वित्त मंत्रालय
सरकार की संतुलित वित्तीय रणनीति ने वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखा: आर्थिक समीक्षा 2025-26
पूंजीगत व्यय में लगातार बढ़ोत्तरी और राजस्व संग्रह की गतिशीलता वित्तीय समेकन के प्रमुख बिन्दु
शासकीय योजना में राज्यों को जीडीपी के 4.5 प्रतिशत पर पूंजीगत व्यय बनाये रखने में सहायता की; पिछले पांच वर्षों में राज्यों को साढ़े चार लाख करोड़ रुपये जारी किए गए
वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4 प्रतिशत, वित्त वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत से कम
राजस्व घाटा वित्त वर्ष 2009 के बाद सबसे निचले स्तर पर, वित्त वर्ष 2026 में 0.8 प्रतिशत
बेहतर संग्रह व्यवस्था और प्रौद्योगिकी के माध्यम से किए गए उपायों के बाद लीकेज दूर होने से वित्त वर्ष 2025 में राजस्व प्राप्तियां बढ़कर 11.6 प्रतिशत
राजस्व व्यय वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 13.6 प्रतिशत से 2025 में 10.9 प्रतिशत
प्रभावी ऋण व्यय कोविड महामारी से पहले की समयावधि में 2.7 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 4.3 प्रतिशत
कर्ज से जीडीपी अनुपात वित्त वर्ष 2025 में घटकर 55.7 प्रतिशत पर आया; इसे वित्त वर्ष 2031 तक 50 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य
आयकर दाखिल करने वालों की संख्या वित्त वर्ष 2022 में 6.9 करोड़ से वित्त वर्ष 2025 में 9.2 करोड़ पर पहुंची
कुल कर संग्रह में प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी कोविड से पहले की समयावधि के दौरान वित्त वर्ष 2022 में 51.9 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 58.2 प्रतिशत हुई
वित्त वर्ष 2026 में (अप्रैल से दिसम्बर) सकल वस्तु और सेवाकर संग्रह 17.4 लाख करोड़ रुपये हुआ, जबकि वित्त वर्ष 2025 में (अप्रैल से दिसम्बर) 16.3 लाख करोड़ रुपये रहा
प्रविष्टि तिथि:
29 JAN 2026 2:04PM by PIB Delhi
केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए कहा कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चिताओं के युग में भारत की अर्थव्यवस्था अपनी मैक्रोइकोनॉमिक गतिविधियों के स्थायित्व के कारण बेहतर स्थिति में है। ऐसा हमारी संतुलित वित्तीय रणनीति और राजकोषीय तथा राजस्व घाटे में कमी के कारण संभव हुआ है। पूंजीगत खर्च पर नियंत्रण बनाये रखने के लिए लचीली राजस्व गतिविधियों और राजस्व की पुन: प्राप्ति ने अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान की है। सरकार के विवेकपूर्ण वित्तीय प्रबंधन ने विश्वसनीयता और भारत के मैक्रोइकोनॉमिक तथा वित्तीय ढांचे में भरोसे को बढ़ाया है। देश के राज्य हमारे आर्थिक संतुलन को सधा हुआ बनाये रखने में महत्वपूर्ण साझेदार रहे हैं।
केन्द्र सरकार के द्वारा लक्षित और भरोसेमंद वित्तीय समेकन ने पिछले कुछ वर्षों से आर्थिक स्थिरता के सहयोग से विकासात्मक गतिविधियों द्वारा मैक्रोइकोनॉमिक ढांचे को संभाले रखा है। केन्द्र का आर्थिक समेकन स्पष्ट रूप से निर्धारित किए गए वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपना योगदान देता है, जिसमें लचीलापन भी बना रहता है। साथ ही, अनिश्चितताओं के इस युग में विकास को प्रभावित किए बिना समग्र वित्तीय नीतियों को पूर्ण सहयोग मिलता है। देश के राज्य हमारे आर्थिक संतुलन को सधा हुआ बनाये रखने में महत्वपूर्ण साझेदार रहे हैं। राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए विशेष सहायता (सास्की) योजना ब्याज मुक्त ऋण के आधार पर दीर्घावधि परिसंपत्तियों को बनाये रखने में मदद कर रही है। यह योजना देश में सतत पूंजीगत व्यय के माहौल के साथ राज्यों की निवेश आधारित प्राथमिकताओं और परिवर्तनकारी निवेश कार्यक्रम के बीच संतुलन बनाये रखने में सक्षम है।
आर्थिक स्थिरता बनाने रखने के मौद्रिक कारक
वित्त वर्ष 2026 में वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.4 प्रतिशत तक प्रत्याशित रहा है, जो पिछले वित्त वर्ष में 4.8 प्रतिशत था। इसी समयावधि में राजस्व घाटा जीडीपी के एक हिस्से के रूप में तेजी से कम हुआ और वित्त वर्ष 2009 से लेकर वित्त वर्ष 2026 में अपने न्यूनतम स्तर 0.8 प्रतिशत तक पहुंच गया। इसके साथ ही पूंजीगत खर्च के लिए एक बड़ा हिस्सा रखा गया और लगातार सुधार के साथ-साथ गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया गया। राजस्व खर्च वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 13.6 प्रतिशत से वित्त वर्ष 2025 में 10.9 प्रतिशत तक लाया गया है। हालांकि, उत्पादकता के लक्ष्य के साथ पूंजीगत खर्च पर पूरा ध्यान रखा गया है। प्रमुख सब्सिडी में किया जाने वाला खर्च को वित्त वर्ष 2022 में 1.9 प्रतिशत से वित्त वर्ष 2026 में 1.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि केन्द्र सरकार ने अक्टूबर 2025 तक 78 करोड़ 90 लाख लाभार्थियों के लिए खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की है। प्रत्यक्ष कर आधार में लगातार बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या वित्त वर्ष 2022 में 6.9 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 9.2 करोड़ हो गई है। आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में हुई वृद्धि बेहतर अनुपालन, कर व्यवस्था में तकनीक के अधिकाधिक उपयोग और व्यक्तिगत आय बढ़ने के साथ-साथ कर दायरे में शामिल होने वाले लोगों की संख्या में आई उछाल को भी दर्शाती है।
राजस्व प्राप्ति में सतत सुधार
केन्द्र सरकार की राजस्व प्राप्तियां वित्त वर्ष 2016 से वित्त वर्ष 2020 के बीच में जीडीपी का लगभग 8.5 प्रतिशत थीं, जो वित्त वर्ष 2022 से वित्त वर्ष 2025 के बीच में लगभग 9.1 प्रतिशत तक बढ़ गई। इस बदलाव का मुख्य कारण गैर-कॉर्पोरेट कर संग्रह में आई तेजी है। आंकड़ों में देखा जाए तो यह महामारी से पहले जीडीपी का 2.4 प्रतिशत था और महामारी के बाद लगभग 3.3 प्रतिशत पर पहुंच गया। नॉन-इट्रूसिव यूसेज ऑफ डेटा टू गाइड एंड इनेबल (एनयूडीजीई) आयकर विभाग का एक डेटा आधारित परिवर्तनकारी घटक है, जो सूचनाओं और दृष्टियों के माध्यम से करदाताओं के व्यवहार में बिना किसी जोर तथा दखल के बदलाव पर ध्यान केन्द्रित करता है। यह कर प्रणाली के बेहतर अनुपालन में काफी शक्तिशाली सिद्ध हुआ है।
वस्तु और सेवाकर 2.0 : व्यापार को प्रतिस्पर्धी बनाना
वस्तु और सेवाकर राजस्व की बढ़ती हुई संख्या करदाताओं की संख्या में हो रही बढ़ोत्तरी को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है। जीएसटी करदाताओं की संख्या वर्ष 2017 में 7 लाख थी, जो वर्तमान समय में डेढ़ करोड़ से अधिक हो चुकी हैं। अप्रैल से दिसम्बर 2025 के बीच में कुल वस्तु और सेवाकर 17.4 लाख करोड़ रुपये संग्रहित हुआ। यह का आंकड़ा साल-दर-साल जीएसटी में 6.7 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वस्तु और सेवाकर राजस्व में हो रही वृद्धि मौजूदा नाम मात्र की जीडीपी बढ़ने की स्थिति को संरेखित करती है। देखा जाए तो समानांतर रूप से उच्च आवृत्ति वाले संकेतक सशक्त लेन-देन आंकड़ों को ही सामने रखते हैं। इसमें अप्रैल से दिसम्बर 2025 के दौरान संचयी ई-वे बिल की संख्या साल-दर-साल आधार पर 21 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है। जीएसटी 2.0 के अंतर्गत सरल की गई दो कर संरचनाओं ने सकारात्मक परिवर्तन को दर्शाया है। इससे अनुपालन लागत कम होने, लेन-देन को सुचारू बनाने तथा छोटे आकार के व्यवसायों को और अधिक सहयोग एवं सहायता मिलने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त देश में कारोबारी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलने और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को सहयोग प्राप्त होने की परिस्थितियां भी हमारे सामने है। यह सुधार जीवनयापन में आने वाले खर्च में कमी ला रहे हैं और इससे घरेलू खपत को तेजी मिल रही है।
लाभांश और लाभ के माध्यम से गैर-कर राजस्व बढ़ोत्तरी
सकल घरेलू उत्पाद के एक हिस्से के रूप में गैर-कर राजस्व में उछाल देखने को मिला है। यह महामारी से पहले के समय में औसतन और महामारी के बाद के समय में जीडीपी के 1.4 प्रतिशत भाग के तौर पर स्थिर है। इसमें केन्द्र सरकार की राजस्व प्राप्तियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसई) के शानदार प्रदर्शन की भी केन्द्र सरकार की गैर-कर राजस्व बढोत्तरी में हिस्सेदारी रही है। वित्त वर्ष 2020 से 2025 के बीच में कुल शुद्ध लाभ और लाभांश में क्रमश: 174 प्रतिशत तथा 69 प्रतिशत का उछाल आया है। स्पष्ट है कि इसके लिए परिचालन क्षमता में सुधार और विवेकपूर्ण पूंजी प्रबंधन को जिम्मेदार माना जा सकता है, जिससे सरकार की गैर-कर राजस्व व्यवस्था सशक्त हो चुकी है।
सतत पूंजीगत व्यय
केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत दृष्टिकोण को प्रमुखता देते हुए प्रभावशाली पूंजीगत व्यय को महामारी से पहले की अवधि में जीडीपी के 2.7 प्रतिशत से बढ़ाकर महामारी की बाद की अवधि में 3.9 प्रतिशत कर दिया है। यह वित्त वर्ष 2025 में अब तक के उच्चतम स्तर यानी कि जीडीपी का 4 प्रतिशत हो चुका है। बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं वाले प्रमुख क्षेत्रों में सड़क यातायात और राजमार्ग, रेलवे, हवाई यातायात और जल मार्गों का विकास शामिल है। देश में विशिष्ट परिसंपत्तियों के निर्माण पर लगातार जोर देते हुए कुल पूंजीगत व्यय का आधे से अधिक हिस्सा इन्हीं परियोजनाओं पर खर्च किया जाता है। वित्त वर्ष 2025 में राज्यों को (34.9 प्रतिशत), टेलीकॉम (24.4 प्रतिशत) और आवास तथा शहरी कार्यो के लिए (19.6 प्रतिशत) लगभग दहाई के आंकड़े में धनराशि जारी की गई है, जो साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।
कर अवमूल्यन और वित्त आयोग सहायता के माध्यम से केन्द्र-राज्य उधारी में वृद्धि
केन्द्र सरकार ने कोविड महामारी के बाद के दौर में राज्यों के लिए प्रोत्साहन आधारित पूंजीगत व्यय की योजना को शुरू किया था, जिसके अंतर्गत दीर्घावधि ब्याज रहित है, इसके बहु-गुणक प्रभावों का आंकलन और निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया गया। केन्द्र सरकार ने राज्यों को पूंजीगत व्यय के लिए विशेष सहायता (सास्की) योजना के माध्यम से वित्त वर्ष 2025 में जीडीपी के लगभग 2.4 प्रतिशत तक पूंजीगत व्यय बनाये रखने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस तरह से केन्द्र सरकार ने पिछले 5 वर्षों ने 4,49,845 करोड़ रुपये जारी किए हैं। महामारी के बाद की अवधि में राज्य सरकारों का संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी के 2.8 प्रतिशत पर स्थिर रहा है, जोकि महामारी से पहले के स्तर के समान ही है। हालांकि, यह वित्त वर्ष 2025 में 3.2 प्रतिशत भी पहुंचा है, हाल के वर्षों में राज्यों के आर्थिक दबाव को दर्शाता है।
आर्थिक समीक्षा यह कहती है कि हाल के वर्षों में केन्द्र सरकार की प्रोत्साहन राशि ने राज्यों के पूंजीगत व्यय को बढ़ाने में सहायता की है, लेकिन सतत विकास होना या उसे बनाये रखना वास्तव में राजस्व व्यय में पूरक अनुशासन पर ही निर्भर करेगा। समीक्षा में यह भी कहा गया है कि राज्यों के पूंजीगत व्यय का सावधानीपूर्वक और अनुशासन के साथ इस्तेमाल काफी सहायक होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि अल्पकालिक धनराशि की सहायता उन निवेशों को नुकसान नहीं पहुंचाएगी, जिनपर समावेशी और मध्यम अवधि की समृद्धि आधारित है। इस प्रकार समझदारीपूर्ण व्यय बजट निर्धारण की प्राथमिकता में होना चाहिए।
सरकार की ऋण प्रोफाइल
सरकार की सार्वजनिक ऋण प्रबंधन रणनीति को वित्तीय कार्य योजना को पुन: प्रभावी किया गया है, जबकि वैश्विक सार्वजनिक ऋण स्तर लगातार बढ़ रहा है। सरकार का मध्यम अवधि लक्ष्य वित्त वर्ष 2031 तक कर्ज से जीडीपी अनुपात को 50+-1% तक लाना है। यह पहल अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में नीतियों के लचीलेपन को बनाये रखते हुए समग्र ऋण व्यवस्था को सुरक्षित बनाये रखने के प्रयासों को दर्शाती है। वर्तमान समय में कर्ज से जीडीपी अनुपात वित्त वर्ष 2025 के लिए 55.7 प्रतिशत है। भारत सरकार ने वर्ष 2020 से इसे लगभग 7.1 प्रतिशत तक कम किया है और इस बीच में उच्च सार्वजनिक निवेश को आकर्षित भी किया गया है।
भारत का राजकोषीय मॉडल सार्वजनिक निवेश दृष्टिकोण के आकलन से विशेष रूप से अलग नजर आता है। वित्त वर्ष 2024 में सामान्य सरकारी निवेश जीडीपी का 4 प्रतिशत था, जो वास्तव में कुल सरकारी राजस्व का लगभग 5वां भाग है। यह अधिकांश समकक्ष अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कहीं अधिक है। राज्य स्तर पर किसी भी तरह की वित्तीय अनुशासनहीनता ऋण के मूल्य पर नकारात्मक असर डालती है। इसके बावजूद केन्द्र सरकार मध्यम अवधि के वित्तीय समेकन को जारी रखती है और साथ ही यह अपेक्षा रखती है कि सभी बिन्दुओं पर स्थिति सामान्य बनी रहे।
निष्कर्ष
आर्थिक समीक्षा ने कुछ सुझाव भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं, ताकि क्रॉस सब्सिडी को कम किया जा सके, सरकारी कंपनियों की परिभाषा को संशोधित करके इक्विटी मोनेटाइजेशन पाइपलाईन को स्थिर किया जाए, ई-वे बिलिंग में ट्रस्ट और नज (एनयूडीजीई) थ्योरी को विस्तार दिया जा सके, खर्च में दक्षताओं को प्राप्त किया जा सके तथा अल्पकालिक अधिशेष के प्रभावी प्रबंधन के लिए समग्र उपाय किए जा सकें।
भविष्य की ओर देखते हुए कराधन में सुधार जारी हैं, जिसमें जीएसटी 2.0 और व्यक्तिगत आयकर अवसंरचना प्रमुखता से शामिल हैं। इन संरचनाओं को और सरल बनाने, अनुपालन लागत कम करने तथा कर आधार को व्यापक कराने के माध्यम से कर प्रणाली की कार्यकुशलता को बढ़ाने की प्रक्रिया जारी है। इन सुधारों का लाभ आर्थिक गतिविधियों और राजस्व संसाधन जुटाने में प्राप्त होगा।
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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई -. 15
(रिलीज़ आईडी: 2219958)
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