वित्त मंत्रालय
स्वदेशी से रणनीतिक लचीलापन और लचीलेपन से रणनीति अपरिहार्यता तक भारत का अभियान अकेले आर्थिक तेजी से पूरा नहीं हो सकता : आर्थिक समीक्षा 2025-26
रणनीतिक अपरिहार्यता के लिए भारत को स्थायित्व का स्रोत बनाना और वैश्विक बाजार में सिर्फ भागीदार होने की बजाय उसकी अहमियत का होना जरूरी है : आर्थिक समीक्षा 2025-26
क्रियाकलाप, प्रयोग और अनिश्चितता के माहौल में सीखने को बढ़ावा देने वाली संस्थागत प्रोत्साहन संरचना भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है : आर्थिक समीक्षा 2025-26
नई ‘अनुपालन घटाने और नियमन हटाने की पहल’ ने देश स्तरीय नियमन हटाने के पांच वृहद क्षेत्रों में 23 प्राथमिकताएं चिन्हित की हैं, 76 प्रतिशत सुधार पहले ही लागू कर दिए गए
प्रविष्टि तिथि:
29 JAN 2026 2:26PM by PIB Delhi
केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए कहा कि स्वदेशी से रणनीतिक लचीलेपन और अंतत: रणनीतिक अपरिहार्यता तक का भारत का बदलाव सिर्फ इस बात से निर्धारित नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ती है, बल्कि इस बात से कि वैश्विक उत्पादन प्रणाली में घरेलू क्षमताएं कितनी गहराई से जुड़ी हैं, जो विश्वसनीयता, सीख और बाहरी स्थायित्व को बढ़ाती हैं। आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि कार्यनीतिक मजबूती देश की कमियों का अनुमान लगाने, संस्थाओं के बीच समन्वय बनाने और तनाव में भी बिना किसी अफरा-तफरी के सही प्रतिक्रिया करने की क्षमता पर निर्भर करती है। कार्यनीतिक अपरिहार्यता बहुत कुछ मांगती है: वैसी कार्यक्षमताएं सृजन करने की क्षमता जिस पर दूसरे निर्भर रहें, भारत को स्थायित्व का स्रोत बनाना और वैश्विक बाजारों में महज एक भागीदार के बजाय उसकी अहमियत का होना।
समीक्षा में यह भी कहा गया है कि गहरी वैश्विक अनिश्चितता के बीच दुनिया में उद्यमी देश की ओर बढ़ने की जरूरत है। ऐसा न सिर्फ पुराने की बजाय नये बाजार स्थापित करने के लिए है, बल्कि अनिश्चितता में काम करने, संरचनात्मक जोखिम उठाने और बेहतर तरीके से सीखने के लिए है। इस तरह, भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता एक ऐसी संस्थागत प्रोत्साहन संरचना होनी चाहिए, जो अनिश्चितता की परिस्थितियों में कामकाज, प्रयोग और सीखने को प्रोत्साहित करे। इसमें यह भी कहा गया है कि सफलतापूर्वक संरचनात्मक बदलाव लाने वाले किसी भी देश ने अपने पूरे प्रशासन को उद्यमिता की ओर ले जाने की कोशिश नहीं की। साथ ही, प्रशासन के लिए हर समय उद्यमिता की स्थिति में रहना संभव नहीं हो सकता, क्योंकि सुशासन के लिए स्थायित्व और भावी हालात का अनुमान लगाने की क्षमता भी जरूरी है। इसके बदले, सफल देशों ने विशेष संस्थागत क्षेत्रों का निर्माण किया है, जहां प्रयोग करने की अनुमति दी गई, जवाबदेही के नियम-कानून अलग-अलग हैं और सीखना स्व-स्फूर्त है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि नीतियां जो नये क्षेत्रों में लागू हैं चाहे वे औद्योगिक रणनीति हो, या वित्तीय नियमन, प्रौद्योगिकी प्रबंधन या सामाजिक नीति, का कभी भी अधिकतम लाभ नहीं उठाया जा सकता। उनका परीक्षण किया जाना, संशोधन किया जाना और कभी-कभी प्रतिबंधित किया जाना जरूरी है। राजनीतिक नेतृत्व को लगातार संदेश देते रहना चाहिए कि असफलता स्वीकार किये जाने योग्य है, प्रयोग करना जरूरी है और इस दौरान कामकाज में सुधार करते रहना योग्यता की पहचान है न कि कमजोरी की। संस्थागत माफी तभी सार्थक होती है, जब अनजाने में हुई त्रुटि और खराब नीयत से की गई गलती के बीच अंतर स्पष्ट हो।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, आने वाले दशकों में भारत ऐसे फैसलों का सामना करेगा, जिनके लिए कोई लिखित प्रावधान नहीं हैं। हर मामले में, नतीजे प्रारंभिक विकल्पों को दुरुस्त करने पर कम और देश की सीखने, संशोधन करने और अनिश्चतता के माहौल में पूरे विश्वास के साथ कामकाज करने की क्षमता पर अधिक निर्भर करेगा। इसमें यह भी कहा गया है कि अनिश्चितता की परिस्थिति में सीखने, दिशा सुधारने और आत्मविश्वास के साथ कार्य करने की देश की क्षमता अंततः इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी संस्थाओं के भीतर जिम्मेदारियों, अधिकारों और स्वामित्व को किस प्रकार व्यवस्थित किया गया है। भारत की सबसे बड़ी बाधा आज नीतिगत आशय, विचारों या संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि संस्थानों के भीतर की प्रोत्साहन संरचनाओं का अभाव है जो निर्धारित करता है कि अनिश्चितता में कैसे फैसले लिए जाएं। समीक्षा में सतर्क किया गया है कि अनिश्चितता भरी दुनिया में ऐसा नहीं है कि शक्तिशाली देश ही सफल होंगे, बल्कि वे देश भी सफल हो सकते हैं, जो तेजी से सीखेंगे, बुद्धिमता से काम लेंगे और कामकाज को सुधारते रहने का भरोसा बनाए रखेंगे।
समीक्षा में कहा गया है कि देश की क्षमता कोई एकल सुधार एजेंडा नहीं है, बल्कि यह एक समग्र परिणाम है, जो इससे आकार लेता है कि निर्णय कैसे लिए जाते हैं, जोखिम और असफलता को कैसे समझा तथा प्रबंधित किया जाता है, परिणामों के लिए प्रशासन को कैसे संगठित किया जाता है, विनियमन को कैसे अभिकल्पित और लागू किया जाता है तथा प्रोत्साहन किस प्रकार अधिकारियों, उद्यमों और नागरिकों के व्यवहार को प्रभावित करता है।
देश की क्षमता उन मानव प्रणालियों का भी परिणाम है जिनके माध्यम से व्यवहार में सार्वजनिक अधिकार का प्रयोग किया जाता है। जैसे-जैसे शासन से जुड़ी चुनौतियां अधिक जटिल होती जा रही हैं, सार्वजनिक परिणामों की गुणवत्ता इस बात पर लगातार अधिक निर्भर होती जा रही है कि लोक सेवक अपनी भूमिकाओं की व्याख्या कैसे करते हैं, विवेक का प्रयोग कैसे करते हैं तथा नागरिकों के साथ किस प्रकार संवाद करते हैं। देश की क्षमता ही कार्यनीतिक लचीलेपन की नींव है और वही वह मार्ग है जिसके माध्यम से कार्यनीतिक अपरिहार्यता संभव होती है। क्षमता का निर्माण महज दावों से नहीं होता है, बल्कि संस्थागत प्रणालियों के अनवरत तालमेल से होता है। यह देश, कंपनियों और नागरिकों के दैनिक व्यवहार के माध्यम से सह-निर्मित होती है तथा इन तीनों के बीच साझा दायित्व और पारस्परिक अनुबंध पर आधारित होती है।
आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि विनियमन देश और अर्थव्यवस्था के बीच सबसे महत्वपूर्ण संपर्क बिंदुओं में से एक है। नियामक क्षमता केवल मंशा या प्रयास का विषय नहीं है, बल्कि उतनी ही हद तक संस्थागत संरचना से जुड़ा प्रश्न है, जिसमें नियम-निर्माण, प्रवर्तन, जवाबदेही तथा प्रदत्त प्राधिकार की संरचना शामिल होती है। नियामक क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि नियामकों को दी गई औपचारिक शक्तियों को कैसे संरचित किया गया है और संस्थागत डिजाइन के जरिए उसका इस्तेमाल कैसे हो रहा है। संस्थागत डिजाइन विकल्पों में कुछ महत्वपूर्ण विषय जैसे-नियम निर्माण और मार्गदर्शन में स्पष्टता, प्राधिकरण के अंदर अलगाव, जवाबदेही तय करने वाला विनियामक मंडल, प्रवर्तन में समानुपाती और अनुशासन, संचालन विधि की उचित प्रक्रिया और लोकतांत्रिक तौर-तरीके तथा पादर्शिता शामिल हैं।
समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि नियामकों को दूरदर्शिता और स्वतंत्रता में संतुलन बनाने की क्षमता वाले विशेषज्ञों की जरूरत है, जबकि व्यवसाय को इसमें तेजी लाने के लिए नियमों का पालन करते हुए इस स्वतंत्रता का सदुपयोग करने वाले पेशेवरों की आवश्यकता है। समीक्षा में सुझाव दिया गया है कि विनियामक संबंधी अध्ययन कराने वाले स्कूलों की स्थापना या तो स्वतंत्र रूप से करनी चाहिए या मौजूदा संस्थानों के साथ मिलकर इस संबंध में पाठक्रम उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि विशेषज्ञ तैयार किये जा सकें। इसमें बताया गया है कि अनुमोदन, जांच, प्रवर्तन कार्रवाई, विवाद और अपील जैसी विनियामक प्रक्रियाओं में देरी से आर्थिक लागत बढ़ती है। इस समस्या के समाधान के लिए समय-सीमा के अंदर फैसले लिए जाने चाहिए। इसमें जब सक्षम प्राधिकार निर्धारित अवधि में कार्रवाई करने में विफल होता है, तो डीम्ड अनुमोदन का भी प्रावधान होना चाहिए।
समीक्षा में कहा गया है कि निजी कॉरपोरेट क्षेत्र महज विनियमन का विषय नहीं है, बल्कि यह उस प्रोत्साहन वातावरण का संरचनात्मक सहभागी है, जो यह निर्धारित करता है कि देश अपनी क्षमता को उन्नत करता है या विवेकाधीन शासन के माध्यम से कार्य करता है। जब कंपनियां उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रदर्शन के आधार पर प्रतिस्पर्धा करती हैं, तो वे सशक्त, पूर्वानुमेय और निष्पक्ष सार्वजनिक संस्थानों में प्रत्यक्ष हित विकसित करती हैं।
यदि निजी कॉरपोरेट क्षेत्र देश की क्षमता उभारने वाले प्रोत्साहन पर्यावरण का मिलकर निर्माण करते हैं, तो नागरिक इसे अपने दैनिक तौर-तरीकों के जरिए ठोस आकार देते हैं, जो यह निर्धारित करता है कि सार्वजनिक प्रणालियों को प्रवर्तन के अधीन होना चाहिए या खुद आंतरिक जिम्मेदारी के तहत कार्यरत होना चाहिए। जब नागरिक साझा सार्वजनिक स्थलों में उत्तरदायित्व के मानदंडों को आत्मसात करते हैं, सीखने को एक सतत आदत के रूप में अपनाते हैं, शारीरिक और तकनीकी श्रम का सम्मान करते हैं, प्रौद्योगिकी का उपयोग उसके अधीन हुए बिना करते हैं और यह समझते हैं कि आज का आराम कभी-कभी कल का बोझ बन सकता है, तब वे निरंतर प्रवर्तन की देश की आवश्यकता को कम करते हैं। साथ ही, नागरिक उस विश्वास का निर्माण करते हैं, जिस पर संस्थागत क्षमता का विकास होता है।
समीक्षा के अनुसार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा चाहे वो विनिर्माण क्षेत्र में हो या लॉजिस्टिक्स, संस्थान या समृद्ध खेल हों, लाभ के लिए लागत की मांग करती है, जो अनिश्चित, विलंबित और छोटी अवधि में कभी-कभी नगण्य भी होती है।
आर्थिक समीक्षा में यह भी बताया गया है कि अनुपालन घटाने और नियमन हटाने की जारी पहल ने देश स्तरीय नियमन हटाने के पांच वृहत क्षेत्रों के प्राथमिकता वाले 23 क्षेत्रों की पहचान की है। इन क्षेत्रों की पहचान केन्द्रीय मंत्रियों, राज्यों, उद्योग संघों और क्षेत्र के जानकारों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद की गई है। अनवरत और समन्वित प्रबंधन प्रक्रिया के रूप में नियमन हटाने की प्रक्रिया देश को मजबूत करने की प्रक्रिया है। नियमन हटाने का यह अभियान पहले के अभियानों से सिर्फ सुधारों की संख्या के आधार पर अलग नहीं है, बल्कि यह संस्थागत प्रक्रिया है, जिसमें अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय, राज्यों के साथ मिलकर समस्या का समाधान निकालने की कोशिश और तत्क्षण सीखना शामिल है जो देश की क्षमता के महत्वपूर्ण तत्व हैं।
36 देश और केन्द्रशासित प्रदेश प्राथमिकता वाले 23 चिन्हित क्षेत्रों में सुधार लागू करेंगे। इसके साथ ही देशभर में कार्रवाई योग्य सुधारों की संख्या 828 है। 23 जनवरी, 2026 तक 630 प्राथमिकता वाले क्षेत्र जो कुल संख्या का 76 प्रतिशत है, को पहले ही क्रियान्वित कर दिया गया है। 10 प्रतिशत अन्य प्राथमिकता वाले 79 क्षेत्रों में क्रियान्वयन का काम तेजी से चल रहा है।
आर्थिक समीक्षा का निष्कर्ष है कि भारत की मौजूदा चुनौतियों का स्वरूप बदल रहा है और इसका हालिया आर्थिक प्रदर्शन दर्शाता है कि वृहद आर्थिक स्थायित्व और वृद्धि अनिश्चितता से भरे वैश्विक माहौल में भी जारी रह सकती है। ऐसे वैश्विक माहौल में जोखिम को अनदेखा नहीं कर सकते है। इसके बेहतर प्रबंधन में लाभ निहित है। दुनिया में निश्चितता आने से पहले जो देश काम करते रहें, वे उभर सकते हैं, बिना किसी नुकसान के कामकाज के दौरान सुधार कर सकते हैं और देश , कंपनियां के बीच प्रोत्साहन बढ़ा सकते हैं तथा नागरिक वृद्धि को प्रभाव में बदलकर अपना बेहतर स्थान बना सकते हैं। देश की क्षमता प्रशासनिक चिन्ता का विषय नहीं है। देश की क्षमता कार्यनीतिक लचीलेपन की नींव है और वही वह मार्ग है जिसके माध्यम से कार्यनीतिक अपरिहार्यता संभव होती है।
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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई - 04
(रिलीज़ आईडी: 2219985)
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