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अंतरिक्ष विभाग02-जनवरी, 2015 15:37 IST

2014- अंतरिक्ष विभाग के लिए सफलता का वर्ष

वर्षांत समीक्षा-2014

वर्षांत समीक्षा-2014

अंतरिक्ष विभाग

 

अंतरिक्ष विभाग ने 2014 के दौरान भारत को उपलब्धियों की सीढ़ी पर चढ़ाने के प्रयासों में कई सफलताएं हासिल की है।

भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-डी5) का सफल प्रक्षेपण

देश में निर्मित क्रायोजेनिक इंजन वाले भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी-डी5) का 5 जनवरी 2014 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी), श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण किया गया। जीएसएलवी-डी5 द्वारा निर्धारित भूस्थिर परिवर्तनीय कक्षा में 1982 किलोग्राम वज़न का जीसेट-14 स्‍थापित किया गया।

भारतीय नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस-1बी का सफल प्रक्षेपण, भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) में दूसरा उपग्रह

सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से 04 अप्रैल 2014 को पीएसएलवी-सी24 के जरिए भारतीय नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस-1बी, भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) में दूसरा उपग्रह और 16 अक्‍टूबर 2014 को पीएसएलवी-सी26 के जरिए आईआरएनएसएस-1सी, आईआरएनएसएस का तीसरा उपग्रह, का सफल प्रक्षेपण किया गया।

सार्क उपग्रह

भारत ने 30 जून 2014 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी-सी23 के जरिए 5 विदेशी उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया गया। ये विदेशी उपग्रह – (1) एसपीओटी-7 (फ्रांस), (2) एआईएसएटी (जर्मनी), (3) एनएलएस 7.1/सीएएन-एक्‍स4 (कनाडा), (4) एनएलएस 7.2/सीएएन-एक्‍स5 (कनाडा) और (5) वीईएलओएक्‍स-1 (सिंगापुर) हैं।

अब तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने विदेशी उपभोक्‍ता और इसरो के व्‍यावसायिक निकाय, एंट्रिक्‍स कॉरपोरेशन लिमिटेड के बीच अनुबंध के तहत व्‍यावसायिक आधार पर 19 देशों के 40 उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं। इन उपग्रहों के प्रक्षेपण से 50.47 मिलियन यूरो और 17.17 मिलियन अमेरिकी डॉलर अर्जित किए गए हैं।

भविष्‍य की परियोजनाओं में उन्‍नत प्रक्षेपण यान प्रणाली का विकास, बेहतर समाधान के साथ पृथ्‍वी के मनचित्र सबंधी अवलोकन उपग्रह, बेहतर रिजोल्यूशन, उच्‍च शक्ति और उच्‍च प्रवाह क्षमता वाले संचार उपग्रह, माइक्रोवेव मल्‍टीस्‍पेक्‍ट्रल रिमोट संवेदी उपग्रह, मौसम और जलवायु अध्‍ययन, क्षेत्रीय नौवहन के लिए उपग्रहों का तारामंडल, मानव अंतरिक्ष विमान के लिए महत्‍वपूर्ण तकनीकियों का विकास और अंतरिक्ष विज्ञान तथा सौरमंडलीय परीक्षण के लिए उपग्रह विकसित करना शामिल है।

प्रधानमंत्री ने 30 जून 2014 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा में अपने संबोधन में भारतीय अंतरिक्ष समुदाय से एक ऐसे सार्क उपग्रह को विकसित करने के लिए कहा जो हमारे सभी पड़ोसियों को हर प्रकार की सुविधाएं और सेवाएं प्रदान करे। भारत सरकार के जरिए इसरो द्वारा सार्क देशों के साथ विचार-विमर्श कर सार्क उपग्रह विकास कार्यक्रम के लिए प्रस्‍ताव तैयार करने की आवश्‍यकता है जो सार्क देशों की अंतरिक्ष एप्लीकेशनों और सेवाओं की आवश्यकताओं का समाधान करे। 

मंगल उपग्रह अंतरिक्षयान को मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया गया

24 सितंबर 2014 की सुबह भारत के मंगलयान को 8 छोटे लिक्‍वि‍ड इंजनों के साथ 440 न्‍यूट्रॉन लिक्विड एपोगी मोटर (एलएएम) द्वारा मंगल ग्रह के कक्ष में स्‍थापित किया गया। भारतीय मानक समय के अनुसार 07:17:32 बजे शुरू हुआ लिक्विड इंजन प्रक्षेपण 1388.67 सेकेंड तक चला और जिससे यान का वेग 1099 मीटर प्रति सेकेंट तक हो गया। इस परिचालन के साथ ही यान मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी इस महत्‍वपूर्ण आयोजन के साक्षी बनने के लिए बेंगलोर में इसरो के टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) में उपस्थित थे। आईएसटीआरएसी में उपस्थित अन्‍य गणमान्यों में कर्नाटक के राज्‍यपाल श्री वजुभाई आर वाला, रेल मंत्री श्री डी.वी. सदानंद गौड़ा, रासायन और उर्वक मंत्री श्री अनंत कुमार, कर्नाटक के मुख्‍य मंत्री श्री सिद्दारमैया, अंतरिक्ष राज्‍य मंत्री डॉ. जीतेंद्र सिंह, नागरिक उड्डयन राज्‍य मंत्री श्री जी.एम. सिद्देश्‍वरा, संसद सदस्‍य श्री प्रह़लाद वी जोशी, कर्नाटक सरकार में परिवहन मंत्री श्री रामलिंगा रेड्डी और कर्नाटक विधान सभा के सदस्‍य श्री मुनिराजू एस., इसरो के पूर्व अध्‍यक्ष प्रोफेसर यू.आर. राव, और अंतरि‍क्ष अनुप्रयोग केंद्र के पूर्व निदेशक प्रोफेसर यशपाल शामिल थे।

मंगल की कक्षा में यान भेजने की प्रक्रिया संतोष जनक रूप से पूर्ण हुई और मंगल यान सामान्‍य रूप से कार्य कर रहा था। यह यान अब मंगल की कक्षा में मंगल ग्रह की परिक्रमा कर रहा है जिसकी मंगल न्यूनतम दूरी (पेरीएप्‍सीस) 421.7 किलोमीटर पर और अधिक्तम दूरी (एपोएप्‍सीस) 76993.6 किलोमीटर है। मंगल की भूमध्‍य रेखा के संदर्भ में कक्ष का झुकाव 150 डिग्री है। इस कक्ष में यान को मंगल ग्रह का एक चक्‍कर लगाने में 72 घंटे 51 मिनट, 51 सेकेंड लगते हैं।

5 नवंबर 2013 को मंगल यान को देश के प्रक्षेपण यान पीएसएलवी के जरिए पृथ्‍वी के कक्षा में स्थापित किया गया था। 1 दिसंबर 2013 को ट्रांस मार्स इंजेक्शन (टीएमआई) के बाद यान पृथ्‍वी के कक्षा से बाहर निकल कर 24 सितंबर 2014 को मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश के लिए पथ पर भेजा गया।

मंगल यान के मंगल ग्रह पर भेजने के सफल अभियान से इसरो चौथी ऐसी अंतरिक्ष एजेंसी बन गई है जिसने सफलतापूर्वक यान मंगल की कक्षा में भेजा है। आगामी हफ्तों में मंगल यान में गहन परीक्षण किया जाएगा और अपने 5 वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग करते हुए यह यान मंगल ग्रह का क्रमबद्ध अवलोकन शुरू कर देगा।

भारत का तीसरा नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस-1सी का पीएसएलवी-सी26 के जरिए सफल प्रक्षेपण

इसरो के ध्रुवीय उपग्रह पक्षेपण यान, पीएसएलवी-सी26 के जरिए 16 अक्‍टूबर 2014 को भारतीय मानक समय के अनुसार 0132 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) में तीसरा उपग्रह, आईआरएनएसएस-1सी का सफल प्रक्षेपण किया गया। यह पीएसएलवी का लगातार 27वां सफल अभियान था। इस अभियान के लिए पीएसएलवी के 'एक्‍सएल' कॉन्फिगरेशन का इस्‍तेमाल किया गया था। इससे पहले यान के इसी कॉन्फिगरेशन का 6 बार सफल उपयोग किया गया था।

अंतरिक्ष राज्‍य मंत्री डॉ. जीतेंद्र सिंह ने एसडीएससी, श्रीहरिकोटा के अभियान नियंत्रण केंद्र से प्रक्षेपण को देखा था।

पहले चरण में इग्निशन के साथ पीएसएलवी-सी26 को छोड़े जाने के बाद योजना के अनुसार स्‍टेज एंड स्‍ट्रेप ऑन इंग्निशन, हीट-शील्‍ड सेपरेशन, स्‍टेज एंड स्‍ट्रेप-ऑन सेपरेशंस और उपग्रह प्रक्षेपण जैसे महत्‍वपूर्ण प्रक्षेपण चरण सफलता पूर्वक पूरे किए गए। करीब 20 मिनट 18 सेकेंड की उड़ान के बाद 1425 किलोग्राम वज़न के आईआरएनएसएस-1सी उपग्रह को 282.56 किलोमीटर X 20670 किलोमीटर के अंडाकार कक्ष में स्‍थापित किया गया था जो लक्ष्‍य से बहुत करीब था।

प्रक्षेपण के बाद आईआरएनएसएस-1सी के सौर पैनल स्‍वत: ही कार्य करने लगे थे। इसरो के प्रमुख नियंत्रण कक्ष (हासन, कर्नाटक में) ने उपग्रह पर नियंत्रण कर लिया। आने वाले दिनों में 83 डिग्री पूर्व देशांतर पर भू-स्थिर कक्ष में उपग्रह को स्‍थापित करने के लिए प्रमुख नियंत्रण कक्ष से चार अभियान संचालित किए जाएंगे।

आईआरएनएसएस-1सी भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली के अंतरिक्ष सेगमेंट के लिए बने 7 उपग्रह में से तीसरा है। 02 जुलाई 2013 और 04 अप्रैल 2014 को क्रमश: आईआरएनएसएस-1ए और आईआरएनएसएस-1बी, तारा मंडल के पहले दो उपग्रहों को पीएसएलवी द्वारा सफलता पूर्वक प्रक्षेपित किया गया था। आईआरएनएसएस-1ए और 1-बी दोनों ही अपने निर्धारित भू-स्थिर कक्ष से संतोषजनक कार्य कर रहे हैं।

स्‍वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली के आईआरएनएसएस को भारतीय क्षेत्र में स्थिति और भारतीय महाद्वीप के आसपास 1,500 किलोमीटर की जानकारी देने के लिए किया गया था डिजाईन किया गया था। आईआरएनएसएस दो प्रकार की सेवाएं देगा। इनमें सभी उपयोगकर्ताओं के लिए स्‍टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विसेज (एसपीएस) और अधिकृत उपभोगियों के लिए सीमित सेवाएं (आरएस) प्रदान की जाएंगी।

नौवहन मानकों, उपग्रह नियंत्रण, उपग्रह की सीमा और निगरानी आदि के लिए प्रणाली तैयार करने और ट्रांसमिशन की जिम्‍मेदारी कई ग्राउंड स्‍टेशनों की है जिन्‍हें देश में 15 स्‍थानों पर स्‍थापित किया गया है।

आने वाले म‍हीनों में इस तारा मंडल का अगला उपग्रह आईआरएनएएस-1डी पीएसएलवी के जरिए प्रक्षेपित किया जाएगा। वर्ष 2015 तक आईआरएनएसएस तारा मंडल के सभी 7 उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की योजना है।

इसरों की अन्‍य उपलब्धियां

अंतरिक्ष प्रक्षेपण के क्षेत्र में इसरों के कौशल को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की व्‍यावसायिक इकाई- एंट्रिक्‍स कारपोरेशन लिमिटेड (एंट्रिक्‍स) ने 1999 से अब तक इसरो के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) का उपयोग कर 19 देशों के विदेशी उपभोक्‍ताओं के 40 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया है। आने वाले वर्षों में 6 देशों के 16 उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए अनुबंध को अंतिम रूप दे दिया गया है।

इसरो ने अपनी व्‍यावसायिक इकाई एंट्रिक्‍स के जरिए एशिया के विकासशील देश, इंडोनेशिया के लिए पहले ही एक उपग्रह प्रक्षेपित किया है और इंडोनेशिया के ही 2 और उपग्रह प्रक्षेपित करने के लिए अनुबंध को अंतिम रूप दे दिया गया है। अफ्रीका के अल्‍जीरिया के लिए भी एक उपग्रह प्रक्षेपित किया गया था।

इसरो की व्‍यावसायिक इकाई एंट्रिक्‍स कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा शुरू की गई अंतरिक्ष परियोजनाओं में- (1) भारतीय रिमोट संवेदी (आईआरएस) उपग्रह से आंकड़ें प्राप्‍त करने के साथ भारत के बाहर 20 स्‍थानों पर प्रक्रिया सुविधाओं के लिए ग्राउंड स्‍टेशनों की स्‍थापना, (2) यूरोपीय उपभोक्‍ताओं के लिए 2 समकालीन संचार उपग्रहों और भारतीय रणनीतिक उपभोगियों के लिए एक संचार उपग्रह का निर्माण, (3) विदेशी उपभोक्‍ताओं के 70 से अधिक विमान अभियानों के लिए खोज में सहायता उपलब्‍ध कराना, (4) दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण, डायरेक्‍ट टू होम (डीटीएच) सेवाओं और वीसेट अनुप्रयोगों के लिए भारतीय संचार उपग्रह से उपग्रह ट्रांसपोंडर क्षमता के प्रावधान, (5) इसरो के पीएसएलवी के जरिए 40 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण, (6) टेली-एजूकेशन, टेली-मेडिसीन, आपदा को कम करने और ग्राम संसाधन केंद्रों के लिए गाउंड टर्मिनल्‍स स्‍थापित करना और (7) घरेलू और विदेशी ग्राहकों के लिए परामर्श सेवाएं शामिल हैं।

इसरो के फेलोशिप कार्यक्रम

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अमेरिका में केलीफोर्निया प्रौद्योगिकी संस्‍थान (केलटेक) के एयरो स्‍पेस लैबरोट्रिज से स्‍नातक करने के लिए एक फेलोशिप कार्यक्रम शुरू किया गया है। यह फेलोशिप कार्यक्रम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्‍यक्ष डॉ. सतीश धवन के सम्‍मान में शुरू किया गया था। यह फेलोशिप, भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्‍थान, तिरुवनंतपुरम के एयरो स्‍पेस विभाग के एक स्‍नातक छात्र को केलटेक में एयरो स्‍पेस इंजीनियरिंग में स्‍नातकोत्‍तर करने के लिए अंतरिक्ष विभाग द्वारा प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है।

यह फेलोशिप कार्यक्रम अकादमिक वर्ष 2013-14 के शीत सत्र में शुरू किया गया था और एक छात्र ने इस फेलोशिप का लाभ उठाकर केलटेक से अपनी स्‍नातकोत्‍तर डिग्री हासिल कर ली है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और राष्‍ट्रीय एयरो नॉटिक्‍स एवं अंतरिक्ष प्रबंधन (नासा) पृथ्‍वी के अवलोकन के लिए दोहरी फ्रिक्‍वेंसी (एल एंड एस बैंड) के सिंथेटिक अपर्चर राडार मिशन पर एक साथ कार्य कर रहे हैं। दोनों एजेंसियों ने मंगल अभियान में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं को तलाशने के लिए 'इसरो-नासा मंगल कार्यकारी दल' गठित किया है।

भारत का अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान जीएसएलवी एमके-3 की सफल पहली प्रायोगिक उड़ान

18 दिसंबर 2014 को सुबह सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से छोड़ा गई भारत की अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान जीएसएलवी एमके-3 की पहली प्रायोगिक उड़ान (जीएसएलवी एमके-3 एक्‍स/सीएआरई) सफल रही। एलवीएम3-एक्‍स/सीएआरई के नाम से पहचाने जाने वाले इस उप कक्षीय प्रायोगिक मिशन का मकसद उड़ान के दौरान चुनौतीपूर्ण वातावरण में विमान के कार्य क्षमता का परीक्षण करना था, इसलिए इसे निष्क्रिय (नॉन फंक्‍शनल) उच्‍च क्रायोजनिक स्‍तर पर किया गया।

यह अभियान दूसरे प्रक्षेपण पैड से योजना के मुताबिक भारतीय मानक समय सुबह के 09.30 बजे जीएसएलवी एमके-3 के प्रक्षेपण के साथ शुरू हुआ और निर्धारित 126 किमी. की ऊंचाई पर करीब साढ़े पांच मिनट के बाद 3775 किलोग्राम के वज़न का क्रू मॉड्यूल एटमास्फियरिक रीइंट्री एक्‍सपेरिमेंट (सीएआरई) किया गया। इसके बाद सीएआरई को जीएसएलवी एमके-III के उच्‍च स्‍तर से अलग किया गया और दोबारा वातावरण में भेजा गया और इसके पैराशूट के मदद से करीब 20 मिनट 43 सेकेंड के लिफ्ट ऑफ के बाद बंगाल की खाड़ी में सुरक्षित उतारा गया।

207 टन के ठोस प्रोपेलंटों के साथ दो बड़े एस-200 ठोस स्‍ट्रैप ऑन बुस्‍टरों को यान के लिफ्ट ऑफ पर इग्‍नाईट किया गया और सामान्‍य कार्य करने के बाद 153.5 सेकेंड के बाद अलग किया गया। लिफ्ट ऑफ के 120 सेकेंड के बाद एल110 लिक्विड स्‍टेज को इग्‍नाईट किया गया जबकि एस-200 अभी भी कार्य कर रहे थे और इन्‍हें 204.6 सेकेंड के लिए आगे बढ़ाया गया। सीएआरई लिफ्ट ऑफ के 330.8 सेकेंड के बाद जीएसएलवी एमके-3 के निष्क्रिय सी25 क्रायोजनिक अपर स्‍टेज से अलग हुआ और वातावरण में दोबारा प्रवेश के लिए निर्देशित दिशा में बढ़ना शुरू किया।

सफल पुन: प्रवेश चरण के बाद सीएआरई मॉड्यूल के पैराशूट खुले और इसके बाद श्रीहरिकोटा से करीब 1600 किलोमीटर की दूरी पर अंडमान महासागर के ऊपर आराम से उतारे गए। और यहां पर जीएसएलवी एमके-3 एक्‍स/सीएआरई अभियान सफलता पूर्वक सम्‍पन्‍न हुआ।

जीएसएलवी एमके-III X /सीएआरई अभियान की सफलता के साथ ही क्रियाशील सी25 क्रायोजनिक अपर स्‍टेज के साथ यान अपनी पहली विकासशील उड़ान के एक कदम और नजदीक आ गया।

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वि.कासोटिया/.एम/एमके/एकेपी-34

 

 

(Release ID 32972)


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