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राज्यसभा सचिवालय
विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 160वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति
प्रविष्टि तिथि:
16 MAR 2026 4:28PM by PIB Delhi
श्री बृज लाल, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय) की अनुदान मांगों (2026-27) के सम्बन्ध में अपना एक सौ साठवां प्रतिवेदन 16 मार्च, 2026 को राज्य सभा में प्रस्तुत किया और 16 मार्च, 2026 को लोक सभा के सभा पटल पर रखा गया ।
अनुदान मांगों की जांच करते हुए, समिति ने 17 और 18 फरवरी, 2026 को आयोजित बैठकों के दौरान वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारत की संचित निधि से किए गए व्यय की तुलना में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के प्रदर्शन, कार्यक्रमों और नीतियों का मूल्यांकन किया है।
पैनल ने सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग; निदेशक, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो; सचिव, केंद्रीय सतर्कता आयोग; प्रधान रजिस्ट्रार, केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण; संयुक्त सचिव, लोकपाल; अपर सचिव, केंद्रीय सूचना आयोग; सचिव, संघ लोक सेवा आयोग; अध्यक्ष, कर्मचारी चयन आयोग; अध्यक्ष, राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी; सचिव, लोक उद्यम चयन बोर्ड; निदेशक, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी; सदस्य (प्रशासन), क्षमता विकास आयोग; निदेशक, सचिवालय प्रशिक्षण एवं प्रबंधन संस्थान और महानिदेशक, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के साथ लगभग पांच घंटों तक अनुदान मांगों की गहनता से जांच की । समिति द्वारा 12 मार्च, 2026 को प्रतिवेदन पर विचार किया गया और उसे स्वीकार किया गया । समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई सिफारिशें/समुक्तियां संलग्न हैं। संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs/hi पर भी उपलब्ध है।
प्रमुख सिफारिशें/समुक्तियां
कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी 160 वां प्रतिवेदन
कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय की अनुदान मांगों का समग्र मूल्यांकन
- समिति ने नोट किया कि 2023-24 और 2024-25 के दौरान, संशोधित अनुमान क्रमशः 13.0% और 10.6% से बजट अनुमानों से अधिक थे, फिर भी वास्तविक व्यय संशोधित अनुमानों से क्रमशः 5.43% और 2.59% कम रहा। आगे, 2025-26 में, 31.01.2026 तक वास्तविक व्यय संशोधित अनुमानों की तुलना में 25.34% की कमी दर्शाता है। साथ ही, वित्त मंत्रालय द्वारा अनुमोदित बजट अनुमान पिछले पांच वर्षों में अनुमानित व्ययों के 60.32% से 84.26% के बीच रहे हैं। इसलिए समिति यह सिफारिश करती है कि मंत्रालय अपने बजट निर्माण और व्यय प्रबंधन प्रक्रियाओं की एक व्यापक समीक्षा करे। समिति का यह भी मानना है कि परियोजनाओं में अधिक यथार्थवाद और बेहतर निष्पादन अनुशासन वित्तीय विश्वसनीयता को बढ़ाएगा और बजट पूर्व परामर्श के दौरान मंत्रालय के पक्ष को मजबूत करेगा।
(पैरा 2.9)
- समिति नोट करती है कि कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के तीन विभागों को वित्तीय मोर्चे पर प्रदर्शन सुधारने की आवश्यकता है। जबकि डीओपीटी ने 31 जनवरी 2026 तक आवंटित निधियों का केवल 75% ही उपयोग किया है, डीएआरपीजी और डीपीपीडब्ल्यू की स्थिति भी समान है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में व्यय सामान्यतः कुल बजट अनुमानों का 33 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, और मार्च महीने में व्यय कुल बजट अनुमानों का 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इस संदर्भ में, समिति इस बात पर बल देती है कि विभाग(विभागों) को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वित्तीय वर्ष के शेष महीनों में व्यय इस निर्धारित मानकों के अनुरूप योजनाबद्ध और नियंत्रित तरीके से किया जाए।
(पैरा 2.15)
- समिति ने नोट किया कि 31 जनवरी 2026 तक संबद्ध और अधीनस्थ कार्यालयों में औसत व्यय दर लगभग 73.45 प्रतिशत है। वित्तीय वर्ष के दस महीने बीत जाने को देखते हुए, यह व्यय की इच्छित गति से धीमी गति को दर्शाता है। समिति ने आगे संगठनों में उपयोग स्तर में अत्यधिक भिन्नता देखी। विशेष रूप से, कर्मचारी चयन आयोग (50.45 प्रतिशत) तथा सचिवालय प्रशिक्षण और प्रबंधन संस्थान (56 प्रतिशत) ने उपयोग स्तर को इच्छित मानक से काफी कम दर्ज किया है, जिसमें पर्याप्त अप्रयुक्त शेष राशि बनी हुई है।
(पैरा 2.18)
- कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) का मामला विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। संशोधित अनुमान 2025-26 चरण में अतिरिक्त धनराशि प्राप्त करने के बावजूद (₹515.15 करोड़ (बीई) से ₹548.50 करोड़ (आरई) तक), 31 जनवरी 2026 तक केवल 50.45 प्रतिशत धन का ही उपयोग किया गया, जिससे ₹271.79 करोड़ की अव्ययित शेष राशि बची। इसके अलावा, 2026-27 के लिए, एसएससी ने अत्यधिक अनुमानित व्यय ₹719.13 करोड़ का प्राक्कलन किया, जबकि स्वीकृत बजट अनुमान ₹525.20 करोड़ है (प्राक्कलन का 73.04 प्रतिशत)।
(पैरा 2.19)
- समिति का मानना है कि प्राक्कलन को व्यय प्रवृत्तियों और संगठन की वित्तीय वर्ष के भीतर धन का उपयोग करने की क्षमता के साथ सुदृढ़ रूप से संरेखित किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग त्रैमासिक व्यय निगरानी तंत्र को मजबूत करे और व्यय की समान गति के संबंध में वित्त मंत्रालय के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे। जैसा कि तालिका IX में दर्शाया गया है, 31 जनवरी 2026 तक संगठनों में औसत उपयोग 73.45 प्रतिशत है, जिसमें कुछ संगठन जैसे कर्मचारी चयन आयोग (50.45 प्रतिशत) और सचिवालय प्रशिक्षण और प्रबंधन संस्थान (56.00 प्रतिशत) विशेष रूप से कम व्यय स्तर दिखा रहे हैं। साथ ही, 2026-27 के बजट अनुमानों के चरण में, लोकपाल जैसी संस्थाओं को उनके अनुमानित व्यय का केवल 20.24 प्रतिशत ही प्राप्त हुआ, जबकि आईएसटीएम और एलबीएसएनएए को क्रमशः 48.47 प्रतिशत और 52.68 प्रतिशत मिला (तालिका X)। समिति का मानना है कि अनुमानों, संशोधित अनुमानों और वास्तविक उपयोग के बीच निकट समानता आवश्यक है। संशोधित अनुमानों के चरण में अनुपातहीन व्यय के बिना राशि बढ़ाने का संशोधन, जैसा कि एसएससी के मामले में देखा गया, वित्तीय विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है और भविष्य के आवंटन निर्णयों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
(पैरा 2.21)
- समिति नोट करती है कि योजना घटक के अंतर्गत, बीई 2026-27 (₹298.51 करोड़) का आवंटन आरई 2025-26 (₹281.01 करोड़) की तुलना में ₹17.50 करोड़ की वृद्धि दर्शाता है, हालांकि यह बीई 2025-26 (₹383.46 करोड़) से कम बना हुआ है। गैर-योजना घटक के अंतर्गत, बीई 2026-27 (₹2308.94 करोड़) आरई 2025-26 (₹2244.06 करोड़) की तुलना में ₹64.88 करोड़ और बीई 2025-26 (₹2273.00 करोड़) की तुलना में ₹35.94 करोड़ की वृद्धि दर्शाता है। समिति नोट करती है कि जबकि संशोधित अनुमानों के चरण में कुछ सुधार हुआ है, अनुमोदित आवंटन अभी भी अनुमानित व्यय से कम बने हुए हैं, जो वित्त मंत्रालय द्वारा सतर्कतापूर्वक किए गए अनुमोदन को दर्शाता है।
(पैरा 2.24)
- समिति ने ट्रेनिंग फॉर ऑल (टीएफए) योजना के बढ़े हुए दायरे पर ध्यान देते हुए, यह समुक्ति भी की है कि आवंटन राशि सं.अ. 2025-26 में ₹26.16 करोड़ से बढ़कर ब.अ. 2026-27 में ₹52.20 करोड़ हो गई है, जो ₹26.04 करोड़ (लगभग 100 प्रतिशत) की बढ़ोतरी दिखाता है। इस उल्लेखनीय वृद्धि और योजना के घटकों के पुनर्गठन को देखते हुए, समिति ने सिफारिश की है कि मंत्रालय 2026-27 के दौरान तिमाही खर्च पर करीब से नज़र रखे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बढ़ा हुआ वित्तीय प्रावधान मापने लायक प्रशिक्षण नतीजों में बदले और खर्च का असमान या वर्ष के अंत में संकेंद्रण न हो।
(पैरा 2.29)
- इस बात को ध्यान में रखते हुए कि एनपीसीएससीबी – मिशन कर्मयोगी का हिस्सा ब.अ. 2026-27 में कुल योजना आवंटन का 42 प्रतिशत है, समिति ने इस योजना की कड़ी वित्तीय और भौतिक निगरानी की ज़रूरत पर बल दिया है। हालांकि राजस्व घटक में 2025-26 (31 जनवरी 2026 तक) के दौरान लगभग 69.96 प्रतिशत का उपयोग दर्ज हुआ, लेकिन पूंजीगत घटक काफी कम उपयोग हुआ है जो संशोधित अनुमान का केवल 15.09 प्रतिशत है। यह देखते हुए कि इस योजना को ब.अ. 2026-27 में ₹125.35 करोड़ (राजस्व) और ₹0.65 करोड़ (पूंजीगत) आवंटित किया गया है, समिति का मत है कि व्यय की बेहतर तिमाही गति, खासकर पूंजीगत घटक के तहत, यह सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि बढ़ी हुई आवंटन राशि मूर्त क्षमता-निर्माण परिणाम में तबदील हो और इसका नतीजा साल के आखिर में संकेंद्रण या प्रभाव-विस्तार देयताएं न हों।
(पैरा 2.31)
- मंत्रालय के स्पष्टीकरण को नोट करते हुए, समिति बिलासपुर सर्किट पीठ भवन के निर्माण हेतु विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) की प्रक्रिया को समय पर पूरा करने की आवश्यकता पर बल दिया और सिफारिश की है कि सीपीडब्ल्यूडी जैसी क्रियान्वयन एजेंसियों के साथ सुदृढ़ समन्वय सुनिश्चित किया जाए ताकि पूंजीगतगत निधि के प्रवाह-विस्तार एवं अव्यवस्थित उपयोग को टाला जा सके। समिति यह भी सिफारिश करती है कि लखनऊ एवं गुवाहाटी पीठों में चल रहे निर्माण एवं नवीनीकरण के अन्य कार्यों की प्रगति की भौतिक एवं वित्तीय समीक्षा तंत्र के माध्यम से त्रैमासिक निगरानी की जाए, जिससे कार्य का समय पर पूरा होना और आवंटित निधि का इष्टतम उपयोग सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 2.39)
- इसके अतिरिक्त, माननीय उच्चतम न्यायालय की हाइब्रिड मामला सुनवाई प्रणालियों को सभी पीठों में स्थापित करने के निर्देशों के दृष्टिगत, समिति ने सिफारिश की है कि पर्याप्त बजट व्यवस्था तथा चरणबद्ध कार्यान्वयन योजना सुनिश्चित की जाए ताकि पूंजीगतगत आवंटन में कमी के कारण डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ करने के काम में कोई दिक्कत न हो।
(पैरा 2.40)
- समिति का मत है कि ऐसी विचलन की स्थिति का पूर्वानुमान लगाया जा सकता था, विशेष रूप से इस तथ्य के दृष्टिगत कि आयोग एक निर्धारित परीक्षा कैलेंडर तथा आवर्ती परिचालन पैटर्न पर कार्य करता है। 2022-23 से 2024-25 तक तीन लगातार वर्षों में ब.अ. तथा सं.अ. दोनों का बार-बार अत्यधिक होना बजट पूर्वानुमान तथा व्यय योजना में खामियों को दर्शाता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि परीक्षा अनुसूचियों, व्यय के ऐतिहासिक रूझानों तथा दायित्व अनुमानों को सम्मिलित करते हुए एक अधिक यथार्थवादी तथा आंकड़ा आधारित बजटीय ढांचा अपनाया जाए, ताकि बाद के वित्तीय वर्षों में असंगति को टाला जा सके।
(पैरा 2.45)
- समिति ने समुक्ति की है कि वास्तविक व्यय ने 2022-23 से 2024-25 तक तीन लगातार वित्तीय वर्षों (तालिका XVIII) में बजट अनुमान तथा संशोधित अनुमानों दोनों को पार कर दिया था। 2022-23, 2023-24 तथा 2024-25 में, वास्तविक व्यय संशोधित अनुमान से क्रमशः ₹29.16 करोड़, ₹4.29 करोड़ तथा ₹7.37 करोड़ अधिक हो गया (सं.अ. ₹841.96 करोड़ के मुकाबले वास्तविक: ₹871.12 करोड़; सं.अ. ₹859.51 करोड़ के मुकाबले ₹863.80 करोड़; तथा सं.अ. ₹935.88 करोड़ के मुकाबले ₹943.25 करोड़)। मंत्रालय ने निवेदन किया है कि वित्त मंत्रालय द्वारा संप्रेषित संशोधित अनुमान सीमाएं बजट-पूर्व चरण में प्रस्तुत अनुमानों से कम थीं तथा संगठन के लंबित देयताओं की पूर्ति के लिए अतिरिक्त निधि की आवश्यकता थी।
(पैरा 2.50)
- तथापि, समिति ने समुक्ति की है कि अनेक वर्षों के दौरान ब.अ. तथा सं.अ. दोनों पर व्यय का बार-बार अत्यधिक होना बजट पूर्वानुमान तथा देयता मूल्यांकन तंत्रों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता का संकेत देता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि अपेक्षित परिचालन आवश्यकताओं, प्रतिबद्ध देयताओं तथा व्यय के ऐतिहासिक रूझानों को सम्मिलित करते हुए एक अधिक यथार्थवादी तथा दूरदर्शी बजटीय ढांचा अपनाया जाए, ताकि विचलनों को न्यूनतम किया जा सके तथा भावी वित्तीय वर्षों में बजट विश्वसनीयता में वृद्धि हो।
(पैरा 2.51)
- समिति को ‘एलबीएसएनएए में अवसंरचना के सुधार एवं आवश्यक सुविधाओं के उन्नयन’ योजना के बंद किए जाने के बारे में अवगत कराया गया है और परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2026–27 के बजट अनुमान में इसके लिए कोई आवंटन नहीं किया गया है। इस संदर्भ में समिति यह जानना चाहती है कि अब एलबीएसएनएए में अवसंरचना विस्तार और उन्नयन से संबंधित गतिविधियाँ किस वैकल्पिक व्यवस्था या योजना के अंतर्गत संचालित की जाएँगी। यह देखते हुए कि एलबीएसएनएए एक प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान है तथा अवसंरचना का आधुनिकीकरण और क्षमता वृद्धि निरंतर आवश्यकताएँ हैं, समिति यह भी जानना चाहती है कि क्या इन गतिविधियों को किसी अन्य मद के अंतर्गत समाहित कर दिया गया है अथवा इन्हें किसी नए ढाँचे के अंतर्गत पुनर्गठित किया गया है।
(पैरा 2.62)
- योजना के अंतर्गत 57.87 प्रतिशत धनराशि के अप्रयुक्त रहने (तालिका XXIV देखें) संबंधी एक प्रश्न के उत्तर में विभाग ने इस कमी का कारण परियोजना स्थल पर वृक्षों के प्रत्यारोपण से संबंधित लंबित वाद-विवाद तथा दिल्ली में ग्रैप प्रतिबंधों के लागू होने को बताया है। प्रस्तुत स्पष्टीकरण को ध्यान में रखते हुए समिति यह समुक्ति करती है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ग्रैप से संबंधित प्रतिबंध अब एक बार-बार होने वाली स्थिति बन गए हैं और इन्हें परियोजना की योजना में तथा क्रियान्वयन की समय-सीमा में पहले से ही शामिल किया जाना चाहिए। समिति यह सिफारिश करती है कि इस प्रकार की अवसंरचना परियोजनाओं में व्यापक जोखिम आकलन, समयबद्ध नियामक स्वीकृतियाँ तथा संबंधित प्राधिकरणों के साथ पहले से समन्वय होना चाहिए, ताकि विलंब को न्यूनतम किया जा सके और पूंजीगत निधियों के बड़े पैमाने पर अप्रयुक्त रहने की स्थिति से बचा जा सके।
(पैरा 2.66)
- समिति यह नोट करती है कि ‘विस्तार कार्य और क्षमता निर्माण’ शीर्ष के अंतर्गत व्यय पिछले दो वित्तीय वर्षों के दौरान सीमित रहा है। 2024–25 में वास्तविक व्यय ₹0.29 करोड़ था, जबकि 2025–26 में 31 जनवरी 2026 तक का व्यय ₹0.46 करोड़ रहा है, जबकि संशोधित अनुमान ₹0.76 करोड़ है। यद्यपि केंद्रीय सतर्कता आयोग की समग्र बजटीय स्थिति स्थिर प्रतीत होती है, तथापि क्षमता निर्माण घटक के अंतर्गत अपेक्षाकृत कम आवंटन और व्यय पर ध्यान दिया जाना चाहिए, विशेषकर आयोग के निवारक सतर्कता के दायित्व को ध्यान में रखते हुए। समिति यह सिफ़ारिश करती है कि आयोग आउटरीच, जागरूकता और क्षमता-निर्माण की पहलों को अधिक प्राथमिकता दे, ताकि विभिन्न विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं में संस्थागत सतर्कता तंत्र को मज़बूत किया जा सके।
(पैरा 2.79)
- संघ लोक सेवा आयोग की विस्तृत अनुदान मांगों का विश्लेषण करते समय समिति ने यह देखा कि बीई 2026–27 में अतिरिक्त कार्यालय स्थान किराए पर लेने के लिए ₹11.3950 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जिससे एक नई आवर्ती देयता उत्पन्न हो गई है। आयोग ने इस व्यय का कारण अपने वर्तमान परिसर में स्थान की कमी तथा उपयुक्त सरकारी आवास की अनुपलब्धता बताया है। समिति यह भी नोट करती है कि रक्षा मंत्रालय को पहले अस्थायी रूप से हस्तांतरित भूमि की बहाली का मुद्दा और आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय से अतिरिक्त भूमि की मांग अभी भी अनसुलझी है। समिति का यह मत है कि किराए के परिसरों पर लगातार निर्भर रहना एक टिकाऊ दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। इसलिए, समिति यह सिफ़ारिश करती है कि यूपीएससी, मंत्रालय के समन्वय से, रक्षा मंत्रालय और आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय के साथ इस मामले को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाए, ताकि पर्याप्त ज़मीन की बहाली या आवंटन सुनिश्चित किया जा सके और स्थायी बुनियादी ढाँचे में वृद्धि हो सके, जिससे भविष्य में बार-बार होने वाले किराये के खर्च से बचा जा सके।
(पैरा 2.83)
कार्मिक प्रबंधन
- समिति का यह मत है कि लगातार बनी हुई कमी केंद्र और राज्यों में प्रशासनिक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है, विशेष रूप से क्षेत्रीय स्तर के पदों पर, जहाँ समय पर निर्णय लेना और नीतियों को लागू करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(पैरा 3.5)
- समिति, इसलिए, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग से आग्रह करती है कि एजीएमयूटी कैडर में 25 प्रतिशत रिक्तियों को तुरंत प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए, क्योंकि यह कैडर कई केंद्र शासित प्रदेशों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अपनी विशिष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ निभाता है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि पूर्वोत्तर और नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा तथा सिक्किम जैसे छोटे कैडरों के लिए एक विशेष भर्ती रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है, जहाँ प्रतिशत के आधार पर कमी असमान रूप से अधिक है।
(पैरा 3.6)
- इस पृष्ठभूमि में, समिति चिंता के साथ यह नोट करती है कि बार-बार यह आश्वासन दिए जाने के बावजूद कि चंद्रमौली समिति की रिपोर्ट विभाग में विचाराधीन है, अब तक समिति को कोई ठोस निर्णय, रूपरेखा या समय-सीमा सूचित नहीं की गई है। इस संबंध में, मापनीय प्रगति वाले किसी भी समय-सीमा-बद्ध लक्ष्य का अभाव, एक ऐसे संरचनात्मक मुद्दे को हल करने में तत्परता की कमी को दर्शाता है, जिसका शासन, सेवा वितरण और संस्थागत प्रभावशीलता पर सीधा असर पड़ता है।
(पैरा 3.10)
- अतः, समिति अपने 126वें और 145वें प्रतिवेदनों में की गई अपनी पिछली सिफारिशों को दोहराती है कि विभाग चंद्रमौली समिति की सिफारिशों पर स्पष्ट रूप से परिभाषित समयसीमा के भीतर निर्णय ले और उसकी सूचना समिति को दे। नीतिगत स्तर पर, समिति यह सिफ़ारिश करती है कि सीधे भर्ती होने वाले आईएएस अधिकारियों की वार्षिक भर्ती योजना एक डेटा-आधारित तंत्र का पालन करे, और अनुमानित भर्ती को संवर्ग-वार अनुमानित सेवानिवृत्ति डेटा, अपेक्षित कमी और प्रशासनिक आवश्यकताओं के साथ संरेखित किया जाए।
(पैरा 3.11)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि विभाग आईएएस के अलावा अन्य सेवाओं से चुने गए संयुक्त सचिव एवं अन्य उच्च पदों को पैनलबद्ध करने के लिए एक संरचित 360-डिग्री समीक्षा तंत्र को संस्थागत बनाने की व्यवहार्यता की जांच करे। इस प्रकार के दृष्टिकोण से सभी सेवाओं में मूल्यांकन मानक में एकरूपता आएगी, वरिष्ठ स्तर पर योग्यता के आधार पर चयन प्रक्रिया सुदृढ़ होगी, और पैनलबद्ध करने की प्रक्रिया की वस्तुनिष्ठता और मजबूती पर विश्वास बढ़ेगा।
(पैरा 3.15)
- समिति का मानना है कि कार्मिक प्रबंधन में भर्ती और कैडर में कर्मियों की संख्या से आगे बढ़कर प्रशासनिक कार्यबल के संपूर्ण कल्याण और संधारणीयता को शामिल करना चाहिए। समिति यह सिफारिश करती है कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, कैडर नियंत्रक प्राधिकरण और राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके, अधिकारियों के कल्याण के लिए एक संरचित कार्ययोजना विकसित करे, जिसमें संस्थागत मानसिक स्वास्थ्य/परामर्श समर्थन तंत्र, लंबे समय तक अतिरिक्त प्रभार दिए जाने की समय-समय पर निगरानी, बार-बार स्थानांतरण की जगह समुचित कार्यकाल संबंधी स्थिरता, मिशन कर्मयोगी के तहत तनाव-प्रबंधन मॉड्यूल का एकीकरण शामिल हो, और प्रणालीगत तनाव के कारणों की पहचान करने के लिए स्वास्थ्य संबंधी वार्षिक सर्वेक्षण पर विचार किया जाए। समिति का मानना है कि अधिकारियों के कल्याण पर सक्रिय रूप से ध्यान देने से प्रशासनिक प्रभावकारिता में वृद्धि होगी, कार्यबोझ से क्षीण होने का जोखिम कम होगा और बेहतर गवर्नेंस परिणाम प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
(पैरा 3.17)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि विभाग, संबंधित मंत्रालयों और विभागों के साथ मिलकर, लोक प्रशासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नैतिक, सुरक्षित और जवाबदेह उपयोग के लिए एक व्यापक सरकारी कार्ययोजना बनाने के लिए आगे आए। इस कार्ययोजना में डेटा सुरक्षा और गोपनीयता के लिए सुरक्षा उपाय स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किये जाने चाहिए, एआई की सहायता से किये गए कार्यों का सही रिकॉर्ड रखा जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए, और अंतिम निर्णय करने का अधिकार नामित मानव अधिकारियों के पास ही होना चाहिए। यह विशेष रूप से इसलिए आवश्यक है क्योंकि मंत्रालयों में एआई उपकरण जिसमें कर्मचारियों, वित्तीय, नियामक और नागरिकों से जुड़ी जानकारी सहित अलग-अलग और संवेदनशील श्रेणी के डेटा का कार्य शामिल हो सकता है।
(पैरा 3.20)
- समिति यह भी सिफारिश करती है कि आधिकारिक कार्यों के लिए एआई उपकरणों के उपयोग को, लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) मंचों समेत सेवा प्रदाता के साथ केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित उद्यम-स्तरीय समझौतों के माध्यम से नियंत्रित किया जाए, ताकि सरकारी डेटा की गोपनीयता सुनिश्चित हो, राष्ट्रीय डेटा संरक्षण और सुरक्षा मानकों का पालन हो, और डेटा स्टोरेज, प्रसंस्करण और उस तक पहुँच के संबंध में स्पष्ट संविदात्मक सुरक्षा उपाय हों।
(पैरा 3.21)
- इसके अलावा, समिति यह भी सिफारिश करती है कि मंत्रालयों द्वारा उपयोग में लाए गए एआई-सक्षम तंत्र, विशेष रूप से सेवा अभिलेखों, सतर्कता संबंधी मामलों, कार्य निष्पादन डेटा, वित्तीय लेन-देन और अन्य संवेदनशील सरकारी जानकारी को संभालने के लिए एक मजबूत सूचना सुरक्षा प्रोटोकॉल और गोपनीयता संबंधी सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए।
(पैरा 3.22)
- समिति सरकार में सभी स्तरों, विशेष रूप से संबंधित कर्मचारी (डीलिंग हैंड्स) और निचले स्तर के कर्मियों के लिए जो नियमित तौर पर आधिकारिक डेटा प्रोसेस करते हैं, तक एआई साक्षरता और जिम्मेदार उपयोग संबंधी प्रशिक्षण को विस्तृत करने की आवश्यकता पर भी बल देती है, ताकि प्रौद्योगिकी अपनाने के साथ-साथ नैतिक सीमा, गोपनीयता का उत्तरदायित्व और साइबर-सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता का भी विस्तार हो।
(पैरा 3.23)
भर्ती संस्थान
- समिति इस घटनाक्रम का स्वागत करती है, क्योंकि यह परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, निष्पक्षता और अभ्यर्थी का भरोसा बढ़ाने की दिशा में एक कदम है। हालांकि, समिति चाहती है कि उसे संघ लोक सेवा आयोग द्वारा तैयार किये गए विस्तृत तरीकों से अवगत कराया जाए, जो प्रारंभिक परीक्षा के बाद अनंतिम उत्तर-कुंजी के प्रकाशन की समयरेखा; अभ्यर्थी द्वारा आपत्ति दर्ज करने का तंत्र और समय अवधि; और ऐसी आपत्तियों की जांच और उनके निपटारे की प्रक्रिया से जुड़े हैं। समिति को यह भी बताया जाए कि क्या अंतिम उत्तर-कुंजी के साथ स्वीकृत/अस्वीकृत आपत्तियों के साथ कारण स्पष्टीकरण भी पब्लिक डोमेन में डाला जाएगा।
(पैरा 4.4)
- समिति यह मानती है कि भावी सिविल सेवक में विश्लेषणात्मक योग्याता, समझ और निर्णय लेने संबंधी कौशल का आकलन करना आवश्यक है। साथ ही, समिति का मानना है कि प्रारंभिक परीक्षा में अलग-अलग अकादमिक स्ट्रीम के अभ्यर्थियों के लिए एक निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जानी चाहिए। यद्यपि सीएसएटी पेपर का स्वरूप योग्यता निर्धारण प्रकृति का है; तथापि यह समिति सिफारिश करती है कि संघ लोक सेवा आयोग, सीएसएटी घटक को युक्तिसंगत बनाने के लिए एक व्यापक समीक्षा करे, जिसमें इसका पाठ्यक्रम और कठिनता का स्तर शामिल हों, ताकि अलग-अलग अकादमिक पृष्ठभूमि पर इसके प्रभाव का आकलन किया जा सके। समीक्षा को अभ्यर्थी के कार्य निष्पादन पैटर्न के प्रयोगसिद्ध विश्लेषण से समर्थित किया जा सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि परीक्षा निष्पक्षता, समावेषिता और समान अवसरों के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
(पैरा 4.6)
- समिति भर्ती में पीडब्ल्यूबीडी या ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र के किसी भी दुरूपयोग को गंभीर चिंता का विषय मानती है, क्योंकि यह सरकारी नौकरी के लिए आवश्यक बराबरी, पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों को कमज़ोर करता है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, यूपीएससी और अन्य भर्ती एजेंसियों से सलाह करके, भर्ती प्रक्रिया के सही चरण में पीडब्ल्यूबीडी और ईडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र के लिए सत्यापन तंत्र को सुदृढ़ करे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि प्रौद्योगिकी सक्षम सत्यापन तंत्र, जिसमें जहाँ मुमकिन हो, एडवांस्ड डिजिटल स्क्रूटनी टूल शामिल हों, का उपयोग किया जाए ताकि नकली या हेरफेर किए गए प्रमाणपत्र का समय पर पता लगाया जा सके। ऐसे उपायों में डिजिटल मान्यता, जारी करने वाले प्राधिकरण के साथ सिस्टमैटिक क्रॉस-वेरिफिकेशन, और राज्य सरकारों और सक्षम प्रमाणीकरण निकाय के साथ निकट तालमेल शामिल किया सकता है।
(पैरा 4.8)
- समिति ने संघ लोक सेवा आयोग द्वारा बताई गई स्थिति पर ध्यान दिया है। संसद के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की संवैधानिक आवश्यकता को मानते हुए, समिति इस बात पर ज़ोर देती है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए वार्षिक प्रतिवेदनों को समय पर अंतिम रूप दिया जाना और उसे प्रस्तुत करना आवश्यक है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि आयोग अपने वार्षिक प्रतिवेदनों को तैयार करने और उन्हें प्रस्तुत करने के लिए एक तय समयरेखा का पालन करे और भविष्य में बेवजह की देरी से बचे।
(पैरा 4.10)
- समिति नोट करती कि मामले की अभी भी जांच चल रही है और सुधारों को लागू करने के लिए अभी तक कोई खास समयावली नहीं बताई गई है। यह मानते हुए कि सिफारिशों का नीतियों पर बड़ा असर होगा, समिति का मानना है कि बिना किसी तय समयावली के लंबे समय तक विचार करने से एक आवश्यक राष्ट्रीय भर्ती प्रक्रिया में आवश्यक सुधारों में देरी हो सकती है। इसलिए, समिति अपनी पिछली सिफारिश दोहराती है कि एक संरचित और चरणबद्ध क्रियान्वयन रोडमैप तैयार किया जाए, जिसमें उन सुधारों की पहचान की जाए जिन्हें अल्पावधि में किया जा सकता है और जिनके लिए बड़े पैमाने पर परामर्श करने की आवश्यकता है, और समिति को इस बारे में हुई प्रगति के बारे में अवगत कराया जाए।
(पैरा 4.14)
- समिति यह जानकर प्रसन्न है कि प्रतिभा सेतु पोर्टल पर 292 संगठन पंजीकृत हो चुके हैं। हालांकि, यह भी देखा गया है कि नियोक्ता पोर्टल पर चुने गए अभ्यर्थी की स्थिति का नियमित रूप से अपद्यन नहीं कर रहे हैं। यूपीएससी के आउटरीच प्रयासों का स्वागत करते हुए, समिति यह सिफारिश करती है कि पंजीकृत संगठनों द्वारा नियमित अद्यतन सुनिश्चित करने और योजना के तहत नियुक्ति के वास्तविक परिणामों का आकलन करने के लिए एक संरचित निगरानी प्रणाली बनायी जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि इस पहल की कार्यसाधकता और प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए भाग लेने वाले संगठनों के साथ-साथ अभ्यर्थी से भी समय-समय पर फीडबैक लिया जाए। पोर्टल की वार्षिक कार्य-निष्पादन समीक्षा, जिसमें पंजीकरण, नियुक्ति और मिले फीडबैक का डेटा शामिल हो, उसे भी आयोग के वार्षिक प्रतिवेदन में शामिल किया जा सकता है।
(पैरा 4.16)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि कर्मचारी चयन आयोग जल्दी से एक संरचित स्लाइडिंग तंत्र/काउंसलिंग सिस्टम को अंतिम रूप देकर लागू करे, जिसमें समयावली स्प्ष्ट हो, ताकि बताई गई रिक्तियों का उसी भर्ती चक्र में इष्टतम उपयोग हो सके। इसके अलावा, समिति यह भी सिफारिश करती है कि एसएससी संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तरह एक आरक्षित/प्रतीक्षा सूची बनाए रखने की व्यवहार्यता की जांच करे, ताकि रिपोर्ट न करने या नाम वापस लेने की वजह से होने वाली रिक्तियों को अगले परीक्षा चक्र की प्रतीक्षा किए बिना तुरंत भरा जा सके।
(पैरा 4.19)
- समिति को लगता है कि एसेससी एक बड़ी राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी है, इसलिए उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके भर्ती प्रक्रिया से, अनजाने में भी, भर्ती के परिणामों में क्षेत्रीय संकेद्रण न हो। आयोग को एक विश्लेषणात्मक अध्ययन करना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि क्या संरचनात्मक घटक, जैसे जागरूकता का स्तर, कोचिंग तक पहुंच, डिजिटल अवसंरचना, भाषा की रुकावटें, या परीक्षा केंद्र का संवितरण, क्षेत्रीय अंतर को बढ़ावा दे रहे हैं। समिति आगे कम भागीदारी वाले क्षेत्रों, विशेष रूप से पूर्वोत्तर, आदिवासी जिलों, ग्रामीण इलाकों और आकांक्षी जिलों के लिए एक लक्षित आउटरीच कार्यनीति बनाने की सिफारिश करती है, जिसमें स्थानीय भाषाओं में जागरूकता अभियान और दूर-दराज के इलाकों में परीक्षा केंद्र की मौजूदगी बढ़ाना शामिल है।
(पैरा 4.21)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी (एनआरए) प्रस्तावित तीन महीने की समयावली का पालन करे और मुख्य पड़ावों को बताते हुए एक स्पष्ट क्रियान्वयन संबंधी समयसूची उपलब्ध कराए। एक बार एसएससी, आरआरबीएस और आईबीपीएस के शामिल हो जाने के बाद, अन्य केंद्रीय सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरणों को भी एकीकृत एकबारगी पंजीकरण (यूओटीआर) प्लेटफ़ॉर्म पर समयबद्ध और चरणबद्ध तरीके से लाया जाना चाहिए ताकि इसे हर संगठन में समान रूप से शुरू किया जा सके। समिति इस बात पर भी ज़ोर देती है कि इसे पूर्ण रूप से शुरू करने से पहले मज़बूत डेटा सुरक्षा और लेखापरीक्षा सुरक्षा संबंधी उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
(पैरा 4.25)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि एनआरए एक तय समय में एक समान कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) मानक और तकनीकी प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देकर अधिसूचित करे। इसके अलावा, इसे पूरे देश में शुरू किये जाने से पहले, एनआरए को परीक्षा अवसंरचना का एक व्यापक क्षमता आकलन करना चाहिए और रसद संबंधी तैयारी के आधार पर एक चरणबद्ध क्रियान्वयन कार्यनीति अपनानी चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि पहले फुल-स्केल सामान्य पात्रता परीक्षा (सीईटी) चक्र के शुरू होने से पहले तैयारी का आकलन किया जाए।
(पैरा 4.28)
- समिति की राय है कि संबंधित विभाग को एनआरए के बढ़ते काम को देखते हुए, संस्वीकृत और कार्यात्मक कार्यबल की पर्याप्त संख्या की जांच करनी चाहिए। संस्थागत स्थिरता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नेतृत्व वाले पदों पर पूर्णकालिक आधार पर भर्ती की जानी चाहिए। सामान्य पात्रता परीक्षा (सीईटी) और एकीकृत एकबारगी पंजीकरण (यूओटीआर) को पूरी तरह से शुरू करने से पहले एक वास्तविक कार्यबल बढ़ाने का योजना तैयार किया जाना चाहिए।
(पैरा 4.30)
- इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि लोक उद्यम चयन बोर्ड (पीईएसबी) को चयन प्रक्रिया के हर चरण के लिए समयावली तय करनी चाहिए, जिसमें सर्तकता मंजूरी और बैठकों की समयसूची शामिल है। आने वाली रिक्तियों के मामले में, विज्ञापन से पहले की प्रक्रिया, विशेष रूप से कार्य विवरण को समय पर जमा करना और अंतिम रूप देना, प्रशासनिक मंत्रालयों के साथ समन्वय करके आसान बनाया जा सकता है। आने वाली रिक्तियों के लिए पहले से कार्रवाई करने से यह सुनिश्चित होगा कि रिक्तियाँ आने से काफी पहले अभ्यर्थी के नामों की सिफारिश की जाए, जिससे प्रक्रिया बेहतर होगी।
(पैरा 4.34)
- समिति सिफारिश करती है कि पीईएसबी रिक्तियों का एक व्यापक ट्रैकिंग डैशबोर्ड बनाए रखे जिसमें मौजूदा, अनुमानित और भविष्य की रिक्तियाँ दर्शायी जाएं, जिसका प्रशासनिक मंत्रालयों के साथ परामर्श करके समय-समय पर समीक्षा किया जाए। समिति यह सिफारिश करती है कि जिन मामलों में चयन बैठक बिना किसी सिफारिश के समाप्त हो जाती हैं, उनके कारणों का प्रणालीगत तरीके से विश्लेषण किया जाना चाहिए, जिसमें आवेदन पूल की कमी, बाध्यकारी पात्रता शर्तें, या सही अभ्यर्थी का न मिलना शामिल है। इसके अलावा, ऐसे पदों को एक तय समयवधि के भीतर फिर से विज्ञापित किया जाना चाहिए ताकि लंबे समय तक रिक्तियाँ न रहें और यह सुनिश्चित हो सके कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (सीपीएसई) में नेतृत्व बना रहे।
(पैरा 4.38)
प्रशिक्षण संस्थाएँ
- इसलिए समिति सिफारिश करती है कि विशेषकर विधि, प्रबंधन, अर्थशास्त्र, सामाजिक प्रबंधन और हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं में संकाय के सभी रिक्त पद समयबद्ध तरीके से भरे जाएं ताकि अकादमिक गहराई, निरंतरता और प्रशिक्षण की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके। समिति आगे सिफारिश करती है कि लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (लबासना) एक संरचित कैडर समीक्षा करे ताकि यह आकलन किया जा सके कि वर्तमान संस्वीकृत संख्या मिशन कर्मयोगी के तहत उसके बढ़ते दायरे को पर्याप्त रूप से दर्शाती है या नहीं, विशेष रूप से डिजिटल गवर्नेंस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु नीति और सार्वजनिक वित्त जैसे उभरते क्षेत्रों में, जहां उनके क्षेत्र के विशेषज्ञों की आवश्यकता हो।
(पैरा 5.3)
- सिविल सेवकों के बीच सेवा भाव को मजबूत करने के लिए, समिति अनुशंसा करती है कि एलबीएसएनएए को फाउंडेशन कोर्स, जिला प्रशिक्षण और मध्य-कैरियर कार्यक्रमों में नागरिकों के साथ सेवा-भाव और 'फ्रीक्वेंसी मैचिंग' पर मॉड्यूल को व्यवस्थित रूप से शामिल करना चाहिए, जिसमें आम लोगों, विशेषकर गरीबों, वृद्धों, किसानों और कमजोर वर्गों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के लिए विशेष व्यावहारिक अभ्यास शामिल हों।
(पैरा 5.5)
- इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि एलबीएसएनएए भारत के संविधान, संविधान सभा की बहसों और महत्वपूर्ण संसदीय और विधायी बहसों से लिए गए नियमित, मामले आधारित शिक्षण को संस्थागत बनाए, ताकि अधिकारियों की संवैधानिक मूल्यों की समझ और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को गहरा किया जा सके। समिति आगे सिफारिश करती है कि राजनीतिक प्रतिनिधियों, जिनमें सांसद भी शामिल हैं, को अधिकारी प्रशिक्षुओं के साथ प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है। विशेष रूप से, जिला और क्षेत्रीय प्रशिक्षण के दौरान, अधिकारी प्रशिक्षुओं को यथोचित नयाचार का अनुपालन करते हुए स्थानीय विधायक/सांसद के साथ औपचारिक रूप से संवाद करने और उनके दृष्टिकोण और विकासात्मक प्राथमिकताओं को समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ऐसे उपाय प्रशिक्षण अनुभव को समृद्ध करेंगे, संस्थागत अंतराल को पाटेंगे और नागरिक सेवा प्रशिक्षण को लोकतांत्रिक वास्तविकताओं के करीब लाएंगे।
(पैरा 5.7)
- समिति सिफारिश करती है कि सचिवालय प्रशिक्षण एवं प्रबंधन संस्थान (आईएसटीएम) पंच प्रणाली और भूमिका दृश्यावलोकन जैसे नवाचारों के प्रभाव का मापनीय परिणामों के साथ संकलन, प्रलेखन और समय-समय पर आकलन करे। ऐसे आकलन के आधार पर, इन दृष्टिकोणों को प्रासंगिक बुनियादी और सेवाकालीन पाठ्यक्रमों में व्यवस्थित रूप से मुख्यधारा में लाया जा सकता है ताकि अधिकारियों की क्षमता और उच्च जिम्मेदारियों के लिए तैयारी को मजबूत किया जा सके।
(पैरा 5.10)
- इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि एलबीएसएनएए, आईएसटीएम और सीबीसी के परामर्श से भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए), अपने विशेष ध्यान क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से परिभाषित और औपचारिक करे, जैसे कि उन्नत सार्वजनिक नीति, लोक प्रशासन में उन्नत पेशेवर कार्यक्रम (एपीपीपीए) जैसे पेशेवर कार्यक्रम, शहरी शासन, जलवायु-स्मार्ट शासन, और प्रयुक्त सार्वजनिक प्रशासन अनुसंधान, ताकि प्रशिक्षण क्षेत्रों में अनावश्यक अतिव्याप्ति को कम किया जा सके, मिशन कर्मयोगी के तहत विशिष्ट मूल्य संवर्धन और अधिक संस्थागत सामंजस्य सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 5.14)
- इसलिए समिति सिफारिश करती है कि क्षमता निर्माण आयोग सभी शेष राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में क्षमता निर्माण पहलों के विस्तार को प्राथमिकता दे, विशेष रूप से बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और उत्तरी-पूर्वी राज्यों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, जो अभी तक पूरी तरह शामिल नहीं हैं। समिति आगे सिफारिश करती है कि शहरी स्थानीय निकायों और पंचायतों से संबंधित पायलट पहल को चरणबद्ध लेकिन समयबद्ध तरीके से बढ़ाया जाए, यह सुनिश्चित करते हुए कि क्षमता निर्माण ढांचे राज्यों में समान रूप से लागू हों, जिसमें छोटे नगर निकाय और ग्रामीण स्थानीय निकाय भी शामिल हों। सीबीसी एक स्पष्ट अखिल भारतीय रूपरेखा तैयार कर सकता है जिसमें परिभाषित समयसीमा, प्राथमिक क्षेत्र और मापनीय उपलब्धियां हों, ताकि मिशन कर्मयोगी के अंतर्गत पूरे देश में इसकी व्याप्ति और जमीनी स्तर की शासन प्रणाली को व्यवस्थित रूप से मजबूत किया जा सके।
(पैरा 5.18)
- इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि क्षमता निर्माण आयोग आईगोट के माध्यम से संचालित प्रमुख प्रशिक्षण कार्यक्रमों की तुलना भौतिक, प्रत्यक्ष (इन-पर्सन) प्रशिक्षण माध्यमों से आयोजित कार्यक्रमों के साथ करते हुए एक संरचित प्रभाव मूल्यांकन करे, ताकि क्षमता सुधार और कार्यस्थल परिणामों में उनकी पारस्परिक प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जा सके। अध्ययन में कार्यात्मक दक्षता, व्यवहारिक क्षमताओं, निर्णय लेने की गुणवत्ता, नागरिक संतुष्टि, और सेवा वितरण समयसीमा से संबंधित मापनीय संकेतकों को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसे आकलनों के निष्कर्षों का आयोग द्वारा समय-समय पर विश्लेषण किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्षमता निर्माण प्रयास केवल संख्यात्मक पंजीकरण और पाठ्यक्रम पूर्णता आंकड़ों से परे दिखने योग्य अभिशासन परिणामों में परिवर्तित हों।
(पैरा 5.20)
सत्यनिष्ठा , सतर्कता, पारदर्शिता और सेवा संबंधी मामले
- समिति नोट करती है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) में प्रत्यक्ष भर्ती कोटा के तहत रिक्तियों का एक प्रमुख कारण यह है कि यूपीएससी और एसएससी द्वारा अनुशंसित कुछ उम्मीदवार अंततः संगठन में शामिल नहीं होते, जिससे निरंतर कमी रहती है। समिति के दृष्टिकोण में, ऐसी टाली जा सकने वाली रिक्तियों को फैलने और संचालनात्मक दक्षता को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि भर्तिकर्ता एजेंसियों से परामर्श करके रिज़र्व पैनल/वेटलिस्ट बनाए रखने की एक प्रणाली को संस्थागत किया जाए ताकि इस स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरा जा सके बिना नई भर्ती प्रक्रिया शुरू किए।
(पैरा 6.3)
- समिति यह सिफारिश करती है कि उप-निरीक्षक (एसआई) कैडर में कर्मचारियों की घटती संख्या के कारणों की जांच के लिए इसकी मूल वजह का एक विस्तृत विश्लेषण किया जाए, जिसमें कार्यभार, करियर प्रगति, कार्य परिस्थितियाँ, स्थानांतरण, प्रशिक्षण और अंतर-संस्थागत गतिशीलता से संबंधित मुद्दों को शामिल किया जाए। ऐसे विश्लेषण के आधार पर, प्रतिधारण और मनोबल बढ़ाने के लिए उचित सुधारात्मक उपाय लागू किए जा सकते हैं।
(पैरा 6.5)
- हालांकि, समिति यह समुक्ति करती है कि 122वें, 126वें और 145वें प्रतिवेदनों में की गई इसकीपूर्व सिफारिशों के मुख्य मुद्दे, जैसे, संयोजित मामले की सांख्यिकी का संरचित और व्यवस्थित सार्वजनिक प्रकटीकरण और सीबीआई की वार्षिक रिपोर्ट का सार्वजनिक क्षेत्र में प्रकाशन, पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया है। जबकि चयनित अपडेट वेबसाइट पर पोस्ट किए जाते हैं, ये व्यापक, आवधिक सांख्यिकीय प्रकटीकरण का विकल्प नहीं हैं जो लंबित मामलों, निपटान दरों, दोषसिद्धि दरों और श्रेणीवार मामले की स्थिति की अर्थपूर्ण सार्वजनिक समझ को सक्षम बनाते।
(पैरा 6.8)
- संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करने के प्रयास में, समिति अपनी पूर्व सिफारिश को दोहराती है कि सीबीआई को अपनी वार्षिक रिपोर्ट को सार्वजनिक करनाचाहिए, जिसमें संवेदनशील या वर्गीकृत जानकारी के लिए उचित सुरक्षा उपाय हों; और पंजीकरण, लंबित मामले, निपटान और सजाय दरों सहित एकीकृत और गैर-संवेदी मामले की सांख्यिकी के समय-समय पर प्रकाशन के लिए एक व्यापक ढांचा विकसित करना चाहिए। इसके अलावा, केंद्रीकृत केस प्रबंधन प्रणाली के सार्वजनिक इंटरफेस के लिए एक स्पष्ट समयरेखा निर्दिष्ट की जानी चाहिए।
(पैरा 6.9)
- समिति का मानना है कि सीबीआई मामलों पर विचार करने वाले विशेष न्यायालयों को समय पर न्याय-निर्णयन और प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने के लिए स्थिरता और न्यायिक निरंतरता की आवश्यकता होती है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि विभाग संबंधित उच्च न्यायालयों से परामर्श करके, सीबीआई-नामित न्यायालयों में नियुक्त न्यायिक अधिकारियों के लिए उचित और निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित करने की संभावना का पता लगाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि कनिष्ठ और मध्य स्तर के न्यायाधीशों को ऐसे न्यायालयों में पर्याप्त अवधि के लिए तैनात किया जाए ताकि उनके अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता की निरंतरता और विकास को सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 6.11)
- समिति अनुशंसा करती है कि सीबीआई गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ मिलकर विशेष तौर पर क्षेत्रीय भाषाओं में और वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपलब्ध प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाए जिनमें यह स्पष्ट किया जाए कि ब्यूरो न तो धनराशि की मांग करता है और न ही डिजिटल चैनलों के ज़रिए जांच करता है। इसके अतिरिक्त, समिति यह भी अनुशंसा करती है कि संदिग्ध धोखाधड़ी वाले लेन-देन पर तत्काल रोक लगाने के लिए बैंकों और डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म के सहयोग से तेज़ी से प्रतिक्रिया वाली प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए। इसके अलावा, समिति सरकारी अधिकारियों की नकल करने वाले संगठित साइबर फ्रॉड नेटवर्क को खत्म करने के लिए एजेंसी के बीच तालमेल बढ़ाने और डिजिटल फोरेंसिक और क्रिप्टो करेंसी से जुड़े अपराधों सहित उभरते हुए साइबर अपराध क्षेत्रों में जांच अधिकारियों की क्षमता को लगातार स्तरोन्नत करने की आवश्यकता पर भी बल देती है।
(पैरा 6.13)
- समिति ने नोट किया है कि अभियोजन की स्वीकृति प्रदान करने में विलंब होता है और समिति सिफारिश करती है कि आयोग, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेईटी) के साथ समन्वय से केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) प्रस्तावित सेंट्रलाइज़्ड डिजिटल केस रिपॉजिटरी संबंधी अद्यतन स्थिति से अवगत कराए। समिति को डिजिलॉकर या किसी अन्य डिजिटल रिपॉजिटरी प्रणाली के साथ समेकन के बारे में मेईटी के साथ परामर्श की मौजूदा स्थिति से अवगत कराया जाए। इसके अतिरिक्त, समिति की यह अपेक्षा है कि अभियोजन की स्वीकृति प्रदान करने संबंधी मामलों का तेज़ी से और पारदर्शी तरीके से निपटान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग और रिपॉजिटरी प्रणाली को पूर्ण तौर पर कार्यात्मक करने के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा के बारे में सूचित किया जाए।
(पैरा 6.17)
- समिति की यह अनुशंसा है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) अपने निगरानी और समीक्षा कार्यों का निर्वहन करते हुए अपने पास उपलब्ध और विभागों/मंत्रालयों से प्राप्त सूचना के आधार पर विगत तीन वर्षों के चरण-वार समेकित डेटा प्रस्तुत करे जिसमें जिसमें सतर्कता प्रक्रियाओं, जांच, आयोग को संदर्भित करने, परामर्श पर विचार किए जाने और अंतिम आदेश जारी किए जाने के मुख्य चरणों में लगने वाले औसत समय का उल्लेख किया गया हो। आयोग सतर्कता नियमावली में नियत समय – सीमा से अधिक समय तक लंबित और आयोग की समीक्षा या परामर्शी हस्तक्षेप के चरणों का भी उल्लेख करे। ऐसे डेटा से सतर्कता प्रशासन की प्रवृतियों और प्रणालीगत विलंब को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
(पैरा 6.21)
- समिति को यह जानकार प्रसन्नता है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग ने अपने परामर्श की प्राप्ति, निपटान और कार्यान्वयन की निगरानी के लिए सतर्कता मामले प्रबंधन प्रणाली (वीसीएमएस) विकसित की है। समिति यह अनुशंसा करती है कि वीसीएमएस को जांच, आयोग के परामर्श और अंतिम निपटान सहित विभागीय स्तर पर शिकायत और जांच के चरण के मामलों की समग्र चरण-वार ट्रैकिंग और सतर्कता नियमावली में नियत समय-सीमाओं से ज्यादा समय तक लंबित मामलों की ऑटो फ्लैगिंग को निगमित करने का भी अधिकार प्रदान किया जाए। मंत्रालयों और संगठनों में बार-बार उत्पन्न होने वाली बाधाओं को अभिनिर्धारण करने के लिए प्रणाली से आवधिक विश्लेषण रिपोर्ट तैयार की जाए। ऐसी संवर्धित निगरानी से प्रणालीगत विलंब की पूर्व में ही पहचान करने और सतर्कता नियमावली में नियत समय-सीमाओं की तत्काल अनुपालना सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी।
(पैरा 6.22)
- समिति यह अनुशंसा करती है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग संबंधित मंत्रालयों और विनियामक प्राधिकरणों के परामर्श से इन अंतरों की सुव्यवस्थित समीक्षा करे और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों और उनकी आनुषंगिक ईकाईयों में सतर्कता संरचनाओं में वृहत्त एकरुपता के संवर्धन के लिए समुचित परामर्श जारी करे। संयुक्त उपक्रमों/ विशिष्ट प्रयोजन के लिए गठित संस्थाओं और आनुषंगिक ईकाईयों में सुव्यवस्थित सतर्कता ढ़ांचा सुनिश्चित करने, सेवानिवृत्त कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई के संबंध में सामंजस्य स्थापित करने और समग्र मामलों में सेवा विनियमों के मानकीकरण के लिए विशिष्ट ध्यान दिया जाए ताकि सतर्कता प्रशासन में निरंनतरता और प्रभावशीलता का सुदृढ़ीकरण किया जा सके।
(पैरा 6.24)
- समिति को उन न्यायिक और प्रक्रियागत दिक्कतों की जानकारी है जो केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) कतिपय लंबे समय से लंबित मामलों के निपटारे को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, दस साल से ज़्यादा समय तक मामलों का लंबित रहना गंभीर चिंता का विषय है और इस पर पहले ध्यान देने की ज़रूरत है। इसलिए, समिति यह अनुशंसा करती है कि अधिकरण ऐसे मामलों के लिए एक ऐसी सुव्यवस्थित और समय-समय पर समीक्षा करने का तरीका अपनाए, जिसमें मौजूदा कानूनी संरचना के अंदर यथासंभव संकेन्द्रित सूचीबद्धता और सही समय पर निपटान की रणनीति हो। ज़रूरत के हिसाब से विशेष अभियान जारी रह सकते हैं, लेकिन दस साल से ज़्यादा समय से लंबित मामलों की निगरानी को अध्यक्ष के स्तर पर नियमित समीक्षा के ज़रिए सांस्थानिक बनाया जा सकता है ताकि लंबित मामलों में लगातार कमी आए और भविष्य में इतने पुराने मामलों के संग्रहण पर रोक लगाई जा सके।
(पैरा 6.28)
- समिति इस बात की सराहना करती है कि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) की सभी बेंचों में चरणबद्ध तरीके से न्यायिक अभिलेखों के डिजिटलीकरण और स्केनिंग का कार्य किया जा रहा है और मुख्य बेंच में दस्तावेज प्रबंधन प्रणाली (डीएमएस) के कार्यान्वयन के लिए जुलाई, 2025 का समय अस्थायी तौर पर निर्धारित करने के साथ ही दिसम्बर, 2025 तक सभी बेंचों में इसके विस्तार का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। समिति कागजरहित और डिजिटल न्यायिक प्रणाली के कार्यान्यवन में हुई प्रगति की सराहना करती है। इस संबंध में, समिति को बेंचों में डिजिटलीकरण की पूर्णता, डीएमएस के कार्यान्वयन (ई-कोर्ट/स्मार्ट कोर्ट संघटक) की वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करने के साथ ही यह भी बताया जाए कि क्या लक्षित समय-सीमाओं की अनुपालना की गई है अथवा नहीं। समिति को मामला प्रबंधन प्रभावशीलता के संबंध में उन्नत मामला सूचना प्रणाली के कार्यान्वयन के प्रभाव, यदि कोई हो, और अब तक निपटान दरों के बारे में भी सूचित किया जाए।
(पैरा 6.29)
- जबकि समाप्त माने गए पदों की आंशिक बहाली के अनुमोदन प्राप्त करने में हुई प्रगति की सराहना करते हुए समिति ने नोट किया कि केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में महत्वपूर्ण सहायक और प्रशासनिक कैडर में बड़ी संख्या में पद अभी भी रिक्त हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कुल संस्वीकृत 144 पदों में से केवल 65 पद भरे हुए हैं जबकि 79 रिक्तियां (जिनमें से 47 को समाप्त समझा गया है और 11 को संवर्गीकृत किया गया है) हैं, समिति अपनी पूर्व की अनुशंसा, कि इस मामले को अत्यधिक वरीयता के साथ उठाया, पर बल देती है।
(पैरा 6.33)
- समिति अनुशंसा करती है कि बहाल किए गए और संवर्गीकृत दोनों प्रकार के पदों को शीघ्र भरा जाना सुनिश्चित करने के लिए बहाल किए गए पदों के शेष प्रस्तावों पर शीघ्र निर्णय के लिए व्यय विभाग और डीओपीटी के संबंधित प्रभागों के साथ्र समन्वित प्रयासों में तेजी लाई जाए ताकि केंद्रीय सूचना आयोग की कार्यात्मक क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
(पैरा 6.34)
- वर्तमान कमियों की दूर करने के एक उपाय के तौर पर, समिति अनुशंसा करती है कि अपील और शिकायत निगरानी प्रणाली एपकॉम्स 2.0 को सुरक्षित अधिप्रमाणन प्रणालियों, शीघ्र सुनवाई और कालवर्जित मामलों के लिए समर्पित माड्यूल्स तथा संवर्धित अनुपालन मानीटरिंग विशिष्टताओं को निगमित करते हुए समयबद्ध तरीके से कार्यान्वित किया जाए। केंद्रीय सूचना आयोग आवधिक तौर पर निपटान दरों, लंबित मामलों में कमी लाने और प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप का प्रभावी और मापनीय दक्षता लाभ सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शिता के संबंध में स्तरोन्नत प्रणालियों के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकता है।
(पैरा 6.36)
- समिति ने यह नोट किया कि व्यय विभाग की सहमति से 70 नियमित पदों का सृजन करते हुए इन्हें सीएसएस, सीएसएसएस और सीएससीएस में संवर्गीकृत किया गया है जबकि कुछ पदों को केन्द्रीय स्टॉफिंग योजना के अंतर्गत भरे गए हैं। हालांकि, यह देखा गया है कि जांच निदेशक की नियुक्ति और अनुमोदित संगठनात्मक रुपरेखा के अनुसार जांच विंग के कर्मचारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया लोकपाल में जारी है। इसलिए, समिति की यह अपेक्षा है कि इसे मौजूदा जांच एजेंसियों के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करते हुए जांच निदेशक की नियुक्ति की वर्तमान स्थिति और जांच विंग को पूर्ण सांविधिक रुप में कार्यात्मक करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी प्रदान की जाए।
(पैरा 6.40)
- अभियोजन के संबंध में, समिति ने यह नोट किया कि लोकपाल की अभियोजन विंग का औपचारिक गठन दिनांक 06.06.2025 के आदेश के माध्यम से किया गया और इसे दिनांक 13.06.2025 को राजपत्र में अधिसूचित किया गया। इसके अतिरिक्त, समिति ने यह भी नोट किया कि वर्तमान में अभियोजन संबंधी मामलों को सीबीआई के माध्यम से किया जा रहा है, जिसका अपना अभियोजन तंत्र है। अभियोजन विंग के गठन को नोट करते हुए समिति की यह अपेक्षा है कि इसे अभियोजन विंग को कार्यान्वित करने की वर्तमान स्थिति और सांविधिक संरचना के अनुरूप इसे पूर्ण कार्यात्मक करने की प्रस्तावित रुपरेखा के बारे में जानकारी प्रदान की जाए।
(पैरा 6.41)
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 35 के अंतर्गत विशेष न्यायालय की अधिसूचना के संबंध में, समिति ने यह नोट किया कि मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष उठाया गया है और इस पर सक्रियता से कार्य किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, समिति ने यह भी नोट किया कि वर्तमान में लोकपाल की संस्वीकृति प्राप्त होने के उपरांत मामलों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत अधिसूचित विशेष न्यायाधीशों द्वारा सुना जा रहा है। समिति की यह अपेक्षा है कि इसे उच्च न्यायालय के साथ परामर्श की वर्तमान स्थिति और अधिनियम की धारा 35 कें अंतर्गत समर्पित विशेष न्यायालय की अधिसूचना की संभावित समय-सीमा के बारे में जानकारी प्रदान की जाए।
(पैरा 6.42)
- समिति अनुशंसा करती है कि लोकपाल सचिवालय की स्टॉफिंग स्थिति की शिकायतों और जांच कार्यकलापों की बढ़ती प्रवृत्तियों के आलोक में समीक्षा की जाए। मुख्य कार्यात्मक ओर सहायक प्रभागों में रिक्तियों को यथाशीघ्र भरा जाए और यह सुनिश्चित करने के लिए संबंधित प्राधिकरणों के साथ आवश्यक समन्वय स्थापित किया जाए कि लोकपाल को अपने सांविधिक कार्यों के प्रभावी और बाधारहित निर्वहन के लिए पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध कराई जाए।
(पैरा 6.48)
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आरकेके
(रिलीज़ आईडी: 2240725)
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