राज्यसभा सचिवालय
उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 333वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति
प्रविष्टि तिथि:
11 MAR 2026 4:22PM by PIB Delhi
श्री तिरुची शिवा की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित उद्योग संबंधी संसदीय स्थायी समिति(राज्य सभा) ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) की अनुदानों मांगों (2026-27) के संबंध में अपना तीन सौ तैंतीसवाँ (333वां) प्रतिवेदन 11 मार्च, 2026 को संसद में प्रस्तुत किया। प्रतिवेदन में मंत्रालय के बजटीय आवंटनों, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) तथा प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना जैसी प्रमुख योजनाओं, ऋण गारंटी तंत्र, सार्वजनिक खरीद, विलंबित भुगतान, अमरीकी शुल्कों का एमएसएमई पर प्रभाव, तथा मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त निकायों एवं संस्थानों के कार्यनिष्पादन को सम्मिलित किया गया है।
समिति ने राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के नियम 272 के अंतर्गत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय की 2026-27 की अनुदान मांगों (मांग संख्या 68) की जांच की । समिति ने मंत्रालय के सचिव एवं अन्य अधिकारियों के साथ-साथ मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रणाधीन संगठनों से भी मौखिक साक्ष्य प्राप्त किए। एमएसएमई क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 31.1 प्रतिशत, विनिर्माण उत्पादन में 35.4 प्रतिशत, तथा भारत के निर्यात में 48.58 प्रतिशत का योगदान करता है और लगभग 32.82 करोड़ व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करता है, और 7.69 करोड़ से अधिक उद्यम, उद्यम पंजीकरण पोर्टल तथा उद्यम असिस्ट प्लेटफ़ॉर्म पर पंजीकृत हैं।
प्रतिवेदन में अंतर्विष्ट समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें संक्षेप में निम्नानुसार हैं:
बजटीय आबंटन: जीईसीएल प्रावधान एवं वास्तविक विकासात्मक परिव्यय
समिति ने नोट किया कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मंत्रालय का बजट प्राक्कलन (बी.ई. ) ₹24,566.27 करोड़ है, जिसमें ₹22,647.26 करोड़ राजस्व व्यय तथा ₹1,919.01 करोड़ पूंजीगत व्यय सम्मिलित है। हालाँकि, समिति ने इंगित किया कि ₹9,000 करोड़-कुल परिव्यय का 36.6 प्रतिशत- गारंटीकृत आपातकालीन क्रेडिट लाइन (जीईसीएल) के अंतर्गत रखा गया है, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 में वास्तविक जीईसीएल व्यय शून्य रहा है तथा आपातकालीन ऋण गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) का प्रचालन 31 मार्च 2023 को बंद हो चुका है। यह “आभासी आवंटन” बजट के शीर्ष आंकड़ों को कृत्रिम रूप से बढ़ा देता है और वास्तविक विकासात्मक परिव्यय को छिपा देता है, जो जीईसीएल को हटाने के बाद लगभग ₹15,566 करोड़ ही रह जाता है।
समिति ने पाया कि वित्त वर्ष 2025-26 के संशोधित प्राक्कलन (आर.ई.) बजट प्राक्कलन (बी.ई. ) का मात्र 52.2 प्रतिशत ही रहे, तथा वित्त वर्ष 2023-24 में कुल व्यय का असाधारण 76.53 प्रतिशत केवल अंतिम तिमाही में ही खर्च किया गया। यह लगातार पिछले चरण में व्यय करने की प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है और व्यय नियोजन में प्रणालीगत कमजोरियों को उजागर करती है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें निम्नलिखित हैं:
- अप्रयुक्त जीईसीएल निधियों का पुनः आवंटन उन प्राथमिक एमएसएमई योजनाओं में किया जाए जहाँ वित्तीय आवश्यकता अत्यधिक है, बजाय इसके कि उन्हें यांत्रिक रूप से समर्पित कर दिया जाए।
- अनिवार्य मध्य-वर्षीय व्यय समीक्षा उन सभी योजनाओं के लिए लागू की जाए जिनमें पिछले तीन वित्तीय वर्षों में किसी भी वर्ष में बी.ई. से आर.ई. में 30 प्रतिशत से अधिक की कटौती हुई हो।
- विशेषकर प्रौद्योगिकी उन्नयन, बुनियादी ढाँचे का निर्माण में पूंजीगत व्यय तथा एमएसएमई हेतु उत्पादकता-आधारित सहायता की ओर संसाधन निर्णायक रूप से पुन: वितरित किए जाए ।
एमएसएमई से संबंधित आठ बजट (2025-26) घोषणाओं में से छह का क्रियान्वयन शेष
समिति ने गंभीर चिंता के साथ नोट किया कि एमएसएमई से संबंधित आठ बजट (2025-26) घोषणाओं में से केवल दो — जो सीधे एमएसएमई मंत्रालय द्वारा संचालित थीं — ही क्रियान्वित की गई हैं। शेष छह घोषणाएँ, जिनमें मंत्रालय सहायक एजेंसी है, अब भी मसौदा स्तर पर या अंतर-मंत्रालयी परामर्श की अवस्था में अटकी हुई हैं। विशेष महत्व की दो घोषणाएँ —सूक्ष्म उद्यमों के लिए क्रेडिट कार्ड (पहले वर्ष में 10 लाख उद्यमों का लक्ष्य), तथा पाँच लाख महिला एवं अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति के प्रथम-पीढ़ी उद्यमियों के लिए ₹2 करोड़ तक की सावधि ऋण सुविधा- घोषणा के लगभग बारह माह बाद भी पूर्णतः अप्रवर्तित हैं।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- एमएसएमई से संबंधित सभी लंबित बजट घोषणाओं को बजट प्रस्तुतीकरण की तिथि से छह माह के भीतर क्रियान्वित किया जाए।
- स्पष्ट मील के पत्थर और समय-सीमा के साथ एक त्रैमासिक अंतर-मंत्रालयी समीक्षा तंत्र स्थापित किया जाए।
- एमएसएमई से संबंधित सभी ऋण-आधारित बजट घोषणाओं के लिए मंत्रालय को औपचारिक रूप से नोडल प्राधिकरण नामित किया जाए।
बजट 2026-27: ‘चैम्पियन एमएसएमई का निर्माण’
केंद्रीय बजट 2026-27 में इक्विटी समर्थन(₹10,000 करोड़ का एसएमई ग्रोथ फंड; एसआरआई फंड में ₹2,000 करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान), तरलता समर्थन(सीपीएसई के लिए अनिवार्य टीरेड्स, इनवॉइस डिस्काउंटिंग के लिए सीजीटीएमएसई गारंटी, जेम-टीरेड्स लिंकेज) और व्यावसायिक सहायता(कॉरपोरेट मित्र कार्यक्रम) के माध्यम से “चैम्पियन एमएसएमई का निर्माण” कार्यनीति प्रस्तुत की गई है। हालाँकि, समिति ने नोट किया किया कि इन घोषणाओं में से कई के लिए स्पष्ट बजट-शीर्षक मानचित्रण उपलब्ध नहीं है, जिससे इनके क्रियान्वयन की व्यवहार्यता पर प्रश्नचिह्न उठते हैं।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- ₹10,000 करोड़ का एसएमई ग्रोथ फंड तत्काल क्रियान्वित किया जाए, जिसमें स्पष्ट बजट-शीर्षक पहचान तथा क्रियान्वयन समय-सीमा निर्धारित हो।
- सभी नई घोषणाओं को समयबद्ध क्रियान्वयन रूपरेखाओं के साथ समर्थित किया जाए, जिनमें त्रैमासिक मील के पत्थर निर्धारित हों।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी): 87 लाख रोजगार सृजित, परंतु ₹50 लाख की पुरानी परियोजना सीमा और 40-50% बैंक अस्वीकृति दर भारत की सबसे बड़ी सूक्ष्म-उद्यम योजना को बाधित करती है
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, जो 2008-09 से संचालित है, को वित्त वर्ष 2026-27 के बजट प्राक्कलन (बी.ई. ) में ₹4,500 करोड़ आवंटित किए गए हैं — जो वित्त वर्ष 2025-26 के ₹2,954 करोड़ की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है। कार्यक्रम के प्रारंभ से लेकर 31 दिसम्बर 2025 तक, पीएमईजीपी ने लगभग 10.73 लाख सूक्ष्म-उद्यमों को लगभग ₹29,295 करोड़ की मार्जिन-मनी सब्सिडी प्रदान की है और अनुमानित 87 लाख रोजगार सृजित किए हैं। लगभग 80 प्रतिशत इकाइयाँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, 50 प्रतिशत से अधिक इकाइयाँ महिलाओं, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति उद्यमियों के स्वामित्व में हैं, तथा लगभग 15 प्रतिशत इकाइयाँ आकांक्षी जिलों में स्थापित हैं।
तथापि, समिति के अध्ययन दौरे के दौरान किए गए जमीनी आकलन से यह स्पष्ट हुआ कि कुछ गंभीर संरचनात्मक बाधाएँ विद्यमान हैं: विनिर्माण क्षेत्र के लिए ₹50 लाख की परियोजना लागत सीमा वर्तमान पूंजीगत आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है और इसे पुराना माना जा रहा है; बैंक अस्वीकृति दर अब भी 40–50 प्रतिशत बनी हुई है, जिसका कारण जोखिम-परहेज़ी दृष्टिकोण और सिबिल स्कोर पर अत्यधिक निर्भरता है; स्वीकृति के बाद मार्गदर्शन एवं परामर्श की व्यवस्था कमजोर है; और खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी), जिला उद्योग केंद्रों (डीआईसी) तथा क्षेत्रीय कार्यालयों में मानव संसाधन की दीर्घकालिक कमी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को बाधित करती है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- परियोजना लागत सीमा को ₹50 लाख से बढ़ाया जाए तथा इसे समय-समय पर मुद्रास्फीति से संबद्ध किया जाए। साथ ही पात्रता को स्वामित्व उद्यमों से आगे बढ़ाकर साझेदारी एवं व्यवसाय के अन्य स्वरूपों तक विस्तारित किया जाए।
- बैंकों को बाध्यकारी परामर्श जारी किए जाएँ ताकि संपार्श्विक मुक्त मानकों का समान रूप से अनुपालन हो और प्रथम-पीढ़ी उद्यमियों के लिए सिबिल स्कोर का उपयोग संतुलित रूप से किया जाए।
- पीएमईजीपी 2.0 का सिंगल-विंडो पोर्टल शीघ्रता से लागू किया जाए, जिसमें शुरू से अंत तक डिजिटल कार्यप्रवाह और रीयल-टाइम ट्रैकिंग की सुविधा हो।
- क्षेत्रीय एवं क्षेत्र-विशिष्ट सुविधा दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिसमें उच्च क्षमता वाली गतिविधियों जैसे असम में तेल एवं गैस सेवाएँ तथा उत्तर-पूर्व में अगरवुड आधारित उद्यमों के लिए समर्पित समर्थन प्रदान किया जाए।
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा: दो वर्षों में 30 लाख पारंपरिक कारीगरों तक पहुँचना
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना, जिसे 17 सितम्बर 2023 को ₹13,000 करोड़ के परिव्यय के साथ प्रारम्भ किया गया था, ने मात्र दो वर्षों में ही 30 लाख लाभार्थियों का पंजीकरण लक्ष्य प्राप्त कर लिया — जो मूल पाँच-वर्षीय समयसीमा से कहीं आगे है। 25.5 लाख लाभार्थियों को टूलकिट ई-रुपी वाउचर जारी किए गए; लगभग ₹4,748 करोड़ के ऋण 5.5 लाख लाभार्थियों को स्वीकृत किए गए (₹3,873 करोड़ 4.66 लाख लाभार्थियों को वितरित); और 12.82 लाख टूलकिट भारत डाक के माध्यम से वितरित किए गए। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट अनुमान (बी.ई. ) ₹3,860.89 करोड़ है, जो वित्त वर्ष 2025-26 के ₹5,100 करोड़ से कम है।
समिति के जमीनी आकलन में पाया गया कि प्रारंभिक पंजीकरण सफलता अभी तक प्रशिक्षण, टूलकिट उपयोग और ऋण परिणामों में अनुपातिक रूप से परिलक्षित नहीं हुई है। ग्राम पंचायत/शहरी स्थानीय निकाय स्तर पर सत्यापन में बाधाएँ, बड़ी संख्या में लाभार्थियों का योजना का लाभ लेने से वंचित रह जाना, उच्च स्तर पर बैंक ऋण अस्वीकृति, तथा प्रतिबंधात्मक 18 व्यापार कार्यढांचे प्रमुख अवरोध बने हुए हैं। समिति ने विशेष चिंता व्यक्त की कि व्यापार नामकरण में अब भी क्षेत्रीय और जाति-आधारित नामों (जैसे नाई, चर्मकार, कुम्हार, धोबी) का उपयोग होता है, जिससे व्यावसायिक कठोरता को बल मिलता है और कुछ राज्यों में अनिच्छा या अपनाने में कमी देखी गई है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- जाति अथवा क्षेत्र-विशेष से जुड़े व्यवसाय नामों को तत्काल तर्कसंगत बनाया जाए और उनकी जगह पेशे-निरपेक्ष, कार्य-आधारित नाम अपनाए जाएं (जैसे “मोची” के स्थान पर “जूते का कारीगर”, “कुम्हार” के स्थान पर “सिरेमिक और मिट्टी के उत्पाद निर्माता”, “नाई” के स्थान पर “व्यक्तिगत सौंदर्य सेवा प्रदाता”)।
- योजना को स्थिर, ट्रेड-आधारित ढाँचे से हटाकर गतिशील, बाज़ार-प्रतिक्रियाशील आजीविका कार्यक्रम के रूप में पुनः अभिमुख किया जाए, जिसमें पात्र ट्रेडों का समय-समय पर विस्तार किया जाए।
- क्रेडिट लिंकेज को सुदृढ़ किया जाए, जिसमें शाखा-स्तर पर अधिक उत्तरदायित्व और प्रथम-पीढ़ी उधारकर्ताओं के लिए अधिक लचीले मानदंड हों।
- प्रशिक्षण, टूलकिट वितरण और ब्याज सब्सिडी जैसी लंबित देनदारियों को ध्यान में रखते हुए आवंटन की पर्याप्तता की समीक्षा की जाए।
₹8.1 लाख करोड़ एमएसएमई के विलंबित भुगतानों में अटके — ऑनलाइन विवाद निवारण पोर्टल ने आठ माह में केवल 17 मामलों का निपटारा किया
समिति ने विलंबित भुगतानों को एमएसएमई के सामने उपस्थित सबसे गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों में से एक के रूप में चिह्नित किया। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार लगभग ₹8.1 लाख करोड़ विलंबित भुगतानों में अटके हुए हैं। एमएसएमई समाधान पोर्टल पर 2,56,892 आवेदन दर्ज हैं, जिनमें ₹55,244.31 करोड़ की राशि अंतर्ग्रस्त है। ऑनलाइन विवाद निवारण (ओडीआर) पोर्टल, जिसे 15 अक्टूबर 2025 को प्रारम्भ किया गया था, के बावजूद इसके माध्यम से आठ माह में केवल 17 मामलों का निपटारा किया गया है, जो निवारण की अत्यंत अपर्याप्त गति को उजागर करता है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिश:
- समाधान पोर्टल और ऑनलाइन विवाद निवारण (ओडीआर) तंत्र को सुदृढ़ किया जाए, जिसमें खरीदारों के लिए अनिवार्य अनुपालन, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) के साथ एकीकरण द्वारा विलंबित भुगतानों का स्वतः चिन्हांकन, तथा समयबद्ध निवारण आदेश सम्मिलित हों, जिन्हें एमएसएमई विकास अधिनियम, 2006 के अंतर्गत दंडात्मक प्रावधानों द्वारा समर्थित किया जाए।
क्रेडिट गारंटी (सीजीटीएमएसई): ₹12.39 लाख करोड़ की गारंटी, परंतु शाखा स्तर पर संपार्श्विक-मुक्त उद्देश्य कमजोर
क्रेडिट गारंटी योजना, जिसे सीजीटीएमएसई के माध्यम से संचालित किया जाता है, ने अपनी स्थापना से 31 दिसम्बर 2025 तक 1.35 करोड़ गारंटियाँ प्रदान की हैं, जिनकी राशि ₹12.39 लाख करोड़ है। अप्रैल 2025 से प्रति उधारकर्ता गारंटी सीमा को बढ़ाकर ₹10 करोड़ कर दिया गया है। हालाँकि, समिति की कोलकाता और अन्य स्थानों पर जमीनी बातचीत से यह स्पष्ट हुआ कि नीति उद्देश्य और क्रियान्वयन के बीच एक उल्लेखनीय अंतर बना हुआ है: बैंक व्यवहार में अब भी संपार्श्विक की माँग करते हैं; सिबिल स्कोर पर अत्यधिक निर्भरता युवाओं और प्रथम-पीढ़ी उद्यमियों को बाहर कर देती है; गारंटी शुल्क, बैंक प्रभार और बीमा प्रीमियम के कारण वास्तविक उधारी लागत बढ़ जाती है; और ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जागरूकता सीमित बनी हुई है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- प्रभाव-आधारित निगरानी अपनाई जाए, जिसमें केवल स्वीकृति और वितरण संख्या पर ध्यान देने के बजाय उद्यमों का स्थायित्व, रोजगार, कारोबार वृद्धि और एनपीए प्रवृत्तियों का आकलन किया जाए।
- संपार्श्विक-मुक्त ऋण मानकों को सख्ती से लागू किया जाए; किसी भी विचलन के लिए लिखित औचित्य अनिवार्य हो तथा बार-बार उल्लंघन पर निवारक शास्तियाँ लगाई जाएँ।
- सीजीटीएमएसई के लिए एक व्यापक सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जाए, जिसमें योजनानुसार आवेदन, स्वीकृति, अस्वीकृति और रोजगार परिणामों के आंकड़े उपलब्ध हों।
भारतीय निर्यात पर अमरीकी शुल्क: प्रभावित एमएसएमई के लिए समर्थन तंत्र को सुदृढ़ करना
समिति ने नोट किया कि संयुक्त राज्य अमरीका ने 27 अगस्त 2025 से भारतीय निर्यात पर कुल मिलाकर लगभग 50 प्रतिशत शुल्क लगाया है, जिससे सीधे तौर पर एमएसएमई-प्रधान क्षेत्र — जैसे वस्त्र एवं परिधान, इंजीनियरिंग उत्पाद, हस्त उपकरण, रसायन और ऑटो घटक — प्रभावित हुए हैं। समिति ने समुक्ति की कि मंत्रालय की प्रतिक्रिया मुख्यतः प्रतिक्रियात्मक रही है और इसमें एमएसएमई-प्रधान निर्यात क्लस्टरों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट, अग्रसक्रिय रणनीति का अभाव है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- एमएसएमई व्यापार रक्षा और सहायता तंत्र स्थापित किया जाए, जो कानूनी, तकनीकी और परामर्श सहायता प्रदान करे।
- आरएएमपी और पीएमएस के अंतर्गत एक एमएसएमई टैरिफ़ रेज़िलिएंस पैकेज तैयार किया जाए, जिसमें लक्षित कार्यशील पूंजी समर्थन तथा यूरोपीय संघ, आसियान, पश्चिम एशिया और अफ्रीका की ओर बाज़ार विविधीकरण शामिल हो।
- एक पूर्व चेतावनी और वास्तविक समय निगरानी प्रणाली विकसित की जाए, जो एमएसएमई को प्रभावित करने वाले वैश्विक व्यापार नीतिगत परिवर्तनों की निगरानी करे ।
99.3% एमएसएमई सूक्ष्म — समिति ने ‘नैनो उद्यम’ श्रेणी की माँग दोहराई
समिति ने नोट किया कि उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत 7.61 करोड़ एमएसएमई में से 7.56 करोड़ की बड़ी संख्या (99.3 प्रतिशत) सूक्ष्म श्रेणी में आती है, जबकि केवल लगभग 4.88 लाख छोटे उद्यम और लगभग 36,816 मध्यम उद्यम हैं। संशोधित ऊपरी वर्गीकरण सीमा से यह जोखिम उत्पन्न होता है कि अपेक्षाकृत बड़े उद्यम भी सूक्ष्म श्रेणी में बने रहेंगे, जिससे वास्तविक छोटे और गृह-स्तरीय उद्यमों के लिए लाभ कम हो सकते हैं। समिति ने यह भी नोट किया कि केरल सरकार पहले ही ₹10 लाख तक के निवेश के साथ एक नैनो उद्यम श्रेणी को लागू कर चुकी है, जो प्रशासनिक व्यवहार्यता को प्रदर्शित करता है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिश:
- नैनो उद्यम की एक अलग श्रेणी तत्काल प्रारम्भ की जाए, जिसमें लगभग ₹10 लाख की आरंभिक निवेश सीमा निर्धारित हो।
सार्वजनिक खरीद: एमएसई लक्ष्य 47% से पार, परंतु एससी/एसटी खरीद 1.85% — अधिदेशित 4% के आधे से भी कम
केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा कुल खरीद में सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों की हिस्सेदारी बढ़कर 47.4 प्रतिशत हो गई है, जो अनिवार्य 25 प्रतिशत लक्ष्य से कहीं अधिक है। महिला-स्वामित्व वाले एमएसई की खरीद भी सुधरकर 3.46 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो 3 प्रतिशत लक्ष्य के निकट है। हालाँकि, एससी/एसटी-स्वामित्व वाले एमएसई की खरीद अत्यंत कम— केवल 1.85 प्रतिशत बनी हुई है, जो अनिवार्य 4 प्रतिशत लक्ष्य के आधे से भी कम है। इससे पिछले छह वर्षों में लगभग ₹18,000–20,000 करोड़ की संचयी कमी दर्ज हुई है। वित्त वर्ष 2023-24 में 76 सीपीएसई को एससी/एसटी उप-लक्ष्य अनुपालन न करने पर दंडित किया गया, परंतु नकारात्मक अंकन ठोस सुधारात्मक कार्रवाई में परिवर्तित नहीं हो पाया।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- सीपीएसई-वार वार्षिक उप-लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ, कमी का अनिवार्य प्रकटीकरण किया जाए तथा एमओयू-सम्बद्ध दंडात्मक प्रावधानों को सुदृढ़ किया जाए, जिनके ठोस प्रबंधकीय परिणाम हों।
- एमएसएमई संबंध पोर्टल का गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) के साथ समयबद्ध एकीकरण पूरा किया जाए और एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय विक्रेता निर्देशिका तैयार की जाए।
अवसंरचना एवं प्रौद्योगिकी योजनाएँ : मुख्य योजनाओं में बजट प्राक्कलन से संशोधित प्राक्कलन चरण में 75 प्रतिशत तक की गिरावट
अवसंरचना और प्रौद्योगिकी योजनाओं में उच्च बजट प्राक्कलन (बी.ई.) के बाद संशोधित प्राक्कलन (आरई) में तीव्र कटौती का एक दीर्घकालिक पैटर्न देखा गया: वित्त वर्ष 2025-26 में स्फूर्ति में 61 प्रतिशत कमी, नए प्रौद्योगिकी केंद्र/विस्तार केंद्र में 75 प्रतिशत कमी, और टीसीएसपी में 43 प्रतिशत कमी दर्ज की गई। इसके मूल कारणों में राज्य सरकारों द्वारा भूमि हस्तांतरण में विलंब, पीपीपी मोड का निजी क्षेत्र को आकर्षित करने में असफल रहना, ठेकेदारों का गैर-निष्पादन और धीमी खरीद प्रक्रिया शामिल हैं।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिश:
- बजट अनुमान को सिद्ध अवशोषण क्षमता के अनुरूप समायोजित किया जाए, न कि केवल आकांक्षी लक्ष्यों के आधार पर। निधि अनुमोदन को राज्य सरकारों से भूमि और निर्मित स्थान के लिए पूर्व-निर्धारित, समयबद्ध प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ा जाए।
एसआरआई फंड: 693 एमएसएमई में ₹16,260 करोड़ का निवेश, पूंजी आवंटन बढ़कर ₹1,900 करोड़
आत्मनिर्भर भारत (एसआरआई) निधि, जिसका अनुमोदित कोष ₹50,000 करोड़ है, ने अब तक 69 पैनलबद्ध डॉटर फंड्स के माध्यम से 693 एमएसएमई में ₹16,260 करोड़ का कुल निवेश किया है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट प्राक्कलन (बी.ई.) में पूंजी आवंटन को वित्त वर्ष 2025-26 में ₹700 करोड़ से उल्लेखनीय रूप से बढ़ाकर ₹1,900 करोड़ कर दिया गया है। सहायता प्राप्त उद्यमों में से 90 उद्यम महिला-नेतृत्व वाले हैं।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिश:
- बढ़े हुए आवंटन को उन एमएसएमई की ओर लक्षित किया जाए जिनमें उच्च वृद्धि और निर्यात क्षमता है, तथा टियर-II और टियर-III क्षेत्रों से निवेश योग्य एमएसएमई की पाइपलाइन को संरचित मार्गदर्शन और प्रारम्भिक चरण में समर्थन के माध्यम से सुदृढ़ किया जाए।
केवीआईसी और एनएसआईसी: स्थिर वृद्धि, परंतु क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा के अनुरूप विस्तार आवश्यक
केवीआईसी ने 2024-25 में ₹3,784.52 करोड़ का खादी उत्पादन और ₹7,145.61 करोड़ की बिक्री दर्ज की, जबकि ग्रामोद्योगों का उत्पादन ₹1 लाख करोड़ से अधिक हो गया। खादी क्षेत्र में रोजगार लगभग 5 लाख व्यक्तियों के स्तर पर स्थिर बना हुआ है।
एनएसआईसी ने वित्त वर्ष 2024-25 में ₹3,431 करोड़ राजस्व और ₹146.30 करोड़ कर पश्चात लाभ दर्ज किया, तथा ₹43.89 करोड़ का अपना अब तक का सबसे बड़ा लाभांश वितरित किया। एनएसआईसी को अनुसूची ‘ख’ से अनुसूची ‘क’ सीपीएसई का दर्जा दिया जाना (फरवरी 2026 में घोषणा) इसकी बढ़ती रणनीतिक महत्ता को रेखांकित करता है।
समिति की प्रमुख सिफ़ारिशें:
- केवीआईसी को एक व्यापक मध्यम-अवधि रणनीति तैयार करनी चाहिए, जिससे मापनीय लक्ष्यों के साथ कारीगर कवरेज का विस्तार और रोजगार सृजन हो।
- प्रस्तावित ₹10,000 करोड़ एसएमई ग्रोथ फंड को एनएसआईसी के अंतर्गत चरणबद्ध रूप से लागू किया जाए, जिसमें मजबूत शासन तंत्र और स्वतंत्र निवेश पर्यवेक्षण सुनिश्चित हो।
- एनएसआईसी में पर्याप्त इक्विटी निवेश पर विचार किया जाए, ताकि उच्च लागत वाले ऋण पर निर्भरता कम हो और एमएसएमई समर्थन की वहनीयता सुधरे।
समापन समुक्तियाँ
समिति के प्रतिवेदन में मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं की प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने, जीईसीएल आभासी आवंटन से उत्पन्न बजटीय विकृतियों को सुधारने, बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन को तीव्र करने, अमरीकी शुल्कों के प्रभाव से एमएसएमई को बचाने, ₹8.1 लाख करोड़ के विलंबित भुगतान संकट को हल करने, समावेशी सार्वजनिक खरीद सुनिश्चित करने, पीएमईजीपी और पीएम विश्वकर्मा को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने हेतु समायोजित करना तथा प्रौद्योगिकी, अवसंरचना और ऋण पारिस्थितिकी तंत्र सुधारों के माध्यम से संस्थागत प्रतिस्पर्धात्मकता विकसित करने हेतु व्यापक सिफ़ारिशें सम्मिलित हैं। समिति ने यथार्थवादी बजटिंग, परिणाम-आधारित निगरानी, समयबद्ध क्रियान्वयन और संसद को पारदर्शी रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है।
टिप्पणी : प्रतिवेदन का सम्पूर्ण पाठ, संसद में प्रस्तुत रूप में, राज्य सभा की वेबसाइट https://sansad.in/rs पर उपलब्ध है ।
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आरके
(रिलीज़ आईडी: 2238250)
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