राज्यसभा सचिवालय
विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति का 405वां प्रतिवेदन
प्रविष्टि तिथि:
13 MAR 2026 6:12PM by PIB Delhi
श्री भुबनेश्वर कालिता, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग संबंधित विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) के संबंध में अपना 405वां प्रतिवेदन 9 मार्च, 2026 को संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया/सभा पटल पर रखा। समिति ने 9 मार्च, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में प्रारूप प्रतिवेदन पर विचार किया और उसे स्वीकार किया। समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई सिफारिशें/समुक्तियां संलग्न हैं।
2. संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs पर भी उपलब्ध है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
की अनुदान मांगों (2026-27) के संबंध में
405वां प्रतिवेदन
सिफारिशें / समुक्तियां - एक नजर में
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए बजटीय विवरण और 2026-27 के लिए आवंटन
समिति नोट करती है कि वर्ष 2024-25 और 2025-26 में मंत्रालय द्वारा निधियों का उपयोग वर्ष 2023-24 की तुलना में कम रहा, जब उसने आवंटित धन का 96% से अधिक उपयोग किया था। मंत्रालय 2024-25 में दी गई निधि का 72.35% उपयोग कर पाया। मंत्रालय वर्ष 2025-26 में अपने ₹3481.61 करोड़ के आरई आवंटन का केवल 67.87% (31.1.2026 की स्थिति के अनुसार) उपयोग कर पाया है। समिति ने वर्ष 2025-26 के शेष हिस्से में आवंटन के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय द्वारा उठाए जा रहे कदमों को नोट करती है और सिफारिश करती है कि मंत्रालय को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने चाहिए कि उसे आवंटित धन का अधिकतम संभव उपयोग हो सके।
(पैरा 2.4)
समिति ने आगे नोट किया कि 2026-27 में ₹3759.46 करोड़ का ब.अ. आवंटन, वर्ष 2025-26 के ₹3412.82 के ब.अ. आवंटन से लगभग 10 प्रतिशत ज़्यादा है। समिति ने सिफारिश की है कि मंत्रालय को अगले वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ही अतिसक्रिय प्रयास करने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वित्तीय वर्ष के दौरान उसे आवंटित की गई निधियों का इष्टतम उपयोग हो।
(पैरा 2.5)
केन्द्रीय क्षेत्र की योजनाएं
समिति नोट करती है कि हालांकि केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं के लिए बजट आवंटन को ब.अ. 2025-26 में ₹1060.56 करोड़ से बढ़ाकर सं.अ. 2025-26 में ₹1451.52 करोड़ कर दिया गया था, फिर भी मंत्रालय केवल ₹888.22 करोड़ (31.01.2026 की स्थिति के अनुसार) का ही उपयोग कर पाया। चार में से तीन घटकों यानी ‘पर्यावरण ज्ञान और क्षमता निर्माण’, ‘राष्ट्रीय तटीय प्रबंधन कार्यक्रम’ और ‘प्रदूषण नियंत्रण’ में निधि का कम उपयोग हुआ है। समिति यह भी नोट करती है कि कम उपयोग का प्रमुख कारण ‘प्रदूषण नियंत्रण’ योजना है। समिति सिफारिश करती है कि वर्ष 2025-26 में आवंटित धन के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएँ।
(पैरा 4.5)
प्रदूषण नियंत्रण
समिति ने पिछले तीन वर्षों में ‘प्रदूषण नियंत्रण’ योजना का वित्तीय प्रदर्शन देखा है। समिति ने यह नोट किया कि 2025-26 में, मंत्रालय ₹1300 करोड़ के बढ़े हुए सं.अ. आवंटन में से ₹814.26 करोड़ (31.1.2026 तक) का उपयोग कर पाया है। समिति ने यह तथ्य नोट किया कि वर्ष 2025-26 के लिए ‘प्रदूषण नियंत्रण’ योजना के बजट आवंटन को ₹853.9 करोड़ से बढ़ाकर ₹1300 करोड़ किया गया है। देश में पर्यावरणीय प्रदषूण सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए एक बड़ा, निरंतर खतरा है और इसलिए, इसके नियंत्रण हेतु दी गई निधियों का सही उपयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति यह सलाह देती है कि मंत्रालय को सुधार के उपाय करने चाहिए, काम की वित्तीय और भौतिक प्रगति की निगरानी करने के लिए एक मजबूत निगरानी प्रणाली बनानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ‘प्रदषूण नियंत्रण’ के तहत दी गई निधियों का अगले वित्तीय वर्ष में में पूरी तरह उपयोग हो, ताकि वांछित परिणाम प्राप्त हों।
(पैरा 5.5)
समिति ने समुक्ति की कि चालू वित्तीय वर्ष के अक्तूबर-फरवरी अवधि के अधिकांश समय के दौरान दिल्ली एनसीआर में वायु गुणवत्ता खराब और उससे नीचे के स्तर में बनी रही। समिति का मानना है कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक मजबूत योजना की आवश्यकता है और समिति ने सिफारिश की है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को दिल्ली एनसीआर की सरकार के समन्वय में लंबे समय से चली आ रही इस समस्या को दूर करने के लिए एक दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए।
(पैरा 5.6)
पर्यावरण शिक्षा, जागरूकता, अनुसंधान और कौशल विकास
समिति ने 'पर्यावरण शिक्षा, जागरूकता, अनुसंधान और कौशल विकास' के तहत निधियों के कम उपयोग के लिए मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत कारणों को नोट किया। समिति का मत है कि मंत्रालय द्वारा निधियों के कम उपयोग के लिए प्रस्तुत कारण अधिकांशतः प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक प्रृकति के हैं। समिति पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को सिफारिश करती है कि आवंटित संसाधनों के उपयोग के लिए अपनी प्रशासनिक और निगरानी तंत्र को और सुदृढ़ बनाए और यह सुनिश्चित करे कि योजनाओं के लिए निधियों का कम उपयोग न हो।
(पैरा 6.4)
समिति सिफारिश करती है कि पर्यावरण शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए और सभी एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में राज्य सरकारों को इसका एक अभिन्न अंग बनाया जाए। मंत्रालय इस मामले पर शिक्षा मंत्रालय (स्कूली बच्चों और साक्षरता विभाग तथा उच्चतर शिक्षा विभाग) के साथ भी चर्चा कर सकता है ताकि पर्यावरण जागरूकता और शिक्षा को स्कूल जानेवाले बच्चों के पाठ्यक्रम में एकीकृत किया जा सके और भविष्य की पीढ़ियों के मन में शुरुआत से ही पर्यावरणीय जागरूकता और संरक्षण का भाव समाहित हो और उन्हें पर्यावरणीय रूप से जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद मिले।
(पैरा 6.6)
केन्द्रीय प्रायोजित स्कीमें
समिति यह समुक्ति करती है कि इस शीर्षक के अंतर्गत बीई 2025-26 के लिए ₹720.00 करोड़ का आवंटन आरई चरण में घटकर ₹391.75 करोड़ हो गया, जो बीई आवंटन का मात्र 55 प्रतिशत है। इस घटे हुए आरई आवंटन में से मंत्रालय 31 जनवरी 2026 तक केवल ₹256.31 करोड़ ही व्यय कर पाया, अर्थात आवंटित राशि का 65.40 प्रतिशत। समिति यह भी समुक्ति करती है कि घटे हुए आरई के कारण इस योजना के सभी उप-योजनाओं में आवंटन में कमी हुई। एक प्रमुख योजना, राष्ट्रीय हरित भारत मिशन, पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। समिति इस बात को लेकर भी चिंतित है कि प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण पर आरई के ₹30.48 करोड़ में से केवल 60% अर्थात ₹18.27 करोड़ ही व्यय हुए हैं।
(पैरा 7.2)
हरित भारत के लिए राष्ट्रीय मिशन
समिति यह समुक्ति करती है कि राष्ट्रीय हरित भारत मिशन के लिए ₹220.00 करोड़ की बीई 2025-26 आवंटन राशि को आरई चरण में ₹95.70 करोड़ तक कम कर दिया गया, जो कि बीई आवंटन का लगभग 44 प्रतिशत है। फिर, ₹95.70 करोड़ की घटी हुई आवंटन राशि में से मंत्रालय 31 जनवरी 2026 तक केवल ₹40.95 करोड़ ही उपयोग कर सका, अर्थात् आरई आवंटन का लगभग 43 प्रतिशत। मंत्रालय को मूल रूप से स्वीकृत बजट अनुमान या कम किए गए संशोधित अनुमान आवंटन के उपयोग में तेजी लाने के लिए एक कार्य योजना तैयार करनी चाहिए। चालू वित्त वर्ष के दौरान उपलब्ध निधियों के पूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना चाहिए। मंत्रालय ने आरई चरण में आवंटन में कटौती का कोई कारण नहीं बताया है। समिति का मानना है कि यद्यपि आरई में कटौती ने योजना के तहत गतिविधियों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया, लेकिन मंत्रालय भी अपनी ओर से जनवरी माह तक उपलब्ध निधियों का वांछित सीमा तक उपयोग करने में सक्षम नहीं रहा है। समिति पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सिफारिश करती है कि वह इस योजना के तहत धन उपयोग की धीमी प्रगति की जांच करे और यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय करे कि ऐसे धन का अपर्याप्त उपयोग न हो।
(पैरा 8.5)
वन अग्नि निवारण और प्रबंधन
समिति यह नोट करती है कि यद्यपि इस शीर्ष में व्यय 2023-24 और 2024-25 के दौरान संतोषजनक रहा है, तथापि वर्तमान वित्तीय वर्ष के दौरान अब तक उपयोग की दर धीमी रही है, क्योंकि ₹33.25 करोड़ के कम किए गए संशोधित अनुमान आवंटन में से केवल ₹15.52 करोड़ ही खर्च किए गए हैं।
(पैरा 9.3)
समिति यह भी समुक्ति करती है कि देश में जंगल में आग लगने की घटनाओं की बारंबारता बढ़ गई है और इसका पर्यावरण, वन, जैव विविधता और वन्यजीवों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। उत्तराखंड में हर साल गर्मियों में जंगलों में आग लग जाती है। ऐसे परिदृश्य में, समिति का मानना है कि न सिर्फ़ ऐसी घटनाओं को कम करने की ज़रूरत है, बल्कि जंगल की आग बुझाने के लिए एक प्रोटोकॉल बनाने की भी ज़रूरत है, जिसे हिमालयी इलाके में किसी भी जंगल में आग लगने पर फ़ॉलो किया जा सके। समिति यह भी समझती है कि अब जंगल की आग बुझाने के लिए आधुनिक उन्नत प्रौद्योगिकियाँ उपलब्ध हैं, जिसमें जंगल की आग प्रारंभिक पहचान, अलर्ट, कारण और प्रकृति बताने के साथ-साथ उसे बुझाने के लिए सैटेलाइट और ड्रोन का इस्तेमाल भी शामिल है। अतः समिति यह भी सिफारिश करती है कि मंत्रालय को उपलब्ध नवीनतम तकनीकों का पता लगाना चाहिए ताकि वन आग से होने वाले पारिस्थितिक नुकसान को कम करने के लिए सक्रिय, एआई और डेटा-संचालित रोकथाम और प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया जा सके और इस संबंध में राज्य सरकारों को पर्याप्त बजटीय सहायता प्रदान करनी चाहिए।
(पैरा 9.4)
वन्यजीव आवासों का एकीकृत विकास
यह समिति पाती है कि पिछले दो वित्तीय वर्षों के दौरान ‘वन्यजीव आवासों के समेकित विकास’ के अंतर्गत मंत्रालय का प्रदर्शन अत्यंत उत्कृष्ट रहा है। चूंकि मंत्रालय ने 31 जनवरी 2026 तक आवंटन का लगभग 75% उपयोग कर लिया है, इसलिए समिति आशा करती है कि मंत्रालय इस वित्तीय वर्ष में इस शीर्षक के तहत आवंटन का पूरी तरह से उपयोग कर पाएगा।
(पैरा 10.2)
प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट
केंद्र से वित्तपोषित योजनाएं राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को कार्यान्वित करने, राज्यों के बीच असमानता को कम करने और एक समान विकास सुनिश्चित करने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। समिति को ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट’ में मंत्रालय का वित्तीय प्रदर्शन संतोषजनक लगा। समिति इस बात से सहमत है कि कुछ ज़रूरी प्रशासनिक कारणों से व्यय की गति धीमी हो गई थी। समिति इस बात से भी सहमत है कि इस योजना के तहत निधि की ज़रूरत काफी ज़्यादा है, क्योंकि हाल के सालों में बाघ अभ्यारण्य, बाघ की आबादी, लैंडस्केप कवरेज और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं की संख्या बढ़ी है। इसलिए, समिति ने यह सलाह दी है कि मंत्रालय को सुरक्षा, पुनर्वास और संघर्ष कम करने की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए इस शीर्ष में और निधि देने पर विचार करना चाहिए।
(पैरा 11.7)
मानव-पशु संघर्ष के मामलों में कमी की आवश्यकता
समिति ने समुक्ति की है कि यद्यपि मंत्रालय ने बताया कि वे मानव-पशु संघर्ष के मामलों को कम करने के लिए बहुत मेहनत कर रहे हैं, फिर भी ऐसी घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। समिति को लगता है कि वन क्षेत्र के मुकाबले बाघों और तेंदुओं की संख्या बढ़ गई है, और इसलिए उनके रहने की जगह की कमी हो गई है। समिति ने सिफारिश की है कि इन जानवरों को आबादी वाले इलाकों में आने से रोकने के लिए हर मुमकिन कदम उठाए जाने चाहिए ताकि वे सिर्फ जंगल के इलाकों तक ही सीमित रहें। जंगल के इलाकों में बाघों और तेंदुओं के लिए बचाव केंद्र बनाने के लिए उचित निधियां दी जा सकती हैं ताकि वे जंगल का इलाका न छोड़ें। मंत्रालय इस खतरे से निपटने और मानव-पशु संघर्ष के मामलों को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप पर भी विचार कर सकता है।
(पैरा 12.2)
सीएएमपीए निधियों से औषधीय पौधों का रोपण
औषधीय पौधे अपनी उपचार क्षमता और बायोएक्टिव कंपाउंड की वजह से पारंपरिक और आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा रहे हैं। औषधीय पौधे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं, जैसे पुरानी बीमारियों, संक्रमण और चपापचयी संबंधी विकारों के लिए कम दुष्प्रभाव वाले प्राकृतिक, सस्ता इलाज प्रदान करते हैं। इन पारंपरिक पौधों का ज़्यादा से ज़्यादा लाभ लेने के लिए, ऐसे पौधों की उपलब्धता अनिवार्य हो जाती है। इसके दृष्टिगत, समिति ने पुरजोर सिफारिश की है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि खराब इलाकों में पेड़ लगाने के मामले में, सीएएमपीए निधि से लगाए गए पौधों में से कम से कम 25 प्रतिशत पौधे औषधीय पौधे हों, जो उस खास पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उपयुक्त हों। मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पेड़ लगाने से कार्बन सिंक और जैव विविधता को ठीक करने में अर्थपूर्ण योगदान हो न कि सिर्फ़ अल्पकालिक लक्ष्य पूरे हों।
(पैरा 13.3)
अन्य केंद्रीय क्षेत्र व्यय
वैधानिक एवं नियामक / स्वायत्त निकाय मंत्रालय को उसके कार्य पूरे करने में सहायता करके, संरक्षण, प्रवर्तन और वैज्ञानिक आकलन के लिए विशेष शाखा के तौर पर काम करके एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसा कि मंत्रालय ने पिछले अनुच्छेद में बताया है, 2025-26 में आरई आवंटन में कटौती और 2026-27 में बीई में कमी का लगभग सभी वैधानिक और नियामक / स्वायत्त निकाय पर उनके तय कार्यों को पूरा करने पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, जिसमें कुछ विस्तार गतिविधियों और आवश्यक नियामक, अनुसंधान और वन्यजीव संरक्षण मैंडेट्स की गति का धीमा होना शामिल है। समिति इन संस्थानों के लिए बजट आवंटन में सुधार की आवश्यकताओं का समर्थन करती है। तदनुसार, समिति यह सिफारिश करती है कि 2026-27 में, मंत्रालय के अंतर्गत सभी वैधानिक और नियामक / स्वायत्त निकायों को वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में अपनी अलग-अलग गतिविधियों के भौतिक और वित्तीय लक्ष्य को जल्द से जल्द प्राप्त करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करने चाहिए ताकि आरई चरण में आवंटन में वृद्धि का दावा किया जा सके।
(पैरा 14.7)
वन भूमि पर अवैध कब्जा
समिति देश की वन भूमि पर अवैध कब्ज़े होने पर चिंता जताती है। ऐसी रिपोर्ट हैं कि 25 राज्यों में 13,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्रों पर गैर-कानूनी तरीके से कब्ज़ा है। समिति का मानना है वन क्षेत्रों का गैर-वनीय कार्यों के लिए उपयोग करने से वन क्षेत्र कम हो जाता है, जिससे जैवविविधता का नुकसान होता है, आवास स्थान नष्ट होते हैं और पर्यावरण का क्षरण होता है। भारत के उच्च्तम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि सभी सरकारी अभिलेखों में दर्ज वन भूमि, जिसमें शब्दकोश अर्थानुसार वन भूमि भी शामिल है, वन संरक्षण अधिनियम के दायरे में लाई जाएगी और ऐसी वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए परिवर्तित करने के लिए केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य होगा।
(पैरा 15.3)
समिति नोट करती है कि मंत्रालय को वन क्षेत्रों में भूमि का ड्रोन से सर्वेक्षण करवाने से संबंधित समिति के प्रश्न की जांच करने की आवश्यकता है। हालांकि मंत्रालय ने वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16(1) के प्रावधानों की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिसके अतंर्गत सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासनों को उन सभी वर्गों की वन भूमि का एक समिकित अभिलेख तैयार करना और उसे बनाए रखना आवश्यक है, जिन पर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के प्रावधान लागू होते हैं। तथापि, यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में है या नहीं अथवा आम लोगों को आसानी से मिल सकती है या नहीं। वन भूमि की बिक्री के कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें गैर-कानूनी रूपातरण अथवा बिना अनुमति के अंतरण शामिल है, जिसमें प्रायः निजी दलों, डेवलपर्स और अधिकारियों के बीच सांठगांठ शामिल होती है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को सभी राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों पर ज़ोर देना चाहिए कि वे वन क्षेत्र की भूमि का ड्रोन से सर्वेक्षण करवाएँ और इन रिपोर्ट को सार्वजनिक डोमेन में डालें ताकि संबंधित जनता/ सार्वजनिक प्राधिकरण ऐसी भूमि से जुड़ी कोई भी वाणिज्यिक गतिविधि/बिक्री/खरीद शुरू करने से पहले उस भूमि की स्थिति सत्यापित कर सकें। अगर सार्वजनिक प्राधिकरण इस मामले में कोई ढिलाई बरतती हैं, तो उनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
(पैरा 15.4)
इसके अलावा समिति यह भी सिफारिश करती है कि देश के सभी पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का डिजिटल रूप में मानचित्रण किया जाना चाहिए और देश के नाज़ुक पारितंत्र को बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।
(पैरा 15.5)
मुख्य कार्यक्रमों को जारी रखने के लिए अतिरिक्त बजटीय आवश्यकताएँ
समिति मंत्रालय द्वारा प्रमुख कार्यक्रमों के लिए बजट आवंटन के संबंध में बताई गई कठिनाइयों और साथ ही इन पहलों को जारी रखने के लिए निर्धारित न्यूनतम वित्तीय आवश्यकताओं को नोट करती है। समिति मंत्रालय के प्रस्तुत किए गए अनुमानों से सहमत है। समिति यह सिफारिश करती है कि वित्त मंत्रालय को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वित्तीय आवश्यकताओं पर सकारात्मकता से विचार करना चाहिए। समिति इसके अलावा यह भी सिफारिश करती है कि 2026–27 में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को बीई चरण में दी गई निधि का अधिक से अधिक उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि वह उपरोक्त योजना और कार्यक्रम के लिए आरई चरण में और अधिक आवंटन की मांग करने के समय एक प्रबल अवस्था में हो।
(पैरा 16.2)
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आरके
(रिलीज़ आईडी: 2239772)
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