जनजातीय कार्य मंत्रालय
बेंगलुरु में वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक आयोजित
दक्षिणी राज्यों ने जनजातीय कार्य मंत्रालय को दावों के निपटारे, सामुदायिक वन अधिकारों एवं आवासन अधिकारों की मान्यता में हुई प्रगति की जानकारी दी; समयबद्ध रोडमैप तैयार करने के निर्देश दिए
प्रविष्टि तिथि:
10 SEP 2026 7:39PM by PIB Delhi
भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) ने आज कर्नाटक के बेंगलुरु में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (एफआरए) के कार्यान्वयन पर पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक आयोजित की। इस बैठक में पाँच दक्षिणी राज्यों—आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना—के जनजातीय कल्याण, राजस्व तथा वन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी कार्यान्वयन की स्थिति की समीक्षा करने और आगे की एकीकृत रणनीति पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए।
कार्यक्रम की शुरुआत कर्नाटक सरकार के अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के सचिव के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने उपस्थित सदस्यों को सम्मेलन के उद्देश्यों से अवगत कराया और गणमान्य व्यक्तियों व प्रतिनिधियों का औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद कर्नाटक के जनजातीय समुदायों के कलाकारों द्वारा पारंपरिक जनजातीय नृत्य प्रस्तुत किया गया। इसके उपरांत एमओटीए के संयुक्त सचिव का मुख्य भाषण और एमओटीए की सचिव का विशेष संबोधन हुआ। संयुक्त सचिव ने सम्मेलन को अवगत कराया कि 30 जून 2026 तक राष्ट्रीय स्तर पर 54 लाख से अधिक व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) दावे प्राप्त हुए हैं, जिनमें से लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर करीब 25.42 लाख पट्टे वितरित किए जा चुके हैं; जबकि 10 लाख से अधिक दावे लंबित हैं और 19,845 सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) मान्यता प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने दक्षिणी राज्यों से लंबित दावों के समयबद्ध निपटारे, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों एवं विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के आवास अधिकारों की मान्यता, और मान्यता प्राप्त अधिकारों को भूमि अभिलेखों में दर्ज करने को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। अपने विशेष संबोधन में एमओटीए सचिव ने इस बात पर जोर दिया कि अधिकारों की मान्यता का परिणाम आजीविका की सुरक्षा, टिकाऊ आजीविका और विकास योजनाओं के कनवर्जेंस के रूप में निकलना चाहिए, जिससे जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण हो सके। सचिव ने सामुदायिक वन अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों पर अधिक ध्यान देने का आह्वान किया और ग्राम सभा के नेतृत्व वाले वन शासन तथा समुदाय-आधारित आजीविका को मजबूत करने की क्षमता को रेखांकित किया। उन्होंने एमओटीए और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी संयुक्त परामर्श का उल्लेख किया, जो वन विभाग की कार्य योजनाओं के साथ सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं के एकीकरण को सक्षम बनाता है। पीवीटीजी के आवास अधिकारों को संस्कृति, आजीविका और पारंपरिक ज्ञान की जीवंत प्रणाली बताते हुए, सचिव ने आग्रह किया कि इनके अधिकारों की मान्यता संवेदनशीलता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ सुनिश्चित की जाए।
निदेशक, एफआरए, एमओटीए ने सम्मेलन को एफआरए के कार्यान्वयन के राष्ट्रीय परिदृश्य से अवगत कराया। इसमें विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों द्वारा की गई प्रगति पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिसमें दावों की लंबितता, अधिकारों के अभिलेखों को शामिल करना, आवास अधिकारों की मान्यता, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (सीएफआरआर) की मान्यता और इस संबंध में मंत्रालय द्वारा दिए जा रहे सहयोग जैसे विषय शामिल थे। इसके बाद, उप सचिव एमओटीए ने सम्मेलन को एफआरए अभिलेखों के डिजिटलीकरण की आवश्यकता से अवगत कराया और वर्तमान में विकसित किए जा रहे राष्ट्रीय स्तर के एफआरए पोर्टल' की जानकारी दी। उन्होंने राज्यों से इस पोर्टल का उपयोग करने और एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) के माध्यम से अपने मौजूदा एफआरए अभिलेखों को इससे जोड़ने का आग्रह किया।
राज्यवार प्रस्तुतियां
इसके उपरांत पाँचों दक्षिणी राज्यों के अधिकारियों ने अपने-अपने राज्यों में एफआरए के कार्यान्वयन की स्थिति से सम्मेलन को अवगत कराया, जिसका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:
कर्नाटक: प्राप्त 2,95,176 आवेदनों में से 16,700 वन अधिकार पट्टे वितरित किए जा चुके हैं और 15,553 दावों का सत्यापन अभी बाकी है; तालुका और जिला पंचायतों के गठन में देरी के कारण उप-मंडल और जिला स्तरीय समितियों का कामकाज प्रभावित हुआ है। खारिज किए गए दावों का 'महजारू' समितियों के माध्यम से पुन: सत्यापन प्रगति पर है, तथा सरकारी योजनाओं के कनवर्जेंस के लिए एफआरए लाभार्थियों के डेटा को राज्य के 'फ्रूट्स' और 'भूमि' पोर्टल से जोड़ा जा रहा है।
तमिलनाडु: प्रथम चरण में जारी किए गए 15,838 पट्टों का डिजिटलीकरण कर दिया गया है, जबकि द्वितीय चरण के तहत प्राप्त 41,692 नए दावे सत्यापन के अधीन हैं। इस प्रक्रिया को राज्य स्तरीय ' एफआरए एटलस', समर्पित जिला एफआरए सेल और वन अधिकार समितियों के संरचित क्षमता निर्माण से सहायता मिल रही है।
आंध्र प्रदेश: 31 अगस्त 2026 तक प्राप्त 2,90,874 दावों के सापेक्ष 2,27,300 व्यक्तिगत और 1,225 सामुदायिक पट्टे वितरित किए जा चुके हैं। यहाँ 'गिरिभूमि एफआरए पोर्टल' को राज्य की राजस्व और बैंकिंग प्रणालियों से जोड़कर एक एकीकृत भूमि-अभिलेख एवं कल्याण-वितरण मॉडल लागू किया गया है।
तेलंगाना: प्राप्त 6,55,249 दावों के सापेक्ष 2,30,735 व्यक्तिगत और 102 सामुदायिक पट्टे वितरित किए गए हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह से डिजिटल 'ऑनलाइन आरओएफआर टाइटिल ग्रांटिंग सिस्टम' द्वारा संचालित है, जो 'भू-भारती' राजस्व पोर्टल के साथ एकीकृत है और इसे स्कॉच अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस (गोल्ड, 2024) से सम्मानित किया जा चुका है।
केरल: 29,545 व्यक्तिगत और 286 सामुदायिक पट्टों को मान्यता दी गई है। 1,616 व्यक्तिगत और 108 सामुदायिक दावों के लंबित होने का मुख्य कारण सर्वेक्षण और सत्यापन प्रक्रियाएं हैं; साथ ही छह वन गांवों को राजस्व गांवों में परिवर्तित किया जा चुका है।
आगे की राह
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने दक्षिणी राज्यों से लंबित और खारिज किए गए दावों का समयबद्ध निपटारा एवं मिलान सुनिश्चित करने, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों और पीवीटीजी के आवास अधिकारों की मान्यता में तेजी लाने, राजस्व और वन अभिलेखों में मान्यता प्राप्त अधिकारों को दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी करने, तथा आजीविका एवं कल्याणकारी योजनाओं के साथ कनवर्जेंस को मजबूत करने का आह्वान किया। इसके लिए संबंधित राज्यों द्वारा राज्य-विशिष्ट रोडमैप और समय-सीमाएं तैयार की गईं।
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पीके/केसी/एसके
(रिलीज़ आईडी: 2308912)
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