और 15 डॉल्फिन क्लबों ने पूर्व रिपोर्टिंग और संरक्षण जागरूकता अभियान को मजबूत किया।
- xi. घड़ियाल संरक्षण: 22 नदियों में किए गए घड़ियाल आकलन में 3,037 घड़ियाल दर्ज किए गए, जिसमें आवास मॉडल केवल 5.6% अत्यधिक उपयुक्त आवास का संकेत हैं, जो प्रवाह विनियमन और आवास संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- संकटग्रस्त कछुआ प्रजातियों में 15 (10 रेडियो टैग वाली) केपटिव हेच्ड चित्रा इंडिका, 60 हार्डेला थुरजी (10 रेडियो टैग वाली) और 20 बाटागुर कचुगा (सभी रेडियो टैग वाली) शामिल हैं, जिन्हें यमुना, सरजू और गंगा नदियों में सुदृढ़ निगरानी प्रोटोकॉल के साथ पुनः वन्य जीवन में छोड़ा गया है। प्रसार और सर्वाइवल मैप तैयार हैं।
- चंबल में नदी किनारे स्थित दो हैचरी के माध्यम से लुप्तप्राय बटागुर कछुआ प्रजाति के कुल 387 संवेदनशील घोंसलों (8257 अंडे) को संरक्षित किया गया। इससे 7979 अंडों से निकले बच्चों को सुरक्षित रूप से नदी में वापस छोड़ा गया, जिससे कुल मिलाकर 96.7% अंडों से बच्चे निकलने की सफलता दर प्राप्त हुई।
- उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के 210 किलोमीटर क्षेत्र में एसएमएआरटी-आधारित नदी गश्त के संस्थानीकरण के माध्यम से प्रौद्योगिकी-संचालित संरक्षण को आगे बढ़ाया गया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), गंगा नदी के पांच मुख्य धारा वाले राज्यों - उत्तराखंड-19; उत्तर प्रदेश-41; बिहार-33; झारखंड-04; और पश्चिम बंगाल-15 में 112 स्थानों पर गंगा नदी की जल गुणवत्ता की मैन्युअल निगरानी करता है। प्रदूषित नदी खंड (पीआरएस) 2025 के संबंध में सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के मुख्य धारा में प्रदूषण के संबंध में निम्नलिखित जानकारी उपलब्ध है:
गंगा का मुख्य धारा – राज्य-वार तुलना (वर्ष 2018 बनाम वर्ष 2025)
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राज्य
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वर्ष 2018 में प्रदूषित खंड
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प्राथमिकता
(वर्ष 2018)
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वर्ष 2025 में प्रदूषित खंड
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प्राथमिकता
(वर्ष 2025)
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प्रचलन/अवलोकन
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उत्तराखंड
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हरिद्वार→
सुल्तानपुर
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IV
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कोई पीआरएस नहीं
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—
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सुधार किया गया और पीआरएस खंड को हटा दिया गया
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उत्तर प्रदेश
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कन्नौज→ वाराणसी
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IV
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बिजनौर→ तारीघाट
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IV / V
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आंशिक रूप से सुधार किया गया
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बिहार
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बक्सर से भागलपुर
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V
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भागलपुर डी/एस → खलगांव डी/एस
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V
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आंशिक प्रदूषण शेष है
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झारखंड
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कोई पीआरएस नहीं
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—
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कोई पीआरएस नहीं
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—
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—
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पश्चिम बंगाल
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त्रिवेणी→ डायमंड बंदरगाह
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III
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बहरामपुर→डायमंड बंदरगाह
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V
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सुधार किया गया
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वर्ष 2025 (जनवरी से अगस्त) के लिए गंगा नदी के जल गुणवत्ता आंकड़ों (माध्य मान) के आधार पर, निम्नलिखित अवलोकन किए गए हैं:
(i). पीएच और घुलित ऑक्सीजन (डीओ) नदी की स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण मानदंड हैं। गंगा नदी का पीएच और डीओ, गंगा नदी के सभी स्थानों पर स्नान के मानदंडों के लिए अपेक्षित मानकों को पूरा करता है।
(ii). उत्तराखंड, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में गंगा नदी के पूरे खण्ड में निम्नलिखित स्थानों/खण्डों को छोड़कर गंगा नदी की जल गुणवत्ता - जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) के संबंध में स्नान के मानदंडों के अनुरूप है:
- फर्रुखाबाद से पुराना राजापुर, कानपुर।
- डलमऊ, रायबरेली।
- उत्तर प्रदेश में डी/एस मिर्ज़ापुर से तारीघाट, ग़ाज़ीपुर (दो स्थानों को छोड़कर, अर्थात् यू/एस वाराणसी, संगम के बाद गोमती और यू/एस ग़ाज़ीपुर)।
(iii). सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड और झारखंड में गंगा नदी के पूरे खण्ड और उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में स्नान के लिए फीकल कोलीफॉर्म (मध्यिका) प्राथमिक जल गुणवत्ता मानदंड पूरा होता है, जबकि उत्तराखंड, बिहार और झारखंड में गंगा नदी के पूरे खण्ड और उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में स्नान के लिए फीकल स्ट्रेप्टोकोकोई (मध्यिका) प्राथमिक जल गुणवत्ता मानदंड पूरा होता है। हरकी पौड़ी घाट पर फीकल कोलीफॉर्म (एफसी) का मान वर्ष 2025 में 135 एमपीएन/100 मिलीलीटर और हरिद्वार के पास 140 एमपीएन/100 मिलीलीटर है। वाराणसी के अस्सीघाट पर एफसी का औसत मान वर्ष 2014 में 2500 एमपीएन/100 मिलीलीटर और वर्ष 2025 में 790 एमपीएन/100 मिलीलीटर है। पटना के एनआईटी गांधी घाट पर एफसी का औसत मान वर्ष 2014 में 5400 एमपीएन/100 मिलीलीटर और वर्ष 2025 में 2200 एमपीएन/100 मिलीलीटर है, और पटना में गंगा पुल के पास एफसी का औसत मान वर्ष 2014 में 3000 एमपीएन/100 मिलीलीटर और वर्ष 2025 में 1950 एमपीएन/100 मिलीलीटर है।
गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 50 स्थानों और यमुना नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 26 स्थानों पर वर्ष 2024-25 के दौरान की गई जैव निगरानी के अनुसार, जैविक जल गुणवत्ता (बीडब्ल्यूक्यू) मुख्य रूप से 'अच्छी' से 'मध्यम' श्रेणी में पाई गई। विभिन्न प्रकार की बेंथिक मैक्रो-इनवर्टेब्रेट्स प्रजातियों की उपस्थिति नदियों के जलीय जीवन को बनाए रखने की पारिस्थितिक क्षमता को दर्शाती है।
यह सूचना जल शक्ति राज्यमंत्री श्री राज भूषण चौधरी द्वारा राज्यसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।
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एनडी
(रिलीज़ आईडी: 2244010)
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