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डिजिटलीकरण से अन्वेषण तकः भारत में न्याय तक पहुंच बढ़ा रही है एआई


न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं, बल्कि न्याय में सहायक के तौर पर प्रौद्योगिकी

प्रविष्टि तिथि: 11 FEB 2026 1:42PM by PIB Delhi

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मुख्य बिंदु

  • ईकोर्ट्स चरण ।।। के अंतर्गत सरकार का निवेश प्रौद्योगिकी के जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग के जरिए भारत के न्याय परिदान को मजबूत करने की उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का संकेत है।
  • उच्चतम न्यायालय और अनेक उच्च न्यायालयों में इस्तेमाल किए जा रहे सुपेस तथा एआई आधारित प्रतिलेखन और अनुवाद टूल्स के माध्यम से कृत्रिम मेधा अदालतों की मदद कर रही है।
  • ये टूल्स स्वतः फाइलिंग, बुद्धिमतापूर्ण कार्य निर्धारण, वाद सूचना प्रणाली के सुदृढ़ीकरण और चैटबोट के माध्यम से पक्षकारों के साथ संवाद के जरिए कार्यकुशलता को बढ़ाते हैं।
  • एआई का सावधानीपूर्वक और नियंत्रित ढंग से उपयोग कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि प्रौद्योगिकी से मदद मिले मगर यह न्यायिक निर्णय प्रक्रिया की जगह नहीं ले।

 

परिचयः एआई समर्थित अदालतों की ओर भारत के संतुलित कदम

भारत की अदालतों में किसी भी सामान्य दिन खूब चहल-पहल रहती है। फाइलें एक से दूसरी जगह लाई जा रही होती हैं और सूचीबद्ध मामलों के लिए आवाज लगाई जाती है। भीड़ भरे गलियारों में वकीलों की आमदफ्त रहती है और मामलों के पक्षकार सुनवाई के लिए इंतजार कर रहे होते हैं। दशकों से यह व्यवस्था बढ़ते मामलों के बोझ, भाषाई विविधता तथा पहुंच की और प्रक्रियात्मक कठिनाइयों के तनाव से जूझ रही है।

हाल के अरसे में डिजिटल परिवर्तन के एक समन्वित प्रयास के जरिए न्यायपालिका का आधुनिकीकरण हो रहा है। वर्ष 2023 से शुरू हुए ईकोर्ट्स चरण ।।। से अदालत कक्षों और लेखागारों में लगातार परिवर्तन दिखाई दे रहा है। दस्तावेजी प्रस्तुतीकरण की जगह डिजिटल फाइलिंग ले रही है। वाद सूचियों को समयबद्ध ढंग से अपडेट किया जा रहा है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई नियमित तौर पर हो रही है। अदालती रिकॉर्डों तक समूचे देश में कहीं भी निर्बाध ढंग से पहुंचा जा सकता है।

क्या आप जानते हैं?

वाद सूची में किसी खास दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामलों का विवरण होता है।

ईकोर्ट्स विधि और न्याय मंत्रालय के अधीन न्याय विभाग की समूचे देश में मिशन के तौर पर चलाई जा रही परियोजना है। इसका उद्देश्य सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग के जरिए अदालतों में न्यायिक प्रक्रियाओं को ज्यादा कार्यकुशल, पारदर्शी और पहुंच योग्य बनाना है।

डिजिटल परिवर्तन के व्यापक दायरे के अंदर कृत्रिम मेधा (एआई) ने एक सावधान और व्यवस्थित भूमिका निभाना शुरू कर दिया है। सरकार, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, राष्ट्रीय आसूचना केंद्र (एनआईसी) और आईआईटी मद्रास जैसे संस्थानों की मदद से एआई टूल्स अब विभिन्न कार्यों में सहायक हैं-

  • मौखिक दलीलों का प्रतिलेखन
  • निर्णयों का अनुवाद
  • ईफाइलिंग में त्रुटियों की पहचान
  • विधिक शोध
  • मेटाडेटा निष्कर्षण

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ईकोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित ईकोर्ट्स सॉफ्टवेयर एप्लिकेशंस में एआई तथा मशीन लर्निंग (एमएल), ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (ओसीआर) और नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग जैसे उसके उपवर्गों का उपयोग किया जा रहा है। डिजिटल कोर्ट 2.1 जैसे नए एप्लिकेशन तथा विधि शोध विश्लेषण सहायता (एलईजीआरएए) और अदालती कार्यकुशलता में सहायता के लिए उच्चतम न्यायालय का पोर्टल (एसयूपीएसीई) न्यायालयों में ज्यादा बुद्धिमतापूर्ण कार्यप्रवाह की ओर शुरुआती मगर महत्वपूर्ण कदम हैं।

वर्तमान में एक ऐसा परिवेश उभर रहा है जिसमें प्रौद्योगिकी गति, सटीकता और पारदर्शिता बढ़ाते हुए न्यायिक कार्य में सहायता कर रही है। साथ ही इसने मानवीय निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्रता और सर्वोच्चता को भी बरकरार रखा है।

डिजिटलीकरण से एआई तकः न्यायिक प्रौद्योगिकी की सततता

भारत की न्यायपालिका में एआई को शामिल किया जाना एक औचक प्रौद्योगिकीय छलांग नहीं, बल्कि एक सतत और सोचे-समझे डिजिटल परिवर्तन का हिस्सा है। पिछले दशक में अदालतें बुनियादी कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रव्यापी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, समयबद्ध डाटा प्रणालियों, आभासी अदालतों और बहुभाषी न्याय तक पहुंच का सफर तय कर चुकी हैं।

डिजिटलीकरण की ओर प्रारंभिक कदमों की शुरुआत 2007 में ईकोर्ट्स मिशन प्रणाली परियोजना से हुई जिसमें इन बातों पर ध्यान केंद्रित किया गया था-

  • अदालती दस्तावेजों का कंप्यूटरीकरण ताकि मामलों की फाइलों का संग्रहण, पुनःप्राप्ति और प्रबंधन डिजिटल ढंग से हो सके।
  • वाद सूचियों का डिजिटलीकरण ताकि मामलों की दैनिक फेहरिस्तों का प्रकाशन और उन्नयन ऑनलाइन समयबद्ध ढंग से किया जा सके।
  • इलेक्ट्रॉनिक वाद सूचना प्रणालियों (सीआईएस) को शुरू करना ताकि अदालतों को मामले की प्रगति पर नजर रखने के लिए और प्रशासनिक कार्यवाहियों के वास्ते एक एकीकृत प्लेटफॉर्म मिल सके।

चरण । में मुख्यतः यह प्रयास किया गया कि अदालती सूचनाएं प्रशासकों और पक्षकारों, दोनों ही के लिए ज्यादा दृष्टिगोचर और आसानी से उपलब्ध हों।

चरण ।। में डिजिटलीकरण ज्यादा परिपक्व हुआ। चरण ।।। में चुनौती डाटा की उपलब्धता से आगे बढ़ कर बड़े पैमाने पर सूचनाओं के प्रबंधन की हो गई। ईकोर्ट्स परियोजना के विभिन्न चरणों के अंतर्गत निम्नलिखित व्यवस्थाएं शुरू की गईंः

  • ईफाइलिंग के लिए टूल्स
  • त्रुटियों की इलेक्ट्रॉनिक जांच
  • समन का डिजिटल माध्यम से प्रेषण
  • स्वतः निर्मित वाद सूचियां

इस सततता का अगला चरण एआई है। पूर्ववर्ती डिजिटल टूल्स के विपरीत एआई प्रणालियां इन कार्यों में भी सक्षम हैंः

  • भाषा प्रोसेसिंग
  • प्रतिमान की पहचान
  • डाटा की सघनता वाले जटिल कार्यों में मदद

अहम बात यह कि एआई को भारतीय न्यायपालिका में मौजूदा प्रणालियों के विकल्प के तौर पर नहीं रखा गया है। वास्तव में एआई समेकित वाद प्रबंधन और सूचना प्रणाली (आईसीएमआईएस), ईफाइलिंग मॉड्यूल्स और निर्णयों के डाटाबेस के जरिए इन प्रणालियों को ज्यादा मजबूत बना रहा है।

एआई विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति पर: लाइव और प्रायोगिक परिनियोजन

एआई पहले से ही न्यायपालिका में सक्रिय है, जहाँ इसका उपयोग चयनित रूप से और संस्थागत निरीक्षण के तहत निर्धारित प्रशासनिक और संबंधित क्षेत्रों में किया जा रहा है। ये परिनियोजन या तो पूरी तरह से चालू हैं या नियंत्रित प्रायोगिक चरणों में हैं।

कोर्ट रूम प्रतिलेखन में एआई: मौखिक रिकॉर्ड को सहेजना

सुप्रीम कोर्ट में एआई के सबसे शुरुआती और स्पष्ट उपयोगों में से एक मौखिक दलीलों का प्रतिलेखन रहा है, विशेष रूप से संविधान पीठ के मामलों में। पारंपरिक रूप से, अदालती कार्यवाही हस्तलिखित नोट्स, चुनिंदा डिक्टेशन या सुनवाई के बाद के सारांशों पर निर्भर थी।

एआई स्पीच रिकग्निशन (वाक् पहचान) मौखिक दलीलों के वास्तविक समय के करीब ट्रांसक्रिप्शन को सक्षम बना रहा है, जिन्हें अधिक पारदर्शिता और रिकॉर्ड की सटीकता के लिए सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर जारी किया जाता है। संविधान पीठ की कार्यवाहियों में सफल उपयोग के बाद इस प्रणाली को धीरे-धीरे नियमित सुनवाई के दिनों तक बढ़ाया जा रहा है।

यह परिनियोजन 'ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन' (एएसआर) का उपयोग करता है, जो मशीन लर्निंग (एमएल) का एक उप-समूह है। इसे कानूनी शब्दावली, उच्चारण और कोर्ट रूम के संवादों को पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, जबकि अंतिम सत्यापन अभी भी मनुष्यों द्वारा ही किया जाता है।

बहुभाषी न्याय के लिए एआई: निर्णयों का अनुवाद

भारत की न्याय प्रणाली में भाषाई पहुंच लंबे समय से एक संरचनात्मक बाधा रही है। जबकि अदालती फैसले मुख्य रूप से अंग्रेजी में लिखे जाते हैं, मुक़दमा लड़ने वालों  का एक बड़ा वर्ग क्षेत्रीय भाषाओं में कार्य करता है। बड़े पैमाने पर अदालती निर्णयों के अनुवाद के माध्यम से इस अंतर को पाटने के लिए एआई को तैनात किया गया है।

एनआईसी के सहयोग से, नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी) का उपयोग करने वाले एआई उपकरण सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। इसके लिए, सुप्रीम कोर्ट के एआई-संचालित अनुवाद उपकरण 'सुवास'  (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) का उपयोग किया जाता है, जो अंग्रेजी के निर्णयों और आदेशों को क्षेत्रीय भाषाओं में परिवर्तित करता है। इससे अदालतों में पहुंच और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ावा मिलता है। इन अनुवादित निर्णयों को ई-एससीआर पोर्टल पर पोस्ट किया जाता है, जिससे यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं।

उच्चतम न्यायलय और उच्च न्यायालय की एआई अनुवाद समितियाँ गुणवत्ता और संवैधानिक सटीकता की निगरानी करती हैं। एआई का उपयोग अभी भी सहायक बना हुआ है, न्यायिक ढांचे के भीतर इन अनुवादों की समीक्षा की जाती है।

फाइलिंग और रजिस्ट्री संचालन में एआई: प्रक्रिया से जुड़ी दिक्कतों को कम करना

एआई का इस्तेमाल अदालती रजिस्ट्रियों में भी किया जा रहा है, जहाँ प्रक्रियात्मक जांच में बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने आईआईटी मद्रास के साथ मिलकर ई-फाइलिंग में कमियों को पहचानने के लिए एआई उपकरण बनाए हैं।

ये उपकरण याचिकाओं, अनुलग्नकों, फॉर्मेटिंग, मेटाडेटा और फाइलिंग नियमों के अनुपालन की जांच करने के लिए मशीन लर्निंग और ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (ओसीआर) का उपयोग करते हैं। केवल मैन्युअल जांच के बजाय, एआई सिस्टम संभावित कमियों को सामने लाते  हैं, जिससे रजिस्ट्री अधिकारी महत्वपूर्ण जांच पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

वर्तमान में, यह प्रणाली प्रारंभिक चरण में है, जिसका एक्सेस परीक्षण और फीडबैक के लिए 'एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड' वकीलों के एक सीमित समूह को दिया गया है। इसका उद्देश्य कमियों का जल्द पता लगाना और तेजी से सुधार करना है, जिससे शुरूआती चरण में होने वाली देरी को कम किया जा सके।

कानूनी अनुसंधान सहायता में एआई: 'लेग-आर-ए-ए' और 'सुपेस'

जजों को न्यायिक विश्लेषण के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में मुकदमें से संबंधित कानूनों को समझने में सहायता करने के लिए एआई उपकरण विकसित किए गए हैं। लीगल रिसर्च एनालिसिस असिस्टेंट (लेग-आर-ए-ए) दस्तावेजों का विश्लेषण करके, प्रासंगिक कानूनी संदर्भों को निकालकर और शोध सामग्री को व्यवस्थित करके जजों की सहायता करता है। ये उपकरण एनएलपी और एमएल तकनीकों पर निर्भर हैं, लेकिन ये पूरी तरह से शोध सहायता के रूप

में कार्य करते हैं; परिणामों की सिफारिश करने या स्वायत्त रूप से निर्णय तैयार करने में इनकी कोई भूमिका नहीं रहती है।

सुप्रीम कोर्ट पोर्टल फॉर असिस्टेंस इन कोर्ट एफिशिएंसी (सुपेस) एक एआई-आधारित प्रणाली है जिसे पहले के  निर्णयों की पहचान करने और मामलों के तथ्यों को  समग्रता  से समझने में मदद करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। सुपेस अभी भी एक प्रयोगात्मक चरण में है और इसे अभी तक नियमित न्यायिक उपयोग के लिए तैनात नहीं किया गया है।

वॉइस-टू-टेक्स्ट और डिक्टेशन सहायता में एआई: एएसआर-श्रुति और पाणिनी

न्यायिक लेखन में सहायता करने और हाथ से लिखी जाने वाली ड्राफ्टिंग के समय को कम करने के लिए, डिजिटल कोर्ट्स 2.1 जैसे अनुप्रयोगों के भीतर एआई-सक्षम डिक्टेशन और अनुवाद उपकरण पेश किए गए हैं।

  • एएसआर-श्रुति: यह आदेशों और निर्णयों के लिए वॉइस-टू-टेक्स्ट डिक्टेशन की सुविधा प्रदान करता है।
  • पाणिनी: यह अनुवाद और भाषाई संरचना में सहायता करता है।

ये उपकरण ड्राफ्टिंग में जजों की सहायता करते हैं, जबकि संपादकीय और न्यायिक नियंत्रण पूरी तरह से जज के पास ही रहता है। वे लेखन के मूल स्वामित्व या तर्क को बदले बिना कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।

मुख्य न्यायिक प्रणालियों के साथ एआई का एकीकरण

सभी एआई उपकरणों को मौजूदा न्यायिक बुनियादी ढांचे के साथ एकीकृत किया जा रहा है, जैसे:

  • एकीकृत केस प्रबंधन सूचना प्रणाली
  • केस इंफॉर्मेशन सिस्टम (सीआईएस) 4.0
  • ई-फाइलिंग और निर्णय खोज पोर्टल

क्या आप जानते हैं?

 

  • सुप्रीम कोर्ट का आईसीएमआईएस (एकीकृत केस प्रबंधन सूचना प्रणाली) ई-नोटिस, ई-कॉज लिस्ट, डिजिटल केस एक्सेस, मामलों की ऑनलाइन निगरानी और उच्च न्यायालय, सरकारी विभागों, जेलों एवं पुलिस स्टेशनों को परस्पर जोड़ने में सक्षम बनाता है।
  • ई-कमेटी की पहल के तहत विकसित केस इंफॉर्मेशन सिस्टम, न्यायपालिका में पारदर्शिता और वादी को कोर्ट में सहज बनाता है। केस इंफॉर्मेशन सिस्टम 4.0 उच्च न्यायालय और जिला अदालतों के लिए परिष्कृत उपयोगकर्ता  इंटरफेस, डैशबोर्ड और बेहतर केस प्रबंधन के उपकरण प्रदान करता है।

 

यह सुनिश्चित किया गया है कि एआई संस्थागत सीमाओं के भीतर कार्य करे, न कि एक स्वतंत्र या बाहरी प्रणाली के रूप में; जिससे न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक जवाबदेही और अधिक सुदृढ़ हो सके।

एआई और आपराधिक न्याय तंत्र

आपराधिक न्याय तंत्र के भीतर जांच, साक्ष्य, अभियोजन और अधिनिर्णय में एआई की भूमिका संरचित डिजिटल सुधारों के साथ बढ़ रही है। पुलिस, फोरेंसिक, अभियोजन, जेलों और अदालतों को डिजिटल रूप से जोड़कर, एआई उस पुराने समय से चली आ रही परस्पर कार्यक्षमता की कमी को दूर करने में मदद कर रहा है, जो कभी देरी और सूचनाओं का देर से पहुँचने का कारण बनती थी।

 

अंतर-प्रचलित आपराधिक न्याय प्रणाली परियोजना (आईसीजेएस) के भीतर एआई

'एक डेटा, एक प्रविष्टि' के सिद्धांत पर पुलिस, अदालतों, जेलों, फोरेंसिक प्रणालियों और अभियोजन डेटाबेस को डिजिटल रूप से जोड़ने वाले आईसीजेएस पर कई एआई-सक्षम उपकरण लगाए जा रहे हैं। एआई बड़ी मात्रा में आपराधिक मामलों के डेटा के प्रबंधन, प्रक्रियात्मक चरणों पर नज़र रखता है और एजेंसियों के बीच सूचना विनिमय की विश्वसनीयता में सुधार करने में सहायता करता है।

अदालतों के लिए, यह सत्यापित एफआईआर, आरोप पत्रों, हिरासत की स्थिति और फोरेंसिक रिपोर्ट तक तेजी से पहुंचने में सक्षम बनाता है, जिससे मैन्युअल फाइलों पर निर्भरता कम हो जाती है। एआई-आधारित डेटा हैंडलिंग साक्ष्य मानकों को बदले बिना निरंतरता और समयबद्धता में सुधार करता है।

नेशनल ऑटोमेटेड फिंगरप्रिंट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (एनएएफआईएस) को आपराधिक फिंगरप्रिंट्स का एक केंद्रीकृत और खोजने योग्य राष्ट्रीय भंडार बनाने के लिए विकसित किया गया है, जिसमें 1.23 करोड़ से अधिक रिकॉर्ड शामिल हैं। यह पुरानी प्रणालियों  का स्थान ले रहा है और देश भर में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सटीक, समयबद्ध और एकसमान फिंगरप्रिंट-आधारित पहचान सुनिश्चित करता है।

कार्यवाही और साक्ष्य की एआई-समर्थित रिकॉर्डिंग

एआई-सक्षम प्रणालियाँ अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग और संरक्षण में भी सुधार कर रही हैं। सीआईएस  के भीतर दैनिक कार्यवाहियों को डिजिटल रूप से रखा जाता है, जबकि चयनित अदालतों में सुनवाई की लाइव-स्ट्रीमिंग पारदर्शिता को बढ़ाती है।

आईसीजेएस के तहत शुरू किए गए 'न्याय श्रुति' जैसे अनुप्रयोग, सुरक्षित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वर्चुअल (आभासी) पेशी और गवाही को सुगम बनाते हैं। एआई-संचालित वॉयस प्रोसेसिंग स्पष्टता, निरंतरता और सटीक दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित करती है, विशेष रूप से उन आपराधिक मुकदमों में जहाँ विभिन्न स्थानों पर कई हितधारक शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त, ई-साक्ष्य जैसे प्लेटफार्मों पर साक्ष्य की डिजिटल रिकॉर्डिंग सटीकता में सुधार करती है और रिकॉर्ड को बिना छेड़छाड़  के प्रक्रियात्मक विवादों को कम करती है।

संस्थागत शासन, सुरक्षा उपाय और निवेश

संरचित निगरानी सुनिश्चित करने के लिए, उच्चतम न्यायालय ने  एक एआई समिति  का गठन किया, जिसका बाद में इसके आदेश को मजबूत बनाने के लिए पुनर्गठन किया गया। उच्चतम न्यायालय  के एक वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली यह समिति न्यायपालिका में अनुवाद, अनुसंधान सहायता और प्रक्रिया स्वचालन जैसी एआई पहलों की निगरानी करती है और व्यापक रूप से अपनाने से पहले प्रमुख परियोजनाओं की समीक्षा करती है।

अधिकांश एआई उपकरण ई-कोर्ट परियोजना चरण III के तहत 'विस्तृत परियोजना रिपोर्ट' की स्वीकृत सीमाओं के भीतर विकसित किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की ई-कमिटी नीति और रणनीति निर्धारित करती है, जबकि उच्च न्यायालय राष्ट्रीय मानकों के भीतर स्थानीय रूप से अनुकूल बनाने  की अनुमति देते हुए कार्यान्वयन का काम करते हैं।

डेटा गोपनीयता, सुरक्षा और पूर्वाग्रह को ख़त्म करने के साथ ही सुरक्षा उपायों को न्यायपालिका द्वारा स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है। सुरक्षित कनेक्टिविटी, प्रमाणीकरण तंत्र  और न्यायिक डेटा की सुरक्षा की जांच के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और तकनीकी विशेषज्ञों की विशेष उप-समितियां गठित की गई हैं।

निवेश और क्षमता निर्माण के संबंध में भारत की न्यायपालिका में एआई एकीकरण  सरकार की लगातार कोशिशों से आगे बढ़ रहा है। ई-कोर्ट परियोजना के चरण III के तहत, 7,210 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ, एआई, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन सहित "भविष्य के तकनीकी विकास" के लिए धन निर्धारित किया गया है।

निष्कर्ष: संवैधानिक मिज़ाज के साथ तकनीक

एक लंबे मुकदमें के अंत में, एक न्यायाधीश थोड़ा ठहरता है, सुनता है, तथ्यों को तौलता है और कानून लागू करता है। इसमें कुछ नहीं बदला है। जो बदला है, वह है उस मुक़दमे के आसपास की चीज़ें जैसे पहले की फैसलों को खोजने में लगने वाला समय, रिकॉर्ड को ढूंढने के लिए आवश्यक प्रयास, भाषा और लोजिस्टिक्स के कारण होने वाली देरी। एआई न्यायिक निर्णय लेने के मूल भावना में छेड़ छाड़ किए बिना मुकदमों में होने वाली देरी को कम करने के लिए इन पहलुओं पर चुपचाप काम कर रहा है।

जैसे-जैसे भारत तकनीकी सुधारों के साथ आगे बढ़ रहा है, न्याय प्रणाली में डिजिटल उपकरण तेजी से तकनीक के लोकतंत्रीकरण जैसे विचारों के साथ बढ़ रहे हैं, ताकि सभी अदालतों तक पहुंच सुनिश्चित हो सके; 'सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयाः' (सबका कल्याण, सबकी खुशी) के लिए तकनीक, जो नवाचार को जनहित में स्थापित करती है और 'मानवता के लिए एआई', यह सुनिश्चित करती है कि एआई गरिमा, निष्पक्षता और विश्वास को बनाए रखे। भारत की न्यायपालिका संतुलित और संवैधानिक रूप से सुदृढ़ तरीके से एआई को एकीकृत कर रही है, कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए तकनीक का लाभ उठाते हुए यह सुनिश्चित कर रही है कि मानवीय निर्णय सर्वोपरि  बना रहे। यह नपा-तुला दृष्टिकोण संवैधानिक मूल्यों से समझौता किए बिना न्याय वितरण को सुदृढ़ करता है।

संदर्भ

विधि और न्याय मंत्रालय

https://nalsa.gov.in/lok-adalats/

https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s32e45f93088c7db59767efef516b306aa/uploads/2025/09/202509171342021284.pdf

https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ec0490f1f4972d133619a60c30f3559e/uploads/2024/07/2019-2020.pdf

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https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2100326&reg=3&lang=2
https://doj.gov.in/access-to-justice-for-the-marginalized/

https://nalsa.gov.in/faqs/#1743592297157-684e9890-2d0b

https://nalsa.gov.in/faqs/#1743592298196-ba4b10d1-37f2
https://nalsa.gov.in/national-lok-adalat/

https://nalsa.gov.in/permanent-lok-adalat/

https://nalsa.gov.in/the-legal-services-authorities-act-1987/
https://nalsa.gov.in/lokadalats/#:~:text=Lok%20Adalat%20is%20one%20of,Legal%20Services%20Authorities%20Act%2C%201987

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1848734&reg=3&lang=2
https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s39f329089b8d9644b96ba05d545355d67/uploads/2025/06/202506042007507813.pdf

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2223646&reg=3&lang=1

 

लोकसभा

https://sansad.in/getFile/loksabhaquestions/annex/184/AU4710_TmG1Ss.pdf?source=pqals

 

पत्र सूचना कार्यालय

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2187718&reg=3&lang=2

 

अन्य

https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s38261bae60fcef985b46667cf365e690b/uploads/2025/12/20251208634523449.pdf

https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/10960/1/the_legal_service_authorities_act%2C_1987.pdf

डिजिटलीकरण से अन्वेषण तकः भारत में न्याय तक पहुंच बढ़ा रही है एआई

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पीआईबी शोध

 

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