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  • कारीगरों और बुनकरों की चिंता (14-अक्टूबर,2017)
  • पर्यटन पर्व: भारत की विविधता के अन्वेषण का एक विशेष अवसर (13-अक्टूबर,2017)
  • पर्यटन पर्वः सब देखो अपना देश (13-अक्टूबर,2017)
  • किसानों को खेती में प्रवृत्त रखने की चुनौती (12-अक्टूबर,2017)
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  • बेहतर जल प्रबंधन समय की जरूरत (05-अक्टूबर,2017)
  • गांधी जी के लिए अहिंसा स्‍वच्‍छता के समान थी (03-अक्टूबर,2017)
 
विशेष सेवा और सुविधाएँ

राष्‍ट्र को भोजन प्रदान करने के गौरवपूर्ण प्रयास
शेष लेख कृषि

 

शेष लेख

कृषि

डॉ. एस. अयप्‍पन

 

     भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद देश में सर्वोच्‍च वैज्ञानिक संगठन है, जिसके पास कृषि अनुसंधान और शिक्षा की योजना, संवर्धन, संचालन और समन्‍वय के लिए सुदृढ कृषि अनुसंधान सुविधाएं हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-आईसीएआर के अंतर्गत देशभर में 99 संस्‍थान, 65 कृषि विश्‍वविद्यालय और 631 कृषि विज्ञान केन्‍द्र हैं और यह विश्‍व में विशाल राष्‍ट्रीय कृषि अनुसंधान केन्‍द्रों में से एक है। आईसीएआर ने कृषि की विभिन्‍न प्रक्रियाओं के लिए महत्‍वपूर्ण प्रौद्योगिकीय ज्ञान दिया, जिससे हर प्रकार के अनाज, दालों, फलों और सब्जियों, मांस, दुग्‍ध, मछली और अण्‍डों का वर्ष 2011-12 के दौरान सर्वाधिक उत्‍पादन हुआ।

 

      बीते वर्ष में विभिन्‍न तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा जैसे डांवाडोल मानसून, देश के कुछ भागों में सूखे जैसी स्थिति और चक्रवाती तूफान, जिनसे कृषि उत्‍पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। देश के 374 जिलों के लिए तात्‍कालिक योजनाओं की दृष्टि से प्रौद्योगिकीय मदद तत्‍काल दी गयी । इसके तहत फसलों की लचीली किस्‍मों, एनआईसीआरए के तहत संपूर्ण प्रौद्योगिकीय साल्‍यूशन, कृषि में आपदा प्रबंधन, खेतों में मशीनीकरण के अनूठे प्रयास और माध्‍यमिक कृषि उद्यम शामिल हैं। भारत में महत्‍वपूर्ण अनुसंधानों में ओवुम-पिकअप आईवीएफ से अब तक के पहले बछड़े का जन्‍म और भ्रूण स्‍थानांतरण प्रौद्योगिकी के जरिए पहले मिथुन बछड़े का जन्‍म और पपीता, कसावा और शहतूत की फसलों में तीन जीवाणुओं के पैरासीटायज्‍स प्रवेश करके विशिष्‍ट जैविक नियंत्रण से पपीते से संबंधित बग का पूर्ण उन्‍मूलन शामिल है। परिषद में आईपीआर कल्‍चर में सिग्‍नलिंग को आंतरिक किए जाने से संबंधित एक दर्जन से ज्‍यादा पेटेंट मंजूर किए गए। परिषद किसानों के लिए उपयोगी प्रौद्योगिकियों के विकास में आगे बढ़ी और इनका मूल्‍यांकन तथा सुधार किया गया। समीक्षा और योजना प्रक्रिया के अंतर्गत इस वर्ष सभी पक्षों से परामर्श किया गया।

 

      देशभर में विशिष्‍ट तौर पर जलवायु अनुकूल कृषि के लिए व्‍यापक राष्‍ट्रीय पहल-एनआईसीआरए के अंतर्गत सौ अत्‍यंत प्रभावित जिलों में खेतों में जलवायु लचीली कृषि प्रक्रियाओं का प्रदर्शन किया जा रहा है। वर्ष 2011-12 के दौरान सूखे, गर्मी और सहनशक्ति की समाप्ति के लिए गेहूं के 15 हजार जर्मप्‍लास्‍म और चावल, मक्‍का, दालों जैसी अन्‍य फसलों के दो हजार जर्मप्‍लास्‍म की जांच की गयी। सूखा, गर्मी आदि प्रमुख जलवायु संबंधित तनाव हैं, जिनकी विभिन्‍न फसलों में पहचान की गयी। इनका इस्‍तेमाल अगले वर्ष के दौरान खेती में किया जाएगा। बड़ी संख्‍या में गांवों में अपनाए जाने के लिए सूखे और बाढ़ पर काबू पाने की तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इस वर्ष सूखे जैसी स्थिति के दौरान आईसीएआर ने अपने विस्‍तार केन्‍द्रों और राज्‍यों के कृषि विश्‍वविद्यालयों के जरिए क्षेत्रीय भाषाओं में कृषि संबंधित निर्देशों को समन्वित तौर पर तैयार किया और उनका प्रचार किया।

 

      दालों की उत्‍पादकता के अधिकतम दोहन के लिए प्रोद्योगिकी प्रदर्शन के राष्‍ट्र स्‍तरीय कार्यक्रम का आयोजन भारतीय दलहन अनुसंधान संस्‍थान, कानपुर के साथ मिलकर किया गया। इसके अलावा आंचलिक परियोजना निदेशालयों और 11 राज्‍यों के 137 कृषि विज्ञान केन्‍द्रों ने 2010-11 और 2011-12 के दौरान 6 हजार प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए। पांच प्रमुख फसलों मसूर की दाल और चने की दाल जैसी पांच प्रमुख फसलों के बारे में प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए गए। एक ऐसा मॉडल तैयार किया गया, जिसमें विभिन्‍न प्रौद्योगिकीय और विस्‍तार से संबंधित कारकों को मिलाया गया। इस प्रदर्शन कार्यक्रम की वजह से 40 प्रतिशत उपज में बढ़ोत्‍तरी हुई।

      वर्ष 2011-12 के दौरान अनाज बाजरा, तिलहन, दलहन और अन्‍य महत्‍वपूर्ण फसलों के लिए लगभग 95 हजार अग्रिम प्रदर्शन कार्यक्रम, उन्‍नत औजारों और खेती के काम आने वाले उपकरणों के लिए सात हजार, मवेशियों की किस्‍मों पर आठ हजार, संबंधित उद्यमों पर 8 सौ और लिंग विशिष्‍ट प्रौद्योगिकियों पर चार हजार प्रदर्शन कार्यक्रम आयोजित किए गए। आईसीएआर के संस्‍थानों और कृषि विश्‍वविद्यालयों में स्थित कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केन्‍द्रों के माध्‍यम से प्रौद्योगिकी उत्‍पाद, निदान सेवाओं और ज्ञान के लिए एक ही स्‍थान पर व्‍यवस्था विकसित की गयी। सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों के बल पर तीन सौ से अधिक किसान विकास केन्‍द्र अपने क्षेत्र में पंजीकृत मोबाइल फोन पर किसानों को सलाह दे रहे हैं। वर्ष के दौरान तात्‍कालिक कार्रवाई के लिए एक लाख 10 एसएमएस किए गए।

 

      मवेशियों की महामारी रिंडरपेस्‍ट को पूरे विश्‍व से समाप्‍त कर दिया गया है। इसमें आईसीएआर ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई और देशभर के मवेशियों के मालिकों को काफी आर्थिक फायदा हुआ है। पशुपालन, डेयरी और मत्‍स्‍यपालन विभाग के साथ परामर्श से परिषद ने रिंडरपेस्‍ट से वैश्विक आजादी की घोषणा पर राष्‍ट्रीय समारोह मनाया गया। रिंडरपेस्‍ट से वै‍श्विक आजादी की घोषणा में मदद करने वाले संयुक्‍त राष्‍ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने रोम में खाद्य एवं कृषि संगठन के 37 वें सम्‍मेलन में प्रस्‍ताव स्‍वीकार किया जिसमें 192 सदस्‍य देशों की मौजूदगी में इसे पहला पशु रोग माना गया जो पृथ्‍वी से समाप्‍त किया जा रहा है।

बहुमूल्‍य समुद्री ट्रोपिकल फिनफिश सिल्‍वर पोम्‍पेनो के कैप्टिव प्रजनन और लार्वा उत्‍पादन के अभियान को सफलतापूर्वक सम्पन्‍न किया गया। मध्‍यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कार्प कल्‍चर की अर्थव्‍यवस्‍था को बढ़ावा देने के लिए हंगेरियाई स्‍केल कार्प, रोप्‍सा स्‍कैली और फेलसोसोमोगी मिरर कार्प की परिष्‍कृत नस्‍ल तैयार की गई। अप्रैल में अगेती ग्रास कार्प तैयार करने में सफलता मिलने से ऑफ सीजन में बीज की उपलब्‍धता सुनिश्चित हो सकेगी। 13-15 पीपीटी की लवणीयता में हरियाणा के रोहतक में लवणीय भूजल के इस्‍तेमाल से क्षारीय मिट्टी में पैसिफिक श्रिम्‍फ (एल वन्‍नामेई) की कल्‍चर देश में अपनी तरह का पहला प्रयास है जिससे अवक्रमित मिट्टी का उपयोग एक्‍वाकल्‍चर के लिए किया जा सकेगा।

जैव प्रौद्योगिकी और जीनोमिक्‍स के क्षेत्र में, आईसीएएआर ने अंतर्राष्‍ट्रीय कन्‍सॉर्टियम के पार्टनर के रूप में चावल, आलू और टमाटर के जीनोम की डीकोडिंग में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। हाल ही में, भारत ने टमाटर के क्रोमोसोम 5 (टमाटर में कुल 12 क्रोमोसोम होते हैं) के जीन सम्‍पन्‍न क्षेत्र का अनुक्रम तैयार करने में योगदान दिया और अगली पीढ़ी की अनुक्रम (एनजीएस) प्रौद्योगिकी के जरिए अमाटर के समूचे जीनोम के 5 परत वाले कवरेज तैयार में समर्थन उपलब्‍ध कराया। 14 देशों के 300 से अधिक वैज्ञानिकों के समूह टोमेटो जीनोम कन्‍सॉर्टियम ने परिष्‍कृत टमाटर के जीनोम और इसके निकटस्‍थ जंगली रूप को डिकोडेड किया है।

आईसीएआर, राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों और बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के भारतीय वैज्ञानिकों के समूह ने अरहर के जीनोम को डिकोड किया है जो भारत की दूसरी सबसे महत्‍वपूर्ण दलहन फसल है। यह पहला प्‍लांट जीनोम अनुक्रम है जो पूरी तरह भारतीय संस्‍थानों के नेटवर्क के जरिए सम्‍पन्‍न हुआ है तथा यह अरहर में भावी संशोधनों के लिए बहुमूल्‍य स्रोत उपलब्‍ध कराएगा। जीनोम में कुल 47,004 प्रोटीन-कोडिंग जीन की पहचान की गई है जिनमें से 1,213 रोग प्रतिरोध के लिए हैं तथा 152 सूखा, गरमी और लवणीयता के प्रति सहनशील हैं।

डीएआरई को संघ की राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन के लिए उत्‍कृष्‍ट कार्य और सराहनीय उपलब्धियों के लिए प्रतिष्ठित इंन्दिरा गांधी राजभाषा पुरस्‍कार (2010-11) प्रदान किया गया। राजभाषा हिंदी के व्‍यापक एवं कारगर इस्‍तेमाल के परिणामस्‍वरूप हिंदी भाषी किसानों एवं अन्‍य हितधारकों के विशाल समुदाय तक कृषि अनुसंधान के लाभ पहुंचाने में मदद मिली। परिषद के पहले हिंदी अनुसंधान जर्नल कृषिका का विमोचन किया गया। यह अर्द्धवार्षिक पत्रिका है जिसमें कृषि और संबंधित विषयों में अनुसंधान और उनकी समीक्षा शामिल होती हैं।

ज्ञान प्रबंधन प्रयासों के तहत, ई-लर्न कृषि के तहत 350 से अधिक पाठृयक्रम विकसित किए गए हैं। इस पहल में कृषि, बागबानी, मत्‍स्‍यपालन, पशुरोग विज्ञान, डेयरी प्रौद्योगिकी, रेशम कीट पालन और कृषि अभियांत्रिकी में पूर्वस्‍नातक कार्यक्रम शामिल हैं। फसलों के लिए ऑनलाइन विशेषज्ञ प्रणाली के निर्माण के लिए ज्ञान प्रबंधसाधन एग्रीदक्ष विकसित किया गया है जिसमें ज्ञान मॉडल सृजन, ज्ञान अर्जन, समस्‍या की पहचान, ज्ञान की पुन: प्राप्ति, विशेषज्ञों से प्रश्‍न पूछें और प्रशासन शामिल हैं। पूर्वोत्‍तर के लिए कृषि में ज्ञान सूचना संग्रह (किरन) और चावल ज्ञान प्रबंधन पोर्टल प्रारंभ किए गए। आईसीएआर में राष्‍ट्रीय एग्रीकल्‍चर बायोइनफोर्मेटिक्‍स ग्रिड  राष्‍ट्रीय फैसिलिटी होगी जो देश में जैव प्रौद्योगिकय अनुसंधान को समर्थन देने के लिए कंप्‍यूटेशनल रूपरेखा उपलब्‍ध कराएगी।

देश-विदेश में प्रौद्योगिकी के वाणिज्‍यीकरण और परामर्श के लिए आईसीएआर के पास अब कॉर्पोरेट प्‍लेटफार्म एग्री-इननोवेट इंडिया लिमिटेड है। 2011-12 के दौरान 43 पेटेंट आवेदन किए गए और दो अंतर्राष्‍ट्रीय एवं नौ राष्‍ट्रीय पेटेंट किए गए। प्‍लांट वैरायटी जर्नल में 200 से अधिक किस्‍म पंजीकृत की गईं तथा संरक्षण के लिए मान्‍यता दी गई और 436 आवेदन किए गए। विकसित सॉफ्टवेयरों की सुरक्षा के लिए आईसीएआर संस्‍थाओं में 6 कॉपीराइट पंजीकृत किए गए। फसलों पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए कृषि संबंधी मौसम विश्‍लेषण के उद्देश्‍य से वेदर कुक साफ्टवेयर विकसित किया गया तथा पंजीकृत किया गया। भारतीय मसाला अनुसंधान संस्‍थान, कोझीकोड को आईआईएसआर ट्रेडमार्क प्रदान किया गया।

भारतीय कृषि के सामने चुनौतियों ऐसा अवसर उपलब्‍ध कराती हैं जिसके लिए अपरंपरागत दृष्टिकोण की जरूरत है। नए और एकीकृत दृष्टिकोण के जरिए कृषि-खाद्य-पोषण-स्‍वास्‍थ्‍य पर्यावरण-रोजगार और लैंगिक परिप्रेक्ष्‍य में पूरे प्रयास करने होंगे। आगामी वर्ष में ऐसे कार्यक्रमों, भागीदारियों और परियोजनाओं पर ध्‍यान देने का समय होगा जिनसे भारतीय किसानों को खुशहाल बनाया जा सके। एनएआरईएस परिवार और आईसीएआर का दल विजयी रणनीति के रूप में ज्‍यादा सहभागिता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है ताकि पुरूषों, महिलाओं और युवा वर्ग के व्‍यवसाय और आजीविका के लिए भारतीय कृषि में बदलाव ला सकें।

 

 

वि.कासोटिया/सतपाल/प्रदीप/दयाशंकर – 20

 



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