प्रविष्टि तिथि:
25 OCT 2026 11:38AM by PIB Delhi
मेरे प्यारे देशवासियो,
‘मन की बात’ में एक बार फिर आप सबका स्वागत है। आज से 12 वर्ष पहले, विजयादशमी के पावन अवसर पर, हमने ‘मन की बात’ की शुरुआत की थी। तब से अब तक, हमारी ये यात्रा निरंतर जारी है। इस यात्रा के सहयात्री भी आप हैं और मार्गदर्शक भी आप ही हैं। साथियो मेरे लिए ‘मन की बात’ देश के सामान्य मानवी के परिश्रम, उसके पराक्रम, उसकी प्रतिबद्धता, उसके समर्पण और सेवा-भाव का गौरवगान करने का एक शुभ अवसर रहा है। हमारे देश में सदियों से तीर्थ यात्रा की परंपरा रही है। मेरे लिए ‘मन की बात’ भी देश के लोगों के प्रयासों को करीब से जानने की और उनके योगदान को नमन करने की एक तीर्थ यात्रा से कम नहीं है। साथियो, जो लोग समाज और राष्ट्र के लिए जीते हैं, वे अपने आप में एक तीर्थ के ही स्वरूप हैं। 12 वर्षों में देश के हर कोने से ऐसे अनेक लोग सामने आए हैं जिनकी असाधारण कार्यों की ओर सामान्य रूप से समाज का ध्यान नहीं जाता। ‘मन की बात’ ने ऐसी अनगिनत प्रेरक कहानियों को आप सब के सामने लाने का काम किया है।
साथियो,
मैं इस कार्यक्रम के माध्यम से एक तरह से देश की लोकशक्ति की आराधना करता हूँ। मुझे इसके माध्यम से देश के हर परिवार से जुड़ने का अवसर मिलता है। मुझे सैंकड़ों ऐसे संदेश मिलते हैं जिनमें लोग बताते हैं कि ‘मन की बात’ सुनकर उन्हें ऐसा लगता है, जैसे मैं उनके बीच उनके परिवार में बैठकर एक परिवार के सदस्य की तरह उन सबसे संवाद कर रहा हूँ। मेरे लिए आप सभी श्रोताओं की ये आत्मीयता, आपका ये स्नेह बहुत अमूल्य पूंजी है।
मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे देश में ऐसे अनेक पारंपरिक हुनर हैं, जो पीढ़ियों से हमारी पहचान का हिस्सा रहे हैं, और सुखद ये है कि अब इन परंपराओं से जुड़कर अनेकविध नए प्रयोग भी हो रहे हैं, इन्हें आज के समय के अनुरूप आगे बढ़ाया जा रहा है। पंजाब में ऐसा ही एक प्रयास काफी समय से चल रहा है, यहाँ ‘खेती विरासत मिशन’ नाम की एक संस्था ने organic farming और पारंपरिक कृषि के तौर-तरीकों को नया जीवन देना शुरू किया। इस टीम के लोग पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना चाहते थे। इस पहल को नाम दिया गया ‘नव-त्रिन्जन’। इस पहल के तहत यहाँ बिना chemical का इस्तेमाल किए organic कपास उगाई जाती है। यहाँ प्राकृतिक रंगों वाली कपास भी उगाई जाती है इससे तैयार धागे और कपड़े को रंगने के लिए अलग से chemical इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती। आप कल्पना कर सकते हैं, इससे पर्यावरण की कितनी बड़ी मदद हो रही है। साथियो, कुछ साल पहले ‘नव-त्रिन्जन’ ने एक weaving स्कूल भी शुरू किया। इसका लक्ष्य है बुनकरी के हुनर को नई पीढ़ी तक पहुंचाना। इस स्कूल ने भी बहुत सारी महिलाओं की लोगों की ज़िंदगी बदल दी है। रमनदीप कौर जी इसकी एक मिसाल हैं। पहले वो मजदूर के रूप में काम करती थीं, लेकिन स्कूल में training के बाद आज उनकी पहचान एक कुशल बुनकर के तौर पर है। रेखा रानी जी ने तो training लेने से पहले कभी handloom देखा तक नहीं था। उनके द्वारा बनी गई शॉल भारत की माननीय राष्ट्रपति जी को भेंट की गई है। इसी तरह सुनेहा देवी जी पहले घरों में काम करती थीं, लेकिन आज वे handloom पर अद्भुत fabric तैयार कर रहीं हैं। रजनी कौर जी पहले खेतों में मजदूरी पर निर्भर थीं, अब नए हुनर से उन्हें घर चलाने में काफी मदद मिली है। स्कूल से training के बाद ऐसी अनेक महिलाएं अब स्वदेशी organic cotton से बने धागों का इस्तेमाल कर शॉल, तौलिए और दूसरे कपड़े तैयार कर रही हैं। इन प्रयासों से उनके जीवन में खुशहाली आ रही है।
कुछ महीने पहले National Handloom Day पर मुझे भी इस टीम से मिलने का अवसर मिला था। उस दौरान मैंने काम के प्रति उनके जुनून और समर्पण का अनुभव किया था। मैं उस पूरी टीम को उज्जवल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ।
मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे यहां प्रकृति के प्रति सम्मान की बहुत पुरानी परंपरा रही है। हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया है कि अपने आस-पास स्वच्छता रखना, जल-स्रोतों की देखभाल करना ये हमारी अपनी जिम्मेदारी है। मुझे खुशी होती है, जब मैं देखता हूं कि देश के कितने ही लोग इसी भावना को अपना जीवन बनाए हुए हैं। यही भाव उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में भी देखने को मिलता है। यहां लोगों ने मिलकर एक नदी को नया जीवन देने का प्रयास किया है| ये नदी है ‘हेवल’ (Havel)। कुछ समय पहले हेवल (Havel) नदी में पानी कम होने लगा था। आस-पास के प्राकृतिक जल-स्रोत भी सूख रहे थे। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और गांव के लोगों ने मिलकर हेवल (Havel) नदी को बचाने का अभियान चलाया। इस दौरान बारिश का पानी रोकने के उपाय हुए, जमीन में पानी पहुंचाने के लिए काम हुआ और बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए। आज इस प्रयास से हेवल (Havel) नदी को नया जीवनदान मिला है और साथ ही दर्जनों प्राकृतिक जल-स्रोतों के पुनर्जीवन में भी मदद मिली है।
साथियो,
जब समाज ऐसी भावना से एकजुट होता है तो बदलाव की Guarantee पक्की हो जाती है। इसकी एक झलक हम अपने त्योहारों में भी देखते हैं। कुछ ही दिन बाद दीवाली और छठ का पावन पर्व आने वाला है। इसके लिए जगह-जगह साफ-सफाई का अभियान चलाया जा रहा है। ये जरूरी है कि हम जहां रहते हैं, वहां की स्वच्छता का ध्यान रखें। हमारे छोटे-छोटे प्रयास ही हमारे आस-पास बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
मेरे प्यारे देशवासियो,
त्योहारों के इस मौसम में आप सभी ने अपने आस-पास एक बदलाव जरूर महसूस किया होगा। अब लोग खरीदारी करते समय स्वदेशी उत्पादों को बहुत महत्व देने लगे हैं। ‘Vocal for Local’ की ये भावना अब हमारे उत्पादों को दुनिया के बाजारों तक पहुंचा रही है। बिहार के पूर्णिया का मखाना अब Greece पहुँच रहा है। कर्नाटका के कलबुर्गी की अरहर दाल अब मालदीव जा रही है, यानि, भारत के किसानों के लिए दुनिया में नए बाजार खुल रहे हैं। साथियो, Local उत्पादों की चर्चा करते हुए, मैं, एक और विषय की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहता हूं। किसी भी उत्पाद की Quality के साथ ही उसकी packaging भी बहुत मायने रखती है। कई बार हम बाजार में कोई चीज देखते हैं, तो उसकी अच्छी packaging देखकर ही उसे हाथ में उठाते हैं। हम packaging देखकर ही उस product के बारे में जानना चाहते हैं। इसी बात को समझते हुए अब packaging पर भी जोर दिया जा रहा है। साथियो, महाराष्ट्र में आदिवासी समुदायों ने अपने बनाए उत्पादों की packaging उस पर बहुत focus किया है। यहां ‘शबरी नेचुरल्स’ के जरिए शहद, महुआ, चिरौंजी और बांस से बने उत्पाद बाजार में लाए जा रहे हैं। इनकी packaging पर आदिवासी कला की छाप है। आपको जानकर खुशी होगी कि इस packaging को जापान का प्रतिष्ठित ‘Good Design Award’ मिला है। हमारे युवा भी इस क्षेत्र में नए प्रयोग कर रहे हैं। कर्नाटका का ‘बैंबू’ start-up. बांस और खेती से निकलने वाले अवशेषों से packaging material बना रहा है।
साथियो,
जब स्थानीय उत्पादों की बात होती है तो खादी की चर्चा स्वाभाविक है। इस बार गांधी जयंती पर सिर्फ एक दिन में खादी ग्रामोद्योग के उत्पादों इसकी बिक्री 28 करोड़ रुपये से अधिक की रही। ये पिछले साल से भी डेढ़ करोड़ रुपये और ज्यादा ही है, यानि, खादी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है और इसका लाभ उन लोगों तक भी पहुंच रहा है, जिनके हुनर और मेहनत से खादी Handicraft जैसी अनेक चीजें तैयार होती हैं। साथियो, त्योहारों पर हम अपने परिवार और प्रियजनों के लिए बहुत कुछ खरीदते हैं। इस बार भी खरीदारी करते समय स्थानीय कारीगरों के बनाए उत्पादों को प्राथमिकता दीजिए। आपकी खरीदारी से उनका उत्साह बढ़ेगा। आपका ये अपनापन ‘Vocal for Local’ अभियान को और आगे ले जाएगा, और, जितना ‘Vocal for Local’ अभियान आगे बढ़ेगा, उतनी ही तेजी से आत्मनिर्भर भारत का सपना भी पूरा होगा और इसलिए मेरा व्यक्तिगत रूप से आपसे आग्रह है कि आप स्थानीय कारीगरों के बनाए उत्पादों को प्राथमिकता दीजिए, प्रमुखता दीजिए।
मेरे प्यारे देशवासियो,
हमारे देश के लोगों की एक बड़ी विशेषता है। हम नई Technology को बहुत जल्दी अपना लेते हैं। हम सहज रूप से Technology को अपनी दैनिक जिंदगी का हिस्सा भी बना लेते हैं। ‘e-Sanjeevani योजना’ इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है। इससे पता चलता है कि लोगों के जीवन को आसान बनाने में Technology का कैसे बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। मुझे ये देखकर बहुत संतोष होता हैं कि इसके जरिए अब तक करीब 50 करोड़ Tele-Consultation किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा बहुत बड़ा है। Technology की ताकत, हमारे डॉक्टरों के सेवाभाव, और देशवासियों के विश्वास का यह बेहतरीन उदाहरण है।
साथियो,
आज e-Sanjeevani सेवा अपने विशाल network के जरिए देश के दूरदराज के इलाकों में भी पहुंच चुकी है। इसका लाभ उठाने वाले लोगों की कहानियां आपको भावुक कर देंगी। अंडमान-निकोबार के बाराटाँग द्वीप में जारवा जनजाति के ओहो-ताहाने को तेज बुखार था। सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। ऐसे में local health workers ने e-Sanjeevani के जरिए expert doctor से संपर्क किया। उस बच्चे को निमोनिया था और जैसे ही वो expert doctor की निगरानी में आया, उसकी स्थिति में तेजी से सुधार होने लगा।
साथियो,
लक्षद्वीप के कल्पेनी में करीब 60 साल के कुन्ही कोया जी की तबीयत एक दिन अचानक बिगड़ गई थी। तब समुद्र के उस पार कवरत्ती में बैठे अनुभवी doctor से e-Sanjeevani के जरिए संपर्क किया गया। उन अनुभवी doctor ने local medical team को guide किया और कुन्ही कोया जी को राहत पहुंचाई। लद्दाख के जांस्कर में कुंजांग डोलमा जी को गर्भावस्था के दौरान कुछ complications हो गए थे। इस स्थिति में e-Sanjeevani उनके काम आई और specialist doctor ने तुरंत उनकी मदद की। नागालैंड के पेरेन में 12 साल के मुशेम उनको कान में infection और बुखार था। उन्हें भी e-Sanjeevani का फायदा हुआ। Expert Doctor ने तुरंत उनकी बीमारी पकड़ ली और सही दवाइयां सुझाईं।
साथियो,
एक समय था डॉक्टर को दिखाने में छोटी-सी स्वास्थ्य जांच में भी लोगों को काफी समय लग जाता था, बहुत कठिनाइयाँ आती थी। आज देशभर में लगभग 1 लाख 90 हजार आयुष्मान आरोग्य मंदिर लोगों के जीवन में नई-नई सुविधाएं लेकर आए हैं। ये आरोग्य मंदिर एक प्रकार से, पंचायतों के wellness centre के रूप में विकसित हो रहे हैं। सबसे सुखद बात यह है कि अब गाँवों के लोग भी नियमित जांच करवा रहे हैं, ताकि वे स्वस्थ रहें। और इसमें e-sanjivini बहुत बड़ी भूमिका निभा रही है।
मेरे प्यारे देशवासियो,
इस महीने की शुरुआत में मैं चेन्नई गया था। मेरी मुलाकात वहाँ देश के कई scientist, researchers और युवा प्रतिभाओं से हुई। हमारे युवा आज ऐसे subjects पर भी काम कर रहे है जो पूरी मानवता का भविष्य बदल सकते है और ऐसी ही एक field है Brain Research. इसी से जुड़े, ‘सुधा गोपाल कृष्णन brain centre’ का मैंने IIT Madras में लोकार्पण किया था इस centre ने एक brain imaging technology platform बनाया है जो दुनिया-भर के लिए मिसाल है। इसके जरिए मानव मस्तिष्क की High-resolution digital 3D तस्वीरें तैयार की जा रही है उनका लक्ष्य है आने वाले दिनों में 100 Human Brains की 3D mapping करके उनका बारीकी से अध्ययन करना। पूरी दुनिया में ये इस तरह का पहला मिशन है। इस काम में परम शक्ति super computer का इस्तेमाल किया जा रहा है।
साथियो,
इस brain centre के निर्माण में देश की industry ने सरकार के साथ मिलकर बड़ी भूमिका निभाई है। IIT के कई alumni और academia भी इस research centre के लिए साथ आए है। ये project इतना अहम इसलिए है, क्योंकि science की इतनी प्रगति के बावजूद भी मानव मस्तिष्क आज भी एक बड़ी वैज्ञानिक पहेली है। आज भी Alzheimer और Dementia जैसी बीमारियां हैं, जिनका कोई ठोस इलाज नहीं है। इसलिए विज्ञान human brain की functioning को जितना गहराई से समझेगा, उतने ही नए scope आने वाले समय में create होंगे। ये भी तय हुआ है कि 100 human brains का ये data आगे अलग-अलग field में research के लिए open source के तौर पर उपलब्ध कराया जाएगा।
साथियो,
इस तरह की advanced research में organ donation की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जो लोग अपना जीवन पूरा करने के बाद organ donate करके जाते हैं, वो कितने ही लोगों का जीवन भी बचाते हैं और research को भी संभव बनाते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण है – मध्य प्रदेश में नर्मदापुरम की शिवानी जी का। शिवानी जी एक सड़क दुर्घटना की शिकार हो गई थी। परिवार पर मुसीबत टूट पड़ी, लेकिन इस कठिन समय मे भी उनके परिवार ने एक ऐसा निर्णय लिया, जो हम सभी के लिए प्रेरणा हैं। यह फैसला था- शिवानी जी के अंग दान का। शिवानी जी के परिवार के इस फैसले से समाज और देश के लिए एक बड़ा संदेश गया है। मानवता के ऐसे एक कदम से किसी परिवार मे खुशियां फिर से लौट सकती हैं और साथ ही रिसर्च के कामों मे भी बड़ी मदद मिलती हैं।
मेरे प्यारे देशवासियो,
चेन्नई की मेरी visit के और भी अनुभवों की चर्चा भी मैं आप सबके साथ करना चाहूँगा। मेरा पहला अनुभव था – metro में युवाओं से संवाद। जबकि दूसरा programme था – IIT Madras की मेरी visit. इस दौरान यह देखना बहुत सुखद रहा कि हमारी युवा शक्ति कैसे problems के innovative solutions पर काम कर रही है। मैं जिन Start-Ups से मिला उनमें से एक, gold की quality को परखने पर काम करता है। इससे सोने की खरीदारी में होने वाली धोखाधड़ी से बचा जा सकता है। युवाओं की एक team, एक ऐसे platform पर भी काम कर रही है जिसके जरिए बैंक धोखाधड़ी से निकाली गई रकम को तेजी से recover किया जा सकेगा। वहीं एक team इस पर भी काम कर रही है कि cervical cancer की screening में AI कैसे मददगार बन सकता है। साथियो, IIT का interaction पूरी तरह से Deep-Tech पर focused था। इन Start-Ups को IIT Madras के Incubation ecosystem से मदद मिल रही है। इन्हीं में से एक Start-Up समुद्र के ऊपर उड़ने वाला electric vehicle विकसित कर रहा है। एक अन्य Start-Up Drone और electric गाड़ियों के लिए तेजी से charge होने वाली बैटरियां बना रहा है। एक team defence technology में AI के इस्तेमाल पर काम कर रही है।
साथियो,
आज हमारे युवा इतने असाधारण काम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें सही environment और support मिल रहा है। वरना, हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी कभी नहीं रही। आज से कुछ ही दिनों बाद 31 अक्टूबर को, भारत के एक ऐसे ही महान वैज्ञानिक नरिंदर सिंह कपानी जी की 100वीं जन्मजयंती है। उन्हें दुनिया ‘Father of Fiber Optics’ के रूप में जानती है। उनका जन्म पंजाब के मोगा जिले में हुआ था। प्रकाश को महीन fiber के माध्यम से आगे पहुंचाने की तकनीक में उनकी advanced research ने communication की दुनिया को नई दिशा दी। आज internet और digital communication के जिस युग में हम जी रहे हैं, उसकी कल्पना भी fiber optics के बिना बहुत मुश्किल है। आज इस अवसर पर हम नरिंदर सिंह कपानी जी को नमन करते हैं। मैं चाहूँगा, हमारे युवा कपानी जी जैसे वैज्ञानिकों के बारे में पढ़ें, जानें और उनसे प्रेरणा लें।
साथियो,
कुछ ही दिनों बाद 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल जी की जयंती है। इस दिन को देश ‘एकता दिवस’ के तौर पर मनाता है। इस अवसर पर देशभर में ‘एकता दौड़’ यानि ‘Run for Unity’ का आयोजन होता है। ‘Run for Unity’ हमारी एकता को मजबूत करने का, देश के प्रति अपने संकल्प को दोहराने का, एक बहुत बड़ा मौका है। मेरा आप सभी से आग्रह है कि इस बार भी ‘Run for Unity’ में बढ़-चढ़कर के हिस्सा लें। अपने परिवार, अपने मित्रों और आस-पास के लोगों को भी अपने साथ जोड़ें।
साथियो,
आप सभी को याद होगा कि भारत के आह्वान पर साल 2023 को ‘International Year of Millets’ के रूप में मनाया गया था। इसे पूरी दुनिया में बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी। इस पहल के जरिए लोगों ने जाना कि Super Food श्रीअन्न, यानि millets, हमारी अपनी संस्कृति से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं। North-East में भी millets की खेती की एक समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन समय के साथ लोग इससे दूर हो रहे थे। अब ये स्थिति बदल रही है।
साथियो,
मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में खांडुली नाम का एक गाँव है। यहाँ कई पीढ़ियों से millets, local food culture का अहम हिस्सा रहे हैं। लेकिन कुछ समय से, यहाँ इनकी खेती करने वाले किसानों की संख्या कम हो रही थी, ऐसे में, यहाँ की दो सहेलियों ने एक नई पहल की। उन्होंने millets से नए products बनाने पर ध्यान दिया। Millets का value edition करते हुए उन्होंने cookies, cake और muffins के साथ-साथ millets से बने baby food भी तैयार किए। इससे millets से बने products की बिक्री बढ़ी और millets की demand भी बढ़ने लगी। ऐसे में यहाँ के किसानों ने भी फिर से millets की खेती करना शुरू कर दिया है।
साथियो,
मेघालय के ही पश्चिम गारो हिल्स जिले के सादोलपाड़ा गाँव में भी कुछ नए प्रयास हो रहे हैं। यहाँ के किसान चेकजिंग संगमा जी ने, millets का महत्व समझते हुए आधुनिक तरीकों से इसकी खेती शुरू की है। इससे उनकी आय भी बढ़ी है और गाँव में भी एक जागरूकता आई है। इसी तरह नागालैंड के कोहिमा का एक गाँव है केज़ोमा। इस गाँव में एक दशक से भी ज्यादा समय से millets की खेती बंद थी। इसके चलते यहाँ एक पूरी पीढ़ी इस पारंपरिक फसल से अनजान रह गई। सोचिए, जिस फसल को उनके दादा-दादी उगाते थे, उसे गाँव वाले ही भूलने लगे। साल 2024 में यहाँ के लोगों ने millets की खेती फिर से शुरू की। 2025 में केज़ोमा ने अपना पहला millets festival मनाया। अब यहाँ भी millets से बनी चीजों की demand तेजी से बढ़ रही है। साथियो, millets की खेती से जुड़े उदाहरण अपने आप में एक बड़ा संदेश दे रहे हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि कैसे हमारे नौजवान, पारंपरिक फसलों को नए अवसरों से जोड़ रहे हैं, और कैसे हमारे गाँव, विरासतों को सहेजते हुए समृद्धि के रास्ते पर बढ़ रहे हैं।
मेरे प्यारे देशवासियो,
कल 26 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि जयंती है। हजारों वर्ष बीत गए, लेकिन महर्षि वाल्मीकि जी की रामायण आज भी हमें कुछ नया सिखाती है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के माध्यम से हमें जीवन की गहरी सीख दी है। एक ओर वे निरंतर प्रयास करते रहने का संदेश देते हैं, तो दूसरी ओर सेवा, करुणा और सामाजिक समरसता का महत्व समझाते हैं। वाल्मीकि रामायण में भगवान राम का चरित्र इन मूल्यों का बहुत सुंदर उदाहरण है। भगवान राम ने माता शबरी के प्रेम और भक्ति को अपनाया। निषादराज की मित्रता को सम्मान दिया। सबको साथ लेकर चलने का भाव, ये आदर्श आज भी हमें दिशा दिखाते हैं। इस भावना का प्रतिबिंब अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भी दिखाई देता है। वहां महर्षि वाल्मीकि, निषादराज और माता शबरी के मंदिर भी बनाए गए हैं। मुझे संतोष है कि अयोध्या में airport का नाम भी महर्षि वाल्मीकि जी के नाम पर ही रखा गया है। ये प्रयास हमारी उसी महान परंपरा को समृद्ध करते हैं, जिसमें सेवा, समरसता और करुणा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
मेरे प्यारे देशवासियो,
भारत की माटी में ऐसे कितने ही महान व्यक्तित्व पैदा हुए जिन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व हैं – भाई परमानंद जी। कुछ ही दिनों बाद 4 नवंबर को हम उनकी 150वीं जयंती मनाएंगे। भाई परमानंद जी की प्रेरणा और आदर्श का बड़ा स्त्रोत था – आर्य समाज से उनका गहरा जुड़ाव। 20वीं सदी के बिल्कुल शुरुआती कालखंड में ही भाई परमानंद जी आर्य समाज के काम से दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहाँ उनकी मुलाकात पूज्य बापू से भी हुई थी। उन्होंने गुयाना में गिरमिटिया समाज के बीच भी काम किया, जो उस समय आर्य समाज का एक बड़ा केंद्र था। मुझे भी गुयाना की अपनी यात्रा के समय आर्य समाज के स्मारक पर जाने का सौभाग्य मिला था। साथियो भाई परमानंद जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी। कहा जाता है कि भाई परमानंद जी ने ही लाला हरदयाल जी को अमेरिका जाने के लिए मनाया था। वे गदर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से भी एक थे। आज़ादी की लड़ाई में उनका प्रभाव इतना ज्यादा था कि अंग्रेजों ने उन्हें काला पानी की सजा दे दी थी। उनकी एक किताब है ‘आपबीती : काले पानी की कारावास कहानी’ स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को समझने के लिए ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। भाई परमानंद जी ने सजा खत्म होने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में कदम बढ़ाया। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि उन्होंने वीर भगत सिंह को भी पढ़ाया था। बाद के समय में वे कई वर्षों तक हिन्दू महासभा से भी जुड़े रहे। यानि गांधी जी से लेकर गुयाना तक, गदर से लेकर अंडमान तक उनका व्यक्तित्व बहुत प्रेरणादायक है। मैं भाई परमानंद जी को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। युवा साथियों से मेरा आग्रह है कि वे उनके बारे में जानें और दूसरों को भी प्रेरित करें।
मेरे प्यारे देशवासियो,
आने वाले दिनों में दिवाली, छठ महापर्व और कई दूसरे त्योहारों की रौनक रहेगी। आप स्वस्थ और सुरक्षित रहकर पूरे परिवार के साथ त्योहार मनाएं, और, दूसरों को भी अपनी खुशी में शामिल करें। मैं आप सभी को आने वाले त्योहारों की शुभकामनाएं देता हूं। मुझे हमेशा की तरह आपके संदेशों और सुझावों का इंतजार रहेगा। आपके सुझावों से ‘मन की बात’ को नए विषय मिलते हैं, नई दिशा मिलती है। अगले महीने हम फिर मिलेंगे, देशवासियों के नए प्रयासों और नई प्रेरक गाथाओं के साथ।
बहुत बहुत धन्यवाद।
नमस्कार।
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