Press Information Bureau
Government of India
Vice President's Secretariat
13-November-2019 19:04 IST
The Vice President emphasises need to increase purchasing power of labourers and farmers for inclusive development

New legislative architecture being created for a transparent, sustainable, high growth inclusive economy Both capital and labour are important for wealth creation –VP Calls upon labour unions to prepare workers for Fourth Industrial Revolution Addresses the 100th Birth Anniversary of Shri Dattopanth Thengri

The Vice President, Shri M. Venkaiah Naidu said today that labourers and farmers contribute to economy not only through their hard work, but they also create demand in the economy as consumers. Therefore, it is necessary to increase their purchasing power to give a further fillip to the inclusive development.

Addressing the 100th Birth Anniversary function of Shri Dattopanth Thengri, in New Delhi today, Shri Naidu called for equal distribution of resources to create a stable and inclusive economy. Concentration of wealth in few hands leads to disbalance in economy and resentment in society, he said.

Highlighting that both capital and labour are important for wealth creation, the Vice President called for cooperation and harmony between the two. He also called for respecting every person who contributes to wealth creation, be it worker, manager or investor, as all of them have important roles the production chain.

Citing Mahatma Gandhi’s concept of Trusteeship, Shri Naidu said that wealth is not for individual luxury rather it is collectively owned by the community and should be used for the welfare of public.

On global economic changes, the Vice President said that in tandem with the global economy, we too are changing our economy. New legislative architecture is being created for a transparent, sustainable, efficient, high growth inclusive economy. Noting that India has the third largest pool of Start-ups, he said that new Start-up actors are emerging in our economy. He further said that we are witnessing constructive disruptions in the economy.

Calling Shri Dattopant Thengadi as a great intellectual and Karmyogi, Shri Naidu lauded that he built the most powerful nationalist trade union in the country. “It is remarkable that he never gave a call for bandh and also never made the trade union indulge in violence”, he said.

Talking of Fourth Industrial Revolution, the Vice President called upon the trade unions to prepare the workers and farmers for this new challenge. “Institutions like Bhartiya Mazdoor Sangh and Bhartiya Kisan Sangh should spread awareness about various Government programs and should train the workers and farmers in new technologies”, he said.

Calling Shri Thengdi an inspirational person, Shri Naidu said that for him, nationalism was about taking views of all sections and their interests. “He never believed in class hatred and class wars and rendered the very notion of class itself as irrelevant”, he said.

Lauding various organisations created by Shri Dattopanth Thengri such as – Akhil Bhartiya Grahak Panchayat, Bhartiya Adhivakta Sangh and Sanskar Bharti, the Vice President said that democracy should not merely remain limited to casting of votes, rather people should be actively involved in national affairs. Such organizations help in giving constructive voice to people’s aspirations, he added.

Prof. Om Prakash Kohli, former Governor of Gujarat & President, Shri Dattopant Thengadi Janm Shatabdi Samaroh Samiti, Shri Dattatreya Hosabale, Joint General Secretary, Rashtriya Swayamsewak Sangh, Shri Badri Narayan, General Secretary, Bharatiya Kisan Sangh, Shri C.K. Saji Narayanan, President, Bhartiya Mazdoor Sangh and Shri Satish, Organizing Secretary, Swadeshi Jagran Manch were among the dignitaries present on the occasion.


Following is the full text of speech -

“आज स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित इस समारोह में आप सभी विद्वत महानुभावों के बीच आने का सुयोग प्राप्त होने पर आप सभी के प्रति विनम्र आभार व्यक्त करता हूं।

इस अवसर पर श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी के सरल व्यक्तित्व और अनुकरणीय कृतित्व को प्रणाम करता हूं।

Dattopant Thengadi ji was a rishi, a great intellectual who had a remarkable grasp of the history and economics, sociology and politics. He learnt five languages apart from his mother tongue.

He built the most powerful nationalist trade union in the country. It is remarkable that he never gave a call for bandh and also never made the trade union indulge in violence.

During the strike in 1960, Thengadi ji said “The right to strike from work is inherent in the right to work. Only when an alternative way is found other than strike, the concept of strike will lose its relevance”. He did not own a house or a car, not even a cell phone. He lived in a small room provided to him by the trade union. He lived a very simple but noble life.

He never sought publicity and appeared rarely in public, He never allowed himself to be photographed. He didn’t like to be interviewed. I am told that he refused to be decorated with a Padma award.

He was a great thinker, writer, organizer par excellence and had a unique working style. All these qualities are worth emulating. 

For him, nationalism was about taking views of all sections and their interests. He never believed in the distinction between classes. He never believed in class hatred and class wars and rendered the very notion of class itself as irrelevant. He was willing to change according to times.
Having worked with Dr BR Ambedkar in his last days he was inspired by him.

What I like most is his building the largest union of agriculturists in India, the Bharatiya Kisan Sangh.

He was a truly inspirational person.  He was in many ways a Karmayogi.  I am fortunate enough to have known him intimately and derived a lot of inspiration from his thinking and approach.

ठेंगड़ी जी के कृतित्व का विस्तार वास्तव में असीम था। उसे सिर्फ ‘समर्पित राष्ट्रनिष्ठा’ के रूप में ही परिभाषित किया जा सकता है। ठेंगड़ी जी ने आजन्म राष्ट्र धर्म के हर आयाम का पालन अनुकरणीय निष्ठा से किया - बचपन में वानर सेना के कार्यकर्ता के रूप में, किशोरावस्था में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की गतिविधियों में, केरल और बंगाल में प्रचारक के रूप में, या फिर इंटक के पदाधिकारी के रूप में, उन्होंने राष्ट्र सेवा के हर अवसर को पूरी आस्था से निभाया। उनकी राष्ट्र पूजा के केंद्र में समाज के वंचित, श्रमिक और कृषक वर्ग के सरोकार रहे।

ठेंगड़ी जी ने देश में नए श्रमिक आंदोलन की नींव डाली। 1955 में उनके द्वारा प्रारंभ किया हुआ ‘अखिल भारतीय मजदूर संघ’ आज देश का एक प्रमुख श्रमिक संगठन है। ठेंगड़ी जी को रेलवे, डाक, वस्त्र, कोयला खदान, बैंक जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत श्रमिकों की विशेष समस्याओं का गहरा ज्ञान था। उन्होंने विभिन्न स्तरों पर इन श्रमिकों के साथ कंधे से कंधा मिला कर कार्य किया था।

श्रमिक आंदोलन में उनके अनुभव का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी आदर करते थे।आर्थिक और श्रमिक मुद्दों पर विचार विमर्श करने के लिए उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सहित विश्व के अन्य देशों के संगठनों ने उन्हें आमंत्रित किया।

जैसा कि मैंने कहा कि ठेंगड़ी जी की समाज सेवा का आयाम विस्तृत था। उन्होंने ऐसे संगठन स्थापित किए जो आज राष्ट्रीय जीवन में सक्रिय भागीदार है - भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, पर्यावरण मंच, सामाजिक समरसता मंच आदि। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय शिक्षक संघ, वनवासी कल्याण आश्रम जैसी अनेक संस्थाओं के प्रेरणा स्रोत रहे।

ठेंगड़ी जी ने राष्ट्रीय जीवन में हर वर्ग और हर पहलू को स्पर्श किया और उसका समावेश किया। वे सर्व समावेशी एक सम्पूर्ण विचारक थे। उनके विचार - संसार में समाज के हर वर्ग के लिए स्थान था। इसी प्रयास में ठेंगड़ी जी ने अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय अधिवक्ता संघ, संस्कार भारती की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान किया। ये सभी संस्थाएं राष्ट्र निष्ठा से प्रेरित होकर राष्ट्रीय जीवन में रचनात्मक योगदान कर रही हैं।

लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि जनसाधारण की सक्रियता सिर्फ मतदान तक सीमित रहे बल्कि वे निरंतर राष्ट्रीय जीवन में सक्रिय रहें। जनसाधारण को रचनात्मक स्वर देने और उनके समवेत प्रयासों से जन-सरोकारों का समाधान निकालने के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है। यह ठेंगड़ी जी की दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने ऐसी संस्थाओं की स्थापना की।

उनकी संगठन और नेतृत्व क्षमता अद्वितीय थी। उनकी संगठन और नेतृत्व क्षमता बारे में यह कहना सर्वथा उचित है कि उन्होंने ' शून्य से कई हिमालय खड़े किए ' और आज वही हिमालय हमारे राष्ट्रीय जीवन के शिखर हैं, जो समाज और अर्थ व्यवस्था का मार्ग दर्शन कर रहे हैं।

दत्तोपंत ठेंगड़ी जी अपने अनुभवों को अपनी पुस्तकों, लेखों के माध्यम से साझा करते थे। उनकी लिखी 200 से अधिक पुस्तकें उनके व्यापक अनुभव का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

यही नहीं वे अपनी लिखी लंबी सारगर्भित प्रस्तावनाओं के माध्यम से दूसरे लेखकों की पुस्तकों में भी योगदान देते थे। Hindu Economics, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विचार दर्शन, India's Planned Poverty, आपातकालीन संघर्ष गाथा जैसे ग्रंथों में उनकी लिखी प्रस्तावना इन विषयों पर उनके गंभीर अध्ययन और अनुभव को प्रतिबिंबित करती हैं।

यद्यपि उनकी मातृभाषा मराठी थी फिर भी प्रचारक के रूप में अपने प्रवास के दौरान, उन्होंने मलयालम, बंगाली, संस्कृत भाषाओं जा अध्ययन किया और निपुणता प्राप्त की। देश की भाषाई एकता के लिए उनका उदाहरण आज भी प्रासंगिक और अनुकरणीय है।


ठेंगड़ी जी का अधिकांश समय और ऊर्जा देश की अर्थव्यवस्था में कृषकों और श्रमिकों को अभीष्ट मर्यादित स्थान दिलाने में ही बीते।

कृषक और श्रमिक ही देश की पूंजी होते हैं, उन्हीं के श्रम से देश की संपदा का निर्माण होता है। देश की सम्पन्नता उसकी संपदा से आंकी जाती है। मुद्रा तो उस संपदा को मापने का सिर्फ एक पैमाना मात्र होती है। अतः ज़रूरी है कि हम उस संपदा को पैदा करने वाले हर व्यक्ति का सम्मान करें, उसके योगदान का सम्मान करें। वो चाहे श्रमिक हो या निवेशक या प्रबंधक - सभी एक ही लम्बी श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। उत्पादन श्रृंखला की हर कड़ी अर्थव्यव्स्था में महत्वपूर्ण भागीदार है।

हमें इस तथ्य को हमें समझना होगा कि राष्ट्र की संपत्ति के निर्माण में पूंजी और श्रम दोनों का योगदान है। पूंजी और श्रम के बीच सहयोग और संतुलन ही अर्थव्यव्स्था और समाज को स्थायित्व दे सकते हैं।

एक स्थाई और समावेशी अर्थव्यव्स्था के लिए आवश्यक है कि संसाधनों का वितरण बराबर हो। कुछ ही हाथों में संपत्ति का ध्रुवीकरण, अर्थव्यव्स्था में असंतुलन और समाज में रोष पैदा करेगा। जो मेहनतकश मजदूर और किसान अर्थव्यव्स्था में अपने श्रम का योगदान करते हैं, वे ही उपभोक्ता के रूप में अर्थव्यव्स्था में मांग भी पैदा करते हैं। अतः ज़रूरी है कि उनके हाथों में क्रय शक्ति बढ़ाई जाए, तभी समावेशी आर्थिक विकास के पहिए तेज़ी से आगे बढ़ेंगे। यह सामाजिक और आर्थिक न्याय की दृष्टि से भी आवश्यक है।

ऐसी ही न्यायपूर्ण, पर्यावरण सम्मत, संस्कार सम्मत अर्थव्यव्स्था को बनाने के लिए गांधी जी ने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत दिया था। धन किसी के निजी वैभव के लिए नहीं बल्कि समुदाय की साझा संपत्ति होता है, जिसे ज़िम्मेदारी से जनकल्याण के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए।


आज वैश्विक अर्थव्यव्स्था में तीव्र बदलाव रहा है। देश की अर्थव्यवस्था भी बदल रही है। In tandem with the global economy, we too are changing our economy. New legislative architecture is being created for a transparent, sustainable, efficient, high growth inclusive economy. New Startup actors are emerging in our economy. India has the third largest pool of Startups. We are steadily climbing up the ladder of Ease of Doing Business Global rankings. We are witnessing constructive disruptions in the economy. Their adverse impact on the economy will only be transient before economy regains a high growth trajectory.

आज विश्व तकनॉलाजी आधारित चौथी औद्योगिक क्रांति की तरफ बढ़ रहा है। यदि हमें इस नई औद्योगिक क्रांति में अग्रणी भूमिका निभानी है तो नई अर्थव्यव्स्था में नई औद्योगिक संस्कृति, नए कौशल की आवश्यकता होगी। हमारे श्रमिकों, किसानों, युवाओं को नई टेक्नोलॉजी में दक्षता हासिल करनी होगी। नई दक्षता पर आधारित अर्थ संस्कृति विकसित करने के लिए, अखिल भारतीय मजदूर संघ जैसी संस्थाओं के सक्रिय सहयोग और मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी जो बदलती वैश्विक अर्थव्यव्स्था की आवश्यकताओं तथा हमारी सामाजिक आर्थिक सच्चाइयों के बीच संतुलन बना सके। मैं अखिल भारतीय मजदूर संघ और भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों से आग्रह करूंगा कि वे हमारे श्रमिकों और किसान भाइयों को नई तकनीकों में प्रशिक्षित करें, सरकार के कार्यक्रमों से उन्हें परिचित कराएं, उन्हें नई अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करें।

औपनिवेशिक अंग्रेज़ी सत्ता आने से पहले तक, एक सभ्यता के रूप में भारत अपने हुनर और संसाधनों के बल पर विश्व व्यापार से प्रायः लाभान्वित ही हुआ है। विगत तीन शताब्दियों के औपनिवेशिक अनुभव से ऊपर उठ कर, हम अपने सभ्यतागत संस्कारों और कौशल पर पुनः विश्वास के साथ, विश्व अर्थव्यव्स्था में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हों। मैं, श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की प्रेरणा से स्थापित संस्थाओं से आग्रह करता हूं कि वे राष्ट्र के सर्वसमावेशी तीव्र विकास के यज्ञ में अपना सक्रिय योगदान दें। समाज के हर वर्ग को इस आर्थिक विकास की प्रक्रिया से जोड़ें। " सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास " के मंत्र से ही " एक भारत, श्रेष्ठ भारत" का राष्ट्रीय संकल्प सिद्ध होगा जिसे ठेंगड़ी जी जैसे हमारे मनीषियों ने देखा था।

मेरे लिए यह सुखद संयोग है कि जिस राज्य सभा में ठेंगड़ी जी 1964-76 तक सदस्य रहे, उसके सभापति के रूप में मुझे उस सदन की सेवा करने का अवसर मिला है। ठेंगड़ी जी जैसे मनीषियों के आदर्श मेरा मार्ग दर्शन करते रहें, इसी अपेक्षा के साथ में एक बार पुनः स्वर्गीय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी की पुण्य स्मृति को सादर प्रणाम करता हूं और मुझे यह अवसर देने के लिए आप सभी का आभार व्यक्त करता हूं।

जय हिन्द !”