कोयला मंत्रालय
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बदलता खनन क्षेत्र : सतत खनन पुनर्स्थापन की दिशा में एनएलसी इंडिया लिमिटेड की यात्रा

प्रविष्टि तिथि: 09 MAR 2026 3:57PM by PIB Delhi

केंद्र सरकार के कोयला मंत्रालय के अधीन नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम एनएलसी इंडिया लिमिटेड (एनएलसीआईएल) ने अपनी लिग्नाइट खनन परियोजनाओं में व्यवस्थित खदान पुनर्स्थापन और पारिस्थितिक विकास पहलों के माध्यम से सतत खनन और पर्यावरण पुनर्स्थापना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।

उत्तरदायी खनन और पर्यावरणीय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित करते हुए कंपनी ने खनन-उपरांत क्षेत्रों का व्यापक भौतिक तथा जैविक पुनरग्रहण किया है। ओवरबर्डन डंप और बैकफील्ड भूमि को धीरे-धीरे हरे-भरे भूदृश्यों, इको-पार्कों, जल निकायों और उत्पादक कृषि क्षेत्रों में परिवर्तित किया गया है, जो दर्शाता है कि खनन किए गए भूभागों को पारिस्थितिक और सामुदायिक हित में कैसे बहाल किया जा सकता है।

बड़े पैमाने पर खदान पुनर्स्थापन

एनएलसीआईएल के सुधार प्रयासों के परिणामस्वरूप खनन से प्रभावित भूमि का महत्वपूर्ण पुनर्स्थापन हुआ है। 28 फरवरी 2026 तक कंपनी द्वारा कुल 6,571 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन किया गया, जिसमें से 3,236 हेक्टेयर का भौतिक पुनर्स्थापन तथा और 2,866 हेक्टेयर का जैविक पुनर्स्थापन किया जा चुका है। वृक्षारोपण गतिविधियां भी व्यापक रूप से चलाई गई हैं, जिसके तहत खनन क्षेत्रों में 33.95 लाख पौधे लगाए गए हैं।

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इको-पर्यटन स्थलों में परिवर्तित खदान क्षेत्र

नेवेली में खनन के बाद पुनर्निर्मित क्षेत्रों को इको-पर्यटन स्थलों में विकसित किया गया है। 23 जुलाई, 2020 को वृक्षारोपण अभियान के दौरान तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा माइन-1 इको-पर्यटन पार्क का उद्घाटन किया गया था। इसके बाद, 19 अगस्त, 2021 को तत्कालीन केंद्रीय कोयला, खान और संसदीय कार्य मंत्री द्वारा माइन-II इको-पर्यटन पार्क का उद्घाटन किया गया।

इन इको-पर्यटन पार्कों में खदान पुनर्भरण क्षेत्रों में निर्मित कृत्रिम झीलों में पर्यावरण-अनुकूल नौकायन सुविधाएं, सुशोभित उद्यान और फलों के बाग, पक्षी अवलोकन क्षेत्र, हिरण बाड़े, नर्सरी और मिस्टट चैंबर जैसी सुविधाएं उपलब्ध मौजूद हैं। पुनर्ग्रहित ओवरवडन भूमि पर कृषि क्षेत्र भी विकसित किए गए हैं।

एनएलसीआईएल के माइन-I और माइन-II सहित पुनर्ग्रहीत क्षेत्र अब धीरे-धीरे समृद्ध पारिस्थितिक आवासों के रूप में विकसित हो गए हैं, जो विविध प्रकार के वन्यजीवों को आकर्षित करते हैं और जहां 107 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी देखे गए हैं। इनमें एशियाई कोयल, ब्लैक-हेडेड मुनिया, ब्लैक काइट, एशियाई पैराडाइज फ्लाईकैचर, एशियाई ग्रीन बी-ईटर और एशियाई ब्राउन फ्लाईकैचर  शामिल हैं।

पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को और बढ़ावा देने के लिए एनएलसीआईएल ने 5 अक्टूबर 2022 को पांडिचेरी पर्यटन विकास निगम के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद इको-टूरिज्म सुविधा को 2 अक्टूबर, 2025 से सप्ताहांत और अवकाश के दिनों में आम जनता के लिए खोल दिया गया।

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वनस्पति उगने के बाद बाहरी डंप ढलान का दृश्य।

 

मरु उद्यान: जहां औद्योगिक प्रगति प्रकृति से मिलती है

 

राजस्थान के बीकानेर जिले के बारसिंगसर में एनएलसी इंडिया लिमिटेड द्वारा विकसित "मरु उद्यान- एक मरुस्थलीय इको पार्क" इस बात का एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण किस तरह एक साथ आगे बढ़ सकते हैं। बारसिंगसर परियोजना, जो तमिलनाडु के बाहर एनएलसीआईएल की पहली परियोजना है, लिग्नाइट खनन, तापीय विद्युत उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन को एकीकृत करती है। खनन कार्य 2006 में शुरू हुआ और ऊर्जा उत्पादन में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, वहीं कंपनी ने साथ ही साथ पर्यावरणीय पुनर्स्थापन को भी प्राथमिकता दी है। खनन से प्रभावित भूमि का पुनर्वास 2016 में शुरू हुआ और 2019 से जैव-पुनर्ग्रहण गतिविधियों में तेजी आई, जिसके परिणामस्वरूप निरंतर और वैज्ञानिक प्रयासों के माध्यम से लगभग 40 हेक्टेयर क्षेत्र को सफलतापूर्वक हरित किया गया है।

सतत विकास की इस परिकल्पना के अंतर्गत लगभग दो हेक्टेयर क्षेत्र में एक पर्यावरण-अनुकूल पार्क बनाया गया है। 2024 में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्री जी. किशन रेड्डी द्वारा वृक्षारोपण अभियान शुरू करने और पर्यावरण-अनुकूल पार्क की नींव रखने के बाद इस पहल को नई गति मिली। आज मरू उद्यान पारिस्थितिक बहाली का एक जीवंत उदाहरण है, जिसमें बच्चों के मनोरंजन की सुविधाएं, एक वनस्पति उद्यान, एक पुष्प दीर्घा, जल संचयन संरचनाएं और श्रमिकों के विश्राम के लिए पर्यावरण-अनुकूल झोपड़ियां मौजूद हैं। यहां खेजड़ी, नीम, अमलतास और शीशम सहित इक्कीस प्रजातियों के वृक्ष लगाए गए हैं, जो मरुस्थलीय भू-क्षेत्र में नई हरियाली के विकास में योगदान दे रहे हैं।

सामुदायिक लाभ के लिए खदान जल का उपयोग

नेवेली में खुली खदानों में लिग्नाइट की खुदाई के दौरान काफी बारिश होती है, औसतन लगभग 1200 मिमी प्रति वर्ष। एनएलसीआईएल ने इस संसाधन का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने के लिए एक व्यापक खदान जल उपयोग और वर्षा जल संचयन प्रणाली विकसित की है।

इस प्रणाली में 191.458 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले 88 जल संचयन संरचनाएं शामिल हैं। इन प्रयासों के माध्यम से घरेलू और सिंचाई उद्देश्यों के लिए आसपास के 40 गांवों को प्रतिदिन 550 लाख लीटर उपचारित खदान जल की आपूर्ति की जाती है। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु जल आपूर्ति और जल निकासी बोर्ड के साथ एक समझौते के तहत कुड्डालोर जिले की छह नगर पंचायतों और 625 गांवों में 7.91 लाख लोगों को प्रतिदिन 425.10 लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है।

ओवरवर्डन का निर्माण सामग्री में परिवर्तन

एनएलसीआईएल "अपशिष्ट से संपदा" की अवधारणा के अंतर्गत ओवरवर्डन सामग्री को उपयोगी निर्माण योग्य एग्रीगेट में परिवर्तित कर रहा है। आईआईटी मद्रास के सेंटर फॉर अप्लाइड रिसर्च एंड डेवलेपमेंट के साथ संयुक्त अनुसंधान से सिद्ध हुआ है कि ओवरवर्डन सामग्री से 40-60 प्रतिशत तक रेत प्राप्त की जा सकती है।

नेवेली खदानों में माइन ओवरवर्डन से निर्माण रेत का उत्पादन करने के लिए पायलट एम-सैंड लाभकारी संयंत्र पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं। जनवरी 2024 में खदान-आईए में 2.62 लाख घन मीटर प्रति वर्ष की क्षमता वाला संयंत्र तथा फरवरी 2026 में खदान-आई में 6.25 लाख घन मीटर प्रति वर्ष की क्षमता वाला संयंत्र चालू किया गया।

CFlo Partners with NLC India to Pioneer Green Initiative: Producing M-Sand from Overburden for Sustainable Construction 

खदान -आईए ओबी से एम-रेत संयंत्र तक

 

मृदा का पुनर्जीवन और उच्च-प्रौद्योगिकीय कृषि को बढ़ावा

पुनर्ग्रहित खनन क्षेत्रों में मृदा की उर्वरता बढ़ाने के लिए एनएलसीआईएल ने नवोन्मेषी कृषि पद्धतियों को अपनाया है। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के सहयोग से पॉलीहाउस में हाइड्रोपोनिक खेती की जा रही है। जल-कुशल खेती को संभव बनाने के लिए इजरायली ड्रिप सिंचाई प्रौद्योगिकी को अपनाया गया है।

मिट्टी को प्राकृतिक खाद से समृद्ध करने के लिए स्वदेशी मवेशियों के पालन-पोषण के माध्यम से जैविक मृदा पुनर्स्थापन को बढ़ावा दिया गया है। इन उपायों से बंजर ओवरवर्डन भूमि को उत्पादक कृषि क्षेत्र में बदला जा सका है।

हरित पहलों का विस्तार

वृक्षारोपण अभियान और पर्यावरण जागरूकता पहल एनएलसीआईएल के सतत विकास प्रयासों का अभिन्न अंग हैं। 2020 से वृक्षारोपण अभियान के दौरान 6,45,000 पौधे लगाए और वितरित किए गए हैं।

कंपनी को स्वच्छता गतिविधियों में अपने योगदान के लिए कोयला मंत्रालय से सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उपक्रमों के बीच 'स्वच्छता पखवाड़ा' का प्रथम पुरस्कार मिला है। कंपनी ने विशेष अभियान 4.0 के तहत नवोन्मेषी पहलें भी लागू की हैं, जो "अपशिष्ट को सार्वजनिक उपयोग के लिए संपदा में परिवर्तित करना" की अवधारणा पर केंद्रित हैं और आत्मनिर्भरता की गांधीवादी विचारधारा को बढ़ावा देती हैं।

नेवेली के माइन-I में 30 अक्टूबर, 2024 को शुरू किया गया पोथिगई हर्बल पार्क 1.25 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें लगभग 38 औषधीय पौधों की प्रजातियां हैं। इस पार्क का उद्देश्य बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाले आम पौधों के औषधीय लाभों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।

खदान-II में असमान भूमि को साफ और समतल करने तथा लगभग 109 मीट्रिक टन कबाड़ हटाने के बाद लिग्नाइट गार्डन विकसित किया गया। इस पुनर्ग्रहित स्थान में अब एम्बुलेंस पार्किंग क्षेत्र, एफएम यार्ड मिनी मरम्मत शेड और सौर ऊर्जा संयंत्र स्थित हैं। इसके अतिरिक्त एक नारियल वृक्ष उद्यान भी विकसित किया गया, जिससे कुल 8,15,000 वर्ग फुट स्थान उपलब्ध हो गया।

राजस्थान के बारसिंगसर परियोजना में लगभग 6,700 वर्ग फुट की पहले से अनुपयोगी भूमि पर ‘लिग्नाइट शक्ति नगर नर्सरी’ विकसित की गई, जिसकी क्षमता लगभग 6,000 पौधों की है।

‘अपशिष्ट से संपदा’ की थीम के तहत एनएलसीआईएल ने कबाड़ सामग्री से मूर्तियां भी बनाई गई हैं। इनमें कुड्डालोर में "थ्री फेसस", चेन्नई में "पिककॉक" नई दिल्ली में "जय हिंद चक्र" और एनएलसीआईएल आर्क गेट पर "माइनर रीडिंग बुक" शामिल हैं।

सतत खनन का समर्थन

एनएलसी इंडिया लिमिटेड के पुनर्ग्रहण और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन प्रयास केंद्र सरकार की सतत खनन, पारिस्थितिक बहाली तथा खनन उपरांत भूमि के उत्पादक पुन: उपयोग के व्यापक विजन के अनुरूप हैं।

इन पहलों के माध्यम से एनएलसीआईएल यह प्रदर्शित कर रहा है कि उत्तरदायी खनन और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं तथा खनन-प्रभावित भूमि को हरित, उत्पादक और समुदाय-हितकारी इको-सिस्टम में परिवर्तित किया जा सकता है।

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पीके/केसी/आईएम/एचबी


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