औषधि विभाग
ब्रांडेड दवाओं की कीमतें
प्रविष्टि तिथि:
06 FEB 2026 1:44PM by PIB Delhi
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति, 2012 पर आधारित औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश 2013 (डीपीसीओ, 2013) के प्रावधानों के अनुसार दवाओं की कीमतें विनियमित की जाती है। इसका उद्देश्य आवश्यक दवाओं की उचित कीमतों पर उपलब्धता सुनिश्चित करना और साथ ही उद्योग के विकास को बढ़ावा देने के लिए नवाचार और प्रतिस्पर्धा के पर्याप्त अवसर प्रदान करना है। यह केवल आवश्यकता और बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण के सिद्धांतों का पालन करता है इसलिए, कंपनियों के लागत आकंड़ो का रखरखाव विभाग द्वारा नहीं किया जाता है। डीपीसीओ, 2013 के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, औषधि विभाग (डीओपी) के अधीन राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) डीपीसीओ, 2013 की अनुसूची-I में निर्दिष्ट दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित करके दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है, जो राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम) और डीपीसीओ, 2013 के अनुच्छेद 2(1)(यू) में परिभाषित नई दवाओं के खुदरा मूल्यों पर आधारित है।
किसी दवा की अधिकतम और खुदरा कीमत, बाजार डेटाबेस में उस दवा की 1प्रतिशत या उससे अधिक बाजार हिस्सेदारी रखने वाले सभी ब्रांडों के खुदरा विक्रेता मूल्य (पीटीआर) के औसत में 16प्रतिशत मार्जिन जोड़कर निर्धारित की जाती है। गैर-अनुसूचित दवाओं के मामले में, निर्माताओं को पिछले 12 महीनों के दौरान ऐसी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि करने की अनुमति नहीं है। अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दोनों प्रकार की दवाओं की कीमतों की निगरानी की जाती है और उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूलने या डीपीसीओ, 2013 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है। इसके अलावा, वर्तमान नीतिगत ढांचे के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला में विभिन्न स्तरों पर मार्जिन विनियमित नहीं है और व्यावसायिक प्रथाओं का हिस्सा है, तथा वाणिज्यिक विचारों द्वारा निर्देशित होता है।
भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002 के खंड 1.5 में यह निर्धारित है कि प्रत्येक चिकित्सक को दवाओं के जेनेरिक नाम स्पष्ट रूप से और अधिमानतः बड़े अक्षरों में लिखने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दवाओं का तर्कसंगत उपयोग और निर्धारण हो। पूर्ववर्ती भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने परिपत्र जारी किए थे जिनके माध्यम से सभी पंजीकृत चिकित्सा चिकित्सकों को उपरोक्त प्रावधानों का पालन करने का निर्देश दिया गया था। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने सभी केंद्रीय सरकारी अस्पतालों को केवल जेनेरिक दवाएं लिखने का निर्देश दिया है। इसी प्रकार के निर्देश सभी केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के डॉक्टरों और स्वास्थ्य केंद्रों को भी दवाओं के जेनेरिक नाम स्पष्ट रूप से लिखने के लिए जारी किए गए हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019, संबंधित राज्य चिकित्सा परिषदों या राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नैतिकता और चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड (ईएमआरबी) को उपरोक्त विनियमों के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए डॉक्टर के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार देता है। इसके अलावा, राज्यों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि जेनेरिक दवाओं की पर्ची दी जाए और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में नियमित रूप से इसे ऑडिट किया जाए।
डीपीसीओ, 2013 के मौजूदा प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक निर्माता, चाहे वह अनुसूचित हो या गैर-अनुसूचित, को उस फॉर्मूलेशन के कंटेनर के लेबल पर और खुदरा बिक्री के लिए पेश किए गए उसके न्यूनतम पैक पर, उस दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य (सभी करों सहित) अमिट मुद्रित चिह्न में प्रदर्शित करना आवश्यक है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की जानकारी के अनुसार, अब तक केंद्र सरकार ने मानव के लिए 603 परिवार कल्याण मंत्रालय दवाओं और निश्चित खुराक संयोजनों तथा पशुओं के के लिए 40 दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है। प्रतिबंधित दवाओं और पशु चिकित्सा दवाओं की सूची केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की वेबसाइट www.cdsco.gov.in पर उपलब्ध है ।
देश में प्रतिबंधित दवाओं का निर्माण, बिक्री और वितरण औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 के तहत दंडनीय अपराध है और संबंधित राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण (एसएलए) ऐसे अपराधों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए अधिकृत हैं। प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री से संबंधित कोई भी शिकायत/समस्या सीडीएससीओ को प्राप्त होने पर, आवश्यक कार्रवाई के लिए मामले को राज्य औषधि नियंत्रक के समक्ष रखा जाता है।
केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा ने आज लोकसभा में यह जानकारी दी।
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पीके/केसी/जेके/एनजे
(रिलीज़ आईडी: 2224469)
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