विधि एवं न्याय मंत्रालय
उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण और नियुक्तियां संविधान के प्रावधानों तथा मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) के अनुसार संचालित होती हैं
प्रविष्टि तिथि:
25 JUL 2026 8:59PM by PIB Delhi
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 222 में यह प्रावधान है कि राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद, किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानांतरण कर सकते हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए निर्धारित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण का प्रस्ताव भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम प्यून (Puisne) न्यायाधीशों से परामर्श करके प्रारंभ किया जाता है।
एमओपी में आगे यह भी प्रावधान है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विचारों को भी ध्यान में रखें, जहाँ से संबंधित न्यायाधीश का स्थानांतरण किया जाना है, तथा उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विचारों को भी, जहाँ स्थानांतरण किया जाना है। इसके अतिरिक्त, वे एक या अधिक ऐसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के विचारों पर भी विचार करते हैं, जो इस विषय पर अपने मत देने की स्थिति में हों। संबंधित न्यायाधीश, जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं, से जुड़े व्यक्तिगत पहलुओं तथा स्थानांतरण प्रस्ताव पर उनकी प्रतिक्रिया, जिसमें उनकी पसंदीदा स्थानों की प्राथमिकता भी शामिल है, को प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय लेने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के प्रथम चार वरिष्ठतम प्यून (Puisne) न्यायाधीशों द्वारा अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। सभी स्थानांतरण जनहित में किए जाते हैं, अर्थात् देशभर में न्याय प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से। एमओपी में एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत की जाती है तथा यह नियुक्तियाँ वर्ष 1998 में तैयार किए गए मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होती हैं। यह एमओपी 6 अक्टूबर, 1993 के उच्चतम न्यायालय के निर्णय (द्वितीय न्यायाधीश मामला) तथा 28 अक्टूबर, 1998 की सलाहकारी राय (तृतीय न्यायाधीश मामला) के अनुपालन में तैयार किया गया था।
एमओपी के अनुसार, उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव प्रारंभ करने की जिम्मेदारी भारत के मुख्य न्यायाधीश की होती है, जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उस उच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम प्यून (Puisne) न्यायाधीशों से परामर्श करके प्रारंभ किए जाते हैं। एमओपी के अनुसार, उच्च न्यायालयों को रिक्ति उत्पन्न होने से कम-से-कम 06 माह पूर्व अपनी अनुशंसाएं भेजनी होती हैं। उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए, एमओपी के अनुसार संबंधित राज्य सरकार के विचार प्राप्त किए जाते हैं। जिन नामों पर विचार किया जा रहा होता है, उनके संबंध में सरकार के पास उपलब्ध अन्य रिपोर्टों के आलोक में भी अनुशंसाओं पर विचार किया जाता है। इसके बाद उच्च न्यायालय कॉलेजियम, राज्य सरकारों तथा भारत सरकार की अनुशंसाओं को सलाह के लिए उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम (एससीसी) को भेजा जाता है।
उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक सतत, समन्वित और सहयोगात्मक प्रक्रिया है। इसमें राज्य और केंद्र स्तर पर विभिन्न संवैधानिक प्राधिकारियों से परामर्श और अनुमोदन आवश्यक होता है। केवल उन्हीं व्यक्तियों को उच्च न्यायालयों का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, जिनके नामों की अनुशंसा उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम (एससीसी) द्वारा की जाती है।
यह जानकारी केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी।
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पीके/केसी/वीएस
(रिलीज़ आईडी: 2289522)
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