विधि एवं न्‍याय मंत्रालय
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विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा एक केन्द्रीय योजना, न्याय तक समग्र पहुंच के लिए अभिनव समाधान तैयार करना(DISHA), लागू की जा रही है

प्रविष्टि तिथि: 13 FEB 2026 6:34PM by PIB Delhi

भारत सरकार ने पिछले पांच वर्षों में न्याय तक पहुंच को सुदृढ़ बनाने तथा विधिक एवं न्यायिक प्रक्रियाओं में आने वाली बाधाओं को कम करने के लिए विभिन्न पहल की हैं, ताकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39A के अंतर्गत निर्धारित दायित्वों की पूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

विधि एवं न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा एक केंद्रीय योजना, “न्याय तक समग्र पहुंच के लिए अभिनव समाधान तैयार करना(DISHA)”, वर्ष 2021–2026 की पांच वर्ष की अवधि के लिए कुल 250 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ लागू की जा रही है। इस योजना का उद्देश्य टेली-लॉ, न्याय बंधु तथा विधिक साक्षरता एवं विधिक जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से अखिल भारतीय स्तर पर न्याय तक पहुंच के लिए एक व्यापक एवं एकीकृत समाधान प्रदान करना है। यह एक नागरिक-केंद्रित एवं समावेशी योजना है, जो लाभार्थियों को न्याय सुलभ कराने हेतु प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग करती है। टेली-लॉ कार्यक्रम के अंतर्गत नागरिकों को मुकदमे से पूर्व निःशुल्क विधिक परामर्श वीडियो एवं टेलीफोनिक माध्यम से प्रदान किया जाता है। यह सुविधा सामान्य सेवा केंद्र(सीएससी), टेली-लॉ मोबाइल एप्लीकेशन तथा समर्पित टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 14454 के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। टेली-लॉ देश के 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 776 जिलों में स्थित 2,50,000 सामान्य सेवा केंद्र में संचालित है, जिनमें 112-आकांक्षी जिले तथा 500-आकांक्षी ब्लॉक भी शामिल हैं। अंतिम छोर तक सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2024 से न्याय सहायकों को 500 आकांक्षी ब्लॉकों में घर-घर जाकर मुकदमे से पूर्व विधिक सहायता प्रदान करने हेतु नियुक्त किया गया है। 31 जनवरी, 2026 तक देशभर में 1.12 करोड़ से अधिक पूर्व-विवाद विधिक परामर्श प्रदान किए जा चुके हैं।

न्याय बंधु(प्रो बोनो विधिक सेवाएं) कार्यक्रम के अंतर्गत इच्छुक प्रो बोनो अधिवक्ताओं का पंजीकरण किया जाता है तथा उन्हें उन लाभार्थियों से जोड़ा जाता है, जो विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सहायता के पात्र हैं। यह प्रक्रिया न्याय बंधु एप्लीकेशन (iOS/Android/उमंग प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध) के माध्यम से संचालित की जाती है। इसके अलावा, लाभार्थियों को प्रो बोनो विधिक सेवाएं सुदृढ़ रूप से प्रदान करने हेतु 23-उच्च न्यायालयों में प्रो बोनो अधिवक्ताओं का एक पैनल भी गठित किया गया है, जिससे संस्थागत तंत्र को और मजबूत बनाया जा सके। 31 जनवरी, 2026 तक न्याय बंधु प्लेटफ़ॉर्म पर कुल 10,133 अधिवक्ताओं ने स्वेच्छा से पंजीकरण कराया है। इसके अलावा, विधि छात्रों में प्रो बोनो कार्य की भावना विकसित करने तथा विधिक सेवाओं के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से देश के 109-विधि महाविद्यालयों में प्रो बोनो क्लब स्थापित किए गए हैं। विधिक साक्षरता एवं विधिक जागरूकता कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिष्ठित सरकारी एवं निजी संस्थानों के साथ संस्थागत सहयोग कर पुस्तकों, प्रशिक्षण मॉड्यूल, कार्यशालाओं आदि के रूप में सूचना, शिक्षा एवं संचार सामग्री तैयार की जाती है, ताकि विधिक साक्षरता और जागरूकता को बढ़ावा दिया जा सके। 31 जनवरी, 2026 तक इस कार्यक्रम के माध्यम से 1.20 करोड़ से अधिक लाभार्थियों तक पहुंच सुनिश्चित की जा चुकी है।

केंद्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत संचालित फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय(FTSCs) योजना के तहत 29 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 774 फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय, जिनमें 398 विशिष्ट पॉक्सो(ई-पॉक्सो) न्यायालय शामिल हैं, बलात्कार एवं पॉक्सो अधिनियम से संबंधित लंबित मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए कार्यरत हैं। 31 दिसंबर 2025 तक इन न्यायालयों द्वारा स्थापना के बाद से सामूहिक रूप से 3,66,124 मामलों का निस्तारण किया जा चुका है। इस योजना के अंतर्गत कुल 1,952.23 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान है, जिसमें से 1,207.24 करोड़ रुपये केन्द्रीय अंश के रूप में निर्भया फंड से (सीएसएस पैटर्न पर) व्यय किए जाने हैं। केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2019 में योजना के आरंभ से अब तक यानि 05 फरवरी 2026 तक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को एफटीएससी के संचालन हेतु कुल 1,156.99 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

सरकार ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) की स्थापना की है, ताकि अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत आने वाले समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएं प्रदान की जा सकें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार की अक्षमता के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न होना पड़े, तथा समान अवसरों के आधार पर न्याय प्रणाली के संचालन को बढ़ावा देने हेतु लोक अदालतों का आयोजन किया जा सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विधिक सेवा संस्थानों की स्थापना तालुक न्यायालय स्तर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की गई है। विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा संचालित प्रमुख गतिविधियों/कार्यक्रमों में निःशुल्क विधिक सहायता एवं परामर्श, विधिक जागरूकता कार्यक्रम, विधिक सेवा/सशक्तिकरण शिविर, विधिक सेवा क्लीनिक, विधिक साक्षरता क्लब, लोक अदालतों का आयोजन, पीड़ित मुआवजा योजना का क्रियान्वयन शामिल है।

लोक अदालत आम जनता के लिए उपलब्ध एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र है, जहां न्यायालयों में लंबित अथवा मुकदमे से पूर्व (प्री-लिटिगेशन) चरण में स्थित विवादों/मामलों का सौहार्दपूर्ण समझौते के माध्यम से निस्तारण किया जाता है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत लोक अदालत द्वारा दिया गया फैसला सिविल न्यायालय के आदेश के समान माना जाता है। यह सभी पक्षकारों पर अंतिम एवं बाध्यकारी होता है तथा इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में अपील का प्रावधान नहीं है।राष्ट्रीय लोक अदालतें पूर्व-निर्धारित तिथि पर देशभर के सभी तालुक, जिला न्यायालयों एवं उच्च न्यायालयों में पहले से तय तारीख पर आयोजित की जाती हैं। वर्ष 2016 से दिसंबर 2025 तक लोक अदालतों में निपटाए गए मामलों की जानकारी नीचे दी गई है:

लोक अदालत

मुकदमे से पहले निपटाए गए मामले

लंबित मामलों का निस्तारण

राष्ट्रीय लोक अदालत

33,80,76,089

8,45,59,866

राज्य लोक अदालत

39,33,548

67,03,159

स्थायी लोक अदालत

14,58,389

-

(सार्वजनिक उपयोगिता सेवा से संबंधित मामले)

भारत के संविधान के अनुच्छेद 39A के अनुरूप तथा निवारक एवं रणनीतिक विधिक सहायता के अंतर्गत, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(एनएएलएसए) द्वारा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों तथा जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों(डीएलएसए) के माध्यम से देशभर में अनेक विधिक सेवा गतिविधियां संचालित की जा रही हैं, ताकि विधिक सहायता गरीब एवं वंचित वर्गों तक पहुंच सके। आपराधिक न्यायालय-आधारित विधिक सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से न्याय विभाग एक केंद्रीय योजना, “कानूनी सहायता रक्षा वकील प्रणाली योजना”, लागू कर रहा है। इस योजना के अंतर्गत जिला स्तर पर विधिक सहायता रक्षा अधिवक्ताओं की पूर्णकालिक नियुक्ति, सहायक स्टाफ सहित, की जाती है। दिसंबर 2025 तक देशभर के 680 जिलों में कानूनी सहायता रक्षा वकील(LADC) कार्यालय कार्यरत हैं। एलएडीसी योजना को तीन वित्तीय वर्षों (2023–24 से 2025–26) की अवधि के लिए स्वीकृति प्रदान की गई है, जिसका कुल वित्तीय प्रावधान 998.43 करोड़ रुपये है। जनवरी 2026 तक इस योजना के अंतर्गत 643.755 करोड़ रुपये की राशि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण(एनएएलएसए) को जारी की जा चुकी है। पिछले तीन वर्षों के दौरान LADCs द्वारा आवंटित एवं निस्तारित आपराधिक मामलों का विवरण निम्न अनुसार है: –

वित्तीय वर्ष

आवंटित आपराधिक मामले

निस्तारित आपराधिक मामले

निस्तारण दर

2023-24

3,36,830

2,12,505

63%

2024-25

5,32,413

3,72,750

70%

2025-26 (दिसंबर 2025)

3,93,614

2,86,326

73%

कुल

12,62,857

8,71,581

69%

ई-कोर्ट परियोजना के चरण-III (2023–2027) को 13 सितंबर 2023 को 7,210 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रावधान के साथ स्वीकृति प्रदान की गई है, जिसका उद्देश्य न्याय वितरण प्रणाली को क्रमिक रूप से अधिक सुदृढ़, सरल और सुलभ बनाना है। 31 दिसंबर, 2025 तक ई-कोर्ट परियोजना के अंतर्गत अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित महत्वपूर्ण उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं:

  1. उच्च न्यायालयों एवं जिला न्यायालयों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कुल 3,93,22,695 मामलों की वर्चुअल सुनवाई की गई।
  2. सभी उच्च न्यायालयों एवं जिला न्यायालयों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम लागू कर दिए गए हैं।
  3. लगभग सभी उच्च न्यायालयों में ई-फाइलिंग के नियम, ई-भुगतान की सुविधा तथा आईसीजेएस(अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली) लागू कर दी गई है।
  4. देशभर में संचालित 29 वर्चुअल न्यायालयों के माध्यम से कुल 94,55,288 चालानों का भुगतान किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप 9,73,25,50,414 रुपये की चालान राशि प्राप्त हुई है।
  5. उच्च न्यायालयों एवं जिला न्यायालयों में ई-फाइलिंग के माध्यम से कुल 1,03,96,720 मामले दायर किए गए हैं।
  6. ई-कोर्ट सेवा मोबाइल ऐप के कुल डाउनलोड की संख्या 3,54,86,435 है, जबकि ई-कोर्ट सेवा JustIS ऐप के डाउनलोड की संख्या 22,090 है।
  7. उच्च न्यायालयों में 2,36,96,50,903 पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया गया है, जबकि जिला न्यायालयों में 4,00,89,15,374 पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया गया है।
  8. 37 उच्च न्यायालयों तथा 30 जिला न्यायालयों में न्याय घड़ियां स्थापित की गई हैं।
  9. देशभर के उच्च न्यायालयों एवं जिला न्यायालयों में कुल 2,331 ई-सेवा केंद्र कार्यरत हैं, जिनसे बड़ी संख्या में वादियों को लाभ प्राप्त हो रहा है।
  10. सभी न्यायालय परिसरों में सीआईएस 4.0 लागू कर दिया गया है तथा ई-समिति द्वारा सीआईएस 4.0 पर उपयोगकर्ता मार्गदर्शिका भी जारी किया गया है।
  11. ई-कोर्ट पहल के अंतर्गत मामलों की स्थिति, कारण सूची, फैसला आदि का लगभग वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध कराने हेतु सात प्लेटफ़ॉर्म स्थापित किए गए हैं। ये सूचनाएं अधिवक्ताओं एवं वादकारियों को एसएमएस पुश एवं पुल सेवा (प्रतिदिन 4 लाख से अधिक एसएमएस प्रेषित), ई-मेल(प्रतिदिन 6 लाख से अधिक प्रेषित), बहुभाषी ई-न्यायालय सेवा पोर्टल(प्रतिदिन 35 लाख हिट्स), न्यायिक सेवा केंद्र तथा सूचना कियोस्क के माध्यम से प्रदान की जा रही हैं।
  12. न्यायालयी की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग कई उच्च न्यायालयों में भी प्रारंभ किया गया है, जिनमें गुजरात, गुवाहाटी, ओडिशा, कर्नाटक, झारखंड, पटना, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड तथा कलकत्ता के उच्च न्यायालय शामिल हैं। इससे मीडिया तथा अन्य इच्छुक पक्षों को भी कार्यवाही में सहभागिता का अवसर प्राप्त हुआ है।
  13. न्यायालय परिसरों में सौर ऊर्जा सुविधाओं की स्थापना के निर्धारित लक्ष्य का कुल 96.1% प्राप्त कर लिया गया है।
  14. मोटर दुर्घटना दावा याचिकाओं के त्वरित, ऑनलाइन एवं असमकालिक निस्तारण को सुगम बनाने हेतु इलेक्ट्रॉनिक मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण(ई-MACT) प्लेटफ़ॉर्म विकसित किया गया है। ई-MACT परियोजना को 07 मई 2025 से पायलट न्यायालय में लाइव शुरू किया गया।
  15. राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड(एनजेडीजी) को एक उन्नत डैशबोर्ड के साथ अपग्रेड किया गया है, जो मामलों की लंबित संख्या की पहचान, प्रबंधन एवं कमी के लिए एक निगरानी उपकरण के रूप में कार्य करता है। यह विभिन्न मानकों के आधार पर वर्गीकृत मामलों के निस्तारण में विलंब के कारणों संबंधी जानकारी भी प्रदान करता है।

यह जानकारी विधि एवं न्याय राज्य मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल ने आज लोक सभा में दी।

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पीके/केसी/पीकेपी


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