वित्त मंत्रालय
अस्थिर वैश्विक भू-राजनीति परिदृश्य के बावजूद भारत के मौद्रिक और वित्तीय क्षेत्र में उछाल: आर्थिक समीक्षा - 2025-26
भारत की मौद्रिक नीति, सामाजिक लक्ष्यों के साथ सूक्ष्म आर्थिक संतुलन, मूल्य स्थिरता और वित्तीय मजबूती को बरकरार रखते हुए समावेशी विकास को दे रही बढ़ावा
आरबीआई का प्रबंधन बैंकिंग क्षेत्र में पर्याप्त तरलता सुनिश्चित कर रहा है, आर्थिक उत्पादकता आवश्यकताओं को पूरा भी कर रहा है
प्रविष्टि तिथि:
29 JAN 2026 2:18PM by PIB Delhi
केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने आज संसद में आर्थिक समीक्षा 2025-26 पेश करते हुए कहा कि वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और तेजी से बदलते तकनीकी नवप्रवर्तन के दौर में भारत के मौदिक और वित्तीय क्षेत्र में वित्त वर्ष 26 (अप्रैल से दिसंबर 2025) में जोरदार प्रदर्शन किया है। यह रणनीतिक नीतिगत कार्रवाई और समस्त वित्तीय माध्यमों की ढांचागत मजबूती से संभव हुआ है।
आर्थिक समीक्षा में उल्लेख किया गया कि अनिश्चतता से भरे इस दौर की चुनौतियों के समाधान के लिए नियामक नवाचार, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व महत्वपूर्ण हैं। समीक्षा में आगे कहा गया कि घरेलू वित्त के लिए नए और समावेशी माध्यम आवश्यक हैं, क्योंकि ये वैश्विक वित्त की अस्थिरता से बचाव का कार्य करते हैं।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारत का वित्तीय नियामक ढांचा मई 2025 में जारी आरबीआई के ऐतिहासिक नियामकों को स्पष्ट मान्यता देता है। यह फ्रेमवर्क एक पारदर्शी, परामर्शी और प्रभाव केंद्रित मौदिक प्रबंधन नियमन को संस्थागत करता है।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार भारत का मौद्रिक प्रबंधन सामाजिक लक्ष्यों के साथ सूक्ष्म आर्थिक उद्देश्यों को संतुलित करता है। वित्तीय क्षेत्र नियमन की गुणवत्ता, आर्थिक सुदृढ़ता और सतत विकास के महत्वपूर्ण पहलू के रूप में उभरी है। दस्तावेज के अनुसार मूल्य स्थिरता बरकरार रखते हुए, वित्तीय स्थिरता को समर्थन और समावेशी विकास को बढ़ावा देते हुए मौद्रिक नीति देश के सतत विकास और आर्थिक समृद्धि के मुख्य पहलू के रूप में कार्य कर रही है।
आर्थिक समीक्षा के मुताबिक मुद्रास्फीति में नरमी को देखते हुए रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर में कमी और नकद जमा अनुपात (सीपीआर) कमी कर ओपन मार्केट ऑपरेशंस (ओएमओ) के जरिए तरलता सुनिश्चित की गईं। इन कटौतियों का उद्देश्य साख प्रवाह, निवेश और संपूर्ण आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना रहा। इसके अतिरिक्त, इन उपायों को प्रभावी रूप से ऋण दरों पर लागू किया। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की भारित औसत ऋण दरों में गिरावट के साथ, जो मौदिक नीति की वास्तिवक विस्तारवादी पक्ष को दर्शाता है।
वित्तवर्ष 2026 में आरबीआई तरलता प्रबंधन के जरिए बैंकिंग क्षेत्र में पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करता रहा। इस पहल ने आर्थिक उत्पादकता आवश्यकताओं के अनुरूप मुद्रा और क्रेडिट मार्केट को प्रभावी बनाए रखा। पर्याप्त तरलता के बीच अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के ऋण और जमा दर में गतिशीलता जारी रही।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार मुद्रा विकास के सकारात्मक रुख- एक वर्ष में 9 प्रतिशत से 12 प्रतिशत की वृद्धि से संकेत मिलता है कि बैंक प्रभावी तरीके से सीआरआर कटौती से तरल प्रबंधन में सफल रहे हैं। साथ ही आरबीआई के ओएमओ खरीद से वित्त वर्ष 2026 ( 8 जनवरी 2026) तक तरल समायोजन सुविधा के तहत मापित 1.89 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस प्रदर्शन रहा।
आर्थिक समीक्षा में इस बात पर बल दिया गया कि वित्तीय क्षेत्र के नियमन को लागू करने के लिए आरबीआई के अंतर्गत एक समर्पित नियामक समीक्षा सेल होना चाहिए। यह सेल प्रत्येक 5 से 7 वर्ष में सभी नियमनों की नियमित जांच करेगा। भारत में प्रतिक्रियाशील विनियमन के स्थान पर अबसक्रिय और पूर्व-अनुमानित शासन की ओर एक 'प्रतिमान बदलाव' (paradigm shift) आया है, जो बाजार की बदलती परिस्थितियों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप गतिशील रूप से प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।
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एनबी/एमजी/केसी/हिन्दी इकाई -8
(रिलीज़ आईडी: 2219974)
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