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पर्यावरणीय शासन व्यवस्था में जनजातीय समुदायों की भागीदारी को केंद्र में लाने पर जोर: एचएनएलयू और एफईएस ने आयोजित की दो दिवसीय कार्यशाला

कानून, नीति और संरक्षण के साथ सामुदायिक अनुभवों एवं पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर हुआ विचार-विमर्श

प्रविष्टि तिथि: 01 NOV 2026 6:56PM by PIB Raipur

हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर और फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (एफईएस) द्वारा ‘जनजातीय समुदाय और पर्यावरणीय शासन व्यवस्था’ विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का संयुक्त आयोजन किया गया। कार्यशाला में जनजातीय समुदायों के अनुभवों एवं दृष्टिकोणों को कानून, नीतिगत ढांचे और पर्यावरण संरक्षण के विभिन्न पहलुओं के साथ जोड़ते हुए व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए एचएनएलयू के कुलपति प्रोफेसर (डॉ.) वी. सी. विवेकानंदन ने कहा कि पर्यावरणीय शासन व्यवस्था में वनों के वास्तविक संरक्षकों अर्थात् वन-आश्रित समुदायों को हाशिये पर नहीं रखा जा सकता, बल्कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में स्थान देना आवश्यक है। उद्घाटन सत्र में श्री सत्यजीत जेना ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वहीं, प्रोफेसर विष्णु कोनूरायर, अधिष्ठाता (अनुसंधान) ने कार्यशाला के उद्देश्यों एवं विषयगत रूपरेखा पर प्रकाश डाला। डॉ. अयान हजरा, सह-संयोजक ने स्वागत उद्बोधन दिया तथा सुश्री सत्यवती ने भी प्रतिभागियों को संबोधित किया। एचएनएलयू के संकाय सदस्य श्री आशुतोष अहिरे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

कार्यशाला के विभिन्न तकनीकी सत्रों में जनजातीय अधिकारों, पर्यावरणीय शासन, जलवायु अनुकूलन और समुदाय आधारित संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई। सुश्री सत्यवती और सुश्री धनश्वरी सेन ने सामुदायिक दृष्टिकोण एवं अनुभवों को साझा किया। फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी के प्रतिनिधियों डॉ. मनजीत बाल कौर और श्री शिवम ने भी विचार-विमर्श में योगदान दिया। श्री संजय पटनायक ने पर्यावरणीय शासन व्यवस्था तथा श्री सत्यजीत जेना ने जलवायु अनुकूलन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखी। श्री प्रखर जैन ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) तथा श्री अश्वनी कांगे ने वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों और महत्व पर चर्चा की। डॉ. नीरज देवांगन ने शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच पारस्परिक सीख एवं ज्ञान के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यशाला के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि पर्यावरण प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और नीतिगत निर्णयों में जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, अनुभवों और सहभागिता को संस्थागत स्तर पर उचित स्थान दिया जाना चाहिए।

कार्यशाला की आयोजन समिति में डॉ. अयान हजरा, डॉ. राणा नवनीत रॉय, डॉ. देबोमिता मंडल और प्रोफेसर आशुतोष अहिरे शामिल थे। समापन सत्र में विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव प्रोफेसर दीपक श्रीवास्तव ने प्रतिभागियों को संबोधित किया। श्री प्रदीप बर्मन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। आयोजन में छात्र आयोजन समिति के सदस्य अगम गुप्ता, सान्या पुरोहित, एलिस, अंशी, लिजा, दीपक, फणीभूषण और विदित माथुर ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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आरडीजे/आरके


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