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भारतीय कृषि में बदलाव लाती कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)

प्रविष्टि तिथि: 14 FEB 2026 10:52AM by PIB Delhi

मुख्य बातें

  • भारत ने डिजिटल कृषि मिशन के तहत 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाकर और 23.5 करोड़ फसल भूखंडों का सर्वेक्षण करके कृषि क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर एक डिजिटल आधार तैयार किया है।
  • राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली 66 फसलों और 432 से अधिक प्रकार के कीटों का समर्थन करती है और कीटों का शीघ्र पता लगाने हेतु 10,000 से अधिक विस्तार कार्यकर्ताओं को वास्तविक समय में परामर्श प्रदान करती है।
  • दिसंबर 2025 तक, किसान ई-मित्र चैटबॉट ने 93 लाख से अधिक प्रश्नों के उत्तर दिए हैं और 11 क्षेत्रीय भाषाओं में प्रतिदिन 8,000 से अधिक किसानों के प्रश्नों का समाधान किया है।
  • खरीफ 2025 के लिए स्थानीय मानसून की शुरुआत के पूर्वानुमान हेतु एआई-आधारित एक प्रायोगिक परियोजना (पायलट प्रोजेक्ट) एसएमएस के जरिए 13 राज्यों के 3.88 करोड़ किसानों तक पहुंची, जिसमें सर्वेक्षण किए गए किसानों में से 31-52 प्रतिशत ने पूर्वानुमानों के आधार पर बुवाई और भूमि तैयार करने संबंधी निर्णयों को समायोजित किया।
  • यस-टेक, क्रॉपिक और पीएमएफबीवाई व्हाट्सएप चैटबॉट पीएमएफबीवाई के तहत फसल बीमा को किसानों के लिए अधिक रचनात्मक, तेज और अधिक पारदर्शी बनाने हेतु एआई-आधारित साधनों का लाभ उठा रहे हैं।
  • एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर पैकेज को एआई प्रणाली के साथ एकीकृत करने के उद्देश्य से केन्द्रीय बजट 2026-27 में भारत-विस्तार नाम के एक बहुभाषी एआई उपकरण का प्रस्ताव रखा गया।

 

 

भूमिका

कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्या है?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मशीनों की वह क्षमता है जिसके सहारे वे ऐसे कार्य कर सकती हैं जिनके लिए आम तौर पर मानव बुद्धि की आवश्यकता होती है। यह प्रणालियों को अनुभव से सीखने, नई परिस्थितियों के अनुकूल ढलने और जटिल समस्याओं को स्वतंत्र रूप से हल करने में सक्षम बनाती है। एआई सूचना का विश्लेषण करने, पैटर्न को पहचानने और प्रतिक्रियाएं पैदा करने हेतु डेटासेट, एल्गोरिदम और बड़े भाषा मॉडल का उपयोग करती है। समय के साथ, ये प्रणालियां अपने प्रदर्शन में सुधार करती हैं, जिससे वे मनुष्यों के समान तर्क करने, निर्णय लेने और संवाद करने में सक्षम हो जाती हैं।


स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के 2025 ग्लोबल एआई वाइब्रेंसी टूल के अनुसार, भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक अग्रणी देश के रूप में उभर रहा है और एआई प्रतिस्पर्धात्मकता में विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है। वर्ष 2017 से 2024 के बीच एआई के विकास और नवाचार के आधार पर मापी गई यह तेज प्रगति भारत की डिजिटल क्षमताओं, डेटा इकोसिस्टम और एआई संबंधी प्रतिभा, अनुसंधान, स्टार्टअप, निवेश, बुनियादी ढांचे एवं प्रशासन में मजबूत स्थिति को दर्शाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) कृषि क्षेत्र में भी एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभर रही है, जो विभिन्न कृषि प्रणालियों में उत्पादकता, स्थिरता और सुदृढ़ता को बढ़ाने के नए रास्ते खोल रही है। उपग्रहों, सेंसरों, ड्रोनों, मौसम केन्द्रों और कृषि से जुड़ी मशीनों से प्राप्त डेटा का उपयोग करके, एआई-आधारित उपकरण कृषि मूल्य श्रृंखला के हर चरण में सूचित निर्णय लेने में सहायता करते हैं।

इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026: समावेशी विकास हेतु एआई

शीघ्र ही आयोजित होने जा रहा, इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 समावेशी विकास के साधन के रूप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रति भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। यह शिखर सम्मेलन विशेष रूप से वंचित समुदायों के लिए एआई संबंधी क्षमताओं तक अधिक समतापूर्ण और किफायती पहुंच को बढ़ावा देकर प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण पर जोर देता है। यह ‘सभी के लिए कल्याण, सभी के लिए सुख’ की परिकल्पना के अनुरूप प्रौद्योगिकी के विकास के प्रति भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। ‘मानवता के लिए एआई’ के सिद्धांत को सुदृढ़ करते हुए, एआई को मानव-केन्द्रित और विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर शासन, सेवाओं के वितरण और सतत विकास के एक नैतिक प्रवर्तक के रूप में स्थापित किया गया है। इस व्यापक संदर्भ में, भारतीय कृषि एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां किसानों का समर्थन करने, निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करने और उत्पादकता बढ़ाने हेतु एआई का तेजी से उपयोग किया जा रहा है।

 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कृषि में इसके उपयोग

कृषि में, एआई आंकड़ों (डेटा) को सरल एवं वैसी व्यावहारिक सलाह में बदलने में मदद करता है जिसे किसान अपनी  रोजमर्रा की कृषि पद्धतियों में लागू कर सकते हैं। उपग्रह से प्राप्त चित्रों, मौसम संबंधी पूर्वानुमानों, मिट्टी के आंकड़ों और फसलों के ढर्रों (पैटर्न) का विश्लेषण करके, एआई किसानों को यह तय करने में मदद कर सकता है कि क्या बोना है, कब बोना है, कितना खाद उपयोग करना है और कब कटाई करनी है। कीटों एवं बीमारियों के बारे में प्रारंभिक चेतावनी से लेकर सिंचाई एवं उर्वरकों के उपयोग की बेहतर योजना तक, एआई खेती को अधिक सटीक, कुशल और कम जोखिम भरा बना रहा है। कृषि में एआई के उपयोग को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • मृदा स्वास्थ्य निदान

एआई उपग्रह से प्राप्त चित्रों, ड्रोन द्वारा किए गए अवलोकनों और खेत स्तर के चित्रों से प्राप्त संकेतों का विश्लेषण करके मृदा के स्वास्थ्य की निगरानी हेतु डीप लर्निंग और इमेज रेकग्निशन का उपयोग करता है। इससे पोषक तत्वों की कमी और मृदा तनाव का पता लगाने के साथ-साथ प्रयोगशाला परीक्षण संबंधी बुनियादी ढांचे की जरूरत भी समाप्त हो जाती है। किसान मृदा की उर्वरता को बहाल करने के लिए समय रहते कार्रवाई कर सकते हैं।

  • जलवायु के अनुकूल फसल निगरानी और परामर्श सेवाएं

भारतीय कृषि जलवायु की परिवर्तनशीलता के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है क्योंकि यह वर्षा पर बहुत अधिक निर्भर करती है। एआई मौसम व जलवायु संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करके वर्षा के बदलते पैटर्न, तापमान में उतार-चढ़ाव और चरम घटनाओं का पूर्वानुमान लगाता है। साथ ही बुवाई संबंधी निर्णय, सिंचाई संबंधी कार्यक्रम, कीट प्रबंधन और खाद के उपयोग पर वास्तविक समय में सलाह प्रदान करता है। इसके अलावा उपग्रह से प्राप्त चित्रों, ड्रोन, सेंसर और इमेज एनालिटिक्स का उपयोग करके, एआई-आधारित निगरानी कीटों और फसल के रोगों का शीघ्र पता लगाने में सहायक होती है। इससे समय रहते उपाय संभव हो पाता है। ये सभी अनुप्रयोग मिलकर, विशेष रूप स वर्षा आधारित क्षेत्रों में, जलवायु संबंधी जोखिमों का प्रबंधन करने और फसलों के संभावित नुकसान को कम करने में किसानों की सहायता करते हैं।

  • कृषि संबंधी मशीनीकरण की दक्षता में सुधार

एआई द्वारा संचालित छवि वर्गीकरण (इमेज क्लासिफिकेशन) और मशीन लर्निंग उपकरण ड्रोन, रिमोट सेंसिंग और स्थानीय सेंसर डेटा के साथ एकीकृत होकर, कृषि संबंधी मशीनरी के उपयोग और दक्षता में सुधार करते हैं। इनके अनुप्रयोगों में खरपतवार की सटीक निराई, रोग की शीघ्र पहचान, स्वचालित कटाई और उपज का वर्गीकरण शामिल हैं।

बागवानी के क्षेत्र में, फसलों को जहां विकास के कई चरणों में निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है, वहीं एआई-आधारित प्रणालियां उच्च मूल्य वाली फसलों की चौबीसों घंटे निगरानी प्रदान करती हैं। इससे श्रम पर निर्भरता कम होती है, इनपुट का अनुकूलित उपयोग होता है और गुणवत्ता नियंत्रण बेहतर होती है।

  • किसानों के लिए मूल्य प्राप्ति को बेहतर बनाना

किसान, खासकर फल और सब्जियों के उत्पादन में संलग्न किसान, अपर्याप्त मूल्य निर्धारण, आपूर्ति श्रृंखला की अक्षमताओं और सूचना संबंधी विषमताओं के कारण अंतिम उपभोक्ता मूल्य का एक छोटा हिस्सा ही हासिल कर पाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मांग और आपूर्ति संबंधी पूर्वानुमान, बाजार संबंधी जानकारी और कृषिगत मूल्य श्रृंखलाओं में समन्वय को मजबूत करके इन संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने का एक सशक्त साधन प्रदान करती है।

ई-एनएएम, एजीमार्केट, कृषि जनगणना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम जैसे प्लेटफार्मों से प्राप्त विशाल डेटासेट का उपयोग करके, एआई-आधारित पूर्वानुमान विश्लेषण मूल्य परिवर्तन, आवक के रुझान और क्षेत्रीय मांग के पैटर्न का आकलन करते हैं। घरेलू और वैश्विक दोनों प्रकार के कमोडिटी संकेतों को शामिल करके, ये उपकरण फसल के चयन, बिक्री के समय और बाजार के चयन के बारे में अधिक सटीक निर्णय लेने में सहायता करते हैं। इससे बेहतर मूल्य प्राप्ति होती है और मजबूरी में की गई बिक्री कम होती है। कृषि में एआई का कार्यान्वयन इस क्षेत्र में जमीनी स्तर पर इसके व्यापक उपयोग को दर्शाता है। एआई-आधारित कृषि नेटवर्क ने 12 राज्यों के लगभग 1.8 मिलियन किसानों के लिए बाजार तक पहुंच, मूल्य निर्धारण और लॉजिस्टिक्स संबंधी दक्षता को बेहतर बनाया  है।

सटीक खेती के एक अहम प्रवर्तक के रूप में एआई

जीपीएस, सेंसर, उपग्रहों और ड्रोनों से प्राप्त डेटा को एआई  खेत के  स्तर पर उपयोगी जानकारियों में परिवर्तित करके सटीक खेती को संभव बनाता है। यह मिट्टी के गुणों, नमी के स्तर और फसल के स्वास्थ्य से संबंधित डेटा को स्थानीय स्तर पर एकत्र करने में सक्षम बनाता है। इससे पानी, उर्वरक और कीटनाशक जैसे इनपुट का ठीक उसी स्थान और समय पर डाला जाना सुनिश्चित होता है जहां और जब उनकी आवश्यकता होती है। यह स्थल विशेष पर आधारित यह दृष्टिकोण उत्पादकता को बढ़ाता है, संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करता है, अपव्यय को कम करता है और पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम करता है।

 

एआई आधारित सटीक खेती: टिकाऊ कृषिगत रूपांतरण हेतु एक व्यापक दृष्टिकोण


राजरत्नम कनकराजन का अनुभव भारतीय कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के व्यावहारिक और व्यापक अनुप्रयोग का उदाहरण है। तमिलनाडु स्थित एक स्टार्टअप ‘फार्म अगेन’ द्वारा विकसित एआई-आधारित सटीक कृषि प्रणाली को अपनाकर, उन्होंने सौर ऊर्जा से चलने वाले सेंसरों का उपयोग करते हुए मोबाइल प्लेटफॉर्म के जरिए मिट्टी की नमी, सिंचाई और उर्वरक के उपयोग की वास्तविक समय में निगरानी की। इस प्रणाली ने कृषि से जुड़े कार्यों को स्वचालित कर दिया, अत्यधिक सिंचाई एवं इनपुट के उपयोग को कम किया और फसल की स्थिति को अनुकूलित किया, जिसके परिणामस्वरूप नारियल की पैदावार दोगुनी हो गई।

इस पद्धति से तमिलनाडु में 4,000 एकड़ से अधिक भूमि पर 3,500 से अधिक किसानों को लाभ हुआ है। किफायती कीमत इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है, क्योंकि आयातित उपकरणों (25 लाख रुपये) की तुलना में स्वदेशी उपकरणों की लागत काफी कम (2.5 लाख रुपये) है। उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ, इस पद्धति से पर्यावरण को भी काफी लाभ हुआ है। इसके तहत प्रति वर्ष 4,00,000 घनमीटर से अधिक पानी और लगभग 1,75,000 किलोवाट-घंटे ऊर्जा की बचत हुई है। साथ ही, उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे अनुमानित 20,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर के उत्सर्जन को रोका जा सका है। कई देशों में इसके विस्तार से प्रदर्शित इस उपाय की व्यापकता इस बात को रेखांकित करती है कि स्थानीय स्तर पर विकसित एआई संबंधी नवाचार किस प्रकार कृषि की उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं, संसाधनों का संरक्षण कर सकते हैं और टिकाऊ कृषिगत रूपांतरण  में सहयोग कर सकते हैं।

एआई आधारित कृषि से संबंधित सरकारी पहल

सरकार अपनी विभिन्न पहलों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति का सक्रिय रूप से उपयोग कर रही है। नीचे उल्लिखित पहलें कृषि के विकास के प्रति सरकार के समग्र दृष्टिकोण को दर्शाती हैं, जो नीतिगत नवाचारों में परिलक्षित होता है।

केन्द्रीय बजट 2026-27: एआई आधारित कृषि परामर्श के लिए भारत-विस्तार

केन्द्रीय बजट 2026-27 में भारत-विस्तार (कृषि संसाधनों तक पहुंच के लिए आभासी रूप से एकीकृत प्रणाली) का प्रस्ताव किया गया है। यह एक बहुभाषी एआई उपकरण है, जो एग्रीस्टैक पोर्टल और कृषि पद्धतियों से संबंधित आईसीएआर पैकेज को एआई प्रणालियों के साथ एकीकृत करेगा। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी और अनुकूलित परामर्श सहायता प्रदान करके जोखिम कम होगा

किसानों के लिए एआई आधारित परामर्श एवं निर्णय संबंधी सहायता सेवाएं

किसान ई-मित्र:

वर्ष 2023 में शुरू किया गया किसान ई-मित्र, एक आवाज-आधारित एवं एआई द्वारा संचालित चैटबॉट है। इसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान क्रेडिट कार्ड और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी प्रमुख सरकारी योजनाओं से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देकर किसानों की सहायता हेतु डिजाइन किया गया है। यह प्लेटफॉर्म 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है और वर्तमान में प्रतिदिन 8,000 से अधिक किसानों के प्रश्नों का समाधान करता है। दिसंबर 2025 तक, इसने सफलतापूर्वक 93 लाख से अधिक प्रश्नों का उत्तर दिया है। इससे देश भर के किसानों के लिए योजना संबंधी जानकारी की सुलभता बेहतर  हुई है।

राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली:

वर्ष 2024 में शुरू की गई राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली (एनपीएसएस), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) का उपयोग करके कीटों के प्रकोप और फसल के रोगों का शीघ्र पता लगाने में समर्थ बनाती है। उपयोगकर्ता के अनुकूल मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से सुलभ, यह प्रणाली किसानों को प्रभावित फसलों या कीटों की तस्वीरें अपलोड करने की सुविधा देती है जिससे त्वरित पहचान और निदान संभव हो पाता है।

इमेज एनालिटिक्स का उपयोग करते हुए, एनपीएसएस वास्तविक समय में फसल की सुरक्षा संबंधी परामर्श प्रदान करता है। इससे किसानों को उचित कीट और रोग प्रबंधन पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन मिलता है और फसल के नुकसान को कम करने के लिए समय पर उपाय करने में मदद मिलती है। दिसंबर 2025 तक, एनपीएसएस का उपयोग 10,000 से अधिक विस्तार कार्यकर्ताओं द्वारा किया जा रहा है और यह 66 फसलों और 432 से अधिक कीट प्रजातियों को सहायता प्रदान करता है।

खरीफ की बुवाई के बारे में सटीक निर्णय लेने हेतु एआई-आधारित स्थानीय मानसून के आरंभ संबंधी पूर्वानुमान:

खरीफ 2025 के दौरान 13 राज्यों के विभिन्न हिस्सों में स्थान-विशेष में मानसून के आरंभ के बारे में पूर्वानुमान पाने हेतु एक एआई आधारित प्रायोगिक परियोजना लागू की गई। यह पहल भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और डेवलपमेंट इनोवेशन लैब-इंडिया के सहयोग से की गई। इस प्रायोगिक परियोजना में ओपन-सोर्स मिश्रित मॉडलिंग पद्धति का उपयोग किया गया, जिसमें न्यूरलजीसीएम, यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ईसीएमडब्ल्यूएफ) की कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूर्वानुमान प्रणाली (एआईएफएस) और आईएमडी के 125 वर्षों के ऐतिहासिक वर्षा डेटा को संयोजित किया गया। स्थानीय मानसून के आरंभ पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, बुवाई संबंधी सर्वोत्कृष्ट निर्णयों के बारे में मार्गदर्शन हेतु 13 राज्यों के 3.88 करोड़ से अधिक किसानों को पांच क्षेत्रीय भाषाओं में एमकिसान पोर्टल के जरिए  एसएमएस द्वारा संभाव्य पूर्वानुमान भेजे गए। मध्य प्रदेश और बिहार में किए गए अनुवर्ती सर्वेक्षणों से पता चला कि 31-52 प्रतिशत किसानों ने पूर्वानुमानों के आधार पर अपने बुवाई संबंधी निर्णयों में मुख्य रूप से भूमि की तैयारी, बुवाई की समय-सीमा और फसल एवं इनपुट संबंधी विकल्पों को समायोजित करके बदलाव किया ।

डिजिटल कृषि मिशन के जरिए डेटा आधारित शासन

2,817 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय और वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 54.972 करोड़ के आवंटन के साथ वर्ष 2024 में शुरू किए गए, डिजिटल कृषि मिशन का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में नवोन्मेषी एवं किसान-केंद्रित डिजिटल समाधानों के वितरण को बढ़ावा देना है। यह मिशन किसानों, भूमि जोत और फसलों से संबंधित सत्यापित डेटासेट के साथ-साथ डेटा एनालिटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रिमोट सेंसिंग जैसी उन्नत डिजिटल प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके सभी किसानों के लिए फसल संबंधी विश्वसनीय जानकारी की समयबद्ध पहुंच सुनिश्चित करना चाहता है।

आंकड़ों पर आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत करके, इस मिशन का उद्देश्य कृषि संबंधी सेवाओं की दक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना है। इसमें कृषि के लिए एक व्यापक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) विकसित करने की परिकल्पना की गई है, जिसमें एग्रीस्टैक और कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (केडीएसएस) जैसे प्लेटफॉर् के साथ-साथ एक एकीकृत मृदा उर्वरता और प्रोफाइल मानचित्र शामिल हैं ताकि भारत में एक मजबूत और विस्तार योग्य डिजिटल कृषि इकोसिस्टम की नींव रखी जा सके।

एग्रीस्टैक:

एग्रीस्टैक डिजिटल कृषि मिशन का एक प्रमुख घटक है, जो किसानों को भूमि अभिलेखों, पशुधन स्वामित्व, खेती की गई फसलों और प्राप्त लाभों से जुड़ी एक विशिष्ट डिजिटल पहचान (किसान आईडी) प्रदान करता है। इससे सुरक्षित पहचान और कृषि सेवाओं तक पहुंच संभव हो पाती है। वर्ष 2026-27 तक 11 करोड़ किसान आईडी के लक्ष्य की तुलना में, 27 नवंबर 2025 तक महिला किसानों के लिए 1.93 करोड़ आईडी सहित कुल 7.63 करोड़ से अधिक आईडी जारी की जा चुकी हैं। आईडी के निर्माण और सत्यापन में तेजी लाने हेतु, पीएम-किसान प्रशासनिक निधि से प्रति किसान आईडी 10 रुपये आवंटित किए गए हैं। एग्रीस्टैक मोबाइल-आधारित डिजिटल फसल सर्वेक्षण का भी समर्थन करता है जो फसल के प्रकार और खेती के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र के बारे में वास्तविक समय एवन भूखंड-स्तरीय डेटा एकत्र करता है। सर्वेक्षण में रबी 2024-25 के दौरान 492 जिलों और 23.5 करोड़ से अधिक भूखंडों को शामिल किया गया था और योजना, निगरानी एवं नीति कार्यान्वयन को मजबूत करने हेतु वित्त वर्ष 2025-26 में सभी जिलों में राष्ट्रव्यापी स्तर पर इसे लागू करने की योजना है।

कृषि निर्णय समर्थन प्रणाली:

कृषि निर्णय सहायता प्रणाली (केडीएसएस) उपग्रह से प्राप्त  चित्रों, मौसम संबंधी जानकारी, मृदा एवं जल संसाधन, फसल संबंधी डेटा और सरकारी योजनाओं के डेटाबेस सहित विविध स्रोतों से डेटा को एकीकृत करती है, जिससे डिजिटल फसल मानचित्र, मृदा मानचित्र, उपज अनुमान और सूखा एवं बाढ़ निगरानी आकलन जैसे व्यापक विश्लेषणात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। यह प्रणाली फसल विविधीकरण संबंधी सलाह प्रदान करके और फसल बीमा निपटान के लिए प्रौद्योगिकी एवं मॉडल आधारित उपज आकलन को सुगम बनाकर सूचित निर्णय लेने में सहायता करती है। साथ ही, केडीएसएस सरकारी एजेंसियों को विश्वसनीय, वास्तविक समय की जानकारी प्रदान करके साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और कार्यक्रम कार्यान्वयन को मजबूत बनाती है।

मृदा प्रोफाइल मानचित्र:

भारत के मृदा एवं भूमि उपयोग सर्वेक्षण (एसएलयूएसआई) द्वारा शुरू की गई राष्ट्रव्यापी मृदा संसाधन मानचित्रण परियोजना का उद्देश्य उपग्रह से प्राप्त उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले चित्रों और फील्ड-आधारित अवलोकनों को एकीकृत करके 1:10,000 के उच्च स्थानिक रिज़ॉल्यूशन पर एक व्यापक ग्राम-स्तरीय मृदा सूची तैयार करना है। परिणामस्वरूप प्राप्त मानकीकृत मृदा मानचित्र सूचित भूमि उपयोग योजना, फसल के चयन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने हेतु एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। सितंबर 2024 तक, मिशन के 142 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि के लक्ष्य की तुलना में लगभग 29 मिलियन हेक्टेयर भूमि का मानचित्रण किया जा चुका है। इस मिशन के कार्यान्वयन हेतु, छह राज्यों - उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश – को 1,076 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। साथ ही, राज्यों को क्षेत्र-स्तरीय शिविरों के आयोजन और स्थानीय प्रशासन को सक्रिय करने के लिए शिविर-आधारित दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इसके लिए प्रति शिविर 15,000 रुपये का आवंटन किया गया है।

सुदृढ़ कृषि हेतु  एआई आधारित एवं प्रौद्योगिकी-संचालित फसल बीमा

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत किसानों को अप्रत्याशित घटनाओं के कारण होने वाले फसल के नुकसान से बचाने हेतु की गई थी। इसके तहत कम और निश्चित प्रीमियम दरों पर किफायती फसल बीमा उपलब्ध कराया जाता है। खरीफ खाद्य और तिलहन फसलों के लिए किसान केवल 2 प्रतिशत, रबी खाद्य एवं तिलहन फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत और व्यावसायिक एवं बागवानी फसलों के लिए 5 प्रतिशत प्रीमियम का योगदान करते हैं। शेष प्रीमियम सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप में दिया जाता है। पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में, कमजोर किसानों को बीमा कवरेज सुनिश्चित करने हेतु पूरा प्रीमियम सरकार द्वारा वहन किया जाता है।

इस योजना में दक्षता और पारदर्शिता को बढ़ाने हेतु एआई आधारित प्रौद्योगिकियों को धीरे-धीरे एकीकृत किया गया है।

यस-टेक (प्रौद्योगिकी आधारित उपज आकलन प्रणाली) सटीक उपज अनुमान हासिल करने हेतु रिमोट सेंसिंग और एआई आधारित एनालिटिक्स विश्लेषण का उपयोग करती है। खरीफ 2023 में धान और गेहूं के लिए शुरू की गई और खरीफ 2024 में सोयाबीन तक विस्तारित की गई यस-टेक, प्रौद्योगिकी-आधारित आकलन को न्यूनतम 30 प्रतिशत भार प्रदान करती है। जनवरी 2025 तक, इसे नौ राज्यों द्वारा अपनाया जा चुका है। इनमें से मध्य प्रदेश ने पूरी तरह से प्रौद्योगिकी-आधारित उपज आकलन प्रणाली में परिवर्तित हो गया है। इससे समय पर नुकसान का आकलन और दावों का तेजी से निपटान संभव हो पाता है।

क्रॉपिक (फसलों के वास्तविक समय के अवलोकन और तस्वीरों का संग्रह) एक एआई आधारित उपकरण है जिसका उपयोग फसलों के स्वास्थ्य की निगरानी और फसल की क्षति का आकलन करने के लिए किया जाता है। एक मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए, किसान और फील्ड समन्वयक अपने स्मार्टफोन से जियोटैग और समय-चिह्नित फसल की तस्वीरें अपलोड करते हैं। ये समय-श्रृंखला तस्वीरें बीमित फसलों के विरुद्ध फसल सत्यापन में सहायता करती हैं और स्थानीय आपदाओं के दौरान क्षति के सटीक आकलन को संभव बनाती हैं। क्रॉपिक एक पारदर्शी, वास्तविक समय, साक्ष्य-आधारित प्रणाली प्रदान करता है जो फसल बीमा के कार्यान्वयन, आपदा संबंधी प्रतिक्रिया और डेटा-आधारित निर्णय लेने को मजबूत बनाता है।

पीएमएफबीवाई व्हाट्सएप चैटबॉट, एक एआई-आधारित चैटबॉट है जो व्हाट्सएप के माध्यम से उपलब्ध है और किसानों को पीएमएफबीवाई योजना के बारे में जानकारी प्रदान करने में सहायता करता है।

वर्ष 2023 में शुरू किया गया विंड्स (वेदर इन्फॉर्मेशन एंड नेटवर्क डेटा सिस्टम) एक ऐसा राष्ट्रीय मंच है, जो वास्तविक समय में मौसम संबंधी विश्वसनीय डेटा प्रदान करने हेतु विविध मौसम प्रणालियों को एकीकृत करता है। यह कृषि में मौसम संबंधी सटीक निगरानी, ​​योजना और जोखिम मूल्यांकन को संभव बनाता है।

पीएमएफबीवाई भारत का सबसे व्यापक फसल बीमा कार्यक्रम बनकर उभरा है। पीएमएफबीवाई के साथ ही शुरू की गई पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (आरडब्ल्यूबीसीआईएस) एक मौसम सूचकांक आधारित बीमा योजना है, जो उपज आधारित कवरेज की पूरक है। वर्ष 2016-17 से 2024-25 (अक्टूबर 2025 तक) के बीच, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना (आरडब्ल्यूबीसीआईएस) ने मिलकर 78.51 करोड़ से अधिक किसानों के आवेदनों को कवर किया। इस अवधि के दौरान, किसानों ने प्रीमियम के रूप में 35,919 करोड़ रुपये का योगदान दिया, जबकि 1,90,374 करोड़ रुपये के दावों का वितरण किया गया, जिससे 23 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ हुआ। अकेले 2020-21 से 2024-25 की हालिया अवधि (31 अक्टूबर 2025 तक) पर ध्यान केन्द्रित करते हुए, योजनाओं के अंतर्गत 55.28 करोड़ से अधिक आवेदन आए और 93,891 करोड़ रुपये के दावों का भुगतान किया गया, जिससे 14.97 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ हुआ। ये तथ्य उत्पादन संबंधी जोखिमों से कृषि आधारित आजीविका की रक्षा करने में पीएमएफबीवाई की बढ़ती पहुंच, विश्वसनीयता और प्रभाव को रेखांकित करते हैं।

एआई-आधारित कृषि तकनीक से जुड़े स्टार्टअप और उभरते कृषि संबंधी नवाचार

भारत सरकार 2018-19 से राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत नवाचार एवं  कृषि उद्यमिता विकास कार्यक्रम के जरिए कृषि तकनीक से जुड़े स्टार्टअप के तेज विकास को बढ़ावा दे रही है। साथ ही, यह कार्यक्रम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग, सटीक खेती, ड्रोन और जलवायु-अनुकूल कृषि सहित उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाने में भी सहयोग प्रदान करता है। कृषि-तकनीक से जुड़े स्टार्टअप कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ कृषि पद्धतियों को एकीकृत करके भारतीय कृषि के एक नए युग की शुरुआत कर रहे हैं। ‘आशा की किरण’ के रूप में निरूपित ये स्टार्टअप नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं और देश भर में कृषि से जुड़े कामकाज का कायाकल्प कर रहे हैं।

इस कार्यक्रम के तहत, नॉलेज पार्टनर्स (केपी) और आरकेवीवाई एग्रीबिजनेस इनक्यूबेटर्स (आर-एबीआई) कृषि से जुड़े स्टार्टअप को विचार या प्री-सीड चरण (5 लाख रुपये तक) और सीड चरण (25 लाख रुपये तक) में व्यवस्थित तकनीकी एवं वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं, जिससे वे नवीन उत्पादों एवं सेवाओं को विकसित करने, उनका परीक्षण करने और उनका विस्तार करने में समर्थ होते हैं। जनवरी 2026 तक, 6,000 से अधिक कृषि स्टार्टअप को प्रशिक्षण प्रदान किया जा चुका है और वित्त वर्ष 2019-20 से लेकर वित्त वर्ष 2025-26 के बीच, कुल 2282 स्टार्टअप को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की गई है, जिसमें कुल अनुदान राशि 186.55 करोड़ रुपये है।

समर्थित स्टार्टअप सटीक कृषि, एआई एवं आईओटी-आधारित समाधान, कृषि मशीनीकरण, फसल की कटाई के बाद और खाद्य प्रौद्योगिकियां, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, अपशिष्ट से धन सृजन की पहल और जैविक खेती सहित प्रमुख क्षेत्रों में काम करते हैं, जिससे कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिलता है और दक्षता में वृद्धि होती है।

 एआई आधारित रोबोटिक्स द्वारा कृषि कार्यों में क्रांतिकारी बदलाव

आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) का कृषि इंजीनियरिंग प्रभाग मृदा का नमूना लेने, बुवाई, कटाई और फसल की निगरानी सहित विभिन्न कृषि कार्यों के लिए कृषि रोबोटिक्स विकसित करने में सक्रिय रूप से जुटा हुआ है। इन प्रयासों के पूरक के रूप में, भारत के कृषि रोबोटिक्स इकोसिस्टम में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई है। इसमें स्वायत्त ट्रैक्टर, रोबोटिक कटाई प्रणाली और फसल निगरानी हेतु एआई आधारित उपकरण शामिल हैं, जो कृषि पद्धतियों में स्वचालन और बुद्धिमान प्रौद्योगिकियों के बढ़ते एकीकरण को दर्शाते हैं।

 

भारत में भविष्य की खेती: इम्पैक्ट एआई फ्रेमवर्क

भारत सरकार ने 22 अक्टूबर 2025 को “फ्यूचर फार्मिंग इन इंडिया: एआई प्लेबुक फॉर एग्रीकल्चर” शीर्षक से एक प्रकाशन जारी किया। विश्व आर्थिक मंच द्वारा भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय, इंडियाएआई (एमईआईटीवाई) और बीसीजी एक्स के सहयोग से एक सारगर्भित रिपोर्ट के रूप में विकसित, इस प्लेबुक में छोटे और सीमांत किसानों पर विशेष ध्यान केन्द्रित करते हुए भारतीय कृषि में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को जिम्मेदारीपूर्वक और व्यापक रूप से अपनाने हेतु एक नीति-उन्मुख रोडमैप प्रदान किया गया है।

इस प्लेबुक का उद्देश्य एआई अनुप्रयोगों के प्रायोगिक चरण से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन की दिशा में बदलाव को सुगम बनाना है, जिसमें खंडित डेटा इकोसिस्टम, सीमित डिजिटल अवसंरचना, वहनीयता संबंधी बाधाएं और अंतिम-छोर तक वितरण संबंधी समस्याओं  जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान करना शामिल है। यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कृषि कार्यों में डेटा-आधारित निर्णय लेने के साधन के रूप में पेश करती है, जिसमें उत्पादकता बढ़ाने, जलवायु संबंधी दृढ़ता को मजबूत करने, संसाधनों का अनुकूलित उपयोग करने और बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाने की क्षमता है।

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इस रिपोर्ट में कृषि मूल्य श्रृंखला में एआई के प्राथमिकता वाले उपयोग के मामलों पर प्रकाश डाला गया है, जिनमें एआई आधारित फसल योजना, त्वरित मृदा स्वास्थ्य विश्लेषण, कीट पूर्वानुमान एवं नियंत्रण, और स्मार्ट डिजिटल बाज़ार शामिल हैं। इस प्लेबुक का एक केंद्रीय योगदान इम्पैक्ट एआई फ्रेमवर्क है, जो समग्र इकोसिस्टम में कार्रवाई का मार्गदर्शन करने, हितधारकों की भूमिकाओं को स्पष्ट करने और एआई समाधानों के प्रभावी कार्यान्वयन में सहायता करने हेतु  निम्नलिखित स्तंभों पर आधारित है:

सक्षम करना: सक्षम करने वाला स्तंभ कृषि में एआई के व्यापक उपयोग के लिए आवश्यक बुनियादी प्रणालियों के निर्माण पर केन्द्रित है। यह स्पष्ट एआई संबंधी रणनीतियों, सहायक नीतियों, डेटा-साझाकरण ढांचों और डिजिटल अवसंरचना के विकास जैसे सरकारी नेतृत्व वाले कार्यों पर जोर देता है ताकि एआई को अपनाया जा सके।

निर्माण करना: निर्माण करने वाला स्तंभ कृषि के लिए एआई समाधानों के विकास और परीक्षण पर केन्द्रित है। यह एआई अनुप्रयोगों को डिजाइन करने, मान्य करने और परिष्कृत करने के लिए स्टार्टअप, प्रौद्योगिकी प्रदाताओं और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग पर प्रकाश डालता है।

वितरित करना: वितरित करने वाला स्तंभ एआई से जुड़े समाधानों का किसानों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना सुनिश्चित करने पर केन्द्रित है। यह विस्तार प्रणालियों को मजबूत करता है, एआई को परामर्श सेवाओं में एकीकृत करता है और परिणामों को बेहतर बनाने हेतु जमीनी प्रतिक्रिया का उपयोग करता है।

निष्कर्ष

भारत में कृषि क्षेत्र में एक व्यापक तकनीकी बदलाव हो रहा है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके पारंपरिक पद्धतियों से हटकर डेटा-आधारित सटीक इकोसिस्टम की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है। यह बदलाव डिजिटल कृषि मिशन और एग्रीस्टैक सहित विशाल डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर आधारित है, जो लाखों किसानों को लक्षित सेवाएं प्रदान करने हेतु एक प्रमाणित आधार प्रदान करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण संपूर्ण कृषि मूल्य श्रृंखला में ठोस लाभ प्रदान कर रहा है।

भारत-विस्तार और किसान ई-मित्र जैसे उपकरण बहुभाषी एवं वास्तविक समय में परामर्श सेवाएं प्रदान करते हैं, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में भी विशेषज्ञ ज्ञान सुलभ हो जाता है और निर्णय लेने की क्षमता और बेहतर हो जाती है। मानसून पूर्वानुमान और कीट निगरानी (एनपीएसएस) के लिए एआई द्वारा संचालित प्रणालियां किसानों को जलवायु और जैविक जोखिमों का सक्रिय रूप से प्रबंधन करने में सक्षम बनाती हैं। इससे संभावित नुकसान में काफी कमी आती है और सुदृढ़ता में बढ़ोतरी होती है। सटीक खेती, कृषि से जुड़े रोबोटिक्स और यस-टेक एवं क्रॉपिक के जरिए एआई आधारित फसल बीमा में नवाचार संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित कर रहे हैं और दावों के तेजी से एवं अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी तरीके से निपटान को सुनिश्चित कर रहे हैं। इसके अलावा, एआई-संचालित एनालिटिक्स आपूर्ति श्रृंखला में संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने का प्रयास करता है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए मूल्य निर्धारण और बाजार तक पहुंच में सुधार होता है। सामूहिक रूप से, ये पहलें प्रौद्योगिकी के प्रति एक मानव-केन्द्रित दृष्टिकोण को दर्शाती हैं और इसका लक्ष्य ऐसा सतत कृषि विकास है जो समावेशी विकास और कृषक समुदाय के कल्याण को प्राथमिकता दे

संदर्भ

लोकसभा

राज्यसभा

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय

वित्त मंत्रालय

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय

माई स्कीम

नीति आयोग

भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार का कार्यालय

पत्र सूचना कार्यालय

पीआईबी शोध

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पीके/केसी/आर


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