जनजातीय कार्य मंत्रालय
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जनजातीय मंत्रालय ने प्रीमियम सिग्नेचर ब्रांड “रीसा: टाइमलेस ट्राइबल” का शुभारंभ किया

प्रविष्टि तिथि: 18 MAR 2026 5:29PM by PIB Delhi

भारत की समृद्ध आदिवासी विरासत को वैश्विक फैशन और जीवनशैली में अग्रणी बनाने की दिशा में एक अभूतपूर्व पहल के तहत, जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने 18 मार्च 2026 को नई दिल्ली के सुंदर नर्सरी में एक प्रीमियम सिग्नेचर ब्रांड, "रीसा: टाइमलेस ट्राइबल" का शुभारंभ किया। इस अवसर पर महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर, जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा,  संयुक्त सचिव श्री अनंत प्रकाश पांडे, टीआरआईएफईडी के एमडी श्री एम. राजामुरुगन और प्रसिद्ध डिजाइनर श्री मनीष त्रिपाठी उपस्थित थे।

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जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुअल ओराम ने इस अवसर पर अपने संबोधन में कहा कि जनजातीय शिल्प कालातीत हैं फिर भी उसका महत्व कम आंका जाता है। भारत ट्राइब्स फेस्ट और रीसा जैसे मंच बाजार तक पहुंच और उचित लाभ-साझाकरण के माध्यम से इस अंतर को पाट रहे हैं।

महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने जनजातीय समुदाय के विकास की दिशा में सरकार के निरंतर प्रयासों का उल्‍लेख करते हुए कहा कि विभिन्न मंचों के माध्यम से सरकार विकास सुनिश्चित कर रही है।  बीटीएफ और आरआईएसए जैसी पहल इस इकोसिस्‍टम को मजबूत कर रही हैं, बाजार तक पहुंच बढ़ा रही हैं और जनजातीय समुदायों को 'वोकल फॉर लोकल' की परिकल्पना में बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम बना रही हैं।

जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा ने समान मूल्य वितरण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि बढ़ती मांग के बावजूद, लाभ अक्सर जनजातीय कारीगरों तक नहीं पहुंच पाता।  रीसा का उद्देश्य जमीनी स्तर पर निष्पक्ष लाभ-साझाकरण सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कि रीसा  नाम हाथ से बुने हुए त्रिपुरा के पारंपरिक शॉल से प्रेरित है, जो पहचान, संस्कृति और रोजमर्रा की शान का एक स्थायी प्रतीक है।  इसे पुरुष और महिलाएं दोनों पहनते हैं। देशभर में व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त गमछे की तरह रीसा  भी उतनी ही परिचित और उपयोगी है, जो इसे अपनी जड़ों से गहराई से जोड़ती है और पूरे देश में प्रासंगिक बनाती है। रीसा नाम को बरकरार रखते हुए,  यह ब्रांड अपनी प्रामाणिक आदिवासी जड़ों का सम्मान करता है और साथ ही इसे एक ऐसे वस्त्र के रूप में स्थापित करता है जिसे पूरे देश में अपनाया जा सकता है। यह स्थानीय विरासत को साझा भारतीय पहचान से भी सहजता से जोड़ता है।

प्रसिद्ध डिजाइनर श्री मनीष त्रिपाठी ने कहा कि भारत में डिजाइन हमेशा से औपचारिक स्टूडियो की सीमाओं से परे रहा है। उन्होंने कहा कि भारत में डिजाइन कभी भी स्टूडियो तक सीमित नहीं रहा है। यह यहां के लोगों, इसकी परंपराओं और इसकी शाश्वत सांस्कृतिक स्मृति में जीवित है। रीसा सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि एक सह-सृजन है, जहां हर बुनाई, हर आकृति और हर बारीकी विरासत के सच्चे संरक्षक अर्थात कारीगरों के हाथों से आकार लेती है।

ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक श्री एम. राजामुरुगन ने धन्यवाद प्रस्‍ताव पेश करते देते हुए रीसा के सफल अनावरण में योगदान देने वाले सभी भागीदारों, कारीगरों, डिजाइनरों और हितधारकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि समृद्ध पारंपरिक ज्ञान पर आधारित और समकालीन डिजाइन संवेदनाओं से परिपूर्ण, रीसा आज सामुदायिक नेतृत्व वाले उत्पादन और समावेशी विकास का एक सशक्त प्रतीक है, जो भारत के जनजातीय समुदायों की शक्ति, रचनात्मकता और उद्यमशीलता को प्रतिबिंबित करता है।

प्रीमियम सिग्नेचर ब्रांड रीसा का उद्देश्य जनजातीय करघों और शिल्प परंपराओं को संरक्षित करना और जनजातीय कपड़े/परिधान, कढ़ाई तथा हस्तशिल्प के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित करना और उनमें रुचि पैदा करना है। इस पहल का लक्ष्य जनजातीय उत्पादों के लिए एक अनूठी ब्रांड पहचान बनाना है, जिससे भारत के जातीय समुदायों की शिल्पकारी को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रीमियम बाजारों में उचित स्थान मिल सके। रीसा को पारंपरिक तकनीकों और समकालीन मांग के बीच की खाई को पाटने के लिए डिजाइन किया गया है। जनजातीय कार्य मंत्रालय के उप-सचिव एनएस राजी के अनुसार, परियोजना के पहले चरण में 10 क्लस्टर शामिल होंगे, जिनमें पांच में जनजातीय बुनाई, दो में कढ़ाई और तीन में शिल्प शामिल होंगे।

 

इस पहल के उद्देश्य इस प्रकार हैं:

  • नये डिजाइन तैयार करना: आदिवासी बुनाई, कढ़ाई और हस्तशिल्प के लिए नए डिजाइन तैयार करना और नए उत्पाद बनाना। इससे शिल्प पुनरुद्धार, उत्पाद विकास और कारीगरों के एकीकरण के लिए नए डिजाइनों और पैटर्न का एक अनुकरणीय ढांचा भी तैयार होगा।
  • क्षमता निर्माण: उच्च मूल्य वाले बाजारों के लिए उच्च स्तरीय उत्पादन हेतु आदिवासी बुनकरों और कारीगरों के कौशल को बढ़ाने और उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए उनका प्रशिक्षण और क्षमता विकास करना। इससे जनजातीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक दोनों रूप से सशक्त बनाया जा सकेगा।
  • अवसंरचना: बुनाई और हस्तशिल्प समूहों का विकास किया जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य मौजूदा बुनाई समूहों में सिलाई इकाइयां स्थापित करना भी है।
  • प्रीमियम पैकेजिंग: हरियाणा के राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान (एनआईडी) ने अनुकूलित सेगमेंट के लिए टिकाऊ, पर्यावरण के अनुकूल प्रीमियम पैकेजिंग विकसित की है।

 

इस उत्पाद का शुभारंभ राष्ट्रीय डिजाइन केंद्र (एनडीसी) द्वारा नियुक्त प्रसिद्ध फैशन डिजाइनरों के साथ रणनीतिक साझेदारी पर आधारित है। अबू जानी, संदीप खोसला, मनीष त्रिपाठी, अंजू मोदी, गौरव जय गुप्ता और समीरा दलवी सहित कई प्रसिद्ध डिजाइनर इस परियोजना में मंत्रालय के साथ सहयोग कर रहे हैं।

 

रीसा के शुभारंभ के पहले चरण में देश की कुछ सबसे प्रतिष्ठित बुनाई और शिल्पकलाओं का चुनिंदा संग्रह शामिल है।

क्रमांक

बुनाई/कढ़ाई

शामिल समुदाय

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश

1.

एरी रेशम

 

बोडो

असम

2.

संथाल कपास

 

संथाल

झारखंड

3.

चांगपा पश्मीना

 

चांगपा

लद्दाख

4.

कोटपैड कपास

 

मिर्गन

ओडिशा

5.

मुगा रेशम

मिरी (मिसिंग)

असम

 

6.

डोंगरिया कढ़ाई

 

डोंगरिया कोंध

ओडिशा

7.

टोडा कढ़ाई

 

टोडा

तमिलनाडु

 

इसके अलावा, यह ब्रांड लॉन्गपी पॉटरी (मणिपुर), तुरतुक ब्रास कटलरी (लद्दाख) और विश्व प्रसिद्ध डोखरा कला (छत्तीसगढ़) सहित विशेष हस्तशिल्प का भी प्रदर्शन करेगा।

 

रीसा देश की अनूठी सांस्कृतिक विशेषताओं के संरक्षण में एक नया अध्याय जोड़ते हुए तथा आदिवासी बहुल क्षेत्रों के आर्थिक उत्थान को गति प्रदान करते हुए महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य की पूर्ति करता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप  यह पहल भारत के विकास में आदिवासी समुदायों के महत्वपूर्ण योगदान को मजबूत करती है और साथ ही साथ सतत आजीविका, मूल्यवर्धन तथा स्वदेशी शिल्प कौशल को वैश्विक मान्यता भी प्रदान करती है।

रीसा: अतीत से आगे-अतीत से प्रेरित, भविष्य के लिए कल्पनाशील!

 

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