विधि एवं न्याय मंत्रालय
अदालती अभिलेखों के 660.36 करोड़ से अधिक पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है
नागरिकों को बेहतर सेवा प्रदान करने हेतु 2,444 ई-सेवा केन्द्र स्थापित किए गए हैं
मामलों की सूचना प्रणाली (सीआईएस) को संस्करण 4.0 में उन्नत कर दिया गया है, जिससे मामलों के प्रबंधन में अधिक वस्तुनिष्ठता, पारदर्शिता और गति आई है
प्रविष्टि तिथि:
12 MAR 2026 12:48PM by PIB Delhi
सरकार ने न्यायपालिका द्वारा मामलों के त्वरित निपटान के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करने हेतु कई पहलें की हैं। इन पहलों में अन्य बातों के अलावा, ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत न्याय की सुलभता बढ़ाने और अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु नवीनतम प्रौद्योगिकियों का एकीकरण शामिल है। इनमें न्यायपालिका के लिए अवसंरचना संबंधी सुविधाओं के विकास हेतु केन्द्र प्रायोजित योजना के तहत जिला एवं अधीनस्थ न्यायपालिका को उपयुक्त अवसंरचना संबंधी सुविधाएं प्रदान करने हेतु राज्य सरकारों/केन्द्र- शासित प्रदेशों के संसाधनों की आपूर्ति भी शामिल है।
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत डिजिटल न्याय प्रणाली ने न्यायिक प्रक्रियाओं को त्वरित एवं सरल बनाया है और न्याय प्रदान करने वाली प्रणाली में पारदर्शिता एवं सुलभता को भी बेहतर बनाया है। विवरण इस प्रकार हैं:
प्रथम चरण, जिसकी शुरुआत 2011 में 935 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ हुई थी, मुख्य रूप से न्यायपालिका के मूलभूत डिजिटल अवसंरचना की स्थापना पर केन्द्रित था। इसके तहत 14,249 जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों का कम्प्यूटरीकरण, 13,683 न्यायालयों में लोकल एरिया नेटवर्क (एलएएन) की स्थापना और 13,672 न्यायालयों में मामलों के डिजिटल प्रबंधन हेतु सॉफ्टवेयर की सुविधा के साथ-साथ 493 न्यायालयों और 347 जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा उपलब्ध कराई गई।
इस आधारभूत कार्य को आगे बढ़ाते हुए, द्वितीय चरण, जिसे 2015 से 2023 तक1,670 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ कार्यान्वित किया गया, ने बुनियादी कम्प्यूटरीकरण से लेकर नागरिक-केन्द्रित डिजिटल सेवाओं के प्रावधान तक दायरे का विस्तार किया। कम्प्यूटरीकृत न्यायालयों की संख्या बढ़कर 18,735 हो गई, जो प्रथम चरण की तुलना में 31.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का विस्तार पांच गुना से अधिक हुआ, जिसमें 3,240 न्यायालय (557 प्रतिशत की वृद्धि) और 1,272 जेल (266 प्रतिशत की वृद्धि) शामिल हैं, जो डिजिटल सुनवाई पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है। डब्ल्यूएएन कनेक्टिविटी 99.5 प्रतिशत न्यायालय परिसरों तक पहुंच गई, जिससे मजबूत नेटवर्क की सुलभता सुनिश्चित हुई। इस चरण में स्वतंत्र एवं ओपन-सोर्स वाली मामलों की सूचना प्रणाली (सीआईएस), मामलों से जुड़े डेटा के पारदर्शी ऑनलाइन भंडार के रूप में नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी) जैसे प्रमुख प्लेटफार्मों की शुरुआत हुई और नागरिकों तथा वकीलों को प्रत्यक्ष सुविधा सेवाएं प्रदान करने हेतु ई-सेवा केन्द्रों की स्थापना की गई।
सरकार ने उन्नत डिजिटल अवसंरचना के साथ न्यायपालिका के आधुनिकीकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए तीसरे चरण (2023-2027) के बजट को बढ़ाकर 7,210 करोड़ रुपये कर दिया है। इस चरण में भारतीय न्यायालयों को डिजिटल और कागज-रहित न्यायालयों में परिवर्तित करने की परिकल्पना की गई है। इसके तहत पुराने और वर्तमान मामलों के अभिलेखों का डिजिटलीकरण, सभी न्यायालयों, जेलों एवं अस्पतालों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा का विस्तार और यातायात संबंधी उल्लंघनों से परे ऑनलाइन न्यायालयों का विस्तार किया जाएगा। इसका उद्देश्य ई-सेवा केन्द्रों का सर्वव्यापी विस्तार, डिजिटल न्यायालय के अभिलेखों एवं आवेदनों के भंडारण के लिए अत्याधुनिक क्लाउड-आधारित डेटा भंडार का निर्माण और मामलों के विश्लेषण एवं पूर्वानुमान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तथा ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (ओसीआर) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना भी है।
वर्तमान में, अदालती अभिलेखों के 660.36 करोड़ से अधिक पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है और नागरिक को बेहतर सेवा प्रदान करने हेतु 2,444 ई-सेवा केन्द्र स्थापित किए गए हैं। न्यायालयों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं के जरिए 3.97 करोड़ से अधिक सुनवाई की हैं। ई-फाइलिंग प्लेटफॉर्म के जरिए लगभग 1.07 करोड़ मामले इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज किए गए हैं। अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का विस्तार उत्तराखंड, कोलकाता, तेलंगाना और मेघालय सहित चार अतिरिक्त उच्च न्यायालयों तक किया गया है, जिससे इनकी संख्या बढ़कर 11 हो गई है। सभी ई-कोर्ट पोर्टल अब एनआईसी के क्लाउड अवसंरचना पर होस्ट किए गए हैं और जिला न्यायालयों की वेबसाइटों को सेफ, स्केलेबल और सुगम्य वेबसाइट एज ए सर्विस (एस3डब्ल्यूएएएस) प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया गया है।
इसके अलावा, मामलों की सूचना प्रणाली (सीआईएस) को संस्करण 4.0 में उन्नत कर दिया गया है, जिससे मामलों के प्रबंधन में अधिक निष्पक्षता, पारदर्शिता और गति आई है। एआई/एमएल-आधारित दोष पहचान मॉड्यूल, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने आईआईटी मद्रास के सहयोग से विकसित किया है और लीगल रिसर्च एंड एनालिसिस असिस्टेंट (एलईजीआरएए), जिसे एनआईसी के उकृष्टता केन्द्र ने ई-समिति के मार्गदर्शन में विकसित किया है, जैसे उन्नत एआई-आधारित उपकरणों को न्यायिक कार्यप्रवाह में एकीकृत किया जा रहा है। डिजिटल कोर्ट प्लेटफॉर्म न्यायाधीशों को सभी केस-संबंधित दस्तावेजों, दलीलों और साक्ष्यों को डिजिटल रूप से एक्सेस करने में सक्षम बनाता है, जो कागज रहित न्यायालय प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह जानकारी विधि एवं न्याय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्यमंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
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पीके/केसी/ आर
(रिलीज़ आईडी: 2238855)
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