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Press Information Bureau
Government of India
Prime Minister's Office
18 DEC 2018 10:00PM by PIB Delhi
Text of PM’s speech on releases book “Timeless Laxman” in Mumbai

महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल, श्रीमान विद्यासागर राव, यहां के लोकप्रिय, यशस्‍वी, युवा मुख्‍यमंत्री श्रीमान देवेन्‍द्र जी, सुश्री ऊषा लक्ष्‍मण जी, डॉ. आलोक शर्मा जी और और यहां उपस्थित लक्ष्‍मण परिवार के सभी स्‍वजन और सभी जागरूक नागरिक।

ये मेरा सौभाग्‍य है कि इस Timeless Journey में मुझे भी शरीक होने का अवसर मिल रहा है। मेरा ऊषा जी से परिचय रहा तब से बातचीत करने का मौका मिलता है, उनके विचारों को जानने का मौका मिलता है, परिवार के लोगों से मिलने का मौका मिलता है; तो मैंने उनसे एक बार सुझाव दिया था कि अब हमें इसको इतना सारा contribution है, इसको आधुनिक टेक्‍नोलॉजी से जोड़ना चाहिए, Digital form में लाना चाहिए और दूसरा मेरा सुझाव था कि इसको animation form में अगर हम ला सकते हैं तो शायद जो समाजशास्‍त्र कभी पढ़ाया जाता था, वो पढ़ने का आसान जरिया अकेले लक्ष्‍मण के कार्टून से बन सकता है, इतनी बड़ी ताकत है।

और मुझे खुशी है कि मेरी इन बातों को उन्‍होंने स्‍वीकार किया और जी-जान से जुटे। और सबसे बड़ी बात है इन सारे काम में उन्‍होंने मुझे कभी परेशान नहीं किया। वरना कभी होता क्‍या है, किसी को सुझाव दो…अच्‍छा आपने वो सुझाव दिया था तो अब आगे थोड़ा मदद करो। कुछ नहीं, अपने बलबूते पर इतना बड़ा काम किया है और इसलिए मैं उस परिवार के सबको, कम्‍पनी को बहुत बधाई देता हूं।

ये प्रयास लक्ष्‍मण जी के लिए नहीं हैं, उनको स्‍मरण करने के लिए नहीं हैं। यानी लक्ष्‍मण एक व्‍यक्ति नहीं थे, वे करोड़ो common man में बसे हुए एक तत्‍व थे और जिसके भीतर भी करोड़ों मन विराजमान थे और उसका प्रकटीकरण उनके पीशी में हुआ करता थ। और इसलिए मैं तो अब देवेन्‍द्र जी से भी आग्रह करूंगा अगर हो सके तो महाराष्‍ट्र की कोई यूनिवर्सिटी...एक केस स्‍टडी करें और क्‍या कार्टून के माध्‍यम से चार-पांच दशक की समाज की अवस्‍था, समाज का मनोविज्ञान, राजनीति के चौराहे पर चलती गतिविधियां, देश की अपेक्षाएं और सरकारों की वृति-प्र‍वृति; कार्टून के जरिए भारत का सामाजिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक इतिहास इसका एक केस स्‍टडी हो सकता है...और लक्ष्‍मण ने कैसे इसको बांधा है ये तो पकड़ा सकता है। और हो सकता है कि शायद आने वाली पीढ़ियों को ये ताकत के रूप पर काम  आता है।

मैं हमेशा ये सोचता हूं कि एक आर्टिस्‍ट और एक कार्टूनिस्‍ट में फर्क क्‍या होता है....मैं गलत हो सकता हूं...लेकिन शायद लगता है कि कार्टूनिस्‍ट ईश्‍वर के सबसे ज्‍यादा निकट होता है और शायद उसका direct dialing ईश्‍वर के साथ रहता है। क्‍योंकि ईश्‍वर हर व्‍यक्ति को एक प्रकार का नहीं बनाता है। कुछ न कुछ विशेषता हरेक के चेहरे में, नाक-नक्‍शे में कुछ न कुछ बनाता है। हमको कोई मिलता है तो हमको वो...सुभाष जी मिलेंगे तो ऐसा ही लगेगा हां, सुभाष जी बड़े अच्‍छे हैं लेकिन कार्टूनिस्‍ट मिलेंगे ना तो कार्टूनिस्‍ट को सुभाष जी नहीं दिखेंगे...कान थोड़ी लंबी होगी तो वो ही दिखाई देगी...नाक थोड़ी टेढ़ी होगी तो वो ही दिखाई देगी क्‍योंकि उसने उसको मैसेज दिया हुआ है कि देख मैंने जिस सुभाष को बनाया था तो ऐसे बनाया था तो तुम जब इसको मिलो तो ये पकड़ना है। और इसलिए कार्टूनिस्‍ट...और खुद लक्ष्‍मण खुद का कार्टूनिस्‍ट भी बनाते हैं...तो वो तो कलम के धनी थे, पेशे के धनी थे...वो भी अपने-आप को सुन्‍दर बना सकते थे। लेकिन ऐसा नहीं किया, उन्‍होंने खुद को भी वैसा ही टेढ़ा-मेढ़ा बनाया…उन्‍हीं बालों को उन्‍होंने अपना ;;;; बना दिया।

अब कॉमन मैन...मैं नहीं मानता हूं कि हमारे जो costume designers हैं उन्‍होंने लक्ष्‍मण को कोई advice की होगी। कोई ये कॉमन मैन को देख करके कह सकता है कि ये किस स्‍टेट के हैं। वरना कितना ही बड़ा फैशन डिजाइनर हो, कितना बड़ा आर्टिस्‍ट हो, वो किसी का भी चित्र बनाएगा तो दिखेगा कि यह शायद तमिल का छाया है या ये नॉर्थ-ईस्‍ट की छाया है...शायद इसमें बंगाली रूप दिखता है। उन्‍होंने कॉमन मैन का ड्रेसिंग ऐसे किया है कि हर हिंदुस्‍तानी को लगता है कि मेरा है...कोई कह नहीं सकता ये उस राज्‍य वाला है। साहब ये कितना बड़ा...यानी जो इसको माइनोरिटली देखेगा उसको पता चलेगा कि ऐसा कॉमन मैन क्‍यों ढूंढा जिसके पूरे पहनावे से पक्‍का नहीं कर सकते हैं कि हिंदुस्‍तान के किसी एक इलाके को वो represent करता है...और न ही वो एक युग को represent करता है जी। ये कॉमन मैन constant है...उसके जूते में आधुनिकता है, उसकी मूछों में दम है, लेकिन छाते के बिना जिंदगी नहीं है। यानी एक उनके मन को मैं पढ़ने की कोशिश करता हूं तो ऐसा क्‍यों किया होगा...क्‍योंकि उनको पता था भारत एक ऐसा देश है जहां लोगों की मानसिकता जैसे-जैसे राजनीति में विकृति आती जा रही है…बिखराव ढूंढना...अलग का ढूंढना...उनकी कोशिश थी एकता को समेटना। ये अपने-आप में बड़ा contribution था।

और इसलिए, लक्ष्‍मण की इस ताकत को...अब ये ठीक है हम लोग ऐसी चीजों को miss करते हैं और जिस राजनीतिक जीवन कालखंड में उनका योगदान रहा मैं पक्‍का मानता हूं हर politician अखबार पढ़ने से पहले उनका कार्टून देखता ही देखता होगा और उसमें से उसे मैसेज मिल जाता होगा। इतनी ताकत होना ये अपने-आप में ही बड़ा है। कार्टून की दूसरी विशेषता है वह चूकता नहीं है जी...कभी चूकता नहीं है। सटीक से सटीक बात को, कठोर से कठोर बात को...लेकिन शब्‍दों में जो ताकत होती है दर्द देने की...कार्टून में मरहम देने की ताकत होती है। एक पल लगता है यार ये क्‍या है…दूसरे पल लगता है हां यार ये भी एक बात है। यानी जिसमें क्षमता है सत्‍य को तीव्रता से उजागर करने की लेकिन उसमें वो भी क्षमता है कि वो उस तीव्रता के बीच मरहम लगाने की। वो शायद लक्ष्‍मण की ताकत थी जो बेजोड़ ताकत थी जिसको कभी हम भूल नहीं सकते।

सामान्‍य मानवी की समस्‍याओं को उनको एक कार्टून था कि कॉमन मैन कार खरीदता है क्‍योंकि वो पूछते हैं क्‍या कर रहे हो...बोले कार लाया हूं लेकिन रोड ढूंढ रहा हूं कि कहां चलाऊं। यानी उस समय infrastructure के ऊपर…रास्‍ते नहीं थे, रोड नहीं थे...इतना सटीक, मार्मिक कहने का सामर्थ्‍य। जब उनको पूछा गया कि आप कॉमन मैन कहां से ढूंढे...तो बोले मैंने नहीं ढूंढा कॉमन मैन...कॉमन मैन ने मुझे ढूंढ लिया है। ये अपने-आप में मैं समझता हूं ये बात यानी सोचने की विशालता क्‍या थी। उनके भाई आर.के.नारायण की भी उन पर छाया रही जो उनकी कलम में नजर आया...उनके काफी लिखित के लेखन में भी उनका ध्‍यान आया।

आपने देखा होगा कि जब अटलजी की सरकार थी...मेरे मन पर इन चीजों का बड़ा प्रभाव रहता है क्‍योंकि हम ज्‍यादा अगर दुनिया बड़ी है हमने देखी नहीं...वो तामझाम क्‍या होता है हमें मालूम नहीं था...ये सब यहां आने के बाद देखा है। तो पहले तो ऐसे ही जिंदगी गुजारते थे तब उन्‍हीं चीजों को देखा था तो वही ध्‍यान में रहता है। जब अटलजी की सरकार बनी मैं पार्टी के संगठन का काम करता था। तो मैं एक दिन उनके एविएशन मिनिस्‍टर थे उनके पास चला गया। तो मैंने कहा भई मेरा एक सुझाव है...तो बोले क्‍या। तो हम तो उस समय बहुत सामान्‍य कार्यकर्ता थे तो उस समय मिलने के लिए दे दें यही बहुत बड़ी बात होती थी। मैंने कहा यार जमाना बदल गया, ये जो हमारे हवाई जहाज हैं उसमें ये राजा-महाराजा का सिंबल क्‍यों होता है। हैं...महाराजा का सिंबल रहता ना एक बड़ा सा। मैंने कहा ये लक्ष्‍मण का कॉमन मैन क्‍यों नहीं होना चाहिए...हवाई जहाज के दरवाजे पर सिंबल कॉमन मैन क्‍यों नहीं होना चाहिए? हमारी सोच क्‍यों नहीं बदलनी चाहिए। मेरे मन पर लक्ष्‍मण का इतना impact था ;;;; और आप जान करके खुश होंगे ये बात अटलजी तक पहुंची...और actually decision लिया गया था उस समय...हवाई जहाज की एक जो सेवा थी वहां राजा को हटा दिया था ये कॉमन मैन का चित्र लगा दिया गया। और उस समय...अभी भी शायद कई जहाज ऐसे हैं जिस पर ये चैक्‍स वाले कोट वाला कॉमन मैन...लक्ष्‍मण वाला कॉमन मैन आज भी लगा हुआ है। यानी सामान्‍य मानवी का तवज्‍जो महाराजा से ले करके कॉमन मैन तक हवाई जहाज को ले आना...और मुझे खुशी है मेरा तब तक तो उसकी पहचान और पेंटिंग तक सीमित था लेकिन वो विचार मेरे भीतर जीवित था। जब आज मुझे काम करने का मौका मिला तो मैंने सपना देखा कि जो हवाई चप्‍पल पहनता है वो भी मेरे देश में हवाई जहाज में घूमना चाहिए और हवाई चप्‍पल पहनने वाला आज देखिए देश में रेलवे के एसी कोच में जितने ट्रैवल करते हैं उससे ज्‍यादा हवाई जहाज में कर रहे हैं जी। तो जो लक्ष्‍मण को मैंने जिस रूप में कॉमन मैन के रूप में देखा था उस कॉमन मैन को अब अंदर बिठाने की दिशा में मैं काम कर रहा हूं।

अब देखना होगा भारत सरकार इन दिनों जो पद्मश्री पद्म विभूषण देती है ये सचमुच में अध्‍ययन करने जैसा विषय है। खैर हमारे देश में अच्‍छी चीजों का अध्‍ययन करने के लिए समय बहुत कम है लोगों के पास लेकिन फिर भी समय मिल जाए तो अध्‍ययन करने जैसा विषय है। वरना पहले बड़े-बड़े लोग जिसकी जान-पहचान है, पहुंच है, वो ही पद्मश्री, पद्मविभूषण के लिए योग्‍य रहे थे। पिछले चार साल में हमने उसको पूरी तरह बदल दिया है। कॉमन मैन...अगर उसने समाज के लिए, देश के लिए जीना जी करके कुछ किया है तो वो पद्म के लिए सम्‍मानित होगा। और मैं मानूंगा कि कभी कोई न कोई यूनिवर्सिटी केस स्‍टडी करेगी कि चार साल में जो पद्मश्री, पद्मविभूषण मिले हैं उसमें कॉमन मैन का reflection क्‍या है और देश कितनी ताकतों से भरा पड़ा है उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसी बहुत सी चीजों में बदलाव आया है और उसका मूल कारण...हम उस तबके से आए हैं...उस जिंदगी को जी करके आए हैं जहां पड़े हुए सामर्थ्‍य को हम भलीभांति जानते हैं। और वो ही सामर्थ्‍य है जो देश के सामर्थ्‍य के रूप में शक्ति प्राप्‍त करने की दिशा में हमारा प्रयास है।

लक्ष्‍मण ने बहुत बड़ी सेवा की है। हम लोगों का काम है कि हमारी नई पीढ़ी को प्रेरणा मिले। इस क्षेत्र के जो नौजवान हैं...मुझे विश्‍वास है कि ये किताब उनको बहुत काम आएगी...जो Finance के विद्यार्थी हैं, जो कार्टून की दुनिया में जाना चाहते हैं। और मुझे खुशी है कि अब उनकी पोती आधुनिक विचारों के साथ आई हैं। वो कॉमन मैन लेकर आए...ये कॉमन वूमैन ले करके आई है...तो gender equality का भी ये अच्‍छा प्रयास हो रहा है।

तो मेरी इस पूरे परिवार को बहुत-बहुत बधाई है, बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं और मैं विश्‍वास से कह रहा हूं कि ये सचमुच में उनके लिए तो Less Time था क्‍योंकि जीवन कहीं न कहीं तो रुकता ही है Less Time था...लेकिन वो हमारे लिए ‘’Timeless’’ हैं ‘’Timeless’’ रहेंगे।  

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

 

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DS/NS/AK