शिक्षा मंत्रालय
azadi ka amrit mahotsav

श्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज चेन्नई में तुगलक पत्रिका की 56वीं वर्षगांठ पर संबोधित किया

प्रविष्टि तिथि: 14 JAN 2026 6:30PM by PIB Delhi

केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज चेन्नई में तुगलक पत्रिका की 56वीं वर्षगांठ पर संबोधित किया।

सभा को संबोधित करते हुए श्री प्रधान ने तुगलक को एक ऐसा मंच बताया जिसने सार्वजनिक चर्चा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने नैतिकता, जवाबदेही, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत, शिक्षा और राष्ट्रीय विकास के बीच संबंध और विकसित भारत के निर्माण की साझा जिम्मेदारी सहित कई समकालीन विषयों पर बात की।

भाषण के कुछ अंश इस प्रकार हैं:

எல்லோருக்கும் வணக்கம்!

सभी का अभिनंदन।

என் இனிய தமிழ்ச் சொந்தங்களுக்கு, இனிப்பான பொங்கல் வாழ்த்துகள்!

मेरे प्यारे तमिल भाइयों और बहनों को पोंगल की हार्दिक शुभकामनाएं।

உங்களை இந்த தைத் திருவிழாவில் சந்திப்பதில் மிக்க மகிழ்ச்சி.

मुझे इस उत्‍सव में आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई।

நீங்கள் எல்லோரும் தமிழ்க் கலாசாரத்தின் சொந்தங்கள்.

आप सभी तमिल संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।

இந்தியச் சொந்தத்துடன் நானும் சேர்வது எனக்கு மிக்க மகிழ்ச்சி!

मुझे भारतीय परिवार के सदस्य के रूप में आपके साथ जुड़कर बहुत खुशी हो रही है।

  • मुझे आज यहां आकर बहुत खुशी हो रही है। यह वर्षों से एक ऐसा मंच है जहाँ पर लोग स्पष्ट रूप से बोलने और ईमानदारी से सवाल करने में विश्वास रखते हैं।
  • तुगलक कभी भी आसानी से प्रशंसा पाने का स्थान नहीं रहा है।
  • यह एक ऐसा मंच रहा है जहाँ वक्ताओं को विचार करने और उनसे प्रश्न पूछे जाने की अपेक्षा की जाती है। यह अपेक्षा ही एक स्वस्थ और कार्यशील लोकतंत्र की निशानी है।
  • पोंगल के अवसर पर हमारा एकत्रित होना उचित ही है। पोंगल एक ऐसा त्योहार है जो यथार्थवाद पर आधारित है।
  • यह प्रयास, निरंतरता और जिम्मेदारी का उत्‍सव है।
  • फसल की तरह ही समाज भी समय के साथ परिपक्व होता है।
  • पोंगल हमें भारत के बारे में कुछ और भी गहरी बातों की याद दिलाता है।
  • देश भर में, इस खगोलीय परिवर्तन को अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। दक्षिण में पोंगल, पूर्व में बिहू और कई क्षेत्रों में मकर संक्रांति। नाम अलग-अलग होते हैं। रीति-रिवाज भिन्न होते हैं। यही भारतीय सभ्यता की सुंदरता है।
  • लेकिन मूल भावना वही है; कृतज्ञता, नवजीवन और प्रकृति के साथ सामंजस्य।
  • यही एक भारत, श्रेष्ठ भारत का विचार है।
  • भारत में एकता कभी थोपी नहीं गई; यह हमेशा से व्यवहार में रही है और इसका अनुभव किया गया है। विविधता ने इस राष्ट्र को कमजोर नहीं किया, बल्कि इसे समृद्ध बनाया है।
  • क्षेत्रीय भाषाएँ, परंपराएँ और प्रथाएँ एक साझा सभ्यतागत लय की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ बन गई।
  • एकता को नीति में शामिल किए जाने से बहुत पहले, यह भारतीय संस्कृति में विद्यमान थी।
  • और इस भरोसे की प्रश्‍नों से जांच की जाती है और यही कारण है कि आज तुगलक का महत्व है।
  • ऐसे युग में जहां विचार से कहीं अधिक तेजी से राय फैलती है, जहां शोर को दृढ़ विश्वास और आक्रोश को सहभागिता समझ लिया जाता है, तुगलक हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र में शोर की नहीं बल्कि गहराई की आवश्यकता है।
  • यह इस बात पर जोर देती है कि विचारों के साथ जिम्मेदारी भी आती है। असहमति तर्क पर आधारित होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन केवल प्रदर्शन से कायम नहीं रह सकता है।
  • इस मंच ने दशकों से उस गंभीरता को दर्शाया है।
  • इस मंच पर भारत के सार्वजनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की आवाजें सुनी गई हैं, जिनमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी, स्‍वर्गीय श्री अरुण जेटली जी और श्री एल.के. आडवाणी जी जैसे वरिष्ठ नेता और श्री चो रामास्वामी जी और श्री एस. गुरुमूर्ति जी जैसे सार्वजनिक विचारक शामिल हैं, जिन्होंने भारत की बौद्धिक यात्रा में अपने-अपने तरीके से योगदान दिया है।
  • यहां उनकी उपस्थिति कभी औपचारिक नहीं थी। यह तुगलक के महत्व को एक ऐसे मंच के रूप में दर्शाती है जहां विचारों का परीक्षण किया जाता है, न कि उन्हें केवल आराम के लिए संवारा जाता है।
  • तुगलक केवल एक पत्रिका नहीं है। यह विचारों, अवधारणाओं और विविध दृष्टिकोणों का एक अनूठा संगम है।
  • यह लोकतंत्र की एक सार्वजनिक संस्था है, जो न तो सत्ता की है और न ही विपक्ष की, बल्कि तुगलक के पाठकों की है।
  • और उस संस्थागत स्वरूप की परिकल्पना एक ही व्यक्ति ने की थी - श्री श्रीनिवास राघवन रामास्वामी जी, हमारे अपने - चो रामास्वामी जी ने।
  • यदि तुगलक ने अनुशासित असहमति की पद्धति का प्रतिनिधित्व किया तो चो ने उसकी अंतरात्मा का प्रतिनिधित्व किया। वे एक राजगुरु थे।
  • चो निडर थे, लेकिन कभी लापरवाह नहीं थे।
  • उन्होंने अपने समय की हर सरकार पर सवाल उठाए; उनकी आलोचना आकस्मिक नहीं थी; वह सोची-समझी थी।
  • चो का मानना ​​था कि लोकतंत्र तब कमजोर नहीं होता जब नेताओं की आलोचना की जाती है, बल्कि तब कमजोर होता है जब उनसे गंभीरता से सवाल करना बंद कर दिया जाता है।
  • जो बात उन्हें दूसरों से अलग करती थी, वह यह नहीं थी कि वे क्या कहते थे, बल्कि यह थी कि वे कैसे कहते थे।
  • चो के लिए व्यंग्य का मतलब सिर्फ मजाक उड़ाना नहीं था, बल्कि यह एक कला थी। यह एक नैतिक साधन था।
  • उन्होंने विरोधाभास को उजागर करने के लिए हास्य का, सत्य को प्रकट करने के लिए अतिशयोक्ति का और आत्म-महत्व को परास्त करने के लिए व्यंग्य का प्रयोग किया।
  • उन्होंने खुलेआम दोस्तों की आलोचना की और ईमानदारी से विरोधियों की खूबियों को स्वीकार किया।
  • चो पत्रकारिता को सार्वजनिक जिम्मेदारी के रूप में समझते थे, न कि व्यक्तिगत प्रदर्शन के रूप में।
  • उनके नेतृत्व में तुगलक के विचार और दृष्टिकोण ऐसे थे जो पाठकों को पक्ष चुनने के बजाय सोचने पर मजबूर करते थे। यह गहरी लोकतांत्रिक आस्था को दर्शाता था।
  • उनका मानना ​​था कि सरकार में बैठे लोगों को सवालों का सामना करने में सबसे सहज होना चाहिए क्योंकि बिना सवाल किए सत्ता मिलने से निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
  • अपने अंतिम दिनों में भी चो ने अलगाव की स्थिति नहीं अपनाई। वे सतर्क, सक्रिय और सार्वजनिक जीवन के प्रति जवाबदेह बने रहे।
  • चो के बाद, तुगलक को श्री एस. गुरुमूर्ति जी ने आगे बढ़ाया है, जिन्होंने स्वतंत्रता, आलोचना और राष्ट्रीय हित के इसके मूल लोकाचार को संरक्षित करते हुए इसे अर्थव्यवस्था, संस्कृति और संप्रभुता की समकालीन चुनौतियों पर लागू किया।
  • तमिलनाडु इस क्षण को स्वाभाविक रूप से समझता है, क्योंकि इस भूमि ने सत्ता को कभी विरासत के रूप में नहीं देखा है। इसने सत्ता को हमेशा जिम्मेदारी के रूप में देखा है।
  • लोकतंत्र के संवैधानिक बनने से बहुत पहले, तमिल साहित्य में सद्गुण, न्याय, संयम और नैतिक कर्तव्य की बात कही जाती थी। सत्ता का मापन वंश से नहीं, बल्कि आचरण से होता था।
  • सेंगोल इसी विचार का प्रतीक था। यह नैतिक अधिकार का प्रतिनिधित्व करता था, जो धर्म से बंधे सत्ता के हस्तांतरण को दर्शाता था।
  • गिंजी के पास सिरुकदम्बुर से, जहां चौबीस तीर्थंकरों की उपस्थिति एक प्राचीन जैन विरासत को दर्शाती है, से लेकर तमिलनाडु के पवित्र भूमि को आधार देने वाले महान हिंदू मंदिरों तक, इस भूमि ने सदियों से आध्यात्मिक विविधता को बनाए रखा है।
  • शक्तिशाली राज्यों, विशेष रूप से चोलों ने, धर्म, दर्शन, ज्ञान और सांस्कृतिक सद्भाव को बढ़ावा दिया।
  • वे आध्यात्मिकता और शासन कला को एक-दूसरे के विपरीत नहीं, बल्कि समाज को मजबूत करने वाली पूरक शक्तियों के रूप में देखते थे।
  • तमिलनाडु भारत की सबसे गहरी आध्यात्मिक परंपराओं, वेदांतिक संप्रदायों, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, वास्तु, संस्कृत शिक्षा, शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य का संरक्षक रहा है।
  • चोल और पांड्य वंश ने मंदिरों, कला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से इस साझा भारतीय सभ्यता को केदारनाथ से कन्याकुमारी तक और यहां तक ​​कि समुद्र पार भी पहुंचाया।
  • और फिर भी, इस विशाल विरासत के बावजूद, आज हमें ऐसी आवाजें सुनाई देती हैं जो लापरवाही से सनातन धर्म को मिटाने, इसे एक व्यंग्यचित्र तक सीमित करने, यहां तक ​​कि इसकी तुलना बीमारी से करने की बात करती हैं।
  • यह विचित्र बात है कि एक ऐसी सभ्यता जिसने सदियों तक वाद-विवाद को आत्मसात किया, उसे अब उन लोगों द्वारा असहिष्णु घोषित किया जा रहा है जो इसके अस्तित्व को ही सहन नहीं कर सकते।
  • इस समय, केवल यही आशा की जा सकती है कि महाप्रभु उनके प्रति उनकी सभ्यता की समझ से कहीं अधिक दयालु होंगे।
  • तमिल सभ्यता ने स्वयं को कभी क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा है। इसने विद्वत्ता, भक्ति, व्यापार और विचारों के माध्यम से यात्रा की है।
  • थिरुक्कुरल इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। यह एक तमिल ग्रंथ है, लेकिन क्षेत्रीय ग्रंथ नहीं है।
  • इसके नैतिक मूल्यों, शासन, संयम और मानवीय आचरण संबंधी उपदेश मानवता के लिए हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी जी की दूरदृष्टि में थिरुक्कुरल को भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे ले जाया गया है।
  • काशी तमिल संगमम जैसी पहलें इस सभ्यतागत निरंतरता की पुष्टि करती हैं जो काशी, कांची, मदुरै और रामेश्वरम को एक सांस्कृतिक मानचित्र के जीवंत केंद्रों के रूप में जोड़ती है।
  • जब प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में तमिल में भाषण दिया, तो यह मात्र एक प्रतीकात्मकता नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण था कि भारत की आधुनिक आवाज में उसकी प्राचीन भाषाओं की गहराई समाहित है।
  • तमिल भाषा और तमिल विरासत को वैश्विक मंच पर ले जाना केवल एक सांस्कृतिक कार्य नहीं है।
  • यह हमारा आत्मविश्वास भरा एक बयान है, जो दर्शाता है कि हम कौन हैं और हम अगली पीढ़ी को कैसे तैयार करते हैं।
  • क्योंकि सभ्यताएं केवल स्मृति के सहारे ही कायम नहीं रहती है।
  • वे शिक्षा के माध्यम से, पहुंच बढ़ाकर, अवसरों को गहरा करके और क्षमता निर्माण करके ऐसा करते हैं।
  • यह तमिल भाषा में विश्वास है, न कि उसका अवमूल्यन।

एनईपी 2020

  • एनईपी 2020, डॉ. के. कस्तूरीरंगन द्वारा व्यक्त किए गए उस दृष्टिकोण को दर्शाती है जिसका उद्देश्य शिक्षार्थियों को आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करते हुए भारत की सभ्यतागत बुद्धिमत्ता में विश्वास, सामंजस्य और भरोसे को बहाल करना है।
  • इसकी शुरुआत एक सरल सत्य से होती है: बच्चे सबसे अच्छी तरह उस भाषा में सीखते हैं जिसे वे सबसे पहले समझते हैं, यानी उनकी मातृभाषा।
  • इसीलिए एनईपी प्रारंभिक शिक्षा के केंद्र में मातृभाषा को रखती है, विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षण पद्धति के रूप में।
  • आज मैं इस मंच पर एक बार फिर जोर देना चाहता हूं। भाषा कोई बाधा नहीं है। भाषा तो एक शक्तिवर्धक कारक है।
  • एनईपी 2020 का त्रिभाषी सूत्र मातृभाषा या हमारी भाषा को कमजोर नहीं करता है।
  • यह इसकी रक्षा करता है और फिर अवसरों का विस्तार करता है।
  • तमिल भाषा को दूसरी भाषा सीखने से कोई खतरा नहीं है।
  • तमिल भाषा तभी मजबूत होती है जब उसके बच्चे बहुभाषी, आत्मविश्वासी और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों।
  • वैश्विक शोध स्वयं ही इस बात का प्रमाण है: बहुभाषी शिक्षार्थी अधिक संज्ञानात्मक लचीलापन, बेहतर सीखने के परिणाम और अधिक आर्थिक गतिशीलता प्रदर्शित करते हैं। एनईपी (राष्ट्रीय नीति) इस प्रमाण को दर्शाती है, न कि तुच्छ राजनीति को।
  • यही नई नीति का मूलमंत्र है, न कि बाध्यता; यही सशक्तिकरण है, न कि थोपना। यह दृष्टिकोण पहले से ही परिणाम दे रहा है।
  • भारत में उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या 4.46 करोड़ से अधिक हो गई है जो 2014 से 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है।
  • महिलाओं का नामांकन 1.57 करोड़ से बढ़कर 2.18 करोड़ हो गया है, जो 38.4 प्रतिशत की वृद्धि है।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिला सकल नामांकन अनुपात 2014-15 में लगभग 23 प्रतिशत से बढ़कर आज लगभग 29 प्रतिशत हो गया है, और लगातार छह वर्षों से पुरुष सकल नामांकन अनुपात से अधिक बना हुआ है।
  • अनुसूचित जातियों में नामांकन में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है, और अनुसूचित जनजातियों में 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
  • युवा महिलाओं के लिए यह परिवर्तन और भी तीव्र है: अनुसूचित जाति की महिलाओं का नामांकन 61 प्रतिशत से अधिक और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं का नामांकन 96 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया है।
  • यह प्रतीकात्मकता नहीं है।
  • यह संरचनात्मक समावेशन है। और हमारे लिए समावेशन का अर्थ सुलभता भी है।
  • इसीलिए मोदी जी की दूरदृष्टि के तहत भारतीय भाषाएं कक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं, डिजिटल प्लेटफार्मों और वैश्विक मंचों पर अपना स्थान बना रही हैं।
  • भारत की शास्त्रीय भाषाओं पर सौ से अधिक विद्वतापूर्ण प्रकाशनों का निर्माण और समर्थन किया गया है, जिनमें थिरुक्कुरल, थोलकाप्पियम, सिलप्पथिकारम और मणिमेकलाई जैसी रचनाएँ शामिल हैं, जिनका भारतीय और विदेशी भाषाओं के साथ-साथ भारतीय सांकेतिक भाषा में भी अनुवाद किया गया है।
  • उद्देश्य स्पष्ट है: ज्ञान को भाषाई या भौतिक बाधाओं के बिना क्षेत्रों, पीढ़ियों और क्षमताओं के पार प्रसारित होना चाहिए।
  • एनईपी 2020 ने हमसे पहचान और आकांक्षा के बीच चुनाव करने को नहीं कहा। भारत में दोनों हो सकते हैं और होना भी चाहिए।
  • आज इन विचारोत्तेजक प्रश्नों पर मेरे भाषण का समापन शायद चो रामास्वामी ने ही किया होता।
  • क्या हम ऐसे संस्थान बना रहे हैं जो हमारी अपनी सफलता के बावजूद टिके रहने के लिए पर्याप्त मजबूत हों?
  • क्या हम स्पष्टता बढ़ा रहे हैं या भ्रम पैदा कर रहे हैं?
  • ये अकादमिक प्रश्न नहीं हैं। ये जिम्मेदारी के प्रश्न हैं।
  • भारत का भविष्य चुनौतीपूर्ण है। लेकिन यह बेहद आशाजनक भी है।
  • इसीलिए विकसित भारत का आह्वान महज एक नारा नहीं है।
  • यह एक साझी जिम्मेदारी है। बिना कटुता के निर्माण करना। बिना द्वेष के सुधार करना। बिना अहंकार के नेतृत्व करना।
  • यह जिम्मेदारी सिर्फ दिल्ली की नहीं है।
  • इसकी शुरुआत संस्थानों से, विचारकों से, शिक्षकों से, इस देश के हर कोने में रहने वाले नागरिकों से होती है।
  • इसकी शुरुआत शानदार राज्य तमिलनाडु से होती है।
  • इसकी शुरुआत हमसे होती है। इसकी शुरुआत तुगलक से होती है।
  • यह भारतीयता की निरंतरता है जिसमें आत्मविश्वास, जड़ों से जुड़ाव और खुलापन शामिल है।
  • और यदि हम उस भावना के प्रति सच्चे बने रहते हैं, तो आगे का मार्ग स्पष्ट है।

अंत में मैं यही कहूंगा:

तमिल भाषा समृद्ध हो।

तमिलनाडु समृद्ध हो

भारत की प्रगति हो

जय हिंद! जय तमिलनाडु! जय भारत

 

****

 

पीके/केसी/पीपी/आर


(रिलीज़ आईडी: 2215609) आगंतुक पटल : 13
इस विज्ञप्ति को इन भाषाओं में पढ़ें: English