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निर्यात संवर्धन मिशन: वैश्विक व्यापार में एमएसएमई के लिए एक एकीकृत मार्ग का निर्माण
प्रविष्टि तिथि:
24 FEB 2026 2:54PM by PIB Delhi
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मुख्य बातें
- निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) भारत के निर्यात इकोसिस्टम को सशक्त बनाने की एक प्रमुख पहल है, जिसमें एमएसएमई, पहली बार निर्यात करने वाले उद्यमों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
- ईपीएम के अंतर्गत सात अतिरिक्त हस्तक्षेप शुरू किए गए हैं, जिससे मिशन लगभग पूर्ण रूप से क्रियान्वित होने की दिशा में आगे बढ़ गया है।
- ईपीएम को दो एकीकृत उप-योजनाओं — निर्यात प्रोत्साहन और निर्यात दिशा — के माध्यम से लागू किया जाता है, जो वित्तीय और गैर-वित्तीय दोनों प्रकार की निर्यात सहायता प्रदान करती हैं।
- यह मिशन व्यापार वित्त, निर्यात अनुपालन, लॉजिस्टिक्स, विदेशी भंडारण और वैश्विक बाजार तक पहुंच के लिए व्यापक सहयोग उपलब्ध कराता है।
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परिचय
भारत के निर्यात इकोसिस्टम को निर्यात प्रोत्साहन मिशन (ईपीएम) के तहत मिशन मोड दृष्टिकोण के जरिये सशक्त किया जा रहा है जिसका उद्देश्य वैश्विक बाजार तक पहुंच का विस्तार करना और भारतीय निर्यातकों विशेषकर सूक्ष्म लघु मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।
सरकार ने उन हस्तक्षेपों के आधार पर जो पहले से ही निर्यातकों का समर्थन कर रहे थे, अब ईपीएम के तहत 7 अतिरिक्त हस्तक्षेप शुरू किए हैं, जिससे व्यापार वित्त, अनुपालन सक्षमता, लॉजिस्टिक्स और विदेशी बाजार पहुंच में समर्थन का दायरा काफी बढ़ गया है। इस विस्तार के साथ, मिशन के तहत 10 हस्तक्षेप अब चालू हो गए हैं, जो ईपीएम के कार्यान्वयन में एक प्रमुख मील का पत्थर है और समावेशी और निर्यात-आधारित विकास के लिए भारत के संकल्प को मजबूत करता है।
निर्यात संवर्धन मिशन क्या है?
निर्यात संवर्धन मिशन (ईपीएम) एक प्रमुख पहल है जिसे व्यापार वित्त, मानकों के अनुपालन, लॉजिस्टिक्स, विदेशी भंडारण और बाजार विकास सहित निर्यात इकोसिस्टम के प्रमुख तत्वों में समन्वित समर्थन प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
नवंबर 2025 में सरकार द्वारा अनुमोदित, मिशन एक एकल, एकीकृत और डिजिटल रूप से संचालित ढांचे के तहत कई निर्यात-समर्थन उपायों को एक साथ लाता है। वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 की अवधि के लिए 25,060 करोड़ रूपये के कुल परिव्यय के साथ, ईपीएम निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने और भारत की वैश्विक उपस्थिति का विस्तार करना चाहता है।

मिशन को दो एकीकृत उप-योजनाओं के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है: निर्यात प्रोत्साहन, जो वित्तीय सक्षमताओं और व्यापार-वित्त समर्थन पर केंद्रित है, और निर्यात दिशा, जो गैर-वित्तीय, बाजार-पहुंच और इकोसिस्टम सक्षमताओं को संबोधित करती है।
इस ढांचे के माध्यम से, निर्यात संवर्धन मिशन का लक्ष्य है:
- किफायती और विविध व्यापार वित्त तक पहुंच में सुधार करना विशेष रूप से एमएसएमई और पहली बार निर्यातकों के लिए
- अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता, तकनीकी और स्थिरता मानकों के अनुपालन का समर्थन करना
- निर्यात ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और विदेशी भंडारण क्षमताओं को मजबूत करना
- बाज़ार पहुंच और व्यापार इंटेलिजेंस समर्थन का विस्तार करना
- सीमा पार ई-कॉमर्स निर्यात की वृद्धि सहित एमएसएमई की व्यापक भागीदारी को सक्षम करना

कुल मिलाकर, ईपीएम एक एकल संस्थागत ढांचे के भीतर नीति समर्थन, व्यापार-वित्त सक्षमता, बाजार की तैयारी और बाजार संपर्कों को एकत्रित करके एक संपूर्ण-सरकारी दृष्टिकोण अपनाता है। निर्यातक समर्थन में विभाजन को कम करके और वित्त, मानकों, लॉजिस्टिक्स और खरीदार कनेक्टिविटी में वितरण को मजबूत करके, ईपीएम एमएसएमई के लिए एकीकृत निर्यात विकास को सक्षम बनाता है।
इस कनवर्जेंस-संचालित, मिशन-मोड डिज़ाइन के माध्यम से, मिशन की परिकल्पना एमएसएमई को वैश्विक व्यापार में अपनी भागीदारी को बढ़ाने और बनाए रखने में सक्षम बनाने के लिए एक गेम चेंजर के रूप में की गई है
निर्यातक की यात्रा में समग्र सहायता
निर्यात संवर्धन मिशन निर्यात प्रक्रिया के प्रमुख चरणों के अनुरूप चरणबद्ध सहायता प्रदान करता है। इससे निर्यातकों को प्रारंभिक बाजार खोज से लेकर शिपमेंट के बाद की गतिविधियों और विदेशी बाजार में उपस्थिति तक उचित सहयोग मिल पाता है।
अपनी एकीकृत पहलों के माध्यम से, यह मिशन निम्नलिखित क्षेत्रों में समन्वित सहायता प्रदान करता है:
- बाजार और उत्पाद विश्लेषण
- शिपमेंट से पहले और बाद में निर्यात वित्त तक पहुंच
- व्यापार अनुपालन
- लॉजिस्टिक्स, मालभाड़ा और परिवहन
- विदेशी भंडारण, पूर्ति सेवाएं और खरीदारों से संपर्क

मिशन के तहत प्रगति: हस्तक्षेपों का विस्तार
हालिया लॉन्च से पहले, निर्यात संवर्धन मिशन के अंतर्गत तीन प्रमुख हस्तक्षेप पहले से ही संचालित थे, जिनके माध्यम से ब्याज छूट, बिना जमानत के निर्यात ऋण तथा बाजार तक पहुँच जैसे क्षेत्रों में सहायता प्रदान की जा रही थी।
अब सात अतिरिक्त हस्तक्षेपों की शुरुआत के साथ मिशन का दायरा काफी बढ़ गया है और इन नई पहलों के माध्यम से वैकल्पिक व्यापार-वित्त साधन, ई-कॉमर्स निर्यात, अनुपालन सहायता, लॉजिस्टिक्स लागत में कमी, व्यापार इंटेलिजेंस और विदेशी फूलफिलमेंट जैसे नए क्षेत्रों में भी समर्थन दिया जा रहा है। इस विस्तार के बाद, मिशन अब निर्यातकों की वित्तीय आवश्यकताओं के साथ-साथ इकोसिस्टम से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए एक व्यापक और एकीकृत सहायता ढांचा प्रदान करता है।

निर्यात प्रोत्साहन – वित्तीय सक्षमकर्ता
निर्यात प्रोत्साहन निर्यातकों, विशेषकर एमएसएमई, को वित्त तक पहुंच में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए समाधान देता है ताकि उन्हें किफायती और विविध प्रकार के व्यापार-वित्त साधन उपलब्ध हों।
नये शुरू किये गये हस्तक्षेप
1) वैकल्पिक व्यापार-वित्त साधनों के लिए सहायता (एक्सपोर्ट फैक्टरिंग):
यह पहल एमएसएमई के लिए एक्सपोर्ट फैक्टरिंग को एक सुलभ और किफायती व्यापार-वित्त साधन के रूप में बढ़ावा देती है जिसका उद्देश्य कार्यशील पूंजी की व्यवस्था करना और व्यापार चक्र को आसान बनाना है।
यह सुविधा उन एमएसएमई निर्यातकों के लिए उपलब्ध है जो अधिसूचित छह-अंकीय टैरिफ लाइनों के अंतर्गत माल का निर्यात करते हैं। एक्सपोर्ट फैक्टरिंग सेवाएं पंजीकृत निर्यात फैक्टरिंग कंपनियों (एनबीएफसी) के माध्यम से प्रदान की जाती हैं।
इस योजना के तहत फैक्टरिंग लागत पर 2.75% ब्याज छूट दी जाती है, जो प्रति आईईसी अधिकतम 50 लाख रुपये तक सीमित है। इसमें रिकोर्स और नॉन-रिकोर्स दोनों प्रकार की फैक्टरिंग का समर्थन किया जाता है। फैक्टरिंग भारतीय रुपये तथा स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय विदेशी मुद्राओं दोनों में की जा सकती है।
एक्सपोर्ट फैक्टरिंग
एक्सपोर्ट फैक्टरिंग एक वित्तीय साधन है, जिसके माध्यम से निर्यातक अपनी निर्यात से संबंधित देय राशियों को किसी वित्तीय संस्था को बेचकर तुरंत नकद राशि प्राप्त कर सकते हैं। यह व्यवस्था कार्यशील पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करती है, भुगतान से जुड़े जोखिम को कम करने में मदद करती है, और एमएसएमई के लिए सरकार समर्थित निर्यात वित्त सहायता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा तैयार करती है।
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2) ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए ऋण सहायता:
यह हस्तक्षेप एमएसएमई निर्यातकों को डाक, कूरियर और विदेशी इन्वेंटरी-आधारित फुलफिलमेंट चैनलों के माध्यम से किए जाने वाले निर्यात के लिए कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए ऋण सुविधा प्रदान करती है।
यह सहायता उन एमएसएमई ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए उपलब्ध है जिनके पास वैध आईईसी और उद्यम पंजीकरण है, साथ ही, वे नए एमएसएमई निर्यातक भी पात्र हैं जिनका कम से कम एक वर्ष का घरेलू ई-कॉमर्स कारोबार रहा हो। इस योजना को भारतीय आयात निर्यात बैंक (ईएक्सआईएम बैंक) के माध्यम से लागू किया जाता है।
इस घटक के अंतर्गत डायरेक्ट ई-कॉमर्स क्रेडिट सुविधा में 90% तक गारंटी कवरेज उपलब्ध है, जिसकी सीमा 50 लाख रुपये तक है जबकि ओवरसीज इन्वेंटरी ई-कॉमर्स क्रेडिट सुविधा में 75% तक गारंटी कवरेज उपलब्ध है, जिसकी सीमा 5 करोड़ रुपये तक है। इस पर 2.75% ब्याज छूट प्रदान की जाती है जो प्रति आवेदक प्रति वर्ष अधिकतम 15 लाख रुपये तक सीमित है।
3) उभरते निर्यात अवसरों के लिए सहायता:
यह पहल साझा जोखिम और ऋण साधनों तक पहुंच के जरिये एमएसएमई निर्यातकों को नए या अपेक्षाकृत अधिक जोखिम वाले विदेशी बाजारों में विस्तार करने में मदद करती है।
निर्धारित जोखिम मॉडल के आधार पर, लेनदेन मूल्य का 10 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक जोखिम-साझेदारी सहायता दी जाती है। अधिकतम स्वीकार्य सीमा (एमएलपी) के तहत निम्न सीमाएं निर्धारित हैं जो देश-वार अधिकतम जोखिम सीमा 15 प्रतिशत, निर्यातक-वार जोखिम सीमा 5 प्रतिशत, लेनदेन-वार जोखिम सीमा 1 प्रतिशत और जारीकर्ता बैंक-वार जोखिम सीमा 10 प्रतिशत है।
पहले से संचालित हस्तक्षेप
4) प्री- और पोस्ट-शिपमेंट निर्यात ऋण पर ब्याज छूट:
यह हस्तक्षेप एमएसएमई निर्यातकों द्वारा लिए गए प्री-शिपमेंट और पोस्ट-शिपमेंट निर्यात ऋण पर ब्याज छूट प्रदान करती है जिसका उद्देश्य निर्यात वित्त की लागत को कम करना और कार्यशील पूंजी के प्रवाह को बेहतर बनाना है।
इस घटक के तहत ब्याज लागत पर 2.75 प्रतिश ब्याज अनुदान दिया जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति निर्यातक 50 लाख रुपये निर्धारित है।
वर्तमान कार्यान्वयन स्थिति के अनुसार, पहले की इंटरेस्ट इक्वलाइजेशन स्कीम के अंतर्गत 850 करोड़ रुपये की बकाया राशि का भुगतान कर दिया गया है। जनवरी 2026 से अब तक लगभग 3,000 निर्यातकों ने ब्याज छूट सहायता के लिए पंजीकरण कराया है।
5) निर्यात ऋण के लिए जमानत सहायता:
यह हस्तक्षेप एमएसएमई निर्यातकों को बिना अतिरिक्त जमानत के औपचारिक निर्यात ऋण उपलब्ध कराने में सहायता करती है और इसके लिए ऋण देने वाली संस्थाओं को क्रेडिट गारंटी समर्थन प्रदान किया जाता है।
इस घटक के अंतर्गत सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए 85 प्रतिशत तक क्रेडिट गारंटी कवरेज उपलब्ध है जबकि मध्यम उद्यमों के लिए 65 प्रतिशत तक कवरेज प्रदान किया जाता है। प्रति निर्यातक अधिकतम ऋण सीमा 10 करोड़ रुपये है। लगभग 60 निर्यातकों ने इस पहल के तहत जनवरी 2026 से अब तक पंजीकरण कराया है।
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निर्यात दिशा – गैर-वित्तीय और बाजार पहुंच सक्षमकर्ता
निर्यात संवर्धन मिशन के अंतर्गत निर्यात दिशा एक गैर-वित्तीय सहायता उप-योजना है। यह उप-योजना निर्यातकों द्वारा सामना की जाने वाली गैर-वित्तीय व्यापार बाधाओं को दूर करने और भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं की वैश्विक उपस्थिति को मजबूत करने पर केंद्रित है। यह योजना वैश्विक मानकों और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानदंडों के अनुपालन में सहायता प्रदान करती है और खरीदार–विक्रेता बैठकें, व्यापार मेले और प्रदर्शनियों के माध्यम से रणनीतिक बाजार तक पहुंच का विस्तार करती है। साथ ही यह विदेशी भंडारण और फुलफिलमेंट सुविधाओं तक पहुंच को बढ़ावा देती है।
निर्यात दिशा अपनी विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से, निर्यातकों को बाजार के लिए बेहतर तैयारी करने, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में दृश्यता बढ़ाने, लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियों को कम करने, तथा निर्यात इकोसिस्टम में संस्थागत और सूचना सहायता प्रणालियों को मजबूत करने में सहयोग देती है।
नये शुरू किये गये हस्तक्षेप
1) व्यापार नियमन, प्रत्यायन और कम्प्लायंस एनेबलमेंट (टीआरएसीई):
इस हस्तक्षेप का उद्देश्य निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय परीक्षण, निरीक्षण, प्रमाणन और अन्य अनुरूपता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में वित्तीय सहायता प्रदान करना है, ताकि वे वैश्विक बाजारों तक पहुंच बना सकें।
टीआरएसीई के तहत मदद उन एमएसएमई निर्यातकों को मिलती है जिनके पास वैध इम्पोर्टर एक्सपोर्टर कोड (आईईसी) और वैध एमएसएमई उद्यम पंजीकरण संख्या है। अधिसूचित पॉजिटिव लिस्ट में शामिल प्रमाणनों के लिए सहायता उपलब्ध है जबकि अधिसूचित प्राथमिकता पॉजिटिव लिस्ट में शामिल प्रमाणनों के लिए अधिक स्तर की सहायता प्रदान की जाती है।
पॉजिटिव लिस्ट के अंतर्गत प्रमाणनों के लिए वास्तविक लागत का 60 प्रतिशत, या 25 लाख रुपये, जो भी कम हो वो प्रदान की जाती है। प्राथमिकता पॉजिटिव लिस्ट के अंतर्गत प्रमाणनों के लिए वास्तविक लागत का 75 प्रतिशत, या 25 लाख रुपये, जो भी कम हो वो प्रदान की जाती है। टीआरएसीई के अंतर्गत प्रति निर्यातक वार्षिक अधिकतम सहायता सीमा 25 लाख रुपये निर्धारित है।
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अधिसूचित पॉजिटिव लिस्ट & प्रायोरिटी पॉजिटिव लिस्ट
टीआरएसीई के तहत, पॉजिटिव लिस्ट में आमतौर पर ज़रूरी अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन जैसे सीई मार्किंग, एफडीए प्रमाणन, आईएसओ स्टैंडर्ड और एसएबीईआर/एसएएसओ शामिल हैं। प्रायोरिटी पॉजिटिव लिस्ट में रणनीतिक रूप से ज़रूरी, ज़्यादा कीमत वाले प्रमाणन शामिल हैं जो प्राथमिकता वाले बाजार के लिए ज़रूरी हैं, जिसमें फ़ूड सेफ़्टी (बीआरसीजीएस, एफएसएससी 22000, एचएसीसीपी), मरीन प्रमाणन (एमएससी, एएससी) और एथिकल सप्लाई चेन्स (एसएसईटीए) शामिल हैं।
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2) माल और परिवहन के लिए लॉजिस्टिक्स हस्तक्षेप (एलआईएफटी): यह हस्तक्षेप परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने में मदद देकर, अंदरूनी इलाकों में मौजूद निर्यातकों को होने वाली भौगोलिक दिक्कतों और देश के अंदर संपर्कों की कमी का समाधान करता है।
एलआईएफटी के अंतर्गत अधिसूचित जिलों से अधिसूचित उत्पादों का निर्यात करने वाले सभी एमएसएमई निर्यातकों को समर्थन हासिल है। यह सहायता उन शिपमेंट्स पर लागू होती है, जो एमएसएमई इकाइयों से इनलैंड कंटेनर डिपो (आईसीडी), कंटेनर फ्रेट स्टेशन (सीएफएस), समुद्री बंदरगाहों तथा एयर कार्गो कॉम्प्लेक्स (एसीसी) तक भेजी जाती हैं। रेल और सड़क मार्ग से होने वाली ढुलाई भी इसकी पात्र है, जबकि चयनित क्षेत्रों के लिए हवाई परिवहन की भी अनुमति दी गई है।
परिवहन सेवाओं पर व्यय की गई वास्तविक लागत का अधिकतम 30 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यह सहायता प्रति निर्यातक प्रति वित्तीय वर्ष 20 लाख रुपये की अधिकतम सीमा तक उपलब्ध है।
3) व्यापार इंटेलिजेंस एवं सुविधा के लिए एकीकृत समर्थन (आईएनएसआईजीएचटी): आईएनएसआईजीएचटी का उद्देश्य निर्यात इकोसिस्टम में मौजूद सूचना विषमता और क्षमता संबंधी कमियों को दूर कर निर्यातकों को अधिक सक्षम और तैयार बनाना है।
यह हस्तक्षेप केवल निर्यातकों तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाताओं सहित उन सभी हितधारकों को समाहित करता है, जो निर्यात गतिविधियों से जुड़े हैं। निजी और सरकारी, दोनों प्रकार की संस्थाएँ इस सहायता के लिए पात्र हैं।
योजना के अंतर्गत मॉड्यूल और टूलकिट का विकास, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम, जिला और क्लस्टर स्तर पर सुविधा समर्थन, अनुसंधान एवं नवाचार परियोजनाएं, पायलट पहलें, तथा व्यापार संबंधी विश्लेषण और डेटा-सहायता जैसी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाता है। पात्र परियोजनाओं के लिए स्वीकृत लागत का अधिकतम 50 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है, जो निर्धारित सीमा के अधीन है। सरकारी संस्थाओं को स्वीकृत परियोजना लागत का पूरा यानि 100 प्रतिशत समर्थन भी प्रदान किया जा सकता है।
4) लॉजिस्टिक्स सुविधा, विदेश में भंडारण एंड फुलफिलमेंट (एफएलओडबल्यू): यह हस्तक्षेप निर्यातकों के समक्ष उपस्थित लॉजिस्टिक्स और भंडारण संबंधी बाधाओं को दूर करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसके माध्यम से उन्हें विदेशी भंडारण, वितरण और फुलफिलमेंट अवसंरचना तक पहुंच उपलब्ध कराई जाती है, जिससे निर्यात प्रक्रिया अधिक तेज, विश्वसनीय और किफायती बन सके।
एफएलओडबल्यू के अंतर्गत सहायता निर्यात संवर्धन परिषदों, कमोडिटी बोर्डों, लॉजिस्टिक्स, भंडारण और फुलफिलमेंट सेवा प्रदाताओं, उद्योग संघों तथा केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अनुशंसित संगठनों को उपलब्ध है।
इस घटक के तहत वित्तीय सहायता अधिकतम तीन वर्ष की अवधि के लिए प्रदान की जाती है। निम्नलिखित श्रेणियों के लिए सहायता उपलब्ध है:
- विदेशी भंडारण सुविधा: सहायता स्वीकृत परियोजना लागत के 30 या प्रतिशत 10 करोड़ रुपये, जो भी कम हो, तक सीमित है।
- विदेशी आपूर्ति व्यवस्थाएं: सहायता प्रति माह 5 लाख रुपया या स्वीकृत परियोजना लागत के 30 प्रतिशत, जो भी कम हो, तक सीमित है।
- डिस्पले और बाज़ार पहुंच सुविधाएं: सहायता स्वीकृत परियोजना लागत के 30 प्रतिशत या 5 करोड़ रुपया, जो भी कम हो, तक सीमित है।
- ई-कॉमर्स निर्यात केन्द्र (ईसीईएच): सहायता स्वीकृत परियोजना लागत के 30 प्रतिशत या 10 करोड़ रुपया जो भी कम हो, तक सीमित है।
पहले से संचालित हस्तक्षेप
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5) बाजार में पहुंच के लिए समर्थन (एमएएस): मार्केट एक्सेस सपोर्ट उन बाजार-संबंधी गतिविधियों के संचालन को सुगम बनाता है जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों का विकास, विस्तार और स्थायित्व सुनिश्चित करना है, जिससे बाजार विविधता बढ़ती है और भारतीय उत्पादों एवं सेवाओं की वैश्विक दृश्यता सुदृढ़ होती है।
इस हस्तक्षेप के अंतर्गत क्रेता-विक्रेता बैठक, व्यापार मेला, व्यापार प्रतिनिधिमंडल और रिवर्स क्रेता-विक्रेता बैठक के आयोजन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। क्रेता-विक्रेता बैठक, व्यापार मेला, व्यापार प्रतिनिधिमंडल के लिए प्रति आयोजन अधिकतम 5 करोड़ रुपये तक की सहायता उपलब्ध है, जबकि रिवर्स क्रेता-विक्रेता बैठक के लिए प्रति आयोजन अधिकतम 10 करोड़ रुपये तक की सहायता प्रदान की जाती है। बाजार में पहुंच संबंधी गतिविधियों में भागीदारी के लिए एमएसएमई को हवाई किराए पर सहायता दी जाती है, और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लिए विशेष सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
वर्तमान कार्यान्वयन स्थिति के अंतर्गत पूर्ववर्ती बाजार में पहुंच संबंधी पहलों (एमएआई) योजना के तहत 118.65 करोड़ रुपये की बकाया राशि को स्वीकृति प्रदान की गई है। कुल 34 आयोजनों को स्वीकृति दी गई है, जिनमें 24 व्यापार मेला और 10 रिवर्स क्रेता - विक्रेता बैठक शामिल हैं, तथा इनके लिए 45.5 करोड़ रुपये की संचयी वित्तीय सहायता स्वीकृत की गई है।
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आवेदन की प्रक्रिया
निर्यात प्रोत्साहन हस्तक्षेपों के लिए, निर्यातक सहायता प्राप्त करने से पूर्व dgft.gov.in पर दावा-आशय (आईसी) दाखिल करते हैं, जिसके पश्चात एक विशिष्ट पहचान संख्या (यूआईएन) मिलती है। निर्यातक इस यूआईएन को ऋण देने वाली संस्था या फैक्टरिंग इकाई के साथ साझा करता है। ऋणदाता संस्थाएं निर्यातकों को ऋण या व्यापार-वित्त साधन प्रदान करती हैं और अधिसूचित दिशानिर्देशों के अनुसार कार्यान्वयन एजेंसी को दावा जमा (सीएस) करती हैं।

एलआईएफटी और टीआरएसीई के लिए, निर्यातक आयात-निर्यात संबंधी सेवाएं प्राप्त करने से पूर्व trade.gov.in पर दावा-आशय (आईसी) दाखिल करते हैं और निर्यात पूर्ण होने के बाद सहायक दस्तावेजों तथा स्व-प्रमाणन के साथ प्रतिपूर्ति दावा (आरसी) प्रस्तुत करते हैं।
एफएलओडबल्यू, आईएनएसआईजीएचटी और एमएएस के लिए प्रस्ताव-आधारित अनुमोदन तंत्र के माध्यम से सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें आवेदन trade.gov.in पर प्रस्तुत किए जाते हैं, जिसके बाद ईपीएम विभाग द्वारा मूल्यांकन, उप-समिति द्वारा अनुशंसा और संचालन समिति द्वारा अंतिम स्वीकृति प्रदान की जाती है।

निष्कर्ष
निर्यात संवर्धन मिशन एक समन्वित निर्यात समर्थक इकोसिस्टम का प्रतिनिधित्व करता है, जो वित्तीय सक्षमकर्ताओं, बाज़ार पहुंच समर्थन और इकोसिस्टम-स्तरीय हस्तक्षेपों को एकीकृत करता है। निर्यातकों, विशेषकर एमएसएमई, द्वारा सामना की जाने वाली ऋण-संबंधी और गैर-वित्तीय बाधाओं दोनों का समाधान निकालते हुए, यह मिशन निर्यात लागत को कम करने, अनुपालन तत्परता में सुधार करने और वैश्विक बाज़ार एकीकरण को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखता है।
केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य और जिला प्राधिकरणों, वित्तीय संस्थानों, निर्यात संवर्धन परिषदों तथा विदेशों में स्थित भारतीय मिशनों द्वारा समन्वित क्रियान्वयन के माध्यम से, ईपीएम को समावेशी, विकेंद्रीकृत और सतत निर्यात वृद्धि को बढ़ावा देने वाले तंत्र के रूप में विचार किया गया है।
संदर्भ
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2230664®=3&lang=1
https://www.pib.gov.in/PressNoteDetails.aspx?NoteId=156349&ModuleId=3®=3&lang=1
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2189383®=3&lang=2
https://content.dgft.gov.in/Website/TF.pdf
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