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सिविल सेवा दिवस के विशेष अवसर पर ईपीएफओ के आरजीडीई सीजन 2 में प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने भारत की महानता को सभ्यतागत विरासत से वैश्विक नेतृत्व तक एक नए नजरिए से परिभाषित किया

प्रविष्टि तिथि: 21 APR 2026 7:53PM by PIB Delhi

सिविल सेवा दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने पीडीयूएनएएस के नेतृत्व में रीइमेजिनिंग गवर्नेंस डिस्कोर्स फॉर एक्सीलेंस के दूसरे सीज़न का उद्घाटन किया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिंपल ने भारत की उस प्राचीन और अटूट विरासत पर प्रकाश डाला, जिसने सदियों से विचारों, व्यापार और संस्कृति को जोड़ने वाले एक सभ्यतागत सेतु के रूप में कार्य किया है।

श्री डेलरिंपल ने तर्क दिया कि भारत की ऐतिहासिक शक्ति विजय या आक्रमण में नहीं, बल्कि विचारों के निर्बाध प्रवाह में निहित थी। यह भारत का सभ्यतागत खुलापन ही था, जिसने उसे महाद्वीपों के पार अन्य सभ्यताओं को गढ़ने और प्रभावित करने की शक्ति दी। उन्होंने सुझाव दिया कि इसी उदार चेतना को पुनः प्राप्त करना, भविष्य में भारत की वैश्विक भूमिका के लिए निर्णायक सिद्ध हो सकता है।

सिल्क रोड (रेशम मार्ग) से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देते हुए, श्री डेलरिंपल ने उन साक्ष्यों की ओर इशारा किया जो प्राचीन वैश्विक विनिमय के केंद्र में भारत को स्थापित करते हैं। व्यापारिक पैटर्न—विशेष रूप से भारत के तटों पर रोमन संपदा का भारी जमावड़ा और सुदूर पूर्व में इसकी अनुपस्थिति—यह दर्शाते हैं कि भारत ही वह मुख्य मध्यस्थ था, जो भूमध्यसागरीय दुनिया को शेष एशिया के साथ जोड़ता था।

लेकिन उन्होंने रेखांकित किया कि व्यापार तो इस गहरी कहानी की महज़ एक हिस्सा भर था।

भारत का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विचारों, भिक्षुओं, विद्वानों और व्यापारियों के माध्यम से प्रवाहित हुआ, जिसने मध्य एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक की संस्कृतियों को एक नया आकार दिया। पूरे एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार, अन्य परंपराओं के भीतर भारतीय चिंतन का विकास और गणित का संचार—जिसमें शून्य की अवधारणा भी शामिल है—भारत की उस सभ्यतागत पहुंच को दर्शाता है जो जितनी आर्थिक थी, उतनी ही बौद्धिक भी।

इसे संभव बनाने वाली शक्ति पारंपरिक अर्थों में सत्ता या सैन्य बल नहीं थी, बल्कि भारत की वह विशिष्ट क्षमता थी जो बाहरी विचारों को आत्मसात करने, उन्हें अनुकूल बनाने और उनकी पुनर्व्याख्या करने की थी। भारत के विचार कभी जड़ या स्थिर नहीं रहे, वे जैसे-जैसे आगे बढ़े, विकसित होते गए—अपनी दार्शनिक गहराई को बरकरार रखते हुए उन्होंने नए परिवेशों में अपनी जड़ें जमा लीं।

ऐसे समय में जब वैश्विक व्यवस्थाएं एक बार फिर बदलाव के दौर से गुजर रही हैं, डेलरिंपल ने सुझाव दिया कि भारत का यह खुलापन आज के लिए एक प्रासंगिक मॉडल प्रस्तुत करता है। दुनिया को प्रभावित करने वाले राष्ट्र केवल वे नहीं होते जो अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हैं, बल्कि वे होते हैं जो विचारों का सृजन करते हैं और उन्हें सीमाओं के पार प्रवाहित होने का मार्ग देते हैं।

इस सत्र में 150 से अधिक क्षेत्रीय कार्यालयों के अधिकारियों और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के विभिन्न घटकों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस दौरान पूछे गए प्रश्नों ने इतिहास के गौरवशाली पन्नों को आधुनिक गवर्नेंस की चुनौतियों से जोड़ने का अनूठा कार्य किया।

प्रतिभागियों ने इस पर गहन प्रश्न उठाए कि क्या सभ्यतागत प्रभाव केवल संस्कृति और ज्ञान के बल पर उभर सकता है, या इसके लिए 'हार्ड पावर' (सैन्य और आर्थिक शक्ति) का होना भी अनिवार्य है। साथ ही, इस पर भी चर्चा हुई कि भारत का ऐतिहासिक खुलापन उसकी वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति को दिशा देने में किस प्रकार सहायक हो सकता है।

सत्र में इस विषय पर भी गहरी रुचि देखी गई कि किस प्रकार ऐतिहासिक पैटर्न आज भी आधुनिक गवर्नेंस को आकार दे रहे हैं। चर्चा इस बिंदु पर केंद्रित थी कि क्या प्रशासक इन ऐतिहासिक निरंतरताओं का लाभ उठाकर परिस्थिति अनुसार नीतियां तैयार कर सकते हैं। साथ ही, एक दिलचस्प सवाल यह भी उठा कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इतिहास को अधिक निष्पक्ष बना सकता है और इसमें मौजूद पूर्वाग्रहों को दूर करने में सहायक हो सकता है।

ये संवाद इतिहास के साथ जुड़ने के एक व्यापक प्रयास को दर्शाते हैं, जहाँ इतिहास केवल एक कहानी मात्र नहीं है, बल्कि संस्थानों, नीतियों और भविष्य के बारे में सोचने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है।

पीडीयूएनएएस के निदेशक श्री कुमार रोहित ने अपने उद्घाटन भाषण में गवर्नेंस को एक "स्वर्ण पथ" के रूप में वर्णित किया। उन्होंने इसे एक ऐसी निरंतर प्रक्रिया बताया जो संस्थागत स्मृतियों और बदलाव की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाए रखती है—जो विशेष रूप से सिविल सेवा दिवस के अवसर पर अत्यंत प्रासंगिक है।

केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त, श्री रमेश कृष्णमूर्ति ने सार्वजनिक संस्थानों में सतत शिक्षा और निरंतर सीखने की अनिवार्यता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आरजीडीई जैसे वैचारिक मंच प्रशासनिक दृष्टिकोण का विस्तार करते हैं, जिससे अधिकारियों की सोच केवल रोजमर्रा के कामकाज तक सीमित न रहकर, भविष्य की चुनौतियों और व्यापक संभावनाओं को समझने में सक्षम बनती है।

सत्र का संचालन श्री उत्तम प्रकाश (आरपीएफसी-I) द्वारा किया गया। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इतिहास के दृष्टिकोण को आज की गवर्नेंस व्यवस्था के विमर्श में शामिल करना कितना मूल्यवान है।

जैसे-जैसे आरजीडीई अपने दूसरे सीजन में आगे बढ़ रहा है, यह विभिन्न बौद्धिक दृष्टिकोणों के साथ जुड़ने के एक अनूठे मंच के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है। यह संस्थानों को केवल कामकाज चलाने तक सीमित न रहकर, गहन चिंतन करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

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पीके/केसी/डीवी/ डीए

 


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