विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
शोधकर्ताओं ने एक सींग वाले गैंडे के अंतिम प्रमुख आवास, काजीरंगा के क्रमिक विकास का पता लगाया
प्रविष्टि तिथि:
03 FEB 2026 5:13PM by PIB Delhi
असम के काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) की आर्द्रभूमि के नीचे की मिट्टी से यह कहानी उभरी है कि जलवायु परिवर्तन, वनस्पति में बदलाव, विदेशी प्रजातियों के आक्रमण और शाकाहारी जीवों की गतिविधियों के चलते कैसे एक सींग वाले गैंडे के आवास का क्रमिक विकास हुआ है।
बाढ़, सूखा, भूकंप और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाऔं के साथ-साथ, तेज़ी से हो रहा शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनों की कटाई वैश्विक पारिस्थितिकी ह्रास को बढ़ावा दे रहे हैं और जैव विविधता के नुकसान की गति तेज कर रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत, जो इंडो-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है, उन कई संकटग्रस्त प्रजातियों का आवास है, जिनके विलुप्त होने का खतरा है। लेट क्वाटर्नरी मेगाफॉना विलुप्तियाँ वैश्विक रूप से बड़ी चिंता का विषय बनी हुई हैं, जिनके कारण अब भी विवादित हैं; आज, विश्वभर में लगभग 60% बड़े शाकाहारी जानवर संकट में हैं, और दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अधिक जोखिमग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, बड़े शाकाहारी जानवरों - विशेष रूप से एक-सींग वाला भारतीय गैंडा - का प्रमुख केंद्र है।
बीरबल साहनी पैलियोसाइंसेस संस्थान (बीएसआईपी), विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का एक स्वायत्त संस्थान, के वैज्ञानिकों ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) की आर्द्रभूमि के नीचे की मिट्टी से परागकणों का उपयोग करके केएनपी में पैलियोशाकाहारी गतिविधियों से संबंधित पहले दीर्घकालिक पैलियोइकोलॉजिकल रिकॉर्ड का पता लगाया।
शोधकर्ताओं ने काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के सोहोला दलदली क्षेत्र से एक मीटर से थोड़ा अधिक लंबा तलछटी कोर निकाला। परत दर परत, यह मिट्टी एक प्राकृतिक अभिलेखागार की तरह काम करती है, जो अतीत के सूक्ष्म निशानों को संरक्षित रखती है। इन निशानों में उन पौधों के परागकण और साथ ही, उन कवक के बीजाणु शामिल हैं, जो पशु मल पर पनपते हैं।

चित्र 1: क. नमूना स्थल का स्थान मानचित्र, ख. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान का वनस्पति आवरण मानचित्र (दास एवं अन्य, 2014 के बाद)

जर्नल ‘कैटेना’ (एल्सेवियर) में प्रकाशित अध्ययन यह उजागर करता है कि काजीरंगा का वर्तमान परिदृश्य इसके अतीत से स्पष्ट रूप से भिन्न है और यह दर्ज करता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत में लेट होलोसिन के दौरान, विशेष रूप से लिटिल आइस एज और बढ़ती मानव गतिविधियों के कारण, भारतीय गैंडे सहित बड़े-बड़े शाकाहारी जानवरों की क्षेत्रीय विलुप्ति हुई। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर भारत तुलनात्मक रूप से जलवायु की दृष्टि से स्थिर रहा, जिससे गैंडे पूर्व की ओर पलायन कर सके और अंततः काजीरंगा में केंद्रित हो गए।
अध्ययन, जिसने बड़े-बड़े शाकाहारी जानवरों, विशेष रूप से एक-सींग वाले भारतीय गैंडों की संख्या में गिरावट और वर्तमान में उनके केवल काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित होने के कारणों की जांच की, जीवाश्म साक्ष्यों के माध्यम से दिखाता है कि यह प्रजाति कभी भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से फैली हुई थी, लेकिन होलोसिन काल से इसका वितरण काफी कम हो गया। पिछले लगभग 3300 वर्षों में, पूर्वोत्तर भारत तुलनात्मक रूप से जलवायु की दृष्टि से स्थिर रहा और यहां मानव दबाव कम रहा, जबकि उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में आवास ह्रास, जलवायु की गिरावट और अति-शिकार के कारण गैंडों को पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा और अंततः वे काजीरंगा में केंद्रित हो गए।
अध्ययन यह दर्शाता है कि दीर्घकालिक वनस्पति और जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवों के जीवन, प्रवास और विलुप्ति को कैसे आकार दिया, और यह दीर्घकालिक पारिस्थितिकी ज्ञान प्रदान करता है जो वर्तमान और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के दौरान बेहतर संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन में मार्गदर्शन कर सकता है।
पब्लिकेशन लिंक: https://doi.org/10.1016/j.catena.2025.109762
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पीके/केसी/पीके/डीए
(रिलीज़ आईडी: 2222857)
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